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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने उद्योग- सरकार सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया तथा वैश्विक अनिश्चितताओं को सुधार और सुदृढ़  विकास के अवसरों में बदलने पर दिया जोर


श्री गोयल ने कहा कि भारत को वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक चुनौतियों को तेज सुधारों, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं और अधिक निर्यात के अवसरों में बदलना चाहिए

श्री पीयूष गोयल ने सेवा क्षेत्र में भरोसा जताया तथा एआई, साइबर सुरक्षा और डेटा सेंटर इकोसिस्टम में अवसरों पर बल दिया

भारतीय प्रतिभा पर भरोसे के कारण तेजी से बढ़ रहे हैं भारतीय जीसीसी: श्री पीयूष गोयल

बड़े पैमाने पर स्थापित हो रहे डेटा सेंटर्स अपना खुद का इकोसिस्टम बनाएंगे, जिससे अर्थव्यवस्था को लाभ होगा: श्री गोयल

श्री पीयूष गोयल ने उद्योग जगत से सुधार के लिए लीक से हटकर नए विचारों का आह्वान किया

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने आज नई दिल्ली में एसोचैम (एएसएसओसीएचएएम) इंडिया बिजनेस रिफॉर्म समिट 2026 को संबोधित करते हुए उद्योग और  सरकार के बीच गहन सहयोग का आह्वान किया, ताकि व्यापार सुगमता को आगे बढ़ाया जा सके, भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता क्षमता को मजबूत किया जा सके और और विकसित भारत 2047 कि दिशा मे देश की यात्रा को गति दी जा सके।

मंत्री महोदय ने कहा कि वर्तमान वैश्विक स्थिति और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को भारत के लिए एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, ताकि व्यावसायिक प्रक्रियाओं मजबूत किया जा सके, तेजी से सुधार किए जा सकें अधिक सुदृढ़ता लाई जा सके और आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कभी भी किसी संकट को व्यर्थ नहीं जाने दिया है। उन्होंने भरोसा जताया कि देश मौजूदा वैश्विक जोखिमों को विकास और सुधार के अवसरों में बदल देगा।

वैश्विक स्तर पर बदलती परिस्थितियों और पश्चिम एशिया संकट पर बोलते हुए श्री गोयल ने कहा कि व्यवसायों को बिना घबराए अवसरों और जोखिमों दोनों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने कोविड-19 जैसी अप्रत्याशित चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है और अधिक स्मार्ट और कुशल व्यावसायिक तौर-तरीकों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें अपव्यय को कम करना, उत्पादकता में सुधार करना और ऊर्जा दक्षता के उपायों को लागू करना शामिल है।

उन्होंने कहा कि कोविड काल के अनुभवों ने डिजिटल सहभागिता और दूरस्थ कार्य प्रणाली (वर्क फ्रोम होम मॉडल) की प्रभावशीलता को साबित किया है। भारत में तेजी से बढ़ रहे वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) का उल्लेख करते हुए श्री गोयल ने कहा कि देश में लगभग 1,800 जीसीसी संचालित हो रहे हैं, जो लगभग 20 लाख प्रत्यक्ष और करीब एक करोड़ अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत को एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में देख रही है, जिसके पास वैश्विक परिचालन को संभालने में सक्षम युवा और प्रतिभाशाली मानव संसाधन मौजूद है।

मंत्री महोदय ने भारत के सेवा क्षेत्र में विश्वास व्यक्त किया और कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा जैसी उभरती प्रौद्योगिकियां नए अवसर पैदा करेंगी।

श्री गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को उभरती प्रौद्योगिकियों, व्यापार सुधारों और वैश्विक घटनाक्रमों को अवसरों के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार विश्वसनीय वैश्विक साझेदारियों, कम लागत पर डेटा की उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और मजबूत विद्युत अवसंरचना के माध्यम से डेटा केंद्रों और क्लाउड सेवाओं में निवेश के लिए अनुकूल इको-सिस्टम का निर्माण कर रही है।

उन्होंने बताया कि भारत या भारतीय डेटा केंद्रों से दुनिया के बाकी हिस्सों को प्रदान की जाने वाली क्लाउड सेवाओं को 2047 तक 100 प्रतिशत कर-मुक्त दर्जा दिया गया है। उन्होंने कहा कि डेटा केंद्रों में निवेश से रियल एस्टेट, आतिथ्य, लॉजिस्टिक्स, परिवहन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में मांग पैदा होगी, जिससे आर्थिक विकास का एक सकारात्मक चक्र शुरू होगा।

श्री गोयल ने उद्योग जगत से आग्रह किया कि वे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं, जिनमें जापानी विनिर्माण प्रणालियां भी शामिल हैं, से सीख लेकर अधिक दक्षता अपनाएं और अपव्यय को कम करें। उन्होंने कहा कि टैरिफ, यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया संकट जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत का निर्यात पिछले वर्ष 863 अरब अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं दोनों के निर्यात में वृद्धि दर्ज की गई।

श्री गोयल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत मजबूती की स्थिति से जुड़ रहा है और देश वस्तुओं का एक प्रतिस्पर्धी निर्माता और सेवाओं का प्रदाता है। 38 देशों को शामिल करने वाले मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये समझौते व्यापक जुड़ाव के द्वार खोलते हैं और इस बात पर जोर दिया कि भारतीय व्यवसायों को केवल आयात में वृद्धि होने देने के बजाय निवेश आकर्षित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए इनका लाभ उठाना चाहिए।

श्री गोयल ने कहा कि सरकार एक सहायक के रूप में कार्य करना जारी रखेगी और उन्होंने भव्य पहल तथा 100 नए औद्योगिक पार्कों के स्थान निर्धारण के संबंध में हितधारकों के साथ परामर्श का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 20 पार्क पहले से ही विकास के विभिन्न चरणों में हैं। उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ हुई चर्चाओं के दौरान प्राप्त सुझावों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार औद्योगिक पार्कों में एक एकल निकाय स्थापित करने की संभावना की जांच कर रही है, जो सभी केंद्रीय और राज्य मंजूरियों के लिए ‘वन-स्टॉप शॉप’ के रूप में कार्य कर सके।

श्री गोयल ने सरकारी प्रणालियों में सुधार के लिए निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी का आग्रह किया और कहा कि कोविड-19 के बाद शुरू की गई राष्ट्रीय एकल-खिड़की प्रणाली को उद्योग जगत से पर्याप्त भागीदारी और प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उन्होंने व्यवसायों से आग्रह किया कि वे सरकार के साथ मिलकर विशिष्ट समस्याओं की पहचान करें और सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से व्यापार करने में सुगमता में सुधार करें।

मंत्री महोदय ने कहा कि भारत को ऑटोमोबाइल, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, उपभोक्ता सामान और कृषि आधारित मूल्यवर्धित उत्पादों सहित अधिक मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि किसानों और मछुआरों को बेहतर कीमतें और बेहतर मूल्य प्राप्ति का लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों को कच्चे माल के रूप में नहीं, बल्कि तैयार उत्पादों के रूप में वैश्विक बाजारों तक पहुंचना चाहिए।

श्री गोयल ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पर्यटन और घरेलू खपत के महत्व पर भी प्रकाश डाला और नागरिकों से भारतीय पर्यटन स्थलों को बढ़ावा देने का आग्रह किया। भारत की ऊर्जा दक्षता पहलों का जिक्र करते हुए उन्होंने उजाला एलईडी बल्ब कार्यक्रम की सफलता को याद किया, जिससे ऊर्जा खपत में उल्लेखनीय कमी आई और सालाना लगभग एक लाख करोड़ रुपये की बचत हुई।

उन्होंने कहा कि भारत अब 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रख रहा है और निर्यातकों से आग्रह किया कि वे आगामी एफटीए का सक्रिय रूप से लाभ उठाएं, नए बाजारों को तलाश करें, नमूनाकरण और परीक्षण ऑर्डर शुरू करें तथा समझौतों के औपचारिक रूप से लागू होने से पहले ही वैश्विक जुड़ाव बढ़ाएं।

मंत्री महोदय ने दोहराया कि सरकार अलग-अलग विभागों में काम करने के बजाय एकीकृत तरीके से काम करती है और उद्योग जगत से सरकार को लीक से हट कर सुझाव देने के लिए आंमत्रित किया। उन्होंने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय खुद दक्षता और पारदर्शिता में सुधार के लिए आंतरिक सुधार कर रहा है।

श्री गोयल ने बताया कि मंत्रालय, जिसके 46 संगठनों के तहत 216 शहरों में 482 कार्यालय हैं, राज्य की राजधानियों और प्रमुख शहरों में एकल- संपर्क केंद्रों में परिचालन को समेकित करने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि इससे व्यवसायों को एकीकृत और डिजिटल रूप से जुड़े सिस्टम के माध्यम से डीजीएफटी, कॉफी बोर्ड, मसाला बोर्ड, जीईएम और अन्य निकायों से संबंधित सेवाओं तक पहुंच प्राप्त करने में सुविधा होगी।

गुणवत्ता, उत्पादकता, स्थानीयकरण और नवाचार पर केंद्रित संस्कृति का आह्वान करते हुए श्री गोयल ने सुझाव दिया कि उद्योग और सरकार संयुक्त रूप से स्वदेशीकरण, आयात प्रतिस्थापन, निर्यात, ऊर्जा दक्षता और नवाचार जैसे क्षेत्रों में प्रगति की  निगरानी के लिए स्कोरकार्ड विकसित करें।

श्री गोयल ने सभी हितधारकों से ‘विकसित भारत’ की ओर ‘अमृत काल’ की इस यात्रा को अधिक परिणाम-उन्मुख, कुशल और सहयोगात्मक बनाने के लिए मिल कर काम करने का आग्रह किया।

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पीके/केसी/आईएम/केएस
(रिलीज़ आईडी: 2262799) आगंतुक पटल : 46

इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English Urdu Bengali Bengali-TR Gujarati

भारत का लक्ष्य इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात करना : केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल


दिल्ली /सत्ता संदेश

निर्यात लक्ष्य एक राष्ट्रीय मिशन; लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते बाजार पहुंच को बढ़ावा देंगे: श्री पीयूष गोयल

श्री पीयूष गोयल ने व्यवसायों से आयात रुझानों पर दृष्टि रखने, अवसरों की पहचान करने, आयात प्रतिस्थापन में देश की मदद करने की अपील की

स्वदेशी को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों की सहायता करने का आग्रह किया

बढ़ती खपत अवसर प्रदान करती है, लेकिन आयात में वृद्धि को रोकने के लिए घरेलू उद्योग को आगे आना होगा; युवाओं और स्टार्टअप की अधिक भागीदारी की आवश्‍यकता : श्री पीयूष गोयल

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने आज कहा कि भारत ने इस वर्ष एक ट्रिलियन डॉलर और अगले पांच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। यही आत्मनिर्भर भारत की सच्ची पहचान होगी। नई दिल्ली में भारतीय व्यापार महोत्सव की वेबसाइट लॉन्च समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, इस वर्ष निर्यात 863 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने कहा कि वस्तुओं और सेवाओं दोनों के निर्यात में वृद्धि हुई है, जो वर्तमान वैश्विक परिवेश में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

श्री गोयल ने कहा कि यह केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि राष्ट्र का लक्ष्य है और केंद्र सरकार इसे अर्जित करने के लिए हर संभव सहायता देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में लगभग 38 विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इससे भारतीय वस्तुओं को उन बड़े बाजारों में तरजीही पहुंच मिलेगी जहां प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम आयात शुल्क पर भारतीय सामान बेचा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ये समझौते धीरे-धीरे लागू होंगे और ओमान के साथ एफटीए पहली जून से लागू हो सकता है। कागजी कार्रवाई के लिए लंबित अन्य अंतिम रूप दिए गए एफटीए भी बाद में लागू हो जाएंगे।

श्री पीयूष गोयल ने हितधारकों से वाणिज्य मंत्रालय के व्यापार पोर्टल के माध्यम से आयात रुझानों का अध्ययन करने और घरेलू विनिर्माण तथा आयात प्रतिस्थापन के अवसरों की पहचान करने का आग्रह किया। उन्होंने देश में आयात की जा रही वस्तुओं पर निरंतर दृष्टि रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ऐसे रुझान भारतीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करते हैं। श्री गोयल ने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय को विदेशों से भारत में आने वाले उत्पादों को उजागर करते हुए इन अवसरों को अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रदर्शित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और निर्यात विकास के दो प्रमुख पहलू हैं और मंत्रालय उन क्षेत्रों को भी प्रदर्शित करेगा जहां भारत की शक्ति और क्षमता है ताकि व्यवसाय इन अवसरों का लाभ उठा सकें।

श्री पीयूष गोयल ने घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने और स्वदेशी भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विदेशी वस्तुओं के प्रति थोड़ी सी भी प्राथमिकता घरेलू उद्योग को कमजोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मध्यम वर्ग का विस्तार हो रहा है और उपभोग बढ़ रहा है, भारत के लिए अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करना आवश्यक है, अन्यथा आयात इस कमी को पूरा करेगा। श्री गोयल ने व्यवसायों और उपभोक्ताओं से देश के भीतर आपूर्तिकर्ता और ग्राहक बनकर एक-दूसरे की सहायता करने का आग्रह किया। उन्‍होंने कहा कि यदि भारतीय स्वदेशी मेला जैसी पहलों के माध्यम से इस भावना को मजबूत किया जाता है, तो यह भारत में निर्मित उत्पादों को बढ़ावा देने वाले एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में परिवर्तित हो सकता है।

श्री गोयल ने कहा कि पूंजीगत वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी विदेशी देशों पर बहुत हद तक निर्भर है। उन्होंने राजकोट, जालंधर, लुधियाना, बटाला और पुणे सहित औद्योगिक समूहों से आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन बढ़ाने का आह्वान किया।

केंद्रीय मंत्री ने चिकित्सा उपकरणों के बढ़ते घरेलू उत्पादन को भी रेखांकित किया और विशाखापत्तनम में निर्मित सीटी स्कैन मशीन को उदृत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पादों को अधिक अपनाने से मांग बढ़ेगी और परिचालन का परिमाण भी बढ़ेगा।

श्री गोयल ने कहा कि भारत को केवल विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने मात्र से आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को निरंतर बड़ी उपलब्धियों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए, नए विचार उत्पन्न करने चाहिए और प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा परिकल्पित अमृत काल के दौरान विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर निरंतर कार्य करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उद्योगों, व्यवसायों और नागरिकों के उत्साह के साथ-साथ 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक भावना से यह विश्वास मिलता है कि विश्‍व की कोई भी शक्ति भारत की प्रगति को रोक नहीं सकती। भारत मंडपम में आयोजित हो रहे भारतीय स्वदेशी मेले का उल्‍लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थल स्वयं भारत की विविधता को दर्शाता है, क्योंकि यहाँ उपयोग की जाने वाली सामग्री और उत्पाद देश के विभिन्न कोनों से आए हैं।

श्री गोयल ने गुणवत्ता और उत्पादकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी देश में गुणवत्ता मानकों में सुधार और उत्पादकता में वृद्धि चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर गुणवत्ता और पैकेजिंग के बिना भारत वैश्विक बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत तेजी से प्रगति कर रहा है और इसके निर्यात में भी लगातार वृद्धि हो रही है।

कृषि और मत्स्य पालन सेक्‍टरों की क्षमता को रेखांकित करते हुए श्री गोयल ने कहा कि किसानों और मछुआरों के उत्पादों सहित भारत का कृषि निर्यात लगभग 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन सेक्‍टरों में मूल्यवर्धन का स्तर अभी भी कम है। उन्होंने कहा कि यदि युवा उद्यमी मूल्यवर्धित सेक्‍टरों में प्रवेश करें और लघु, मध्यम एवं वृहत्तर स्तर पर प्रसंस्करण और विनिर्माण इकाइयां स्थापित करें तो अपार संभावनाएं हैं।

श्री गोयल ने कहा कि जब भारत निर्यात-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाता है, तो गुणवत्ता मानक स्वाभाविक रूप से बेहतर होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि स्वदेशी उत्पाद निर्यात-योग्य हो जाएं, तो लोग विदेशी वस्तुओं की ओर रुख नहीं करेंगे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और परिचालन के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री गोयल ने कहा कि सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा का विस्तार किया गया है और अब 500 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले उद्यम एमएसएमई के दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार उद्यमों को और अधिक विकसित होते देखना चाहती है और उनके साथ खड़ी है।

उन्होंने आयोजकों से आग्रह किया कि वे भारतीय व्यापार महोत्सव में देश भर से विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों को आमंत्रित करें। कार्यक्रम में 1,000 व्यवसायों की भागीदारी का हवाला देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य से 25 महिला उद्यमियों को आमंत्रित किया जाए, जिससे अकेले ही लगभग 700-750 प्रतिभागी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग और बढ़ती खपत व्यापारियों, उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असीम अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने सावधान किया कि यदि घरेलू उद्योग देश की आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहते हैं, तो आयात इस कमी को पूरा करेगा।

उन्होंने इस पहल में युवा उद्यमियों, स्टार्टअप्स और देश भर के युवाओं सहित अगली पीढ़ी को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आयात प्रतिस्थापन और वर्तमान में आयात किए जा रहे उत्पादों से संबंधित अवसरों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए ताकि लोग घरेलू विनिर्माण की संभावनाओं को समझ सकें।

श्री गोयल ने भारतीय स्वदेशी मेले में रुपे कार्ड और यूपीआई संचालित करने वाली एनपीसीआई को शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यूपीआई का व्यापक उपयोग हो रहा है, जबकि रुपे कार्ड का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने मेले के पूरे परिसर में 50 से 100 कियोस्क स्थापित करने का सुझाव दिया, जहां आगंतुक आधार और अन्य पहचान दस्तावेजों का उपयोग करके रुपे डेबिट कार्ड प्राप्त कर सकें और यूपीआई या रुपे कार्ड के माध्यम से सभी लेनदेन डिजिटल रूप से कर सकें।

श्री गोयल ने कहा कि इस पहल के लिए बैंकों को एक साथ लाने से भारत की भुगतान प्रणालियों के व्यापक अंगीकरण को प्रोत्साहन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि भारत मंडपम नियमित रूप से प्रदर्शनियों और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन करता है। ऐसी पहल से अधिक लोगों को पूरे देश में रुपे और यूपीआई को अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस तरह की छोटी-छोटी पहल भारत की अमृतकाल यात्रा को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेंगी और जनभागीदारी के माध्यम से समृद्ध और विकसित भारत की राह को सुदृढ़ करेंगी। उन्होंने कहा कि जब प्रत्येक व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ाता है, तो देश 140 करोड़ कदम आगे बढ़ता है।

श्री गोयल ने सभी हितधारकों से भारतीय व्यापार महोत्सव को सफल बनाने के लिए मिलकर काम करने का आग्रह किया और कार्यक्रम के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं।

भारतीय व्यापार महोत्सव 12 अगस्त – 15 अगस्त 2026 तक चलेगा।

बहुपक्षवाद का संकट और डब्लूटीओ में सुधार की अनिवार्यता
  • श्री राजेश अग्रवाल

बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली औचित्य के गहरे संकट का सामना कर रही है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में, विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) वैश्विक व्यापार का केंद्रीय स्तंभ था, जो नियम-आधारित व्यवस्था की पेशकश करने के साथ तटस्थता, पूर्वानुमेयता और निष्पक्षता का वादा करता था। हालांकि आज, ये वादे काफी कमजोर प्रतीत होते हैं। डब्लूटीओ में विश्वास की कमी, किसी एक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक असंतुलन, असमान प्रवर्तन और वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते स्वरुप के संचयी प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है।

इस संकट के मूल में है – वैश्विक उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक व्यापार प्रथाओं की निरंतरता। समय के साथ, आपूर्ति श्रृंखलाएँ परस्पर अत्यधिक निर्भर हो गई हैं और उनका वितरण भी असमान है, जहाँ कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अनुपात से कई गुनी ज्यादा नियंत्रण रखती हैं। हालांकि, इस केंद्रीकरण ने कुछ मामलों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक कुशल बना दिया है, लेकिन इसने उन्हें काफी हद तक कमजोर भी बना दिया। व्यवधान—चाहे भू-राजनीतिक हो, आर्थिक हो, या पर्यावरण-संबंधी हों—अब प्रणालीगत नतीजे लेकर आते हैं। परिणामस्वरूप, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी अब केवल एक आर्थिक चिंता के रूप में नहीं देखी जाती; इसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के मामले के तौर पर देखा जाने लगा है।

धारणा में हुए बदलाव ने नीतिगत प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी लहर को जन्म दिया है, जो बहुपक्षवाद के मौलिक सिद्धांतों को चुनौती देती हैं। देश घरेलू हितों की रक्षा के लिए संरक्षण उपायों, आक्रामक औद्योगिक नीतियों और निर्यात नियंत्रण को अपना रहे हैं। हालांकि ऐसी रणनीतियाँ अल्पकालिक सहनशीलता ला सकती हैं, लेकिन वे डब्लूटीओ की सहयोग भावना और कानूनी रूपरेखा को अक्सर कमजोर कर देती हैं। तकनीकी अवरोध, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में बाज़ार पहुंच का बढ़ता उपयोग एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देता है: व्यापार अब केवल आर्थिक लेन-देन ही नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति के बारे में है।

डब्लूटीओ सदस्यों के बीच एक व्यापक रूप से मान्य दृष्टिकोण यह है कि संगठन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को उनके प्रतिबद्धताओं के प्रति जवाबदेह ठहराने में अक्षम रहा है और इसने वर्तमान स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जब नियम असमान रूप से लागू किए जाते हैं या प्रवर्तन तंत्र विफल हो जाते हैं, तो प्रणाली में विश्वास कमजोर हो जाता है। कई देशों में, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों में, यह धारणा मजबूत हुई है कि डब्लूटीओ अब एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य नहीं करता। इसके बजाय, इसे एक ऐसे संस्थान के रूप में देखा जाता है, जो तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के प्रति अनुकूल होने के लिए संघर्ष कर रहा है।

इस संदर्भ में, सुधार प्रयासों का केंद्रीय उद्देश्य डब्लूटीओ की विश्वसनीयता को बहाल करना हो गया है। यद्यपि डब्लूटीओ सुधार की आवश्यकता पर सदस्यों के बीच व्यापक सहमति है, फिर भी इसे हासिल करने के तरीके पर सहमति न के बराबर है। सुधार की संरचना और विषय वस्तु पर बहसें लगातार विवादास्पद होती जा रही हैं। याओंडे के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में, सदस्यों ने डब्लूटीओ के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुन: पुष्टि की, जिनमें निष्पक्षता, पारदर्शिता, समावेश और सहमति-आधारित निर्णय शामिल हैं। इन सिद्धांतों ने लंबे समय से डब्लूटीओ को अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग बनाये रखा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी सदस्य, चाहे उनका आकार या उनकी आर्थिक शक्ति कुछ भी हो, वैश्विक व्यापार नियमों को अंतिम रूप देने में अपनी बात रख सकें। हालांकि, इन सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को, विशेष रूप से बहुपक्षीय समझौतों से जुड़ी चर्चाओं में, समस्याओं का सामना करना पड़ा है। ये समझौते डब्लूटीओ सदस्यों के उपसमूहों के बीच बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं। इन्हें कई देश—विशेष रूप से वैश्विक उत्तर के देश —सहमति-आधारित नियम निर्माण की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान मानते हैं। ऐसी सदस्यता के लिए, जहां विकास स्तर और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में व्यापक असमानताएँ मौजूद हैं, जटिल मुद्दों पर सर्वसम्मति प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। बहुपक्षीय समझौते आगे बढ़ने का एक तरीका प्रदान करते हैं, जिससे इच्छुक प्रतिभागी नए नियम स्थापित कर सकते हैं, इसमें उन देशों को रुकावट नहीं माना जाता, जो प्रतिबद्ध होने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, ऐसी ही प्रणाली डब्लूटीओ से पहले गैट, 1947 (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) के तहत अस्तित्व में थी।

इस मुद्दे पर भारत का रुख एक सावधानीपूर्वक तैयार संतुलनकारी कार्य को दर्शाता है। नियम-निर्माण को आगे बढ़ाने में बहुपक्षीय समझौतों की क्षमता को स्वीकार करते हुए भारत ने लगातार मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की है, ताकि ऐसे समझौतों द्वारा बहुपक्षीय प्रणाली को कमजोर न होना सुनिश्चित हो सके। बहुपक्षीय समझौतों को प्रमुख डब्लूटीओ सिद्धांतों को दरकिनार नहीं करना चाहिए, मौजूदा कार्यादेश को कमजोर नहीं करना चाहिए या गैर-प्रतिभागी सदस्यों के लिए नुकसानदेह नहीं होना चाहिए। उन्हें बहुपक्षीय रूपरेखा की जगह लेने के बजाय एक पूरक भूमिका निभानी चाहिए। भारत एक तदर्थ, समझौता-दर-समझौता मॉडल के बजाय बहुपक्षीय समझौतों को डब्लूटीओ संरचना में समेकित करने के लिए एक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

सुधार बहस का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा, संगठन के पिछले कार्यादेशों को पूरा करने में विफलता से संबंधित है। यह कई विकासशील देशों के लिए असंतोष का एक प्रमुख कारण रहा है। ये अधूरी प्रतिबद्धताएं—जिनमें कृषि, विकास और विशेष व्यवहार प्रावधानों जैसे क्षेत्र शामिल हैं —केवल नियम बनाने की कमियों को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि वैश्विक व्यापार प्रणाली में लंबे समय से मौजूद असमानताओं को दूर करने के अवसरों की चूक को भी उजागर करती हैं।

विशेष रूप से कृषि, इन असंतुलनों की गंभीरता को दर्शाती है। विकसित देशों ने अपने कृषि क्षेत्रों को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण लचीलापन बनाए रखा है, जिससे उनके किसान वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। वहीं, विकासशील देशों को अपने किसानों को दिए जाने वाले समर्थन के प्रकारों और स्तरों में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। यह विषमता संरचनात्मक असुविधाओं को बनाए रखती है, वैश्विक दक्षिण में लाखों लोगों की आजीविका को कमजोर करती है और वैश्विक व्यापार प्रवाह को विकृत करती है।

कृषि से परे, ऐसी न्यायसंगत रूपरेखाओं की मांग बढ़ रही है, जो प्रौद्योगिकी स्थानांतरण और क्षमता निर्माण को नियंत्रित करती हैं। तेज़ तकनीकी प्रगति के युग में ज्ञान, नवाचार और ज्ञान-कौशल तक पहुँच आर्थिक विकास का एक प्रमुख निर्धारक बन गया है। फिर भी, मौजूदा नियम अक्सर मौजूदा पदानुक्रम को मजबूत करते हैं, जिससे विकासशील देशों की मूल्य श्रृंखला में ऊपरी पायदान पर चढ़ने की क्षमता सीमित हो जाती है। अधिक समावेशी और संतुलित व्यापार प्रणाली बनाने के लिए इन असमताओं को दूर करना आवश्यक है।

विशेष और विभेदपूर्ण व्यवहार (एस एंड डीटी) पर बहस डब्लूटीओ सुधार की जटिलताओं को और अधिक उजागर करती है। एस एंड डीटी मूल रूप से सबसे कम विकसित और विकासशील देशों को गैर-पारस्परिक बाजार पहुँच और व्यापार प्रतिबद्धताओं को लागू करने में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो अब एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। कुछ विकसित देशों का तर्क है कि स्व-निर्धारण की मौजूदा प्रणाली अपेक्षाकृत उन्नत अर्थव्यवस्थाओं को उन प्रावधानों से लगातार लाभ उठाने की अनुमति देती है, जो कम विकसित राष्ट्रों के लिए बनाए गए थे। भारत इन चिंताओं को स्वीकार करता है, लेकिन सकल आर्थिक आकार जैसे मनमाने पैमानों पर आधारित सरल समाधानों के प्रति आगाह भी करता है।

इसके बजाय, ध्यान यह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए कि एस एंड डीटी वास्तविक विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक प्रभावी उपकरण बना रहे। इसके लिए एक अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है—ऐसा दृष्टिकोण, जो विकासशील दुनिया में मौजूद आर्थिक स्थितियों की विविधता को मान्यता देता हो और उसी के अनुसार लचीलापन तैयार करता हो। यह मुद्दा और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि कई विकसित देशों ने कृषि सब्सिडी अधिकारों के संदर्भ में, जिसे कभी-कभी विपरीत एस एंड डीटी कहा जाता है, का फायदा उठाना जारी रखा है।

अंततः, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का भविष्य इसके सदस्यों की प्रतिस्पर्धी हितों को सुलझाने और साझा संस्थानों में विश्वास पुनः स्थापित करने की क्षमता पर निर्भर करता है। चुनौतियाँ कठिन हैं, लेकिन हित इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक कमजोर डब्लूटीओ से एक विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म देने का खतरा है, जो एकपक्षीय और शक्ति-आधारित सौदेबाज़ी पर आधारित हो सकती है। इसके विपरीत, सुधार किये गये और फिर से सशक्त बनाये गये डब्लूटीओ में एक अधिक सुदृढ़, समावेशी और सहयोगात्मक वैश्विक व्यवस्था को आधार प्रदान करने की क्षमता है।         

भारत की व्यापक व्यापार रणनीति, बहुपक्षीय मंचों में भागीदारी को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों के  साथ जोड़ती है। जैसे-जैसे व्यापार नीति जटिल होती जा रही है—जिसमें नियामक मानक, डिजिटल शासन और आपूर्ति श्रृंखला का एकीकरण शामिल है—समान विचारधारा वाले भागीदारों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) मजबूत आर्थिक एकीकरण के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरे हैं। हालांकि, वर्तमान  में जारी चर्चाओं में भारत की रचनात्मक भागीदारी इस कार्य की तात्कालिकता और जटिलता, दोनों को प्रतिबिंबित करती है। संतुलित, समावेशी और भविष्य-केंद्रित सुधारों को समर्थन देकर, भारत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि डब्लूटीओ तेजी से बदलती दुनिया में प्रासंगिक बना रहे—एक ऐसा संस्थान, जो न केवल व्यापार को प्रबंधित करने में सक्षम हो, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक भविष्य को आकार देने की भी क्षमता रखता हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डब्लूटीओ व्यवसायों को निश्चितता, पूर्वानुमेयता, समावेशिता, समानता और सरलता प्रदान करता है, यानि नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था।

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व्यक्त किए गए विचार निजी हैं        

(लेखक वाणिज्य विभाग के सचिव हैं )            

वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने गांधीनगर में ब्रिक्स बैठक में व्यापार और आर्थिक सहयोग पर चर्चा की


गांधीनगर / सत्ता संदेश

ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार 1.17 ट्रिलियन अमरिकी डॉलर तक पहुंचा, इस क्षेत्र में अपार संभावना है: वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल

वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने गुजरात के गांधीनगर में व्यापार और आर्थिक मुद्दों पर ब्रिक्स संपर्क समूह (सीजीईटीआई) की दूसरी बैठक में मुख्य भाषण दिया। यह बैठक मार्च 2026 में वर्चुअल रूप से आयोजित सीजीईटीआई की पहली बैठक के बाद हुई।

श्री अग्रवाल ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स लगातार मजबूत होता जा रहा है तथा यह उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रभावी आवाज के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि बढ़ते संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, मुद्रास्फीति के दबाव और बढ़ती अनिश्चितता के बावजूद ऐसा हुआ है। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स देशों के बीच माल व्यापार तेरह गुना बढ़ गया है, जो 2003 के  84 बिलियन अमरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 1.17 ट्रिलियन अमरिकी डॉलर हो गया है। यह  वृद्धि वैश्विक व्यापार की गति से अधिक रही है और इससे सदस्य देशों के लिए अधिक लचीलापन तथा विविधीकरण में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच होने वाला व्यापार अभी भी वैश्विक व्यापार का लगभग 5 प्रतिशत है, जो अधिक व्यापार एकीकरण, मजबूत मूल्य-श्रृंखला संबंधों और बेहतर आर्थिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण अप्रयुक्त संभावनाओं को दर्शाता है।

“लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता लाना”  विषय पर आयोजित इस बैठक में पिछली अध्यक्षता के दौरान किए गए कार्यों को आगे बढ़ाया गया। भारत 2012, 2016 और 2021 के बाद चौथी बार ब्रिक्स का अध्यक्ष बना है। इस दौरान हुए विचार-विमर्श में समकालीन व्यापार मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को सुदृढ़ करना, रोजगार सृजन के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के अंतर्राष्ट्रीयकरण में सहायता करना, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को अधिक लचीला और विविध बनाना तथा सेवाओं से संबंधित व्यापार को बढ़ाना शामिल है। बैठक में अधिक संतुलित व्यापार को बढ़ावा देने, सेवा क्षेत्र में नए अवसर उपलब्‍ध कराने और ब्रिक्स देशों के बीच अधिक व्यापार के माध्यम से किसानों, महिलाओं, उद्यमियों और व्यवसायों सहित प्रमुख हितधारकों को अधिक समृद्ध बनाने के तरीकों पर भी चर्चा की गई।

15 मई 2026 को, प्रतिनिधिमंडल ने गिफ्ट सिटी-गांधीनगर का दौरा किया और वे वहां कमांड एंड कंट्रोल सेंटर सहित विभिन्‍न सुविधा केंद्र भी गए। गिफ्ट सिटी को विश्व स्तरीय वित्तीय केंद्र के रूप में विकसित करने की पहलों पर एक प्रस्तुति भी दी गई। इस यात्रा से प्रतिनिधिमंडल को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में सहायता करने के लिए बैंकिंग, पूंजी बाजार, फंड प्रबंधन, लीजिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाने के भारत के प्रयासों को देखने का अवसर मिला।

सीजीईटीआई में हुई चर्चाओं में ब्रिक्स के साथ भारत की सहभागिता को व्यापक व्यापार परिप्रेक्ष्य में भी रखा गया। नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स के सदस्य देशों को भारत का माल निर्यात अनुमानित 82.0 बिलियन अमरिकी डॉलर और कैलेंडर वर्ष 2024 में सेवाओं के क्षेत्र में निर्यात 31.3 बिलियन अमरिकी डॉलर था। ये आंकड़े ब्रिक्‍स देशों के बीच व्यापार और बढ़ाने की गुंजाइश को दर्शाते हैं, जिसमें सेवाएं और कनेक्टिविटी भविष्य की वृद्धि के महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं।

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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के बाद निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए निर्यात प्रोत्साहन परिषदों और उद्योग जगत के साथ बैठक की अध्यक्षता की

दिल्ली /सत्ता संदेश


श्री पीयूष गोयल ने विकसित भारत विजन के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 2 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर के निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का लाभ उठाने का आह्वान किया

डीजीएफटी ने निर्यात सुधार प्रारूप प्रस्तुत किया; उद्योग ने एमएसएमई की चुनौतियों को स्‍पष्‍ट किया, सरकार ने समर्थन और व्यापार सुगमता उपायों का आश्वासन दिया

निर्यात प्रोत्साहन मिशन की प्रगति की समीक्षा की गई; श्री पीयूष गोयल ने ईपीसी कंपनियों से निर्यातकों का आधार बढ़ाने और नए बाजारों की खोज करने का आग्रह किया

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल ने 27 अप्रैल, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में निर्यात संवर्धन परिषदों (ईपीसी) और उद्योग संघों के साथ एक बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य के संदर्भ में भारत के निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने से जुड़ी रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। भारत मंडपम में भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर समारोह के दौरान आयोजित इस बैठक में 30 ईपीसी और शीर्ष उद्योग मंडलों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ वाणिज्य विभाग और विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

इस अवसर पर अपने संबोधन में श्री गोयल ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल माल और सेवा निर्यात रिकॉर्ड 860.09 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.22 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवधानों के बावजूद अभियांत्रिकी सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, रत्न एवं आभूषण और कृषि आधारित उत्पादों जैसे क्षेत्रों ने निर्यात की गति को बनाए रखा है।

श्री पीयूष गोयल ने कहा कि यह उपलब्धि विकसित भारत की परिकल्पना के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 2 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर के निर्यात का लक्ष्य हासिल करने के लिए एक आधार का काम करेगी। उन्होंने निर्यातकों और उद्योग जगत से आग्रह किया कि वे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का पूरा लाभ उठाकर बाजार पहुंच बढ़ाएं, निर्यात को बढ़ावा दें और रोजगार के अवसरों का सृजन करें। उन्होंने कहा कि इन समझौतों का समय पर उपयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

बैठक के दौरान, विदेश व्यापार महानिदेशक ने निर्यात प्रदर्शन, वर्तमान में जारी सुधारों और मापनीय निर्यात परिणामों को प्राप्त करने के लिए एक संरचित प्रारूप पर विस्तृत प्रस्तुति दी। प्रस्तुति में एक व्यापक निर्यात सुधार ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की गई, जिसमें क्षेत्रीय निर्यात प्रदर्शन, ईपीसी के लिए केपीआई-आधारित ढांचा, ई-कॉमर्स निर्यात को प्रोत्साहन, जिलों को निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करना, प्रस्तावित डिजिटल व्यापार अकादमी, पश्चिम एशिया संकट पर सरकार की प्रतिक्रिया, निर्यात संवर्धन मिशन के अंतर्गत हुई प्रगति और निर्यात दायित्व मुक्ति प्रमाणपत्र (ईओडीसी) को शीघ्र जारी करने के लिए चल रहे विशेष अभियान शामिल थे। डीजीएफटी ने इस बात पर बल दिया कि ईपीसी को बाजार विविधीकरण को बढ़ावा देने, अधिक से अधिक एमएसएमई को निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र में शामिल करने, प्रौद्योगिकी का अधिक उपयोग करने और यह सुनिश्चित करने में सरकार के साथ समान भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिए कि नीतिगत उपाय राष्ट्रीय स्तर पर मापने योग्य परिणामों में परिवर्तित हों।

उद्योग प्रतिनिधियों ने अनुपालन लागत, परीक्षण आवश्यकताओं और निर्यात बाजारों में प्रवेश करने में लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के सामने आने वाली चुनौतियों से संबंधित मुद्दे उठाए। श्री पीयूष गोयल ने वर्तमान में जारी योजनाओं के अंतर्गत सहायता और प्रवेश बाधाओं को कम करने तथा व्यापार करने में सुगमता बढ़ाने के लिए लक्षित हस्तक्षेपों सहित निरंतर सरकारी समर्थन का आश्वासन दिया।

बैठक में भाग लेने वाले प्रमुख निकायों में फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स, जेम एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, परिधान निर्यात संवर्धन परिषद, काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट्स, इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया, बेसिक केमिकल्स, कॉस्मेटिक्स एंड डाइज एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, कॉटन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, मैनमेड एंड टेक्निकल टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, अन्य प्रमुख टेक्सटाइल ईपीसी; कार्पेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट्स, कृषि और संबद्ध निकाय जिनमें सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी, शेलैक एंड फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, इंडियन ऑयलसीड्स एंड प्रोड्यूस एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया, नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया, पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और कई अन्य प्रमुख क्षेत्रीय संघ शामिल थे।

चर्चा में निर्यात प्रोत्साहन मिशन (ईपीएम) के अंतर्गत हुई प्रगति की भी जानकारी दी गई। यह निर्यातकों को समर्थन देने के लिए सरकार की प्रमुख योजना है। श्री पीयूष गोयल ने ईपीसी को सक्रिय निर्यातकों की संख्या बढ़ाने के लिए कदम उठाने को प्रोत्साहित किया। उन्होंने निर्यात वृद्धि को गति देने के लिए नए बाजारों में प्रवेश करने और वर्तमान बाजारों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए निर्यातकों को सरकार के समर्थन पर भी बल दिया।

श्री पीयूष गोयल ने सतत सुधारों, लक्षित समर्थन उपायों और उद्योग के साथ घनिष्ठ सहयोग के माध्यम से एक सुगम व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि की, ताकि निर्यात वृद्धि को गति दी जा सके और भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्ति भागीदार के रूप में स्थापित किया जा सके।


भारत–न्यूजीलैंड एफटीए: किसानों, युवाओं, नौकरियों और विकास के लिए महिलाओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक समझौता

दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए), जिस पर सोमवार को हस्ताक्षर किये जायेंगे, विकसित दुनिया के साथ भारत की सहभागिता में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को किसानों, महिलाओं, युवाओं और रोजगार सृजक उद्योगों के लिए ठोस लाभ में बदलने से जुड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण में हुई निर्णायक प्रगति को प्रतिबिंबित करता है।

यह एफटीए प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जिसमें यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ शामिल हैं, के साथ हुए कई ऐतिहासिक व्यापार समझौतों के बाद हो रहा है। ये समझौते वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं और निर्यातकों को दुनिया की कुछ सबसे लाभकारी अर्थव्यवस्थाओं में, यहां तक कि वर्तमान वैश्विक अनिश्चितता और उथल-पुथल के बीच भी, प्रतिस्पर्धा आधारित बढ़त प्रदान करते हैं।

निर्यात और रोजगार को मजबूत बढ़ावा 

दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी इस समझौते के केंद्र में न्यूजीलैंड की यह प्रतिबद्धता है कि वह तुरंत ही सभी भारतीय उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर देगा, जिससे उस बाजार में एक महत्वपूर्ण बाधा दूर होगी, जहाँ हमारे प्रमुख निर्यात पर वर्तमान में 10% शुल्क लगाया जाता है।

यह वस्त्र, कालीन, धागे, कपड़े, फुटवियर, बैग, बेल्ट, वाहन घटक, मशीनरी, उपकरण, रत्न और आभूषण तथा हस्तशिल्प जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है। रोजगार के अवसरों का सृजन करने वाले ये उद्योग भारत के एमएसएमई इकोसिस्टम की रीढ़ हैं और इन्हें मूल्य प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुँच से लाभ मिलेगा। इससे निर्यात बढ़ेगा और निर्माण केन्द्रों, कारीगर समुदायों और लघु उद्यमों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। 

यह समझौता उस व्यापक दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जो 2014 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भारत की व्यापार नीति का मार्गदर्शन कर रहा है। यह समावेश, सशक्तिकरण और साझा समृद्धि में निहित है। व्यापार को राष्ट्रीय परिवर्तन के उपकरण के रूप में देखा जाता है, जो किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों को लाभ पहुंचाता है।

नारी शक्ति

इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह भारत का पहला महिला-नेतृत्व वाला एफटीए है। वार्ता टीम की लगभग सभी सदस्य महिलायें थीं। इनमें मुख्य वार्ताकार, उप मुख्य वार्ताकार, क्षेत्र प्रमुख और न्यूजीलैंड में भारत की राजदूत शामिल हैं।

यह उपलब्धि मोदी सरकार में महिलाओं के बढ़ते महत्व को दर्शाती है। यह शासन, नेतृत्व और विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है और  राष्ट्रीय विकास के संचालक के रूप में नारी शक्ति के विचार को सुदृढ़ करती है।

किसान पहले

एफटीए की संरचना कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गयी है। न्यूज़ीलैंड कीवी, सेब और शहद के लिए कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं का समर्थन करेगा। इन पहलों में बेहतर बीज सामग्री, अनुसंधान सहयोग, किसानों के लिए क्षमता निर्माण, बागवानी प्रबंधन प्रथाएं, कटाई के बाद सुधार, खाद्य सुरक्षा प्रणाली और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना शामिल है। सेब उत्पादकों और सतत मधुमक्खी पालन तौर-तरीकों के लिए परियोजनाएं उत्पादन और गुणवत्ता मानकों को बढ़ाएंगी, जिससे कृषि समृद्धि में वृद्धि होगी।

इसके साथ ही, भारत ने अपने प्रमुख कृषि हितों की मजबूती से सुरक्षा की है। डेयरी उत्पादों (जैसे दूध, क्रीम, व्हे, दही और पनीर); प्याज, चना, मटर, मकई, बादाम, चीनी और कुछ ख़ास तेल और वसा जैसी संवेदनशील वस्तुओं को शुल्क छूट से बाहर रखा गया है। समझौता सुनिश्चित करता है कि घरेलू किसान हानिकारक आयात प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहें। किसानों और मछुआरों के हितों की रक्षा करना सभी व्यापार वार्ताओं में भारत के दृष्टिकोण का केंद्र रहा है।

युवा और पेशेवर

समझौते का एक प्रमुख स्तंभ छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए बढ़ी हुई आवागमन की सुविधा है, जो भारत के युवाओं के लिए नए वैश्विक मार्ग का निर्माण करती है।

किसी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते में पहली बार, न्यूजीलैंड ने भारतीय छात्रों के आवागमन और अध्ययन के बाद काम करने के अवसरों के लिए एक संरचना-युक्त रूपरेखा पेश की है। भारतीय छात्रों पर कोई संख्यात्मक सीमा नहीं है। छात्रों को अध्ययन के दौरान प्रति सप्ताह कम से कम 20 घंटे काम करने की अनुमति दी जाएगी, जबकि अध्ययन के बाद काम करने के अधिकार – एसटीईएम  स्नातकों के लिए तीन वर्षों तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार वर्षों तक – बढ़ाए गये हैं।

समझौता किसी भी समय 5,000 भारतीय पेशेवरों तक के लिए अस्थायी रोजगार प्रवेश वीज़ा मार्ग पेश करता है, जिसके तहत आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, निर्माण तथा योग, आयुर्वेद, भारतीय व्यंजन और संगीत शिक्षा जैसे चयनित पारंपरिक क्षेत्रों में तीन वर्षों तक रहने की अनुमति होगी। 

इसके अलावा, एक वर्किंग हॉलीडे वीज़ा योजना प्रत्येक वर्ष 1,000 युवा भारतीयों को न्यूज़ीलैंड में 12 महीने तक रहने और काम करने की अनुमति देगी, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक अनुभव को मजबूती मिलेगी।

निवेश और नवाचार

न्यूजीलैंड ने भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इससे विनिर्माण, अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं, नवाचार इकोसिस्टम और रोजगार सृजन को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक ‘पुनर्संतुलन खंड’ शामिल किया गया है, जिससे भारत को यह अधिकार मिलता है कि यदि निवेश संबंधी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं होतीं हैं, तो वह सुधारात्मक कदम उठा सकता है। यह समझौता अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कौशल विकास और नवाचार-आधारित क्षेत्रों में सहयोग को भी बढ़ावा देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दीर्घकालिक विकासात्मक साझेदारियों में व्यापार पूरक भूमिका निभाएगा।

व्यापार रणनीति

भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करने की स्पष्ट और भरोसेमंद व्यापार रणनीति को प्रतिबिंबित करता है, जो भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए सार्थक बाजार पहुँच की सुविधा देता है और घरेलू संवेदनशीलताओं का सम्मान करता है। 

आज भारत ताकत और विश्वसनीयता की स्थिति के साथ वार्ता करता है। पहले के दशकों में व्यापार समझौतों को अक्सर संवेदनशील क्षेत्रों को अपर्याप्त सुरक्षा दिए बिना अंतिम रूप दिया जाता था, इसके विपरीत वर्तमान वार्ताएं सुनिश्चित करती हैं कि कृषि, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह से सुरक्षित रहें।

जैसे-जैसे भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपनी सहभागिता को प्रगाढ़ कर रहा है, विकसित दुनिया के साथ हुए व्यापार समझौते इस तथ्य का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि व्यापार नीति को कैसे राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित किया जा सकता है, जिससे विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में समावेशी वृद्धि और दीर्घावधि आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित होती है।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)