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भारत-दक्षिण अफ्रीका ने एआई, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण में सहयोग बढ़ाने पर जताई सहमति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और दक्षिण अफ्रीका ने भविष्य की प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को नई गति देने पर सहमति व्यक्त की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अवसंरचना, उन्नत विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी और नवाचार आधारित साझेदारी दोनों देशों के संबंधों के अगले चरण की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरकर सामने आई हैं।

यह सहमति केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और दक्षिण अफ्रीका की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार उपमंत्री डॉ. नोमालुंगेलो जीना के बीच नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में आयोजित उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक के दौरान बनी। बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ वैज्ञानिक, नीति निर्माता और अधिकारियों ने भाग लिया।

नवाचार आधारित साझेदारी पर जोर

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के संबंधों को पारंपरिक अनुसंधान सहयोग से आगे बढ़ाकर नवाचार-संचालित साझेदारी में बदलने की आवश्यकता है, जो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक प्रभाव पैदा कर सके।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास पूरक क्षमताएं हैं, जिनका उपयोग कर विकासशील देशों के लिए किफायती, समावेशी और विस्तार योग्य तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स, नवाचार एजेंसियों और उद्योग जगत के बीच गहन सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।

एआई, क्वांटम तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर फोकस

बैठक के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, साइबर-भौतिक प्रणालियां, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्टार्टअप आधारित नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे नवाचार पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल है और राष्ट्रीय स्तर पर चल रही विभिन्न तकनीकी पहलों के कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर पैदा हुए हैं।

उन्होंने कहा कि विज्ञान का उद्देश्य केवल शोध तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे ऐसे समाधानों में परिवर्तित किया जाना चाहिए जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाएं, रोजगार सृजित करें और अर्थव्यवस्था को मजबूती दें।

स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी और वैक्सीन अनुसंधान में नए अवसर

दोनों देशों ने जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स, टीका विकास, स्वास्थ्य तकनीकों और महामारी तैयारी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कोविड-19 महामारी के अनुभव ने मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियों और वैज्ञानिक साझेदारियों की आवश्यकता को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन निर्माण, किफायती स्वास्थ्य तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी में भारत की विशेषज्ञता दक्षिण अफ्रीका के साथ सहयोग के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

उन्नत विनिर्माण और डिजिटल तकनीकों में साझेदारी

बैठक में उन्नत सामग्री, विनिर्माण, भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी और डिजिटल अवसंरचना को भारत-दक्षिण अफ्रीका संयुक्त समिति के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया। दोनों पक्षों ने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच संवाद बढ़ाकर इन क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं विकसित करने पर सहमति व्यक्त की।

दक्षिण अफ्रीका ने नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, स्वास्थ्य विज्ञान, डिजिटल तकनीक, कौशल विकास और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग को और मजबूत करने की इच्छा जताई।

खगोल विज्ञान में सहयोग की समीक्षा

बैठक के दौरान दोनों देशों ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में चल रहे सहयोग की भी समीक्षा की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्क्वायर किलोमीटर ऐरे (SKA) परियोजना को 21वीं सदी की सबसे महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक पहलों में से एक बताते हुए कहा कि यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि इस परियोजना से वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, तकनीकी नवाचार और मानव संसाधन विकास को बढ़ावा मिलेगा।

ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण की भूमिका

डॉ. जितेंद्र सिंह ने दक्षिण अफ्रीका को अगस्त 2026 में चेन्नई में आयोजित होने वाली ब्रिक्स विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार मंत्रिस्तरीय बैठक में सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स सहयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, जल संसाधन प्रबंधन और सटीक कृषि जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान एवं नवाचार के नए अवसर प्रदान कर रहा है।

वहीं, दक्षिण अफ्रीका ने भारत को साइंस फोरम साउथ अफ्रीका-2026 में भाग लेने का निमंत्रण दिया, जो अफ्रीका के प्रमुख वैज्ञानिक संवाद मंचों में से एक माना जाता है।

30 वर्षों से मजबूत वैज्ञानिक साझेदारी

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग की नींव वर्ष 1995 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समझौते से पड़ी थी। तब से दोनों देश खगोल विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, भूविज्ञान और उन्नत सामग्रियों सहित कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं।

दोनों देशों ने अब तक लगभग 150 सह-वित्तपोषित अनुसंधान परियोजनाओं को समर्थन दिया है और भविष्य में इस सहयोग को और व्यापक बनाने पर सहमति जताई है।

बैठक का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि भारत और दक्षिण अफ्रीका अनुसंधान उत्कृष्टता, प्रौद्योगिकी विकास, स्टार्टअप सहयोग और वैज्ञानिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक मजबूत एवं भविष्य उन्मुख नवाचार साझेदारी का निर्माण करेंगे, जो दोनों देशों के विकास के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को भी नई दिशा देगी।

CCI ने दुबई एयरोस्पेस एंटरप्राइज द्वारा मैक्वेरी एयरफाइनेंस के अधिग्रहण को दी मंजूरी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने वैश्विक विमान पट्टे क्षेत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण सौदे को मंजूरी प्रदान कर दी है। आयोग ने दुबई स्थित विमान लीजिंग कंपनी दुबई एयरोस्पेस एंटरप्राइज (DAE) लिमिटेड द्वारा मैक्वेरी एयरफाइनेंस लिमिटेड के अधिग्रहण को स्वीकृति दे दी है।

यह अधिग्रहण डीएई की सहायक कंपनी DAE Aercap Designated Activity Company के माध्यम से किया जाएगा। प्रस्तावित सौदे के तहत मैक्वेरी एयरफाइनेंस लिमिटेड के मौजूदा शेयरधारकों से कंपनी का अधिग्रहण किया जाएगा।

वैश्विक विमान लीजिंग क्षेत्र में बड़ा कदम

दुबई एयरोस्पेस एंटरप्राइज (DAE) दुनिया की प्रमुख विमान पट्टे पर देने वाली कंपनियों में शामिल है। कंपनी 80 से अधिक देशों में एयरलाइंस और विमानन ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करती है। इसके विमान पोर्टफोलियो में विभिन्न प्रकार के वाणिज्यिक विमान शामिल हैं, जिन्हें विश्वभर की एयरलाइंस को लीज पर दिया जाता है।

वहीं, डबलिन (आयरलैंड) मुख्यालय वाली मैक्वेरी एयरफाइनेंस लिमिटेड भी वैश्विक स्तर पर सक्रिय विमान लीजिंग कंपनी है और 45 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती है। कंपनी का विमानन वित्त और विमान लीजिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।

विमानन क्षेत्र में बढ़ेगी वैश्विक उपस्थिति

विशेषज्ञों का मानना है कि इस अधिग्रहण के बाद डीएई की वैश्विक विमान लीजिंग क्षमता और बाजार हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। साथ ही कंपनी को नए ग्राहकों, व्यापक विमान पोर्टफोलियो और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच प्राप्त होगी।

विमान लीजिंग उद्योग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह सौदा वैश्विक विमानन वित्त क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण अधिग्रहणों में से एक माना जा रहा है।

विस्तृत आदेश बाद में जारी करेगा आयोग

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने कहा है कि प्रस्तावित लेनदेन की समीक्षा के बाद इसे मंजूरी दे दी गई है। हालांकि, इस संबंध में विस्तृत आदेश और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट बाद में जारी की जाएगी।

सीसीआई की मंजूरी मिलने के साथ ही इस अधिग्रहण प्रक्रिया को नियामकीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण मंजूरी प्राप्त हो गई है, जिससे सौदे को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

ईरान डील पर ट्रंप की ‘सिचुएशन रूम’ मीटिंग बेनतीजा, 2 घंटे की चर्चा के बाद भी नहीं बनी बात

वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई इस दो घंटे लंबी बैठक में शीर्ष सलाहकारों के साथ संभावित समझौते पर मंथन किया गया, लेकिन ट्रंप बिना कोई अंतिम फैसला लिए बाहर निकल गए।

ट्रंप की कड़ी शर्तें और ‘रेड लाइन्स’ : रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राष्ट्रपति केवल उसी समझौते को मंजूरी देंगे जो उनकी तय की गई “रेड लाइन्स” को पूरा करेगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि किसी भी डील के लिए ईरान को होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) को अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए खोलना होगा और यह गारंटी देनी होगी कि वह कभी परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। साथ ही, उसे अपना संवर्धित यूरेनियम भंडार अमेरिका के नियंत्रण में देने पर सहमत होना होगा।

ईरान का रुख: “हमें मिसाइलों से रियायतें मिली हैं” दूसरी ओर, ईरान ने इन शर्तों का कड़ा विरोध किया है। ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ ने कहा कि उन्हें अब अमेरिका के वादों पर भरोसा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान को रियायतें बातचीत से नहीं, बल्कि अपनी मिसाइल शक्ति से मिली हैं।

सैन्य कार्रवाई की चेतावनी : बातचीत की कोशिशों के बीच अमेरिका ने सैन्य दबाव भी कम नहीं किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी है कि यदि समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका के पास हथियारों की कोई कमी नहीं है और वे एक “बेहतरीन समझौता” चाहते हैं जो ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर प्रभावी रोक लगाए।

चैंपियंस लीग: PSG की खिताबी जीत के बाद पेरिस में जबरदस्त बवाल, फैंस ने की तोड़फोड़ और आगजनी; 45 गिरफ्तार

इंटरनेशनल डेस्क : चैंपियंस लीग के फाइनल में पेरिस सेंट-जर्मेन (PSG) की ऐतिहासिक जीत का जश्न उस समय मातम और हंगामे में बदल गया, जब टीम के समर्थकों ने पेरिस की सड़कों पर जबरदस्त उत्पात मचाया। आर्सेनल को पेनल्टी शूटआउट में हराने के बाद जीत की खुशी मना रहे फैंस हिंसक हो गए और पुलिस के साथ उनकी सीधी भिड़ंत हो गई।

दुकानों में तोड़फोड़ और आगजनी: पेरिस पुलिस के अनुसार, करीब 20 हजार लोग प्रतिष्ठित चैंप्स-एलिसी एवेन्यू पर जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे। इस दौरान भीड़ बेकाबू हो गई और उपद्रवियों ने दुकानों, एक बेकरी और एक रेस्तरां में तोड़फोड़ की। उपद्रवियों ने 6 गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया और बस स्टॉप के शीशे भी तोड़ दिए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, जिसमें एक पुलिस अधिकारी भी घायल हो गया।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और गिरफ्तारियां : हंगामे की आशंका को देखते हुए पूरे फ्रांस में 22 हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे, जिनमें से 8 हजार अकेले पेरिस में तैनात थे। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 79 लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें से 45 उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में पटाखे और फ्लेयर्स भी जब्त किए हैं।

यातायात हुआ ठप हिंसा और हंगामे के कारण: पेरिस में सुरक्षा के लिहाज से ट्राम लाइनों को रोक दिया गया और कई मुख्य मेट्रो स्टेशनों को बंद करना पड़ा। कुछ इलाकों में बस सेवाएं भी पूरी तरह ठप कर दी गईं ताकि उपद्रवियों को रोका जा सके। पुलिस ने बताया कि कुछ उपद्रवियों ने किराए की साइकिलों से बैरिकेड बनाकर पुलिस का रास्ता रोकने की भी कोशिश की थी।

हेगसेथ ने भारत-पाक संघर्षविराम पर ट्रंप के दावे का किया समर्थन, भारत को बताया हिंद-प्रशांत रणनीति का प्रमुख साझेदार

सिंगापुर / सत्ता संदेश

अमेरिका के रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने शनिवार को राष्ट्रपति Donald Trump के उस दावे का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने तथा संघर्षविराम स्थापित करने में अमेरिकी भूमिका का उल्लेख किया था। साथ ही हेगसेथ ने भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का एक प्रमुख और विश्वसनीय साझेदार बताया।

सिंगापुर में आयोजित Shangri-La Dialogue के दौरान अपने संबोधन और बातचीत में हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए अपने सहयोगियों और साझेदार देशों के साथ लगातार संपर्क में रहता है। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीतिक पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में तनाव कम करने के प्रयासों में अमेरिकी नेतृत्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से यह रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय रूप से किया जाना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। नई दिल्ली कई अवसरों पर इस नीति को स्पष्ट रूप से दोहरा चुकी है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों पर जोर

हेगसेथ ने भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का केंद्रीय साझेदार बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, समुद्री सहयोग और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों, मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोनों देशों को और करीब लाती है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका है और इस क्षेत्र में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में भारत के योगदान की सराहना की।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग, खुफिया साझेदारी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक समन्वय दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले गए हैं।

क्षेत्रीय सुरक्षा पर वैश्विक नजर

शांगरी-ला डायलॉग के दौरान दक्षिण एशिया, चीन, ताइवान, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे। भारत और अमेरिका दोनों ने क्षेत्रीय स्थिरता तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हेगसेथ का बयान एक ओर ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति की प्राथमिकताओं को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी संकेत देता है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक रणनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखता है।

हालांकि भारत-पाक संबंधों में अमेरिकी भूमिका को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध आने वाले वर्षों में और मजबूत होने की संभावना रखते हैं, विशेषकर रक्षा, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्रों में।

अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षक दिवस पर भारत ने दोहराई संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता

संयुक्त राष्ट्र / सत्ता संदेश

भारत ने अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षक दिवस के अवसर पर United Nations शांति अभियानों के प्रति अपनी ‘‘अटूट प्रतिबद्धता’’ दोहराते हुए उन वीर शांतिरक्षकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने विश्व के विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के प्रयासों के दौरान अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित विशेष कार्यक्रम में भारतीय प्रतिनिधियों ने उन सैनिकों, पुलिसकर्मियों और नागरिक कर्मियों के योगदान को याद किया, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों के तहत सेवा देते हुए वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए अपना जीवन समर्पित किया। कार्यक्रम के दौरान शहीद शांतिरक्षकों की स्मृति में श्रद्धांजलि दी गई और उनके बलिदान को मानवता की सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया गया।

भारत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में उसकी भूमिका केवल एक सहभागी देश की नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सहयोग के प्रति उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत दशकों से संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में सबसे बड़े और सबसे विश्वसनीय योगदानकर्ताओं में से एक रहा है।

भारत का संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियानों में योगदान सात दशकों से अधिक पुराना है। इस दौरान हजारों भारतीय सैनिकों और अधिकारियों ने अफ्रीका, एशिया और अन्य क्षेत्रों में विभिन्न मिशनों में भाग लिया है। कई भारतीय शांतिरक्षकों ने कठिन परिस्थितियों में सेवा देते हुए सर्वोच्च बलिदान भी दिया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन संघर्ष प्रभावित देशों में युद्धविराम बनाए रखने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, मानवीय सहायता पहुंचाने और राजनीतिक स्थिरता बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत की पेशेवर सैन्य क्षमता और निष्पक्ष दृष्टिकोण के कारण उसके शांतिरक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष सम्मान प्राप्त है।

कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि आधुनिक शांति अभियानों की चुनौतियां पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। आतंकवाद, गृहयुद्ध, मानवीय संकट और राजनीतिक अस्थिरता जैसी परिस्थितियों में शांतिरक्षकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारतीय प्रतिनिधियों ने कहा कि देश भविष्य में भी संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सक्रिय योगदान देता रहेगा और वैश्विक शांति, सुरक्षा तथा बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षक दिवस हर वर्ष उन लाखों पुरुषों और महिलाओं के सम्मान में मनाया जाता है जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मिशनों के तहत सेवा दी है। यह दिन उन शांतिरक्षकों की स्मृति को भी समर्पित है जिन्होंने कर्तव्य निर्वहन के दौरान अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

भारत ने इस अवसर पर एक बार फिर यह संदेश दिया कि विश्व में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, और इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है।

ट्रंप के वादों और हकीकत के बीच फासला, अमेरिकी श्रमिकों को नहीं मिला अपेक्षित आर्थिक लाभ

वॉशिंगटन / सत्ता संदेश

अमेरिका में रोजगार, विनिर्माण और मजदूर वर्ग की आय बढ़ाने के वादों के साथ सत्ता में लौटे राष्ट्रपति Donald Trump की आर्थिक नीतियों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई अर्थशास्त्रियों और श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि तमाम बड़े वादों और नीतिगत घोषणाओं के बावजूद अमेरिकी श्रमिकों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया है।

ट्रंप ने अपने चुनावी अभियानों में बार-बार यह दावा किया था कि उनकी नीतियां अमेरिकी उद्योगों को पुनर्जीवित करेंगी, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ाएंगी और विदेशी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित श्रमिकों को राहत प्रदान करेंगी। उन्होंने विशेष रूप से चीन के साथ व्यापार असंतुलन, विदेशी आयात और अमेरिकी नौकरियों के पलायन को प्रमुख मुद्दा बनाया था।

हालांकि कई आर्थिक अध्ययनों और श्रम बाजार के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक तस्वीर अधिक जटिल है। कुछ क्षेत्रों में निवेश और रोजगार बढ़ने के बावजूद व्यापक स्तर पर श्रमिकों की वास्तविक आय, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल रोजगार सृजन के आंकड़े किसी अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी नहीं बताते। महंगाई, आवास लागत, स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी आम श्रमिक की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। यदि मजदूरी की वृद्धि इन खर्चों की तुलना में धीमी रहती है, तो श्रमिकों की वास्तविक क्रय शक्ति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

कई श्रम संगठनों का कहना है कि विनिर्माण क्षेत्र में कुछ सुधार जरूर देखने को मिले हैं, लेकिन स्वचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी संरचनात्मक चुनौतियां अभी भी अमेरिकी श्रमिकों के सामने मौजूद हैं। इसके कारण पारंपरिक औद्योगिक नौकरियों में स्थायी वृद्धि सीमित रही है।

दूसरी ओर, ट्रंप समर्थकों का तर्क है कि उनकी व्यापार नीतियों, कर सुधारों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने वाली योजनाओं ने अमेरिकी उद्योगों को मजबूती दी है। उनका कहना है कि आर्थिक लाभों का प्रभाव दीर्घकालिक होता है और कई क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम धीरे-धीरे दिखाई दे रहे हैं।

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी श्रम बाजार की स्थिति का मूल्यांकन केवल राजनीतिक वादों के आधार पर नहीं किया जा सकता। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, तकनीकी परिवर्तन, ऊर्जा लागत, ब्याज दरें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियां भी रोजगार और आय पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं।

वर्तमान बहस यह संकेत देती है कि अमेरिकी राजनीति में श्रमिक वर्ग का मुद्दा अभी भी केंद्रीय विषय बना हुआ है। चाहे रिपब्लिकन हों या डेमोक्रेट, दोनों दलों के लिए यह वर्ग चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि अमेरिकी श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार के लिए केवल संरक्षणवादी नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए कौशल विकास, आधुनिक उद्योगों में निवेश, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को भी समान महत्व देना होगा।

इसी वजह से ट्रंप के आर्थिक वादों और श्रमिकों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को लेकर बहस आने वाले समय में भी अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख मुद्दा बनी रहने की संभावना है।

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने की भारतीय सेना की तारीफ; इंडो-पैसिफिक में भारत के बढ़ते कद को बताया अहम

इंटरनेशनल डेस्क : सिंगापुर में आयोजित Shangri-La Dialogue के दूसरे दिन अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) ने भारतीय सेना और उसके तेजी से होते आधुनिकीकरण की जमकर सराहना की है। उन्होंने भारत को दक्षिण एशिया और क्षेत्रीय स्थिरता का एक “महत्वपूर्ण स्तंभ” करार दिया।

शक्ति संतुलन के लिए भारत जरूरी: हेगसेथ ने कहा कि एक मजबूत भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के अमेरिका के साझा लक्ष्य को भी आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती सैन्य ताकत और सुरक्षा की जिम्मेदारियों का जिक्र किया।

लॉजिस्टिक्स और अमेरिकी नौसेना को सपोर्ट: अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भारत की बढ़ती औद्योगिक और लॉजिस्टिक क्षमता की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत अब लंबे समय तक हाई-लेवल मिलिट्री ऑपरेशन चलाने में सक्षम हो रहा है। इसमें इलाके में तैनात अमेरिकी नौसेना (US Navy) के जहाजों को मरम्मत और लॉजिस्टिक सपोर्ट देने की क्षमता भी शामिल है।

मिसाइलों का साझा उत्पादन : भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर जोर देते हुए हेगसेथ ने जॉइंट प्रोडक्शन (साझा उत्पादन) पहल का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि दोनों देश Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसी आधुनिक क्षमताओं को विकसित करने के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे दोनों देशों की सामूहिक युद्ध तैयारियों को मजबूती मिलेगी।

भारत-कनाडा व्यापार संबंधों को नई रफ्तार, CEPA वार्ता इस साल पूरी करने का लक्ष्य

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल तथा कनाडा के व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को मजबूत करने की अपनी साझा प्रतिबद्धता की पुष्टि की है ताकि दोनों देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और व्यवसायों के लिए कारोबारी अवसरों को बढ़ाने वाले मजबूत परिणाम प्राप्त किए जा सकें। हाल ही में हुई मंत्रिस्तरीय बैठकों से मिली गति को आगे बढ़ाते हुए, कनाडा के मंत्री मनिंदर सिद्धू ने पीयूष गोयल के नेतृत्व में विश्व के अब तक सबसे बड़े भारतीय प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करते हुए स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, कृषि-खाद्य, उन्नत विनिर्माण, डिजिटल प्रौद्योगिकी और कौशल विकास जैसे पूरक क्षेत्रों में सहयोग को परिपुष्ट करने के अवसरों पर बल दिया।

दोनों मंत्रियों ने एक महत्वाकांक्षी और पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और इस साल के अंत तक वार्ता को पूरा करने के अपने साझा लक्ष्य की पुष्टि की। उन्होंने बाजार पहुंच बढ़ाने, सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं का समर्थन करने और द्विपक्षीय आर्थिक विकास को सक्षम बनाने में सीईपीए के महत्व पर बल दिया।

दोनों मंत्रियों ने कनाडा-भारत व्यापार और निवेश मंच का शुभारंभ एक प्रमुख मंच के रूप में किया। यह कनाडा और भारतीय उद्योगजगत प्रमुखों को एक साथ लाते हुए नई वाणिज्यिक साझेदारियों और व्यापारिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है।

दोनों मंत्रियों ने भारत और कनाडा के बीच संपर्क बढ़ाने के महत्व पर भी बल दिया- जिसमें लोगों के बीच संबंध, व्यावसायिक गतिशीलता और प्रत्यक्ष वाणिज्यिक संपर्क शामिल हैं और यह विस्तारित व्यापार और निवेश के लिए आवश्यक कारक हैं।

कनाडा और भारत ने प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में दीर्घकालिक, उच्च गुणवत्ता वाले निवेश को प्रोत्साहित करना जारी रखने और दोनों देशों के व्यवसायों, नवोन्मेषकों और संस्थागत भागीदारों के बीच गहन सहयोग का समर्थन करने पर सहमति व्यक्त की। दोनों देशों ने नियमित संवाद बनाए रखने और आगामी महीनों में ठोस परिणाम प्राप्त करने की भी प्रतिबद्धता जताई।

क्वाड की वास्तविक चुनौती उसके उद्देश्यों को धरातल पर उतारना: विशेषज्ञ

वाशिंगटन / सत्ता संदेश

Quadrilateral Security Dialogue यानी क्वाड को लेकर अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों ने कहा है कि समूह की वास्तविक परीक्षा अब उसके घोषित उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से लागू करने में है। विशेषज्ञों ने यह टिप्पणी भारत की ओर से हाल में आयोजित क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के संदर्भ में की।

क्वाड में India, United States, Japan और Australia शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में क्वाड ने अपनी उपस्थिति और गतिविधियों को काफी विस्तार दिया है, लेकिन अब सदस्य देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे घोषणाओं और बैठकों से आगे बढ़कर वास्तविक परिणाम प्रस्तुत करें।

हाल ही में आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक में समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सहयोग और मुक्त एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी। भारत ने इस बैठक में क्षेत्रीय स्थिरता और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के महत्व पर जोर दिया।

रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्वाड की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने में कितनी प्रभावी भूमिका निभा पाता है। विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इस समूह की भूमिका पर वैश्विक नजर बनी हुई है।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि क्वाड को केवल सुरक्षा मंच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन, वैक्सीन सहयोग, उभरती प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा जैसे गैर-सैन्य क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।

कूटनीतिक जानकारों के अनुसार, भारत क्वाड में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और वह समूह को संतुलित, समावेशी और व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश कर रहा है। भारत लगातार यह रेखांकित करता रहा है कि क्वाड का उद्देश्य किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन बनाना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग और स्थिरता को बढ़ावा देना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में क्वाड की सफलता इस बात से तय होगी कि सदस्य देश अपने साझा हितों को किस हद तक ठोस परियोजनाओं और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग में बदल पाते हैं।