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भारत–जापान स्वास्थ्य सहयोग को नई मजबूती: भारत मंडपम में संयुक्त समिति की तीसरी बैठक

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत और जापान के बीच स्वास्थ्य संबंधी संयुक्त समिति की तीसरी बैठक मंगलवार को भारत मंडपम में आयोजित की गई। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा और जापान की स्वास्थ्य नीति प्रभारी मंत्री किमी ओनोदा ने मिलकर बैठक की अध्यक्षता की।

इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करते हुए कहा कि भारत और जापान के बीच साझेदारी आपसी सम्मान, विश्वास और भविष्य के लिए साझा दृष्टिकोण पर आधारित है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत-जापान के बीच सहयोग ज्ञापन के अंतर्गत आयोजित संयुक्त समिति की बैठक नियमित संवाद और गहन आपसी समझ के माध्यम से इस साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुई है और उन्होंने यह विश्वास भी व्यक्त किया कि इस दौरान रचनात्मक और दूरदर्शितापूर्ण विचार-विमर्श होंगे।

नड्डा ने इस दौरान भारत और जापान के बीच एक सदी से अधिक समय से चले आ रहे बहुआयामी संबंधों का उल्लेख किया जो विभिन्न क्षेत्रों में सहभागिता पर आधारित हैं और उन्होंने “सबका साथ, सबका विकास” के मार्गदर्शक सिद्धांत के अंतर्गत समावेशी विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी दोहराई। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि संयुक्त समिति की बैठक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण मंच है।

ओनोदा ने बैठक को संबोधित करते हुए नवाचार, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाने में जापान की निरंतर भागीदारी पर बल दिया और इसके साथ ही द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

बैठक के दौरान प्राथमिकता वाले प्रमुख क्षेत्रो पर चर्चा की गई, जो इनमें शामिल है।

गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) की रोकथाम, निदान, उपचार और पुनर्वास:

बैठक में भारतीय प्रतिनिधियों ने बीमारियों से बढ़ती कष्टकारी स्थिति के बारे में जानकारी दी जिसमें गैर-संचारी रोगों के बढ़ते प्रसार पर बल दिया गया और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप उनकी जांच-पड़ताल, निरंतर देखभाल और सतत स्वास्थ्य संवर्धन पर आधारित व्यापक प्रतिक्रिया की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। वहीं, जापानी प्रतिनिधियों ने इस मामले में सहयोग के लिए पहले से चल रही पहलों के बारे में बताया जिनमें कैंसर की पहचान के लिए जांच, शीघ्र निदान और तकनीकी सहयोग तथा संस्थागत क्षमता विकास के माध्यम से उपचार प्रणालियों को सुदृढ़ करने पर केंद्रित परियोजनाएं शामिल हैं।

आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना और उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं तक पहुंच:

भारतीय प्रतिनिधियों ने दवा और चिकित्सा उपकरण संबंधी अपने क्षेत्रों की व्यापकता और उनकी क्षमता का उल्लेख किया जिसमें उनके घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने, निर्भरता कम करने और लक्षित नीतिगत उपायों के माध्यम से सस्ती दर पर उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया। जापानी प्रतिनिधियों ने चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण और सुव्यवस्थित साझेदारी के माध्यम से प्रौद्योगिकी के उपयोग को सुगम बनाने के उद्देश्य से समन्वित सार्वजनिक-निजी सहयोग के अपने मॉडल के बारे में विस्तार से बताया।

डिजिटल स्वास्थ्य:

भारतीय प्रतिनिधियों ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के अंतर्गत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अपने दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत की जिससे अंतरसंचालनीय, सुरक्षित और नागरिक-केंद्रित डिजिटल स्वास्थ्य के अनुरूप परिवेश विकसित हो जिसको अपनाने और एकीकरण में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। जापानी प्रतिनिधियों ने उभरते डिजिटल प्लेटफार्मों का लाभ उठाते हुए प्रणालियों को आपस में जोड़ने, एआई-सक्षम चिकित्सा प्रौद्योगिकियों और अनुसंधान में सहयोग के माध्यम से डिजिटलीकरण को आगे बढ़ाने के संबंध में अपने अनुभव साझा किए।

मानव संसाधन विकास और आदान-प्रदान:

भारतीय प्रतिनिधियों ने कुशल और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी स्वास्थ्य सेवा कार्यबल में सहायक अपनी नीति और नियामक प्रणाली के साथ-साथ आदान-प्रदान संबंधी कार्यक्रमों, संयुक्त प्रशिक्षण और दक्षताओं की पारस्परिक मान्यता के लिए सुव्यवस्थित मार्गों और तौर-तरीकों का उल्लेख किया। जापानी प्रतिनिधियों ने चिकित्सा क्षेत्र में संयुक्त रूप से अनुसंधान, कर्मियों के आदान-प्रदान और सहयोग के आधार पर वैज्ञानिक गतिविधियों में सहायता के लिए काम कर रहे तंत्र के बारे में विस्तृत विवरण दिया।

श्री नड्डा ने अपने समापन भाषण में कहा कि विचार-विमर्श ने भारत-जापान स्वास्थ्य साझेदारी को नई गति प्रदान की है। उन्होंने प्राथमिकता वाले प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने की साझा प्रतिबद्धता की पुष्टि की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि चर्चाओं ने सामर्थ्यवान और समावेशी स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करने के लिए स्पष्ट दिशा निर्धारित की है।

उन्होंने यह भी कहा कि बैठक के परिणाम दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए मजबूत आधार प्रदान करेंगे। उन्होंने आपसी विचारों को दोनों देशों के नागरिकों के लिए सार्थक परिणामों में बदलने के उद्देश्य से जापान के साथ मिलकर काम करने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।

सुश्री ओनोदा ने आपसी सहयोग को और आगे बढ़ाने के प्रति जापान की प्रतिबद्धता पर बल देते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने के जापान के संकल्प को दोहराया।

केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने पीजीआईएमईआर के 39वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया

चंडीगढ़ /सत्ता संदेश
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी ने स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के 39वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। इस अवसर पर पंजाब के राज्यपाल और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया और नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. विनोद के. पॉल भी उपस्थित रहे।

सभा को संबोधित करते हुए, जेपी नड्डा ने स्नातक पूरा करने वाले छात्रों को “एक महत्वपूर्ण उपलब्धि” हासिल करने के लिए बधाई दी, जो उनकी कड़ी मेहनत, अनुशासन और दृढ़ संकल्प के साथ-साथ उनके शिक्षकों, संकाय सदस्यों और उनके माता-पिता के प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने भारत में चिकित्सा विज्ञान शिक्षा और रोगी देखभाल को आगे बढ़ाने में पीजीआईएमईआर के योगदान की सराहना की।

जेपी नड्डा ने रेखांकित किया कि “पीजीआई चंडीगढ़ उत्तर भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है और विश्वस्तरीय चिकित्सा देखभाल, उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान का केंद्र है।” उन्होंने कहा कि दशकों से डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य पेशेवरों की पीढ़ियों के समर्पित प्रयासों ने पीजीआई को एक प्रतिष्ठित ब्रांड के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि पीजीआई के स्नातकों के साथ संस्थान की साख जुड़ी होती हैं और इस प्रतिष्ठित संस्थान से उत्तीर्ण होने पर सभी छात्रों को बधाई दी।

जेपी नड्डा ने पथ-प्रदर्शक क्लिनिकल अनुसंधान और अग्रणी सर्जरी में संस्थान के योगदान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा “वर्तमान में पीजीआई में 850 से अधिक बाह्य परियोजनाएं और 100 से अधिक आंतरिक परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं, जो न केवल एक स्नातकोत्तर संस्थान के रूप में बल्कि शिक्षा और अनुसंधान में उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में इसकी स्थिति को दर्शाती हैं।” उन्होंने एक साथ अग्न्याशय-गुर्दा प्रत्यारोपण, गुर्दा प्रत्यारोपण और यकृत प्रत्यारोपण में संस्थान की विशेषज्ञता की भी सराहना की।

जेपी नड्डा ने जोर देकर कहा कि “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत ने स्वास्थ्य सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में एक ऐतिहासिक छलांग लगाई है।” उन्होंने चिकित्सा शिक्षा के बुनियादी ढांचे के विस्तार में नीतिगत निर्णयों की भूमिका को रेखांकित किया और कहा कि “20वीं सदी के अंत तक, भारत में केवल एक एम्स और एक स्नातकोत्तर संस्थान था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह नए एम्स की स्थापना शुरू की थी और पिछले 10 वर्षों में 16 और एम्स जोड़े गए हैं, जिससे कुल संख्या 23 हो गई है।”

स्वास्थ्य सेवा के भविष्य के बारे में बात करते हुए, श्री नड्डा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), स्टेम सेल अनुसंधान, जीन थेरेपी, प्रिसिजन मेडिसिन और टेलीहेल्थ सहित तकनीक की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देते हुए कहा “हालांकि तकनीकी प्रगति स्वास्थ्य सेवा को बदल रही है, लेकिन मानवीय भूमिका भी बनी रहनी चाहिए।” उन्होंने कहा “करुणा की अपनी ताकत होती है और यह चिकित्सा पद्धति के केंद्र में होनी चाहिए।” उन्होंने छात्रों को रोगियों और समाज के लाभ के लिए तकनीक का पूरी तरह से उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा कि सहानुभूति और करुणा उनके काम का मार्गदर्शन करती रहे।

उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे अपनी शिक्षा को समाज के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी के रूप में देखें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वे इसमें सार्थक योगदान देंगे, और साथ ही यह भी कहा कि दीक्षांत समारोह स्नातकों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाने का एक अवसर होता है। उन्होंने उन्हें बाहरी मान्यताओं से परे देखने के लिए भी प्रोत्साहित किया, और ईमानदारी से अपना आत्म-मूल्यांकन करने, लगातार सुधार करने, तथा अपने प्रयासों और समर्पण के माध्यम से बेहतर पेशेवर और बेहतर इंसान बनते हुए उत्कृष्टता के उच्च मानकों को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने के महत्व पर ज़ोर दिया।

अपने संबोधन के अंत में श्री नड्डा ने कहा कि स्नातक छात्र जीवन के एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं, जहां सीखना व्यावहारिक और जिम्मेदारी आधारित होगा। उन्होंने उन्हें इस समझ के साथ आगे बढ़ने और पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ के मानकों और मूल्यों को बनाए रखने की सलाह दी।

दीक्षांत समारोह में 682 उम्मीदवारों को डिग्री दी गई, जिनमें 61 पीएचडी, 114 डीएम, 67 एमसीएच, 323 एमडी, 103 एमएस और 14 एमडीएस स्नातक शामिल थे। इसके अतिरिक्त, संस्थान की शैक्षणिक उत्कृष्टता को दर्शाते हुए 95 पदक (18 स्वर्ण, 37 रजत और 40 कांस्य) प्रदान किए गए।

इस अवसर पर प्रो. विवेक लाल, निदेशक, पीजीआईएमईआर और केंद्र सरकार तथा पंजाब एवं चंडीगढ़ सरकार के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

पृष्ठभूमि: 1962 में स्थापित और 1967 में ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ घोषित पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़, तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल, चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए भारत के प्रमुख संस्थानों में से एक है। एनआईआरएफ 2025 की मेडिकल श्रेणी में संस्थान ने दूसरा स्थान प्राप्त किया है।

क्षमता: संस्थान में 47 विशेषज्ञता विभागों में 2,233 बिस्तरों की क्षमता है।

रोगी सेवा: वार्षिक रूप से लगभग 27-28 लाख ओपीडी विजिट, 1 लाख इनपेशेंट प्रवेश और 95,000 से अधिक सर्जरी की जाती हैं।

आयुष्मान भारत: पीएम-जेएवाई (पीएम -जे ए वाई ) योजना के तहत लगभग 1.81 लाख मरीजों का इलाज किया गया है।

प्रत्यारोपण: 2025 में 250 गुर्दा प्रत्यारोपण किए गए। संस्थान एक साथ अग्न्याशय-गुर्दा प्रत्यारोपण (एसपीके) में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बना हुआ है।

अनुसंधान: डब्ल्यूएचओ, आईसीएमआर और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा समर्थित 800 से अधिक परियोजनाएं चल रही हैं।

विस्तार: संगरूर (पंजाब), ऊना (हिमाचल प्रदेश) और फिरोजपुर (पंजाब) में सैटेलाइट केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं ताकि क्षेत्रीय पहुंच बढ़ सके।

नवाचार: संस्थान ने दवाओं की आपूर्ति के लिए ‘ऑनलाइन इंडेंटिंग सिस्टम’ और मरीजों की सहायता के लिए ‘प्रोजेक्ट सारथी’ जैसे नवाचार लागू किए हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना: किफायती और गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं

के लिए जनऔषधि परियोजना का रणनीतिक विकास

जन औषधि सस्ती भी, भरोसेमंद भी, सेहत की बात, बचत के साथ।

किसी राष्ट्र की प्रगति का असली पैमाना अक्सर इस बात से परिलक्षित होता है कि उसके नागरिक
स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक कितनी आसानी से पहुँच सकते हैं। दशकों तक, भारत
के लाखों लोगों के स्वास्थ्य और आरोग्य के लिए दवाओं की उच्च लागत एक प्रमुख वित्तीय बाधा रही है।
इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (पीएमबीजेपी), प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व
में गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं को उनके ब्रांडेड समकक्षों की तुलना में काफी कम कीमत पर उपलब्ध
कराने के उद्देश्य से शुरू की गई पहल है। यह परियोजना सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल में एक
महत्वपूर्ण कमी को दूर करके एक व्यापक और व्यवस्थित परिवर्तन लाने में सफल रही है।
वैश्विक स्तर पर, जेनेरिक दवाइयाँ सुलभ स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की मूलभूत आधारशिला हैं। विश्व
भर में चिकित्सकों द्वारा दी जाने वाली कुल दवाइयों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 80–90% है और इसने
आवश्यक दवाओं तक पहुँच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि जेनेरिक दवाइयाँ पैकेज, लेबल
और निष्क्रिय अवयव की दृष्टि से भिन्न हो सकती हैं, लेकिन अध्ययनों से पता चला है कि ये अंतर
उनके चिकित्सीय प्रभाव पर असर नहीं डालते हैं। खुराक, सुरक्षा, क्षमता, गुणवत्ता और लक्षित उपयोग के
संदर्भ में जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की समकक्ष हैं तथा उत्पादन और गुणवत्ता के कठोर मानकों का
समान रूप से पालन करती हैं।
पीएमबीजेपी केवल एक खुदरा-बिक्री कार्यक्रम नहीं है; यह भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के
संरचनात्मक सशक्तिकरण को दर्शाता है। यह इस साल के जनऔषधि सप्ताह के थीम में परिलक्षित होता
है, “जन औषधि सस्ती भी, भरोसेमंद भी, सेहत की बात, बचत के साथ”, यह थीम लाखों लाभार्थियों के

साथ गहराई से प्रतिध्वनित होती है। 18,000 से अधिक जनऔषधि केंद्रों के तेजी से बढ़ते नेटवर्क के
माध्यम से, योजना ने सुनिश्चित किया है कि दवाइयाँ बाजार दरों की तुलना में 50% से 80% तक की
कम कीमतों पर उपलब्ध हों और सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों को समर्थन प्रदान
करती हों। क्षेत्र सर्वेक्षणों से पता चला है कि लाभार्थी लागत बचत और दवाइयों तक बेहतर पहुँच की
सराहना करते हैं।
योजना का पैमाना इसके उत्पाद संग्रह से भी परिलक्षित होता है। जनऔषधि 2,110 दवाओं और 315
सर्जिकल उत्पादों का विस्तृत संग्रह पेश करता है, जो 29 विभिन्न चिकित्सीय क्षेत्रों को शामिल करती है।
भारतीय औषधि एवं चिकित्सा उपकरण ब्यूरो (पीएमबीआई) के प्रत्यक्ष देखरेख में, संग्रह का विस्तार एक
गतिशील, डेटा-संचालित प्रक्रिया है, जिसमें बाजार विश्लेषण, हितधारकों की भागीदारी और एक समर्पित
विशेषज्ञ समिति की कठोर निगरानी शामिल हैं। इससे सुनिश्चित होता है कि योजना देश की बदलती
स्वास्थ्य आवश्यकताओं और औषधीय मांगों के अनुरूप विकसित होती रहे।
कठोर नियामक निरीक्षण के साथ, भारतीय दवा कंपनियां 200 से अधिक देशों के लिए भरोसेमंद
आपूर्तिकर्ता बन गई हैं, जिसमें अमेरिका, यूके और यूरोपीय संघ जैसे अत्यधिक विनियमित बाजार भी
शामिल हैं। भारतीय दवा कंपनियां लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पूर्वी यूरोप जैसे उभरते बाजारों में भी
विस्तार कर रही हैं।
यह उद्योग जैविक दवाओं के समान दवाओं (बायोसिमिलर), जैविक दवाओं के जेनेरिक प्रतिरूपों पर भी
ध्यान केंद्रित कर रहा है, साथ ही जटिल जेनेरिक और विशेष दवाओं का उत्पादन करने के लिए
अनुसंधान और विकास में भी अधिक निवेश कर रहा है। ये दूरदर्शी कार्यक्रम भारत को न केवल एक
वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में, बल्कि किफायती दवाओं के क्षेत्र में भविष्य के नवाचार अग्रणी देश के
रूप में भी स्थापित करते हैं।
गुणवत्ता बनाम मूल्य पर बहस कभी-कभी सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करती है। एक बहु-स्तरीय
गुणवत्ता आश्वासन व्यवस्था के माध्यम से,पीएमबीजेपी ने इस मिथक को प्रभावी ढंग से तोड़ दिया है कि
किफायती होना निर्माण मानकों में समझौते का संकेत देता है। दवाइयाँ डब्ल्यूएचओ-जीएमपी प्रमाणित
निर्माताओं से खरीदी जाती हैं, जो वैश्विक उत्पादन मानकों का पालन सुनिश्चित करती हैं। नियम
निर्धारित करते हैं कि फार्मेसी की शेल्फ तक पहुंचने से पहले दवा के हर बैच का राष्ट्रीय परीक्षण और
अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) द्वारा स्वीकृत प्रयोगशालाओं में सख्त सत्यापन होना
आवश्यक है। ये दवाइयाँ औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के नियमों का पालन करती हैं
और ब्रांडेड विकल्पों के सुरक्षा और प्रभावशीलता मानकों के अनुरूप हैं। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए
खरीद से पहले सावधानीपूर्वक समीक्षा की जाती है और खरीद के बाद प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता
है। परियोजना की कार्यान्वयन एजेंसी, पीएमबीआई नियमित रूप से दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी

और समीक्षा करती है, ताकि स्थापित विनियमों के पालन में कोई कोताही न होना सुनिश्चित किया जा
सके।
एक आईटी-संचालित वितरण नेटवर्क, जिसे पांच अत्याधुनिक भंडार गृहों और देशभर के में 41 विशेष
वितरकों का समर्थन प्राप्त है, ने सुनिश्चित किया है कि आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों के खिलाफ सुदृढ़ बनी
रहे।
तीन स्तंभों – पहुँच, गुणवत्ता और सस्ती कीमत – पर ध्यान केंद्रित करके, पीएमबीजेपी ने लाखों लोगों के
चिकित्सा खर्च को काफी हद तक कम कर दिया है। निरंतर संस्थागत समर्थन, लोगों की बढ़ती
जागरूकता और अवसंरचनात्मक सुधारों के साथ, हर जिले में जनऔषधि केंद्र का सपना अब दूर की
आकांक्षा नहीं, बल्कि यह ठोस रूप ले चुका है और वास्तविकता के करीब है।
‘विकसित भारत @2047′ दृष्टि के तहत मुख्य ध्यान इस बात पर है कि हर किसी के लिए एक सुदृढ़,
न्यायसंगत और किफायती स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बनाई जाए। इसमें बेहतर अस्पताल, कम चिकित्सा
खर्च, उपचार तक आसान पहुंच और सस्ती दवाओं की उपलब्धता शामिल हैं। बहु-क्षेत्रीय सहयोगों के
जरिये, पीएमबीजेपी ने यह साबित किया है कि सही संस्थागत दृष्टि के साथ, स्वास्थ्य सेवा उच्च
गुणवत्ता युक्त और सार्वभौमिक रूप से सुलभ दोनों हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में
सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि यह परियोजना प्रगति करती रहे और किफायती
स्वास्थ्य सेवा के वैश्विक मॉडल के रूप में अपनी स्थिति को निरंतर बनाए रखे।