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डॉ. जितेंद्र सिंह ने यूएमएमआईडी (उम्‍मीद) कार्यक्रम राष्ट्र को समर्पित किया; कहा- जीनोमिक और सटीक चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा का भविष्य तय करेगी


दिल्ली / सत्ता संदेश

यूएमएमआईडी: दुर्लभ आनुवंशिक विकारों से पीड़ित परिवारों के लिए प्रारंभिक हस्तक्षेप और किफायती स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने वाली राष्ट्रीय पहल

चिकित्सा का पूरा भविष्य जीन और जीनोम आधारित व्यक्तिगत उपचार की ओर अग्रसर है: डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा- उम्‍मीद यह दर्शाता है कि विज्ञान और सार्वजनिक नीति किस प्रकार जीवन को बदल सकते हैं

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज दुर्लभ आनुवंशिक विकारों/रोगों के लिए यूएमएमआईडी (वंशानुगत विकारों के इलाज की अनूठी विधियां) कार्यक्रम राष्ट्र को समर्पित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत धीरे-धीरे एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहा है जहां स्वास्थ्य सेवा, निदान और उपचार तेजी से जीनोम-आधारित, सटीक और प्रत्येक रोगी की आनुवंशिक प्रोफ़ाइल के अनुसार व्यक्तिगत होते जाएंगे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वंशानुगत और दुर्लभ आनुवंशिक विकार दशकों तक उपेक्षित रहे क्योंकि निदान ही कठिन था, उपचार दुर्गम था और दवाएं या तो अनुपलब्ध थीं या अत्यधिक महंगी थीं, इसलिए सभी परिवारों के लिए निदान और इलाज को व्यवहार्य, वहनीय और सुलभ बनाने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय तंत्र का निर्माण करना आवश्यक है।

केंद्रीय मंत्री ने यूएमएमआईडी (उम्मीद) को भारत में सटीक चिकित्सा के भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम बताते हुए कहा कि यह पहल देश के स्वास्थ्य सेवा तंत्र को जीन और जीनोम-आधारित चिकित्सा देखभाल की अगली पीढ़ी के लिए भी तैयार करेगी।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली के पृथ्वी भवन में जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा राष्ट्र को यूएमएमआईडी नेटवर्क समर्पित करने के लिए आयोजित एक विशेष समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने यूएमएमआईडी संकलन का विमोचन किया और आनुवंशिक विकारों के निदान, परामर्श, जागरूकता अभियान और कार्यक्रम निगरानी तक राष्ट्रव्यापी पहुंच को मजबूत करने के उद्देश्य से यूएमएमआईडी डैशबोर्ड का शुभारम्भ किया।

इस कार्यक्रम में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और ब्रिक के महानिदेशक डॉ. राजेश एस. गोखले; डीबीटी की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. सुचिता नीनावे; वरिष्ठ वैज्ञानिक, चिकित्सक, स्वास्थ्य सेवा पेशेवर, यूएमएमआईडी कार्यान्वयन संस्थानों के प्रतिनिधि और देश भर के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संगठनों के अधिकारी उपस्थित रहे।

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में शुरू किए गए स्वास्थ्य सुधारों का जिक्र करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने लगातार किफायती, सुलभ, निवारक और नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने कहा कि भारत ने स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार किया है, स्वास्थ्य बीमा कवरेज को मजबूत किया है और सस्ती दवाओं तक पहुंच को व्यापक बनाया है, साथ ही साथ शीघ्र निदान और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिए प्रणालियां भी विकसित की हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि वंशानुगत और दुर्लभ आनुवंशिक विकार एक मूक लेकिन गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें परिवार अक्सर निदान और उपचार की तलाश में वर्षों तक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहते हैं। उन्होंने कहा कि अपेक्षाकृत कम आबादी को प्रभावित करने के बावजूद, ये विकार प्रभावित परिवारों पर भारी भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक बोझ डालते हैं और इसलिए अन्य किसी भी गंभीर बीमारी की तरह ही इस पर भी राष्ट्रीय ध्यान देने और स्वास्थ्य देखभाल को लेकर संवेदनशील होने की जरूरत है।

चिकित्सा जगत से जुड़े अपने दृष्टिकोण को साझा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि दुर्लभ आनुवंशिक विकारों को ऐतिहासिक रूप से मुख्यधारा की चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में सीमित महत्व दिया गया है, क्योंकि ये कम प्रचलित हैं और इनकी निदान प्रक्रिया जटिल है। उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप अक्सर निदान में देरी, जागरूकता की कमी और रोगियों के लिए अपर्याप्त उपचार की सुविधा उपलब्ध होती है। उन्होंने यह भी कि भारत की व्यापक आनुवंशिक विविधता इस चुनौती को और भी जटिल बनाती है और इसके लिए प्रारंभिक जांच, आनुवंशिक निदान, प्रसवपूर्व परामर्श, चिकित्सकों के प्रशिक्षण और सामुदायिक जागरूकता के एक मजबूत तंत्र की जरूरत है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस कठिन लेकिन सामाजिक परिवर्तनकारी मिशन को हाथ में लेने की सराहना करते हुए कहा कि यूएमएमआईडी यह दर्शाता है कि कैसे विज्ञान, करुणा और जन नीति समय पर हस्तक्षेप और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से पीड़ा को कम करने के लिए एक साथ आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम ने आनुवंशिक निदान, प्रसवपूर्व और नवजात शिशु स्क्रीनिंग, आनुवंशिक परामर्श, चिकित्सकों की क्षमता निर्माण और सामुदायिक आउटरीच को एकीकृत जन स्वास्थ्य मॉडल के तहत एकीकृत करते हुए एक राष्ट्रीय ढांचा सफलतापूर्वक स्थापित किया है।

डॉ. सिंह ने कहा कि स्क्रीनिंग और निदान सेवाओं के माध्यम से इस कार्यक्रम से पहले ही लगभग तीन लाख लोगों को लाभ मिल चुका है और आकांक्षी जिलों तथा वंचित क्षेत्रों में इसका विस्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस पहल से उन्नत निदान और परामर्श के लिए लगभग 30 निदान केंद्र स्थापित करने में भी मदद मिली है। इससे यह सुनिश्चित हो रहा है कि उन्नत जीनोमिक स्वास्थ्य सेवा महानगरों से बाहर भी आम नागरिकों तक पहुंचे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यूएमएमआईडी के माध्यम से प्राप्त अनुभव सटीक चिकित्सा के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनेगा, जहां मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार प्रोटोकॉल रोगियों की व्यक्तिगत आनुवंशिक प्रोफाइल पर आधारित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आनुवंशिक चिकित्सा और परमाणु चिकित्सा दो प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं जो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवा को नया रूप दे सकते हैं।

इस अवसर पर अपने संबोधन में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव और ब्रिक के महानिदेशक डॉ. राजेश एस. गोखले ने कहा कि यूएमएमआईडी पहल ने वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सहयोगात्मक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और शीघ्र निदान के माध्यम से हजारों परिवारों को आशा की किरण दिखाई है। उन्होंने कहा कि भारत की आनुवंशिक विविधता वैज्ञानिक नवाचार और व्यावहारिक स्वास्थ्य समाधानों के लिए अपार अवसर प्रदान करती है, जो न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक हैं।

इससे पहले, उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए डॉ. सुचिता नीनावे ने कहा कि यूएमएमआईडी कार्यक्रम ने आनुवंशिक निदान, परामर्श और क्षमता निर्माण तक पहुंच में सुधार करके वंशानुगत आनुवंशिक विकारों के प्रति भारत की प्रतिक्रिया को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि इस पहल ने समन्वित संस्थागत साझेदारी के माध्यम से दुर्लभ और वंशानुगत रोगों के इलाज के लिए एक एकीकृत राष्ट्रव्यापी नेटवर्क बनाने में मदद की है।

इस कार्यक्रम में यूएमएमआईडी पहल का एक संक्षिप्त विवरण, उपलब्धियों और सफलता की कहानियों पर प्रस्तुतियां और इस पहल की यात्रा, प्रभाव और भविष्य की रूपरेखा को उजागर करने वाली एक लघु फिल्म का प्रदर्शन भी शामिल था।

एएनआरएफ ने अभिसरण अनुसंधान उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) स्थापित करने के लिए 10 संस्थानों के चयन की घोषणा की

दिल्ली / सत्ता संदेश


सामाजिक चुनौतियों और सतत विकास के लिए अंतःविषयक समाधानों को बढ़ावा देने हेतु अभिसरण अनुसंधान सहयोग समितियां

अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) ने जटिल और व्यवस्थागत चुनौतियों का समाधान करने के लिए बहु-विषयक अनुसंधान दृष्टिकोण हेतु सामाजिक विज्ञान और मानविकी प्रारूपों के भीतर वैज्ञानिक ज्ञान के गहन एकीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपने प्रमुख कार्यक्रमों में से एक, अभिसरण अनुसंधान उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) कार्यक्रम के अंतर्गत दस अभिसरण अनुसंधान उत्कृष्टता केंद्रों (सीओई) का चयन किया है। इस पहल का उद्देश्य ऐसे अग्रणी केंद्र स्थापित करना है जो एकीकृत और अंतःविषयक अनुसंधान के माध्यम से जटिल सामाजिक चुनौतियों का समाधान करने हेतु सामाजिक विज्ञान, मानविकी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक साथ लाते हैं।

विभिन्न विषयगत क्षेत्रों के अंतर्गत चयनित दस एएनआरएफ-सीओई की सूची निम्नलिखित है:

क्रम संख्यासंस्थान का नामपरियोजना का शीर्षकव्यापक विषयगत क्षेत्र
1भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गांधीनगरमानव-जलवायु अंतःक्रिया और पर्यावरण इतिहास केंद्र (सीएचआईईएच)पुरातत्व और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां
2राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान (एनआईएएस), बेंगलुरुपुरातत्व सामग्री, पुरातत्व धातु विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान और संरक्षण अनुसंधान में उत्कृष्टता केंद्रपुरातत्व और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ
3भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्राससंयोग- संस्कृत एआई संगीत और योग केंद्रपुरातत्व और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां
4राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) अगरतलाएआई की सहायता से पूर्वोत्तर भारतीय लोककथाओं का डिजिटल संकलन और वैश्विक प्रचार-प्रसार: मणिपुर और त्रिपुरा पर विशेष ध्यानडिजिटल मानविकी
5मानव विकास संस्थान (आईएचडी), दिल्लीपरिवर्तनकारी एआई और भारतीय श्रम बाजार: उच्च-उपयोग वाले चुनिंदा सेवा क्षेत्रों में जनरेटिव एआई के प्रभाव पर एक बहुविषयक अध्ययनडिजिटल मानविकी
6भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) धारवाड़ग्रामीण आजीविका एवं विकास उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-आरएलडी): ग्रामीण स्थिरता और अनुकूलता के लिए एकीकृत योजना का एक केंद्रग्रामीण विकास
7भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) जम्मूकारीगरों के डिजिटल सशक्तिकरण और आजीविका विकास पर उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-डीईएलडीए)ग्रामीण विकास
8भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुरउत्कृष्टता केंद्र: भाषा प्रदर्शन में अनुसंधान और हस्तक्षेप केंद्रस्वास्थ्य और मनोविज्ञान
9चाणक्य विश्वविद्यालयभाषा और जीवन जगत केंद्रसामाजिक मुद्दों के लिए उभरती प्रौद्योगिकियां
10पीएसजीआर कृष्णम्मल महिला महाविद्यालयअकादमिक-उद्योग साझेदारी के माध्यम से एक लचीले, टिकाऊ और स्मार्ट नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की ओर बढ़ते हुए, एमएसएमई को पारंपरिक से समकालीन प्रौद्योगिकियों में परिवर्तन की गति बढ़ाने के लिए एक तकनीकी-प्रबंधकीय प्रारूप तैयार करनाकम्प्यूटेशनल अर्थशास्त्र

इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रत्येक केंद्र के लिए एक ही संस्थान के भीतर या विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के अधीन विभिन्न शैक्षणिक, सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित संगठनों या निजी संस्थानों के बीच अंतर्विषयक या अंतरविषयक सहयोग अनिवार्य है। इन केंद्रों से जुड़े सह-शोधकर्ता एक विविध नेटवर्क का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये सभी 20 सहयोगी संस्थानों से आते हैंजिनमें राज्य विश्वविद्यालयकेंद्रीय विश्वविद्यालयभारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी)निजी विश्वविद्यालयकॉलेज और मान्यता प्राप्त अनुसंधान एवं विकास संस्थान शामिल हैं।

इस कार्यक्रम को शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों से शानदार प्रतिक्रिया मिली, जिसमें 945 प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए, जो इसकी मजबूत प्रासंगिकता और राष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।

एएनआरएफ कन्वर्जेंस रिसर्च सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस प्रोग्राम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 से प्रेरणा लेता है, जो बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में मजबूत एकीकरण का आह्वान करती है। यह विकसित भारत 2047 के विजन के अनुरूप भी है, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता शताब्दी तक भारत को एक विकसित, समावेशी, नवोन्मेषी और आत्मनिर्भर राष्ट्र में परिवर्तित करना है।

वैज्ञानिक ज्ञान और प्रासंगिक समझ के समायोजन के साथ, यह कार्यक्रम समग्र दृष्टिकोणों के माध्यम से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान करने का लक्ष्य रखता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और बिग डेटा एनालिटिक्स के इस युग में, इस प्रकार का समन्वय सामाजिक-आर्थिक प्रगति के नए मार्ग प्रशस्त कर सकता है और सतत विकास लक्ष्यों को समर्थन प्रदान कर सकता है।

भारत और नॉर्वे के बीच नए द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी प्रगाढ़ हुई

दिल्ली /सत्ता संदेश


भारत सरकार के वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग के अंतर्गत वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने नॉर्वे में स्वच्छ ऊर्जा, अपतटीय पवन ऊर्जा, सतत विकास, भूविज्ञान और शैक्षणिक सहयोग के क्षेत्रों में पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान एक ओर भारत और नॉर्वे के बीच द्विपक्षीय संबंध प्रगाढ़ हुए हैं वहीं, भारत सरकार के वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) के अंतर्गत वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और सतत विकास के क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने के लिए 18 मई 2026 को ओस्लो में नॉर्वे के प्रमुख अनुसंधान, शैक्षणिक और औद्योगिक संगठनों के साथ कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

सीएसआईआर के महानिदेशक और डीएसआईआर के सचिव डॉ. एन. कलाइसेल्वी के नेतृत्व में डीएसआईआर/सीएसआईआर की ओर से नॉर्वे के सहयोगी संस्थानों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों का उद्देश्य अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी के विकास के क्षेत्रों में भारत-नॉर्वे संबंधों का विस्तार करना है तथा इसके साथ ही दोनों देशों में संस्थागत साझेदारी, स्टार्टअप और उद्योग सहभागिता, शैक्षणिक सहयोग तथा सतत विकास संबंधी पहलों को बढ़ावा देना है।

डीएसआईआर/सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद (आरसीएन) के बीच समझौता ज्ञापन का उद्देश्य अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास, नवाचार और क्षमता विकास में सहयोग को बढ़ावा देना है। इस समझौते में जलवायु, स्वच्छ ऊर्जा, महासागरों और स्वास्थ्य सहित वैश्विक चुनौतियों और सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित क्षेत्रों में संयुक्त कार्यशालाओं, सहयोगात्मक अनुसंधान और विकास परियोजनाओं, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के आदान-प्रदान से जुड़ी यात्राओं, विशिष्ट कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की व्यवस्था और समय-समय पर उनकी समीक्षा के लिए तंत्र बनाने की परिकल्पना की गई है।

सीएसआईआर ने नॉर्वे के प्रमुख स्वतंत्र अनुसंधान संगठन स्टिफ्टेल्सन सिंटेफ (एसआईएनटीईएफ) के साथ 2014 से जारी समझौता ज्ञापन के ढांचे के अंतर्गत सहयोग के लिए समझौते (2026-2029) पर भी हस्ताक्षर किए। यह समझौता जैव-आधारित प्रक्रियाओं और सामग्रियों, नवाचार केंद्रों, समुद्री ऊर्जा (जिसमें अपतटीय पवन और हाइब्रिड प्रणालियां शामिल हैं), कार्बन कैप्चर, भंडारण और उपयोग तथा अपशिष्ट को काम में लाने योग्य सामग्रियों में परिवर्तित करने जैसे क्षेत्रों में संयुक्त रूप से अनुसंधान और नवाचार कार्यक्रमों के माध्यम से अपशिष्ट बनने से रोकने और दीर्घकालिक व्यवस्था में परिवर्तन पर केंद्रित है।

सीएसआईआर के संस्थानों और एसआईएनटीईएफ के संस्थानों के बीच समुद्री ऊर्जा और अपतटीय पवन ऊर्जा के संबंध में एक विशिष्ट परियोजना के लिए सहयोग पर भी समझौता किया गया। इस समझौते में सीएसआईआर-संरचनात्मक अभियांत्रिकी अनुसंधान केंद्र (सीएसआईआर-एसईआरसी), सीएसआईआर-राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशालाएं (सीएसआईआर-एनएएल), सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईओ) और सीएसआईआर-चतुर्थ प्रतिमान संस्थान (सीएसआईआर-4पीआई) के साथ एसआईएनटीईएफ महासागर, एसआईएनटीईएफ डिजिटल, एफएमई नॉर्थविंड और एसआईएनटीईएफ कम्यूनिटी शामिल हैं। इस सहयोग का उद्देश्य अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में भारत की क्षमता को मजबूत करना तथा राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन और उसके अवशोषण में संतुलन बनाने से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने में योगदान देना है। इस संयुक्त कार्यक्रम में तैरती हुई अपतटीय पवन प्रौद्योगिकियों, ऊर्जा की समतुल्य लागत (एलसीओई) में कमी लाने, स्थिरता, पर्यावरण, सामाजिक और शासन संबंधी विषयों, मानकीकरण, पायलट प्रदर्शन, कौशल विकास तथा औद्योगिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस परियोजना के लिए सीएसआईआर की ओर से लगभग 341 लाख रुपये का वित्तीय सहयोग दिया जा रहा है।

डॉ. एन. कलाइसेल्वीमहानिदेशकसीएसआईआर और सचिवडीएसआईआर के साथ:

अ) प्रो. टोर ग्रांडेरेक्टरएनटीएनयूब) डॉ. एलेक्जेंड्रा बेच गोजर्वसीईओ स्टिफ्टेलसन सिंटेफ (एसआईएनटीईएफ)स) सुश्री ऐनी केजेर्स्टी फाह्लविककार्यकारी निदेशकनॉर्वे की अनुसंधान परिषदऔर द) डॉ. एंड्रियास ए फाफहुबरसीईओ एमराल्ड

सीएसआईआर, वैज्ञानिक और नवाचार संबंधी अनुसंधान अकादमी (एसीएसआईआर) और नॉर्वेजियन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एनटीएनयू) के बीच “हरित परिवर्तन के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार संबंधी सहयोग” शीर्षक से संयुक्त आशय घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए। यह घोषणापत्र स्थिरता, चक्रीय अर्थव्यवस्था, महासागर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और असैनिक तथा अवसंरचना संबंधी अभियांत्रिकी से जुड़ी प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित है। इस सहयोग में छात्रों और शिक्षकों की यात्राएं, संयुक्त अनुसंधान गतिविधियां, अकादमिक आदान-प्रदान, संगोष्ठियां और सहयोग संबंधी अकादमिक कार्यक्रम शामिल हैं।

एक और महत्वपूर्ण बात यह हुई है कि सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनजीआरआई) ने एमराल्ड जियोमॉडलिंग के साथ भारत में बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के लिए भूविज्ञान पर आधारित समाधान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैज्ञानिक और व्यावसायिक सहयोग स्थापित करने के लिए पांच वर्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस सहयोग में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं, भूभौतिकीय सर्वेक्षण योजना, डेटा विश्लेषण और मॉडलिंग, तकनीकी परामर्श सहायता और वैज्ञानिक कार्यक्रमों एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन शामिल होगा।

ये समझौते विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में भारत-नॉर्वे सहयोग में महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं और इनसे दोनों देशों के बीच सहयोग से अनुसंधान, नवाचार-आधारित सतत विकास और दीर्घकालिक संस्थागत साझेदारी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

भारत का फार्मा सेक्टर : नवाचार और  युवाओं के लिए नया आकाश

श्रीमती अनुप्रिया पटेल

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक नवाचारआधारित वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित ₹10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है।

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंसकी स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को रीस्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम उद्योगअकादमिक साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

जगत प्रकाश नड्डा           

वैश्विक स्तर पर, कुल औषधि राजस्व में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गयी है। लंबे समय से जेनरिक दवाओं में अग्रणी देश होने के कारण ‘विश्व की फ़ार्मेसी’ के रूप में प्रसिद्ध भारत का औषधि उद्योग अब पैमाने से नवाचार की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत सरकार भविष्य के अनुरूप एक नीतिगत रूपरेखा को गति दे रही है, ताकि देश जेनरिक दवाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए इन उभरते क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त कर सके।

केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के मिशन बायोफार्मा निर्माण शक्ति की घोषणा इस दिशा में एक निर्णायक कदम को रेखांकित करती है। यह अगले 8 से 10 वर्षों में भारत को बायोफार्मा नवाचार और उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सेवाओं के वैश्विक केन्द्र बनाने के देश के संकल्प का संकेत देती है। यह विज़न गहरी वैज्ञानिक क्षमताओं के निर्माण, नवाचार-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने और भारत को अगली पीढ़ी की दवाओं के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभरने में सक्षम बनाने पर आधारित होगा।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सीय क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को गति देना है। यह कार्यक्रम औषधि विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की मौजूदा पहलों का पूरक है, जैसे फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना (पीआरआईपी), अनुसंधान विकास और नवाचार योजना, बायोनेस्ट आदि, जिनका उद्देश्य जैव- औषधि समेत जीवन विज्ञान क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है। ये पहलें भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने, उद्योग-अकादमी सहयोग को बढ़ावा देने तथा जेनेरिक दवाओं से नवाचार संचालित दवा अनुसंधान और विकास की ओर बदलाव को सक्षम करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ किण्वन-आधारित निर्माण क्षमताओं का विकास करना है। एंटिबायोटिक, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, यह क्षेत्र लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। अवसंरचना में निवेश करके, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाकर तथा लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करके, भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

भारत के नैदानिक ​​अनुसंधान इकोसिस्टम का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक ​​प्रयोग केंद्र स्थापित किये जायेंगे, जो वैश्विक दवा विकास गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। अपनी लागत लाभ और कुशल शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या के साथ, भारत कुशल और उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक ​​प्रयोग के लिए असाधारण अवसर प्रदान करता है। साथ ही, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और संस्थागत क्षमताओं को बढ़ाने से भारत की मौजूदा व्यवस्था वैश्विक मानकों के अधिक अनुरूप होगी, जिससे तेज अनुमोदन संभव होंगे और वैश्विक हितधारकों के बीच विश्वास बढ़ेगा।

पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने पीएलआई और थोक दवा (बल्क ड्रग) पार्क योजनाओं के सहारे सक्रिय औषधि सामग्री (एपीआई) और मुख्य आरंभिक सामग्रियों (केएसएम) के स्थानीय उत्पादन में तेज़ी से प्रगति हुई है। इससे देश में दवाओं की कीमतें घटाने में मदद मिली है, जो विश्व स्तर पर सबसे कम कीमतों में से एक है और इसके कारण नागरिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत किफायती बनी रहती है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना ने सस्ती कीमतों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है, जिसके तहत 19,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं। कैंसर और दुर्लभ रोगों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं पर सीमा-शुल्क को सुव्यवस्थित करने जैसे पूरक उपाय जीवन रक्षक उपचारों तक पहुंच को और सुलभ बना रहे हैं। जैसे-जैसे उन्नत चिकित्सा प्रक्रियाएं अधिक व्यापक होंगी, किफायती दर और समान पहुंच सुनिश्चित करना केंद्रीय नीति की प्राथमिकता बनी रहेगी।

जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, भारत का उद्देश्य न केवल स्थापित बाजारों में बल्कि उभरते क्षेत्रों में, विशेष रूप से नवाचार-संचालित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना है। सुधार, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नियामक समन्वय, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और तेजी से मंजूरी जैसे प्रयास व्यापार करने में आसानी को बढ़ा रहे हैं। गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने से भारतीय औषधि उत्पादों पर वैश्विक विश्वास की निरंतरता सुनिश्चित होती है। हालांकि, आरएंडडी निवेश बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसका समाधान करने के लिए, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूती देना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रहा जा सके।

नीतिगत समर्थन, तकनीकी प्रगति और बाजार का आपसी समन्वय; औषधि क्षेत्र के लिए विकास का एक अद्वितीय अवसर प्रस्तुत करता है। भारत का घरेलू बाजार, जिसका मूल्य पहले से ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, निरंतर विस्तार के लिए तैयार है। अगले दशक में, भारत न केवल जेनेरिक दवाओं में एक अग्रणी देश के रूप में, बल्कि नवोन्मेषी दवाओं, किण्वन-आधारित उत्पादों और अगली पीढ़ी की चिकित्सा-सेवाओं में भी एक शक्तिशाली केंद्र के रूप में उभरने के लिए बेहतर स्थिति में है।

निष्कर्ष के तौर पर, भारत का औषधि क्षेत्र नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, सुदृढ़ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा द्वारा परिभाषित होता है। बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम जैसी पहलों, नैदानिक अवसंरचना के विस्तार और लक्षित निर्माण प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत धीरे-धीरे मात्रा-संचालित जेनेरिक दवा केंद्र से उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मा नवाचार अग्रणी देश की ओर आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में भारत की भूमिका को मजबूत करने और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न, विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।  

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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री हैं)

गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन से भारत के फार्मा निर्यात को गति देने पर जोर

फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 से पूर्व उच्चस्तरीय संगोष्ठी आयोजित

चंडीगढ़, 10 अप्रैल 2026 – उद्योग जगत के अग्रणी, सरकारी अधिकारी एवं विभिन्न हितधारक आज होटल शिवालिक व्यू में आयोजित एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी में एकत्रित हुए। इस संगोष्ठी का विषय था—
“गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन के माध्यम से भारत के फार्मास्यूटिकल्स, फार्मा मशीनरी एवं उपकरण निर्यात का विस्तार”।

यह आयोजन आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 के दूसरे संस्करण के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्व कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया।

संगोष्ठी की शुरुआत भारत के उच्च मात्रा वाले जेनेरिक उत्पादक से उच्च मूल्य वाले वैश्विक नवाचार केंद्र की ओर परिवर्तन पर सारगर्भित चर्चा के साथ हुई। वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र के 50 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना के मद्देनज़र, “विकसित भारत @2047” के तहत भारत को “फार्मा पावरहाउस” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

इस मिशन के अंतर्गत जटिल बायोप्रोसेसिंग उपकरणों एवं उन्नत प्रयोगशाला उपकरणों में आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर बल दिया गया, साथ ही पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़ते हुए एआई आधारित ऑटोमेशन एवं सतत विनिर्माण जैसी फार्मा 4.0 तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया।
संगोष्ठी में भारत सरकार द्वारा नियामक ढांचे एवं निर्यात प्रोत्साहन पहलों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता के रूप में श्री यश गर्ग, आईएएस, महानिदेशक, आयुक्त, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, हरियाणा ने राज्य सरकार की विभिन्न पहलों पर प्रकाश डालते हुए हरियाणा को फार्मा मशीनरी एवं लैब उपकरण निर्माण एवं निर्यात के लिए एक संभावित केंद्र बताया।

वहीं श्री उत्पल कुमार आचार्य, संयुक्त महानिदेशक (डीजीएफटी, लुधियाना) ने निर्यात को सरल बनाने एवं नवाचार आधारित गुणवत्ता निर्माण को बढ़ावा देने हेतु सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर ईईपीसी इंडिया द्वारा आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गई तथा एक्सपो का आधिकारिक ब्रोशर भी जारी किया गया।

उद्योग प्रतिनिधियों ने एक्सपो के प्रति गहरी रुचि व्यक्त की तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता निर्माण समाधान, उभरते नवाचार, ऊर्जा दक्ष तकनीकें, उन्नत डायग्नोस्टिक एवं विश्लेषणात्मक उपकरणों तथा बायोफार्मा अनुसंधान की बदलती आवश्यकताओं के क्षेत्रों में भागीदारी की इच्छा जताई।

साथ ही रिवर्स बायर-सेलर मीट (RBSM) के माध्यम से अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया एवं अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों के खरीदारों से सीधे संपर्क के अवसरों पर भी चर्चा हुई।

कार्यक्रम में अन्य प्रमुख वक्ताओं में श्री अरुण शुक्ला (ईईपीसी इंडिया), डॉ. प्रदीप मट्टू (पूर्व संयुक्त औषधि आयुक्त), डॉ. गोविंद शंकर पांडे (सीईओ एवं एमडी, गैंप टेक्नोलॉजीज प्रा. लि.) तथा श्री जे. इमाम (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट–वर्क्स, अरिस्टो फार्मास्यूटिकल्स प्रा. लि.) शामिल थे।

वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सरकारी नियामक सहयोग एवं उद्योग नवाचार के बीच बेहतर समन्वय ही वर्ष 2047 तक भारत के इंजीनियरिंग निर्यात को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का आधार बनेगा।

यह संगोष्ठी ईईपीसी इंडिया द्वारा आयोजित की गई, जो इंजीनियरिंग क्षेत्र में व्यापार एवं निवेश प्रोत्साहन की प्रमुख संस्था है, जिसे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार का समर्थन प्राप्त है।