बजट 2026: क्या UPI पेमेंट अब ‘फ्री’ नहीं रहेंगे? 10,000 करोड़ के घाटे ने डिजिटल इंडिया की चिंता बढ़ाई
बिजनेस डेस्क: 1 फरवरी को पेश होने वाले यूनियन बजट 2026 में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के सामने सबसे बड़ी चुनौती UPI सिस्टम की मजबूती बनाए रखना होगा। भारत में डिजिटल क्रांति लाने वाला UPI सिस्टम इस समय ‘बड़े संकट’ से गुजर रहा है, क्योंकि इसे फ्री रखने की पॉलिसी पेमेंट कंपनियों और बैंकों पर भारी फाइनेंशियल दबाव डाल रही है।
ट्रांजैक्शन कॉस्ट और ज़ीरो MDR का बोझ: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मुताबिक, हर UPI ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने में करीब 2 रुपये का खर्च आता है। सरकार की ‘ज़ीरो मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (MDR) पॉलिसी की वजह से मर्चेंट्स से कोई फीस नहीं ली जाती, जिसकी वजह से बैंकों और फिनटेक कंपनियों को यह सारा खर्च खुद उठाना पड़ता है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह मॉडल अब फायदेमंद नहीं रहा।
सरकारी सब्सिडी में कटौती: सूत्रों के मुताबिक, डिजिटल पेमेंट के लिए सरकारी इंसेंटिव में लगातार कमी आई है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में यह 3,500 करोड़ रुपये था, जो मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के बजट अनुमान में घटकर सिर्फ 427 करोड़ रुपये रह गया है। दूसरी ओर, अनुमान है कि अगले दो सालों में इस इकोसिस्टम को चलाने के लिए 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये के इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत होगी।
इंडस्ट्री की क्या मांगें हैं?: PhonePe और पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी पेमेंट कंपनियों ने मांग की है कि:
– बड़े मर्चेंट्स (जिनका सालाना टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा है) पर 25-30 बेसिस पॉइंट्स का MDR लगाया जाए।
– एक सस्टेनेबल रेवेन्यू मॉडल बनाया जाए ताकि कंपनियां साइबर सिक्योरिटी और ग्रामीण इलाकों में विस्तार में इन्वेस्ट करना जारी रख सकें।
RBI गवर्नर का इशारा: RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी इशारा किया है कि UPI हमेशा फ्री नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट होती है और मॉडल के सस्टेनेबिलिटी के लिए किसी को तो पेमेंट करना ही होगा। अगर बजट में कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया तो कई फिनटेक कंपनियों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

