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पंजाब में चालू खरीफ सीजन के लिए यूरिया की कोई किल्लत नहीं; मांग के मुकाबले 10.71 लाख मीट्रिक टन की रिकॉर्ड उपलब्धता सुनिश्चित

नई दिल्ली / पंजाब / सत्ता संदेश

भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत उर्वरक विभाग ने साफ कहा है कि पंजाब राज्य में चालू खरीफ 2026 सीजन लिए यूरिया की उपलब्धता पूरी तरह बनी हुई है। । सरकार ने देश के अन्नदाताओं को आश्वस्त किया है कि धान की रोपाई की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जमीनी स्तर पर मजबूत आपूर्ति और पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है ।

पंजाब में यूरिया की वर्तमान उपलब्धता

खरीफ 2026 सीजन के लिए पंजाब की कुल आवश्यकता 14.50 लाख मीट्रिक टन (LMT) अनुमानित है । चालू सीजन में 9 जून 2026 तक की आनुपातिक (pro rata) आवश्यकता 9.0 LMT की थी, जिसके मुकाबले उर्वरक विभाग ने राज्य में 10.71 LMT यूरिया की उपलब्धता पहले ही सुनिश्चित कर दी है । इस अवधि के दौरान राज्य में यूरिया की वास्तविक बिक्री 6.25 LMT रही है, जिसके बाद भी वर्तमान में 4.46 LMT का बड़ा क्लोजिंग स्टॉक राज्य के पास उपलब्ध है । इसके अतिरिक्त, 39,167 मीट्रिक टन यूरिया इस समय रास्ते में (In-transit) है, जिससे राज्य में कुल उपलब्ध स्टॉक की स्थिति 4.85 LMT पहुंच जाती है ।

अमृतसर जिले में उर्वरकों की स्थिति:

अमृतसर जिले में चालू खरीफ सीजन में अब तक कुल 64,720 मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध कराया गया है, जिसमें से आज की तारीख में 32,956 मीट्रिक टन यूरिया का सुरक्षित स्टॉक जिले में मौजूद है ।

ऐतिहासिक रबी सीजन का रिकॉर्ड:

पिछले रबी 2025-26 सीजन में भी पंजाब की 15.00 LMT की अनुमानित मांग के विपरीत केंद्र सरकार ने 19.43 LMT की रिकॉर्ड उपलब्धता सुनिश्चित की थी, जिसमें कुल बिक्री 15.45 LMT दर्ज की गई थी ।

अग्रिम भंडारण की कारगर रणनीति

खरीफ सीजन के सुचारू संचालन के लिए केंद्र सरकार ने दूरदर्शी रणनीति के तहत काम किया है। इस वर्ष जनवरी 2026 से मार्च 2026 के बीच पंजाब की 3.50 LMT की संयुक्त आवश्यकता के मुकाबले 6.08 LMT यूरिया की आपूर्ति पहले ही कर दी गई थी । इस तरह सीजन की शुरुआत से पहले ही 2.58 LMT अतिरिक्त यूरिया का अग्रिम भंडारण (Pre-positioning) सुनिश्चित किया गया था ।

पंजाब में यूरिया की खपत की गति में इस बार उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है । 1 मार्च 2026 से 9 जून 2026 के बीच राज्य में 7.86 LMT यूरिया की बिक्री हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की बिक्री (7.10 LMT) से 76 हजार मीट्रिक टन अधिक है । इस भारी अग्रिम उठाव और पिछले रबी में अनुमान से 45,000 मीट्रिक टन अधिक हुई बिक्री के कारण राज्य सरकार के तात्कालिक बफर पर दबाव पड़ा था, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा लगातार इसकी प्रतिपूर्ति की जा रही है ।

वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियां और भारत की उर्वरक रणनीति

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला गंभीर भू-राजनीतिक संकटों से प्रभावित रही है । विशेष रूप से अमेरिका-इजरायल व ईरान संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की उपलब्धता और समुद्री परिवहन पर प्रतिकूल असर पड़ा है ।

इन वैश्विक प्रतिकूलताओं के बावजूद, भारत सरकार ने अपने घरेलू कृषि क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित रखा है । इसके लिए उर्वरक विभाग ने प्राकृतिक गैस की तत्काल खरीद (Spot Procurement) हेतु ईपीएमसी (EPMC) तंत्र को सक्रिय किया, जिससे घरेलू यूरिया उत्पादन को उल्लेखनीय गति मिली । इसके साथ ही, पूरे कैलेंडर वर्ष के दौरान रणनीतिक रूप से आयात को सुचारू रखा गया, जिससे देश और विशेष रूप से पंजाब राज्य को निर्बाध आपूर्ति मिलती रही ।

राज्यों का दायित्व और प्रवर्तन (Enforcement) के कड़े निर्देश:

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि जहां थोक में पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करना केंद्र की जिम्मेदारी है, वहीं राज्य के भीतर विभिन्न जिलों और एक जिले से दूसरे जिले में इसका समान और सुचारू वितरण सुनिश्चित करना पूरी तरह राज्य सरकार का दायित्व है ताकि किसी भी क्षेत्र में कृत्रिम कमी न होने पाए ।

सब्सिडी वाले यूरिया का दुरुपयोग रोकने और यह केवल वास्तविक किसानों तक ही पहुंचे, इसके लिए सचिव (कृषि एवं किसान कल्याण) तथा सचिव (उर्वरक विभाग) की सह-अध्यक्षता में राज्य के उच्चाधिकारियों के साथ निरंतर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से समीक्षा बैठकें आयोजित की गई हैं । राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि:

रियायती यूरिया को गैर-कृषि या औद्योगिक उपयोग में डायवर्ट करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए ।

जमाखोरी और कालाबाजारी में करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ तुरंत और कड़े कदम उठाए जाएं ।

वर्तमान में पंजाब में धान की रोपाई पूरी तरह गति पकड़ने वाली है, और राज्य के पास इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं । सभी उर्वरक उत्पादक और आयातक कंपनियों को राज्य सरकार की वास्तविक मांग के हिसाब से उपलब्धता का ठीक से प्रबंधन करने की सलाह दी गई है । भारत सरकार राज्य सरकार के साथ निरंतर संपर्क में है और किसानों के हितों की रक्षा के लिए चौबीसों घंटे स्थिति की निगरानी कर रही है ।

माय भारत ने सीमावर्ती गांवों में युवा सशक्तिकरण के लिए वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम 2026 शुरू किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

युवा मामले एवं खेल मंत्रालय के युवा मामलों के विभाग ने मेरा युवा भारत के माध्यम से विकसित जीवंत ग्राम कार्यक्रम 2026 के पहले चरण का शुभारंभ किया है। यह एक अग्रणी युवा नेतृत्व वाली पहल है जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर भागीदारी को सुदृढ़ करना, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना और भारत के सीमावर्ती गांवों में सतत विकास को प्रोत्साहित करना है। यह कार्यक्रम दो चरणों में कार्यान्वित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए कुल 500 ‘एमवाई भारत’ स्वयंसेवकों का चयन किया गया है। इनका चयन एक राष्ट्रव्यापी ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के माध्यम से किया गया, जिसमें 3 लाख से अधिक युवाओं ने भाग लिया था। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने वाले स्वयंसेवकों को लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के चिन्हित सीमावर्ती गांवों में दो चरणों में तैनात किया जा रहा है। प्रथम चरण में 250 स्वयंसेवक 43 गांवों में गहन गतिविधियों में भाग ले रहे हैं, जबकि शेष 250 स्वयंसेवक इस महीने के अंत में 50 गांवों में द्वितीय चरण की गतिविधियों में शामिल होंगे।

यह कार्यक्रम युवा नागरिकों को सीमावर्ती गांवों में रहने और स्थानीय समुदायों के साथ सीधे जुड़ने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। गांववासियों, पंचायती राज संस्थाओं, स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा कर्मियों के साथ परस्पर बातचीत के माध्यम से, प्रतिभागी भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं, सांस्कृतिक विरासत, विकासात्मक आकांक्षाओं और रणनीतिक महत्व से प्रत्यक्ष रूप से परिचित होंगे।

सात दिवसीय गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम को सीमा जागरूकता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सामुदायिक जीवन, शासन, सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन, ग्राम विकास योजना, स्वयंसेवा और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयगत क्षेत्रों के इर्द-गिर्द संरचित किया गया है। स्वयंसेवक घरेलू सर्वेक्षण करेंगे, ग्राम सभा की गतिविधियों में भाग लेंगे, स्वच्छता और पर्यावरण अभियानों में योगदान देंगे और गांवों में विकास के अवसरों की पहचान करने में सहायता करेंगे।

यह कार्यक्रम गृह मंत्रालय और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के सहयोग से कार्यान्वित किया जा रहा है और राष्ट्र निर्माण की पहलों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से 2047 तक एक विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना के अनुरूप है।

विकसित वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम 2026 भारत सरकार की युवा नागरिकों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदार के रूप में सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही, भारत के युवाओं और इसके जीवंत सीमावर्ती गांवों के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक संबंधों को सुदृढ़ करता है।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस: शिक्षा मंत्रालय ने सम्मानित किए तंबाकू-मुक्त स्कूल, लॉन्च किया नया पोर्टल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले शिक्षा मंत्रालय के विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) ने नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किया। इस दौरान “तंबाकू-मुक्त पीढ़ी की ओर: स्कूल चैलेंज 2025” के विजेता स्कूलों को सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में डीओएसईएल के सचिव संजय कुमार ने विजेता स्कूलों को पुरस्कार प्रदान किए। उन्होंने बताया कि देशभर के 17,000 से अधिक स्कूलों ने इस अभियान में भाग लिया। उन्होंने सभी स्कूलों से तंबाकू और नशा मुक्त वातावरण बनाने की अपील की।

संजय कुमार ने कहा कि स्कूल बच्चों में स्वस्थ आदतें विकसित करने और नशे से दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि देश की शिक्षा व्यवस्था लगभग 24.69 करोड़ छात्रों तक पहुंचती है, जिससे यह अभियान एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

इस अवसर पर नशा-मुक्त भारत अभियान के तहत 2026-2029 की तीन वर्षीय कार्य योजना और नशा मुक्त विद्यालय पोर्टल भी लॉन्च किया गया। यह पोर्टल स्कूलों में नशा-मुक्त अभियान की प्रगति की निगरानी करेगा।

नई कार्य योजना के तहत स्कूलों के आसपास 500 मीटर क्षेत्र को नशा-मुक्त क्षेत्र बनाने, पाठ्यक्रम में नशा विरोधी शिक्षा शामिल करने, शिक्षकों को प्रशिक्षण देने और छात्रों व अभिभावकों में जागरूकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

कार्यक्रम में चार श्रेणियों—फाउंडेशनल, प्रिपरेटरी, मिडिल और सेकेंडरी—में कुल 12 स्कूलों को सम्मानित किया गया। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले स्कूलों को 50,000 रुपये, द्वितीय स्थान पर 25,000 रुपये और तृतीय स्थान पर 15,000 रुपये की पुरस्कार राशि दी गई। इसके अलावा 41 स्कूलों को उनके उत्कृष्ट प्रयासों के लिए प्रशंसा पुरस्कार प्रदान किए गए।

शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि स्कूलों, परिवारों और समुदायों के सहयोग से तंबाकू और नशे के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाकर देश में एक स्वस्थ और जागरूक पीढ़ी तैयार की जा सकती है।

1 जून से 30 जून तक देशभर में चलेगा “खेत बचाओ अभियान”

दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने “खेत बचाओ अभियान” को केवल एक जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि खेत, किसान और गांव को जोड़ने वाला व्यापक राष्ट्रीय अभियान बनाने का संदेश दिया है।

एक जून से शुरू हो रहे महीनेभर चलने वाले “खेत बचाओ अभियान” को प्रभावी और परिणामकारी बनाने के लिए केंद्रीय कृषि ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि अभियान का फोकस खेत को बचाने, लागत को संतुलित करने और किसान को सही समय पर सही मार्गदर्शन देने पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह अभियान ऊपर से नीचे तक नहीं, बल्कि पंचायत से लेकर राज्य और केंद्र तक साझी भागीदारी के मॉडल पर चलेगा।

बैठक में केंद्रीय मंत्री ने रसायनिक उर्वरकों, विशेषकर असंतुलित उपयोग को कम करना अभियान का प्रमुख उद्देश्य होगा। किसानों को मृदा परीक्षण आधारित, संतुलित और सही मात्रा में खाद तथा अन्य कृषि इनपुट के उपयोग के बारे में जागरूक करने, हरी खाद, जैविक और जैव-उत्पादों के उपयोग को बढ़ाने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के प्रदर्शन आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया है।

कृषि मंत्री ने कहा कि आने वाले समय को लेकर जो मौसम संबंधी चिंता जताई जा रही है, उसके मद्देनजर किसानों को व्यावहारिक सलाह दी जाएगी कि वे क्या करें, क्या न करें, कौन-सी फसल लें, कहाँ फसल विविधीकरण अपनाएं और कम पानी या जोखिम की स्थिति में कौन-से विकल्प बेहतर रहेंगे। अभियान का उद्देश्य केवल संदेश देना नहीं, बल्कि खेत-स्तर पर किसान को स्थिति-विशेष के अनुरूप सलाह देना होगा।

बैठक में बताया गया कि अभियान के लिए KVKs को सभी सहभागी संस्थानों के लिए प्रमुख समन्वयक की भूमिका दी गई है, साढ़े 1600 से अधिक टीमें बनाई गई हैं। अधिक उर्वरक उपयोग वाले 100 जिलों के लिए 500 टीमें गठित की गई हैं, जिनमें KVK, ICAR संस्थान, AICRP केंद्रों के वैज्ञानिक और कृषि विभाग के अधिकारी शामिल होंगे, जबकि ICAR संस्थानों और KVKs की 1150 से अधिक बहुविषयक टीमें भी समानांतर रूप से काम करेंगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पंजाब सरकार आवारा कुत्तों के लिए बनाएगी शेल्टर होम

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पंजाब / सत्ता संदेश

पंजाब के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाओं पर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने चिंता जाहिर की है। सीएम मान ने कहा कि पंजाब सरकार लोगों की सुरक्षा के साथ पशुओं की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को पूरी तरह लागू करेगी। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि सार्वजनिक स्थानों को बिना किसी डर के घूमने-फिरने योग्य बनाया जाएगा, बच्चों, बुजुर्गों और परिवारों की सुरक्षा जरूरी है।

सीएम मान ने कहा कि आवारा कुत्तों को अधिक भीड़भाड़ वाली जगहों से हटाया जाएगा और उनकी उचित देखभाल के लिए आवश्यक शेल्टर होम बनाए और संचालित किए जाएंगे। उन्होंने मानव जीवन और पशु कल्याण दोनों की सुरक्षा के प्रति पंजाब सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

आवारा कुत्तों की देखभाल होगी-पंजाब सरकार

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि पंजाब सरकार आवश्यक संख्या में डॉग शेल्टर (आश्रय गृह) बनाएगी और उनकी देखभाल करेगी, जहां आवारा कुत्तों की उचित तरीके से देखभाल की जा सकेगी। उन्होंने पुष्टि की कि सरकार लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ इस मुद्दे का मानवीय और कानूनी समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

मुख्यमंत्री ने कहा, रेबीज और लाइलाज बीमारी से पीड़ित या ऐसे कुत्ते जो अत्यधिक खतरनाक हैं और मानव जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं, उसके मामलों में कानूनी रूप से स्वीकृत कदम, जिनमें दर्दरहित मृत्यु भी शामिल है, के संबंध में पशुओं पर क्रूरता निवारण अधिनियम और एबीसी नियमों का सख्ती से पालन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा, इस कदम से पूरे पंजाब के लोगों को बड़ी राहत मिलेगी क्योंकि आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाओं ने नागरिकों में व्यापक चिंता पैदा की है, जिसके कारण पंजाब सरकार के लिए इस मुद्दे पर निर्णायक कार्रवाई करना जरूरी हो गया था.

सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्ते हटाएंगे-पंजाब सरकार

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार, हम सभी अधिक भीड़भाड़ वाली सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाएंगे ताकि बच्चे, बुजुर्ग नागरिक और परिवार अपनी सुरक्षा के डर के बिना स्वतंत्र रूप से घूम-फिर सकें। हम कुत्तों के लिए आवश्यक संख्या में आश्रय गृह बनाएंगे और उनकी देखभाल करेंगे, जहां इन आवारा कुत्तों की उचित तरीके से देखभाल की जा सके।

उन्होंने कहा कि रेबीज़ और लाइलाज बीमारी से पीड़ित या खतरनाक कुत्तों, जो मानव जीवन के लिए खतरा हैं, के मामलों में कानूनी रूप से स्वीकृत कदम उठाए जाएंगे, जिनमें दर्दरहित मृत्यु भी शामिल है। इसके लिए पशुओं पर क्रूरता निवारण अधिनियम और एबीसी नियमों का सख्ती से पालन किया जाएगा।

आरबीआई देगा सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश, बढ़ेगी वित्तीय मजबूती

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश देने की घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह राशि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार को बड़ी वित्तीय राहत प्रदान करेगी।

यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश हस्तांतरण है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में आरबीआई ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का लाभांश दिया था, जो 2023-24 की तुलना में 27.4 प्रतिशत अधिक था। वहीं, 2023-24 में यह राशि 2.1 लाख करोड़ रुपये और 2022-23 में 87,416 करोड़ रुपये रही थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई से मिलने वाला यह बड़ा लाभांश सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश आय और केंद्रीय बैंक की बेहतर वित्तीय स्थिति के कारण इस बार रिकॉर्ड लाभांश संभव हो पाया है।

भूमि शासन एवं वाटरशेड प्रबंधन में सहयोग को लेकर भूमि संसाधन विभाग और एडीबी के बीच चर्चा


नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भूमि संसाधन विभाग के सचिव ने एडीबी के साथ बैठक में भूमि शासन सुधारों और डिजिटल पहलों पर प्रकाश डाला

नई दिल्ली, 21 मई: ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के सचिव श्री नरेन्द्र भूषण ने आज एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की कंट्री डायरेक्टर सुश्री मियो ओका के नेतृत्व में एडीबी प्रतिनिधिमंडल के साथ एक परिचयात्मक बैठक की। बैठक के दौरान, श्री नरेन्द्र भूषण ने 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के सरकार के विजन के अनुरूप भूमि प्रशासन, भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण और जलसंभर विकास के क्षेत्रों में भूमि संसाधन विभाग द्वारा की जा रही प्रमुख पहलों पर प्रकाश डाला।

सचिव ने कहा कि भूमि संसाधन विभाग को देश में भूमि अभिलेख प्रबंधन और भूमि प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि कुशल भूमि प्रशासन और भूमि संसाधनों का अधिकतम उपयोग आर्थिक विकास को गति देने, भूमि संपत्तियों के मूल्य को उजागर करने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

भूमि प्रशासन में प्रौद्योगिकी की परिवर्तनकारी भूमिका पर बल देते हुए, श्री भूषण ने प्रतिनिधिमंडल को सूचित किया कि डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) के तहत महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की गई है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रिकॉर्ड्स ऑफ राइट्स का डिजिटलीकरण लगभग पूर्ण हो चुका है, जबकि देश भर में लिखित भूमि अभिलेखों को जमाबंदी नक्शों से जोड़ने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं।

उन्होंने बताया कि विभाग कार्यक्रम के अगले चरण, डीआईएलआरएमपी 3.0 लागू करने की प्रक्रिया में है, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी उपाय, भूमि अभिलेखों के गतिशील अद्यतन और भूमि संबंधी डेटाबेस के बेहतर एकीकरण के माध्यम से भूमि शासन प्रणालियों को और सुदृढ़ करना है। सचिव ने देश भर में भूमि पार्सलों को विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (यूएलपीआईएन), जिसे “भू-आधार” भी कहा जाता है, के आवंटन में हुई प्रगति को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 66 प्रतिशत कृषि भूमि पार्सलों के लिए यूएलपीआईएन जारी किए जा चुके हैं।

श्री भूषण ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) की अगली परत के रूप में एक व्यापक “लैंड स्टैक” विकसित करने के विभाग के विजन को साझा किया, जिसमें भूमि अभिलेख, पंजीकरण, म्यूटेशन, भूमि उपयोग और अन्य संबंधित सेवाओं को अंतरसंचालनीय डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से एकीकृत करके बेहतर शासन और सेवा वितरण सुनिश्चित किया जाएगा। उन्होंने शहरी क्षेत्रों में आधुनिक भूमि शासन पद्धतियों के विस्तार के लिए विभाग की चल रही पहलों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें मानचित्रण और प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान शामिल हैं।

जलसंभर विकास के विषय पर, सचिव ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के लिए जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ भूमि एवं जल प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने देश भर में जलसंभर विकास पहलों को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए नवीन वित्तपोषण मॉडल, प्रौद्योगिकी उपाय और संयोजन-आधारित दृष्टिकोणों की आवश्यकता पर बल दिया।

बैठक में भूमि प्रशासन, जलसंभर विकास, डिजिटल शासन और सतत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर भी विचार-विमर्श किया गया। शासन के परिणामों में सुधार के लिए भू-स्थानिक प्रणालियों, डिजिटल प्लेटफार्मों, रिमोट सेंसिंग और डेटा-आधारित योजना सहित उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग पर चर्चा हुई।

सुश्री मियो ओका ने सचिव को भारत में विभिन्न क्षेत्रों में एशियाई विकास बैंक द्वारा समर्थित विभिन्न पहलों और परियोजनाओं तथा राज्य सरकारों के साथ जारी सहयोग के बारे में जानकारी दी। उन्होंने डिजिटल कृषि, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, जलसंभर प्रबंधन और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में एडीबी के कार्यों पर प्रकाश डाला और आपसी हित के क्षेत्रों में भूमि संसाधन विभाग के साथ सहयोग करने में एडीबी की गहरी रुचि व्यक्त की।


दोनों पक्षों ने देश में सतत भूमि और जलसंभर प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करने के लिए तकनीकी सहायता, नीतिगत समर्थन, क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण सहित भविष्य में सहयोग के अवसरों पर चर्चा की।

इस बैठक में अपर सचिव श्री आर आनंद; संयुक्त सचिव श्री पी. नरहरि; संयुक्त सचिव श्री नितिन खाडे; आर्थिक सलाहकार श्री पी.के. अब्दुल करीम; और मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने यूएमएमआईडी (उम्‍मीद) कार्यक्रम राष्ट्र को समर्पित किया; कहा- जीनोमिक और सटीक चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा का भविष्य तय करेगी


दिल्ली / सत्ता संदेश

यूएमएमआईडी: दुर्लभ आनुवंशिक विकारों से पीड़ित परिवारों के लिए प्रारंभिक हस्तक्षेप और किफायती स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने वाली राष्ट्रीय पहल

चिकित्सा का पूरा भविष्य जीन और जीनोम आधारित व्यक्तिगत उपचार की ओर अग्रसर है: डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा- उम्‍मीद यह दर्शाता है कि विज्ञान और सार्वजनिक नीति किस प्रकार जीवन को बदल सकते हैं

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज दुर्लभ आनुवंशिक विकारों/रोगों के लिए यूएमएमआईडी (वंशानुगत विकारों के इलाज की अनूठी विधियां) कार्यक्रम राष्ट्र को समर्पित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत धीरे-धीरे एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहा है जहां स्वास्थ्य सेवा, निदान और उपचार तेजी से जीनोम-आधारित, सटीक और प्रत्येक रोगी की आनुवंशिक प्रोफ़ाइल के अनुसार व्यक्तिगत होते जाएंगे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वंशानुगत और दुर्लभ आनुवंशिक विकार दशकों तक उपेक्षित रहे क्योंकि निदान ही कठिन था, उपचार दुर्गम था और दवाएं या तो अनुपलब्ध थीं या अत्यधिक महंगी थीं, इसलिए सभी परिवारों के लिए निदान और इलाज को व्यवहार्य, वहनीय और सुलभ बनाने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय तंत्र का निर्माण करना आवश्यक है।

केंद्रीय मंत्री ने यूएमएमआईडी (उम्मीद) को भारत में सटीक चिकित्सा के भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम बताते हुए कहा कि यह पहल देश के स्वास्थ्य सेवा तंत्र को जीन और जीनोम-आधारित चिकित्सा देखभाल की अगली पीढ़ी के लिए भी तैयार करेगी।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली के पृथ्वी भवन में जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा राष्ट्र को यूएमएमआईडी नेटवर्क समर्पित करने के लिए आयोजित एक विशेष समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने यूएमएमआईडी संकलन का विमोचन किया और आनुवंशिक विकारों के निदान, परामर्श, जागरूकता अभियान और कार्यक्रम निगरानी तक राष्ट्रव्यापी पहुंच को मजबूत करने के उद्देश्य से यूएमएमआईडी डैशबोर्ड का शुभारम्भ किया।

इस कार्यक्रम में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और ब्रिक के महानिदेशक डॉ. राजेश एस. गोखले; डीबीटी की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. सुचिता नीनावे; वरिष्ठ वैज्ञानिक, चिकित्सक, स्वास्थ्य सेवा पेशेवर, यूएमएमआईडी कार्यान्वयन संस्थानों के प्रतिनिधि और देश भर के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संगठनों के अधिकारी उपस्थित रहे।

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में शुरू किए गए स्वास्थ्य सुधारों का जिक्र करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने लगातार किफायती, सुलभ, निवारक और नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने कहा कि भारत ने स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार किया है, स्वास्थ्य बीमा कवरेज को मजबूत किया है और सस्ती दवाओं तक पहुंच को व्यापक बनाया है, साथ ही साथ शीघ्र निदान और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिए प्रणालियां भी विकसित की हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि वंशानुगत और दुर्लभ आनुवंशिक विकार एक मूक लेकिन गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें परिवार अक्सर निदान और उपचार की तलाश में वर्षों तक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहते हैं। उन्होंने कहा कि अपेक्षाकृत कम आबादी को प्रभावित करने के बावजूद, ये विकार प्रभावित परिवारों पर भारी भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक बोझ डालते हैं और इसलिए अन्य किसी भी गंभीर बीमारी की तरह ही इस पर भी राष्ट्रीय ध्यान देने और स्वास्थ्य देखभाल को लेकर संवेदनशील होने की जरूरत है।

चिकित्सा जगत से जुड़े अपने दृष्टिकोण को साझा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि दुर्लभ आनुवंशिक विकारों को ऐतिहासिक रूप से मुख्यधारा की चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में सीमित महत्व दिया गया है, क्योंकि ये कम प्रचलित हैं और इनकी निदान प्रक्रिया जटिल है। उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप अक्सर निदान में देरी, जागरूकता की कमी और रोगियों के लिए अपर्याप्त उपचार की सुविधा उपलब्ध होती है। उन्होंने यह भी कि भारत की व्यापक आनुवंशिक विविधता इस चुनौती को और भी जटिल बनाती है और इसके लिए प्रारंभिक जांच, आनुवंशिक निदान, प्रसवपूर्व परामर्श, चिकित्सकों के प्रशिक्षण और सामुदायिक जागरूकता के एक मजबूत तंत्र की जरूरत है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस कठिन लेकिन सामाजिक परिवर्तनकारी मिशन को हाथ में लेने की सराहना करते हुए कहा कि यूएमएमआईडी यह दर्शाता है कि कैसे विज्ञान, करुणा और जन नीति समय पर हस्तक्षेप और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से पीड़ा को कम करने के लिए एक साथ आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम ने आनुवंशिक निदान, प्रसवपूर्व और नवजात शिशु स्क्रीनिंग, आनुवंशिक परामर्श, चिकित्सकों की क्षमता निर्माण और सामुदायिक आउटरीच को एकीकृत जन स्वास्थ्य मॉडल के तहत एकीकृत करते हुए एक राष्ट्रीय ढांचा सफलतापूर्वक स्थापित किया है।

डॉ. सिंह ने कहा कि स्क्रीनिंग और निदान सेवाओं के माध्यम से इस कार्यक्रम से पहले ही लगभग तीन लाख लोगों को लाभ मिल चुका है और आकांक्षी जिलों तथा वंचित क्षेत्रों में इसका विस्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस पहल से उन्नत निदान और परामर्श के लिए लगभग 30 निदान केंद्र स्थापित करने में भी मदद मिली है। इससे यह सुनिश्चित हो रहा है कि उन्नत जीनोमिक स्वास्थ्य सेवा महानगरों से बाहर भी आम नागरिकों तक पहुंचे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यूएमएमआईडी के माध्यम से प्राप्त अनुभव सटीक चिकित्सा के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनेगा, जहां मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार प्रोटोकॉल रोगियों की व्यक्तिगत आनुवंशिक प्रोफाइल पर आधारित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आनुवंशिक चिकित्सा और परमाणु चिकित्सा दो प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं जो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवा को नया रूप दे सकते हैं।

इस अवसर पर अपने संबोधन में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और ब्रिक के महानिदेशक डॉ. राजेश एस. गोखले ने कहा कि यूएमएमआईडी पहल ने वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सहयोगात्मक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और शीघ्र निदान के माध्यम से हजारों परिवारों को आशा की किरण दिखाई है। उन्होंने कहा कि भारत की आनुवंशिक विविधता वैज्ञानिक नवाचार और व्यावहारिक स्वास्थ्य समाधानों के लिए अपार अवसर प्रदान करती है, जो न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक हैं।

इससे पहले, उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए डॉ. सुचिता नीनावे ने कहा कि यूएमएमआईडी कार्यक्रम ने आनुवंशिक निदान, परामर्श और क्षमता निर्माण तक पहुंच में सुधार करके वंशानुगत आनुवंशिक विकारों के प्रति भारत की प्रतिक्रिया को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि इस पहल ने समन्वित संस्थागत साझेदारी के माध्यम से दुर्लभ और वंशानुगत रोगों के इलाज के लिए एक एकीकृत राष्ट्रव्यापी नेटवर्क बनाने में मदद की है।

इस कार्यक्रम में यूएमएमआईडी पहल का एक संक्षिप्त विवरण, उपलब्धियों और सफलता की कहानियों पर प्रस्तुतियां और इस पहल की यात्रा, प्रभाव और भविष्य की रूपरेखा को उजागर करने वाली एक लघु फिल्म का प्रदर्शन भी शामिल था।

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) ने एग्जीक्यूटिव एजुकेशन प्रोग्राम के लिए MDI, गुड़गांव के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किया

गुड़गांव / सत्ता संदेश

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के मैनेजमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (MTI) और मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (MDI), गुड़गांव ने 20 मई, 2026 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। कंपनी के नई दिल्ली स्थित कॉर्पोरेट ऑफिस में हुआ यह समझौता, SAIL में भविष्य की कमान संभालने वाले लीडर्स को तैयार करने के उद्देश्य से एग्जीक्यूटिव एजुकेशन प्रोग्राम्स पर मिलकर काम करने के लिए किया गया है।

यह साझेदारी अकादमिक ज्ञान को व्यावहारिक इस्तेमाल के साथ जोड़ेगी। इसके तहत कस्टमाइज्ड लीडरशिप प्रोग्राम्स, रणनीति और इनोवेशन पर आधारित लर्निंग इंटरवेंशन, मापने योग्य व्यावसायिक प्रभाव के लिए ‘एक्शन लर्निंग’, ओवरसीज लर्निंग प्रोग्राम, संयुक्त रिसर्च व कंसल्टिंग और कंपनी के अधिकारियों की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए गए केस स्टडीज शामिल होंगे। इस सहयोग का मुख्य उद्देश्य ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज के साथ तालमेल बिठाते हुए संगठनात्मक क्षमता को मजबूत करना है।

इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर SAIL के एमटीआई (MTI) के कार्यपालक निदेशक (HR-L&D) श्री संजय धर और एमडीआई (MDI), गुड़गांव की प्रोफेसर सुमिता राय (Dean–Industry Connect) ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर SAIL के निदेशक (कार्मिक) श्री के. के. सिंह और सेल तथा एमडीआई के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय 22 मई, 2026 को “सुचारू रूप से कार्य करने वाली देखभाल अर्थव्यवस्था का सृजन” विषय पर एक आभासी कार्यक्रम का आयोजन करेगा


कर्नाटक/ सत्ता संदेश

केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार वरिष्ठ नागरिकों के लिए जीवन ऐप और केयरगिवर डैशबोर्ड का शुभारंभ करेंगे

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग 22 मई, 2026 को सुबह 10:00 बजे “सुचारू रूप से कार्य करने वाली देखभाल अर्थव्यवस्था का सृजन” विषय पर एक आभासी कार्यक्रम का आयोजन करेगा।

कार्यक्रम का शुभारंभ संयुक्त सचिव (वरिष्ठ नागरिक) के स्वागत भाषण से होगा जिसके बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव श्री सुधांश पंत का संबोधन होगा।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री बी.एल. वर्मा और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री रामदास अठावले भी प्रतिभागियों को संबोधित करेंगे।

इस कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण वरिष्ठ नागरिकों के लिए जीवन ऐप और केयरगिवर डैशबोर्ड का शुभारंभ होगा, जिसे केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार द्वारा शुभारंभ किया जाएगा। डॉ. वीरेंद्र कुमार मुख्य भाषण देंगे, जिसमें वे वरिष्ठ नागरिकों के लिए देखभाल व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से मंत्रालय की पहलों की रूपरेखा प्रस्तुत करेंगे।

इस कार्यक्रम में कर्नाटक और केरलम राज्यों से स्वास्थ्य सेवा अर्थव्यवस्था में सर्वोत्तम प्रथाओं पर प्रस्तुतियां भी शामिल होंगी। इस कार्यक्रम में गहन चर्चा के लिए चार विषयगत क्षेत्रों की पहचान की गई है। प्रतिभागी निर्दिष्ट वर्चुअल चर्चा कक्षों में शामिल होंगे, जहां मॉडरेटर, पैनलिस्ट और प्रख्यात वक्ता प्रमुख नीतिगत मुद्दों, कार्यान्वयन में कमियों, उभरती पहलों, सर्वोत्तम प्रथाओं और निर्धारित समयसीमा के साथ कार्रवाई योग्य सिफारिशों पर विचार-विमर्श करेंगे।

इस पहल का उद्देश्य भारत की बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकी और सामुदायिक भागीदारी का लाभ उठाते हुए देखभाल सेवाओं के लिए एक व्यापक ढांचा विकसित करना है।