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माझे की सुरीली बेटीमोहिनी रसीला

गुरभजन सिंह गिल
चेयरमैन
पंजाबी लोक विरासत अकादमी
लुधियाना

पिछले वर्ष मोहिनी रसीला हमें सदा के लिए छोड़कर चली गईं। उनकी स्मृति में आज उनके परिवार द्वारा कलानौर के निकट गांव खुशिपुर (गुरदासपुर) में पहला “मोहिनी रसीला स्मारक मेला” आयोजित किया गया। इसमें माझे के लगभग सभी प्रमुख गायक शामिल हुए। मोहिनी रसीला पर राजपाल सिंह बाठ द्वारा संपादित पुस्तक “सुरों की नज़्म” का इस अवसर पर गुरमीत सिंह बाजवा ने गणमान्य अतिथियों से लोकार्पण करवाया। यह एक शुभ कार्य है। स्मरण के लिए पुस्तक से बड़ा कोई साधन नहीं। रछपाल रसीला इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं।

अब मुझसे पूछो—मोहिनी रसीला कौन थीं?

रावी नदी के इस पार और उस पार शब्द, सुर, संगीत और प्रतिभा की भरपूर फसल उगती है। 1947 से पहले जब वतन एक था, तब नदी के दोनों ओर के गवैये अक्सर आते-जाते रहते थे। अधिकतर गायक पुरुष होते थे। महिलाएँ भी गाती थीं, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर ही—तिंझण में चरखा कातते समय या विवाह-शादियों में। लंबे हेक वाले गीतों का बोलबाला था। बचपन में मैंने अपनी तायाजी की बेटियों, बहन जीतो और बहन वीरो को साथ बैठकर गाते सुना था। बहन वीरो द्वारा बजाई पीतल की गागर आज भी कई बार सपनों में सुनाई देती है।

“घड़ा बजता, घड़ोली बजती
कहीं गागर बजती सुन मुंडिया…”

अब गागर कहीं सुनाई नहीं देती। यह घर के बर्तनों से भी गायब हो गई है और संगीत वाद्यों से भी। कितना सोना रेत में मिलकर मिट्टी हो गया—लोग-संस्कृति के अनेक वाद्य विलुप्त होते जा रहे हैं।

इसी तरह लोक रंग के गायक और लेखक भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं—सोने की डलियों जैसे गायक। ढाढी सोहन सिंह सीतल, जसवंत सिंह चाड़ भट्टी, गुरचरण सिंह गोहलवड़, मूला सिंह पाखरपुरी, कविशर जोगा सिंह जोगी, कुलवंत सिंह बीए, बलदेव सिंह बैंकां और कई अन्य। लोक गायक देविंदर सिंह नबीपुर, अमरजीत गुरदासपुरी, हमारे गांव बसंतकोट के हरदेव सिंह खुशदिल, जसबीर खुशदिल खेलेयां वाला, ज्ञान सिंह कमल, जागीर सिंह तालिब, अमरीक सिंह हरगोबिंदपुरी, लखबीर सिंह लखा भरथ—ये सब जैसे खोए हुए रत्न हैं।

माझे की सुरीली बेटियों में जोगिंदर अरोड़ा, गुरमीत बावा, प्रीति बाला और मोहिनी रसीला भी उस दुनिया में चली गईं, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।

अमरजीत गुरदासपुरी अक्सर कहते थे कि माझे की गायकी का रंग-ढंग और मधुरता रावी नदी का पानी पीने के कारण है।

रावी नदी धरती की सुरीली बेटी है। उसके किनारे चलने वाली हवा भी संगीत सा स्वर भरती है। इन्हीं में से रावी की बेटी, सोने की कण जैसी माझे की बेटी थी—मोहिनी रसीला।

किसी “है” को “था” कहना सबसे कठिन कार्य होता है।

गीतकार बाबू सिंह मान द्वारा लिखा और नरेंद्र बीबा द्वारा गाया एक गीत हमेशा यादों में बसता है—

“हाथों छोड़े सजनां नूं,
नाले याद करां नाले रोवां…”

…और इसी प्रकार आगे की पंक्तियाँ विरह, पीड़ा और स्मृतियों का गहरा भाव व्यक्त करती हैं।

उनके जीवनसाथी और मेरे छोटे भाई रछपाल रसीला की मनःस्थिति भी लगभग ऐसी ही है। उन्होंने बताया कि मोहिनी रसीला की याद में एक पुस्तक तैयार करवाई जा रही है। शब्दों का ताजमहल बनाना अच्छे लोगों की सोच का हिस्सा होता है।

रछपाल का गांव मेरे गांव बसंतकोट से मात्र दस किलोमीटर दूर है। पहले साइकिल से यात्रा करते समय ये रास्ते यादों में बसे रहते थे, अब नई सड़कों ने दूरी तो घटा दी है, लेकिन यादों के भीतर रास्ते और गहरे हो गए हैं।

लेखक मित्र राजपाल सिंह बाठ के अनुसार, मोहिनी रसीला का जन्म 28 मई 1961 को माता जसवंत कौर और पिता सरदार रजिंदर सिंह के घर गांव मियांकोट (कलानौर के निकट), जिला गुरदासपुर में हुआ था।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मियांकोट से, मैट्रिक सरकारी हाई स्कूल कलानौर से और बीए आरआर डीएवी कॉलेज बटाला से की। उनके प्रमाणपत्रों पर उनका नाम कमलजीत कौर दर्ज है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के इंटर-कॉलेज युवा महोत्सव में उन्होंने दो बार अपने कॉलेज की संगीत टीम का नेतृत्व किया—एक बार विजेता और एक बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया।

फरवरी 1980 में उनका विवाह लोक गायक रछपाल रसीला से हुआ। उनका एक पुत्र रूपिंदर सिंह ऑस्ट्रेलिया में परिवार सहित रहता है।

वे अपने गुरु लाल चंद यमला जट्ट को मानती थीं। उनकी आवाज़ में लोक गीत, दोहे, कथाएँ और धार्मिक गीत शामिल हैं।

मोहिनी रसीला और रछपाल रसीला की लोकप्रियता विदेशों तक पहुँची—इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों में उन्होंने अनेक कार्यक्रम किए।

उनकी रिकॉर्डिंग एचएसवी सोनोटोन, इनरिको, सीटीसी जैसी कंपनियों में हुई। वे आकाशवाणी जालंधर और दूरदर्शन जालंधर की मान्यता प्राप्त कलाकार थीं।

उन्हें कई पुरस्कार मिले—ढाढी अमर सिंह शौकी मेले का पुरस्कार, हाशिम शाह स्मृति पुरस्कार, और लाला चंद यमला जट्ट सम्मान आदि।

मोहिनी रसीला के लोकप्रिय गीतों में लोक गीत, लोक कथाएँ, दोहे और धार्मिक भजन शामिल हैं—जैसे “मैं माझे दी जट्टी”, “गुड्डी ले दे कागजां दी”, “शाहनी कौला”, “सोहनी”, “मिर्ज़ा साहिबां” आदि।

उनकी आवाज़ में “तेरा भाणा मीठा लागे”, “धन बाबा दीप सिंह जी” जैसे धार्मिक गीत भी प्रसिद्ध हैं।

कैंसर जैसी बीमारी ने इस सुरीली गायिका को घेर लिया और 29 मई 2025 को उन्होंने सदा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

माझे की यह बुलंद, सुरीली बेटी हमेशा के लिए चुप हो गई। अब केवल यादें शेष हैं—

“अहो गए सज्जण अहो गए,
लांघ गए दरिया…”