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राष्ट्रीय पोषण माह 2026 शुरू, ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी’ बना थीम

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी

2047 का विकसित भारत उन बच्चों के हाथों से बनेगा, जो अभी स्कूल की दहलीज तक भी नहीं पहुँचे हैं। स्वस्थ और सक्षम बनने की उनकी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण नींव जीवन के पहले एक हजार दिनों में ही रखी जाती है। करोड़ों भारतीय बच्चों और माताओं के लिए इस सफर का भरोसेमंद सहारा उनके आसपास ही मौजूद है—आँगनवाड़ी।

स्कूल जाने से बहुत पहले बच्चे का वजन और लंबाई आँगनवाड़ी में मापी जाती है। वहीं उसे गरम पका भोजन और घर के बाहर की दुनिया से जुड़ने का पहला अवसर मिलता है, और गर्भवती माँ को पोषण से जुड़ी पहली सलाह भी। देशभर के लगभग 14 लाख आँगनवाड़ी केंद्र 8.9 करोड़ से अधिक बच्चों, महिलाओं और किशोरियों तक पहुँच रहे हैं, और इन्हें चलाने वाली 25.2 लाख कार्यकर्ता व सहायिकाएँ उसी समाज से आती हैं, जिसकी वे सेवा करती हैं। आँगनवाड़ी हमारे समाज से अलग कोई व्यवस्था नहीं, हमारे अपने पड़ोस का हिस्सा है।

मार्च 2018 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पोषण अभियान की शुरुआत कर इसी परिचित व्यवस्था को देशव्यापी जनआंदोलन की मजबूत नींव बनाया। तब से हर सितंबर राष्ट्रीय पोषण माह और हर मार्च पोषण पखवाड़ा पोषण का संदेश देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का माध्यम बने हैं।

इस वर्ष 9वाँ राष्ट्रीय पोषण माह 9 सितंबर 2026 से “हमारी आँगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी” थीम के साथ शुरू हो रहा है। गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है और इस दिशा में हमारा संकल्प मजबूत है। साथ ही, इन सेवाओं का प्रभाव तब और बढ़ता है, जब समुदाय आँगनवाड़ी को अपना मानता है। प्रधानमंत्री जी ने भी कहा है कि विकसित भारत का निर्माण सबके प्रयास से होगा।

लाभार्थी से भागीदार तक

इस वर्ष सामुदायिक भागीदारी को एक व्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आँगनवाड़ी प्रबंधन समितियाँ माता-पिता, पंचायत प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूहों को केंद्र के संचालन से जोड़ती हैं। वे देख सकते हैं कि बच्चों को क्या परोसा जा रहा है, हर हकदार बच्चे तक सेवाएँ पहुँच रही हैं या नहीं, और केंद्र को बेहतर बनाने के लिए किस सहयोग की आवश्यकता है। इसे प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है—सोशल ऑडिट, जो समुदाय को अपनी आँगनवाड़ी की समीक्षा करने और सामने आने वाली बातों के आधार पर सुधार की दिशा तय करने का अवसर देता है। जिस केंद्र से बच्चों और माताओं का जीवन जुड़ा है, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में उन्हीं परिवारों की भागीदारी सबसे स्वाभाविक है।

इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में माँ है, और उसके हाथ में पारदर्शिता का सरल माध्यम है—मेन्यू बोर्ड। हर केंद्र पर लगा यह बोर्ड गरम पके भोजन और टेक-होम राशन का दिन-वार विवरण परिवारों के सामने रखता है। जब एक माँ जानती है कि उसके बच्चे को क्या मिलना चाहिए और केंद्र के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करती है कि उसे तय मात्रा और गुणवत्ता के अनुसार भोजन मिले, तो पारदर्शिता रोजमर्रा की व्यवस्था बन जाती है।

पोषण माह 2026 इसी भागीदारी को जमीन पर उतारने का अवसर है। जहाँ प्रबंधन समितियाँ गठित नहीं हुई हैं, वहाँ उनका गठन किया जाएगा; जहाँ मौजूद हैं, वहाँ उनकी पहली बैठकें और सोशल ऑडिट होंगे। हर केंद्र पर मेन्यू बोर्ड लगेगा। तिथि भोज और स्वस्थ व्यंजनों के प्रदर्शन जैसे आयोजन परिवारों, पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों को आँगनवाड़ी के और करीब लाएँगे।

मेन्यू बोर्ड से आगे

आँगनवाड़ी सेवाओं की पहली कसौटी है—पौष्टिक भोजन, जो संतुलित और विविधतापूर्ण भी हो: अनाज और श्री अन्न, दालें, मेवे और बीज, दूध और दुग्ध उत्पाद, अंडा, मौसमी फल तथा हरी सब्जियाँ। इसी दिशा में जुलाई में जारी पूरक पोषण कार्यक्रम के व्यापक दिशानिर्देश, 2026 महत्वपूर्ण कदम हैं, जिनमें पहली बार गरम पके भोजन का स्वरूप स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के पोषक मानकों को और मजबूत किया गया है।

भोजन के साथ बच्चे के शुरुआती विकास और सीखने पर भी उतना ही ध्यान जरूरी है। बच्चा क्या खाता है और कैसे सीखता है—दोनों गहराई से जुड़े हैं। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले तीन वर्षों में विकास के 34 पड़ावों पर नजर रखती हैं, और नवचेतना तथा आधारशिला जैसे पाठ्यक्रम बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करते हैं।

यह यात्रा जन्म से भी पहले शुरू होती है—गर्भावस्था में माँ का पोषण बच्चे के जीवन की शुरुआत को भी प्रभावित करता है। इसी संदर्भ में इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके पीछे भावना यही रही है कि किसी महिला को गर्भावस्था के दौरान अपनी आजीविका और अपने स्वास्थ्य के बीच चुनाव न करना पड़े। इन दस वर्षों में 4.65 करोड़ लाभार्थियों तक ₹21,511 करोड़ सीधे उनके बैंक खातों में पहुँचे हैं। मिशन शक्ति के तहत यह योजना अब दूसरी संतान के रूप में बेटी के जन्म पर अतिरिक्त लाभ भी देती है।

सहायता का प्रभाव तब कई गुना बढ़ जाता है, जब वह अकेले नहीं, बल्कि निरंतर परामर्श और सहयोग के साथ पहुँचती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी इसी तथ्य को रेखांकित किया है कि नकद सहायता अपना पूर्ण उद्देश्य तभी सिद्ध करती है, जब उसके साथ ऐसा परामर्श भी जुड़ा हो, जो परिवार को सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाए। सर्वेक्षण में राजस्थान के “कैश प्लस” मॉडल का उल्लेख है, जिसमें नकद सहायता के साथ सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संवाद को योजना का अभिन्न अंग बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि सहायता राशि को भोजन पर व्यय करने वाली महिलाओं का अनुपात 30 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया, और जैसे-जैसे पति तथा परिवार के अन्य सदस्य इस संवाद से जुड़ते गए, मातृ पोषण से जुड़ी भ्रांतियाँ भी दूर होती गईं। शिशु का पोषण केवल माँ की जिम्मेदारी नहीं—इसमें परिवार, समुदाय और व्यवस्था, सभी की भूमिका है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का सम्मान

इस पूरे प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आँगनवाड़ी कार्यकर्ता है। सामुदायिक भागीदारी का उद्देश्य उसका दायित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे सहयोग और सम्मान देना है। स्थानीय परिवारों की जो समझ और भरोसा उन्होंने वर्षों में बनाया है, वह इस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। जब कार्यकर्ता के साथ समुदाय खड़ा होता है, तो आँगनवाड़ी की ताकत कई गुना बढ़ जाती है।

इस सितंबर, मैं हर नागरिक से अपील करती हूँ कि वह अपने क्षेत्र की कम से कम एक आँगनवाड़ी अवश्य जाए। कार्यकर्ता से बात कीजिए, मेन्यू बोर्ड पढ़िए, बच्चों को मिल रही सेवाओं के बारे में जानिए—और सबसे महत्वपूर्ण, पूछिए कि आप क्या सहयोग कर सकते हैं।

इस सितंबर जिन बच्चों का वजन आँगनवाड़ी केंद्रों में लिया जा रहा है, वे 2047 में लगभग बीस-पच्चीस वर्ष के होंगे। वे जिस स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और क्षमता के साथ देश के विकास में योगदान देंगे, उसकी नींव आज रखी जा रही है। जब हर समुदाय अपनी आँगनवाड़ी को अपनी ज़िम्मेदारी मानकर उसके साथ खड़ा होता है, तब हर बच्चे का भविष्य और मजबूत होता है।

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(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

संवाद से परिणाम तक: आसियान-भारत कृषि सहयोग के तीन दशकों को किसानों की समृद्धि में बदलना

एम. एल. जाट और नवीन पी. सिंह

जब भारत और आसियान के 11 सदस्य देशों के अधिकारी और मंत्री नई दिल्ली में दो दिवसीय बैठक के लिए एकत्र हो रहे हैं, तो इस साझेदारी का वास्तविक सार किसी साझा विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि 1992 से लगातार विकसित किए गए अनुसंधान, प्रशिक्षण और ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में निहित है।

नई दिल्ली में 9 सितंबर को आयोजित होने वाली कृषि एवं वानिकी पर 9वीं आसियान-भारत मंत्रिस्तरीय बैठक (AIMMAF) एक स्थापित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी: मंत्रियों के विचारार्थ तकनीकी सिफारिशों पर चर्चा और उन्हें अंतिम रूप देने के लिए कृषि एवं वानिकी पर 10वां आसियान-भारत कार्य समूह (AIWGAF) एक दिन पहले बैठक करेगा। हालांकि यह एक औपचारिक प्रक्रिया या 1992 में भारत-आसियान क्षेत्रीय संवाद शुरू होने के बाद से विकसित तंत्र का एक सामान्य दौर लग सकता है, लेकिन औपचारिकताओं से परे जाकर यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस संस्थागत साझेदारी ने तीन दशकों में क्या हासिल किया है। इसलिए, यह बैठक न केवल प्रगति की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि इस दीर्घकालिक सहयोग को पूरे क्षेत्र के किसानों की समृद्धि, आजीविका और खाद्य प्रणालियों के लिए अधिक ठोस परिणामों में बदलने का भी अवसर देती है।

साझा कृषि वास्तविकताएं, साझा अवसर

भारत और ग्यारह आसियान सदस्य देश—जिनमें अक्टूबर 2025 में शामिल हुआ नया सदस्य तिमोर-लेस्ते भी शामिल है, अपार कृषि विविधता और विकास क्षमता वाले क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आसियान के कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन क्षेत्र लगभग 93 मिलियन नौकरियों को सहारा देते हैं, जबकि भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्र लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल को रोज़गार प्रदान करते हैं।

दोनों ही क्षेत्रों में खेत मुख्य रूप से छोटे और खंडित हैं, उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, तथा दोनों क्षेत्रों में एक जैसी फसलें और ईकोसिस्टम सीमाओं के पार फैले हुए हैं। इनमें धान, दालें, फल और मसालों से लेकर पशुधन, मत्स्पालन, मैंग्रोव और वन तक शामिल हैं। दोनों क्षेत्र जलवायु परिवर्तनशीलता, सीमा पार से आने वाले कीट-रोगों और कटाई के बाद होने वाले निरंतर नुकसान के बढ़ते दबाव का भी सामना कर रहे हैं।

यह समानताएं कृषि ज्ञान और प्रौद्योगिकियों को परस्पर साझा करने के लिए बेहद अनुकूल बनाती हैं, जिससे ‘भारत-आसियान मध्यम अवधि कार्य योजना 2026–2030’ के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है। यह योजना आसियान की नई ‘खाद्य, कृषि और वानिकी क्षेत्रीय योजना 2026–2030’ और इसके छह रणनीतिक स्तंभों-स्थिरता, डीकार्बोनाइजेशन, खाद्य सुरक्षा, व्यापार कनेक्टिविटी, डिजिटल नवाचार और सतत वन प्रबंधन-के अनुरूप है।

भारत का कृषि ज्ञान और तकनीकी आधार

इस साझेदारी में भारत का योगदान दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्तपोषित कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणालियों में से एक पर आधारित है। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत 114 अनुसंधान संस्थान तथा ब्यूरो, 80 कृषि विश्वविद्यालय और 731 जिला-स्तरीय विस्तार केंद्र (कृषि विज्ञान केंद्र) शामिल हैं। पिछले 12 वर्षों में इस नेटवर्क ने फसलों की 3,800 से अधिक किस्में जारी की हैं, जिनमें से लगभग 3,100 विशेष रूप से जलवायु अनुकूलता के लिए और लगभग 200 बेहतर पोषण गुणों के साथ विकसित की गई हैं। इसे एक राष्ट्रीय जीन बैंक का भी समर्थन प्राप्त है, जिसमें करीब 4,70,000 प्रविष्टियां (accessions) संरक्षित हैं।

भारत के कृषि रूपांतरण का पैमाना उसके उत्पादन में हुई वृद्धि में दिखता है। खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के लगभग 25.2 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 37.7 करोड़ टन हो गया है, जबकि इसी अवधि में दूध उत्पादन करीब 14.6 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 24.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है। मत्स्पालन में, उत्पादन पिछले दशक में लगभग दोगुना होकर करीब 2 करोड़ टन हो गया है, जो अनुमानित 3 करोड़ आजीविकाओं को सहारा दे रहा है; साथ ही 49 फिनफिश और शेलफिश प्रजातियों के लिए कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं।

यही वह विशेषज्ञता है जिसे भारत इस साझेदारी में लाता है-किसी श्रेष्ठता के दावे के रूप में नहीं, बल्कि उन कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों द्वारा गढ़े गए एक ठोस संसाधन आधार के रूप में, जो दक्षिण पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों से काफी मेल खाते हैं।

व्यावहारिक धरातल पर क्या है यह सहयोग

अनुसंधान अवसंरचना से परे, इस साझेदारी का अधिक ठोस योगदान मानव पूंजी के निर्माण और ज़मीनी स्तर के विस्तार को मजबूत करने में रहा है। आसियान-भारत फैलोशिप कार्यक्रम सदस्य देशों के छात्रों को प्रमुख भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जिससे वे क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के रूप में पहचाने गए क्षेत्रों में अनुसंधान और विशेषज्ञता से परिचित होते हैं।

भारत की अपनी विस्तार पहल भी यह दर्शाती हैं कि इस तरह के सहयोग को किस बड़े पैमाने पर व्यवहार में लाया जा सकता है। विकसित कृषि संकल्प अभियान 13.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंचा और अनुसंधान एवं नीतिगत ध्यान के लिए 500 से अधिक प्राथमिकता वाले मुद्दों की पहचान की। एक संबंधित आउटरीच पहल ने 728 जिलों में 1,34,000 से अधिक कार्यक्रम चलाए, 6,650 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए और 1,00,000 से अधिक फील्ड प्रदर्शन किए, जबकि इसका डिजिटल प्रसार लगभग 5 करोड़ हितधारकों तक पहुंचा।

ये घरेलू अनुभव आसियान के लिए केवल अपने बड़े पैमाने के कारण ही प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी हैं क्योंकि ये अपेक्षाकृत कम लागत वाले और व्यापक पहुंच वाले विस्तार मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र के छोटे किसानों की कृषि प्रणालियों के अनुसार ढाला जा सकता है। अवसर इस बात में है कि मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच केवल औपचारिक आदान-प्रदान से आगे बढ़कर ऐसे तंत्र बनाए जाएं जो ज्ञान, तकनीक और प्रशिक्षण को सीधे किसानों से जोड़ें-और यह केवल व्यापार उपकरणों के बजाय संस्थागत सहयोग के माध्यम से हो।

साझेदारी में अभी कहां काम बाकी है: अनुसंधान से ज़मीनी प्रभाव तक

एक ईमानदार आकलन यह है कि यह सहयोग अभी भी काफी हद तक अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और मंत्रालयों तक ही सीमित है। सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय विस्तार नेटवर्कों तक इसकी पहुंच तुलनात्मक रूप से सीमित है, जो इसके लाभों को व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत खेतों तक पहुंचा सकते हैं।

सात विषयगत क्षेत्र वर्तमान में इस तकनीकी सहयोग का आधार हैं: खाद्य और पोषण सुरक्षा; सतत वानिकी और मैंग्रोव प्रबंधन; पुनर्योजी (regenerative) एवं जलवायु-अनुकूल कृषि; पशुधन, डेयरी और पशु स्वास्थ्य; मत्स्यपालन और नीली अर्थव्यवस्था; कटाई उपरांत प्रबंधन और मूल्य श्रृंखलाएं; तथा डिजिटल कृषि। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र गहरे जुड़ाव के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है।

अगला कदम एक मजबूत संस्थागत अनुवर्ती कार्रवाई होना चाहिए: आसियान की परिस्थितियों में तनाव-सहनशील फसल किस्मों के बहु-स्थानिक परीक्षण, कीट-निगरानी के व्यावहारिक संयुक्त प्रोटोकॉल, और कटाई के बाद के नुकसान को मापने के लिए समान पद्धतियां, जिससे देशों के बीच सार्थक तुलना संभव हो सके। मत्स्य और वानिकी समुदाय, जिनकी आजीविका इन क्षेत्रों के निर्णयों से सीधे प्रभावित होती है, विशेष रूप से ऐसे सहयोग से लाभान्वित होंगे जो केवल अनुसंधान विनिमय से आगे बढ़कर व्यावहारिक और ज़मीनी स्तर की सहायता तक पहुंचे।

साझेदारी का आकलन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से हो

इसलिए 9वीं AIMMAF का मूल्यांकन उसके संयुक्त बयान की भाषा से नहीं, बल्कि बैठक के बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। वास्तविक और कड़ी परीक्षा-विशेषकर भारत और आसियान में कृषि के विशाल पैमाने को देखते हुए-यह है कि क्या यह सहयोग 2026–2030 की कार्य योजना के दौरान मापने योग्य परिणाम देता है या नहीं।

इसका अर्थ कुछ ठोस प्रश्न पूछना है: आसियान की परिस्थितियों में भारत की कितनी फसल किस्मों का परीक्षण और उन्हें अपनाया गया? आसियान फैलोशिप से निकले कितने छात्र अपने राष्ट्रीय कृषि तंत्र को मजबूत करने के लिए वापस लौटे? क्या संयुक्त कीट-निगरानी और कटाई उपरांत प्रोटोकॉल सहमत रूपरेखाओं से आगे बढ़कर नियमित व्यवहार में आए? और क्या भारत के सिद्ध विस्तार मॉडलों को आसियान के छोटे किसानों की अर्थव्यवस्था के अनुसार सार्थक रूप से ढाला गया?

ये परिणाम इस सप्ताह नई दिल्ली में तुरंत दिखाई नहीं देंगे। ये समय के साथ खेतों, प्रयोगशालाओं, संस्थानों और अंततः 10वीं AIMMAF में प्रस्तुत साक्ष्यों में उभरेंगे। वहीं इस साझेदारी की वास्तविक सफलता का आकलन किया जाना चाहिए: भारत और आसियान भर के किसानों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका, लचीलेपन, उत्पादकता और आय में।

(लेखक क्रमशः सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) तथा महानिदेशक, ICAR और सहायक महानिदेशक (अंतर्राष्ट्रीय संबंध), नई दिल्ली हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)

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भारत की 7.8% विकास दर पर सवाल और जवाब: आर्थिक मजबूती के पीछे क्या है?

डॉ. सौरभ गर्ग और डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन

अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन और अरविंद सुब्रमण्यन ने यह पूछा है कि जिस तिमाही में ऊर्जा के क्षेत्र में जोरदार झटके लगे हों, उसमें भारत की विकास दर आखिर 7.8 प्रतिशत कैसे हो सकती है। बेशक, यह एक उचित सवाल है। इसका एक जवाब भी है और वह जवाब पिछले कुछ वर्षों से सबके सामने ही है। 

समय से ही शुरुआत करते हैं। इस तिमाही की अवधि अप्रैल से जून 2026 तक थी। इससे ठीक पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इजराइल के बीच का संघर्ष चरम पर पहुंच गया था। तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और भारत ने इसका असर महसूस किया। हालांकि मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस जबरदस्त व्यवधान में कमी आई। मई आते-आते दबाव के बदल छंट गए। जून तक, मुश्किल दौर बीत चुका था। तीन महीने वाली तिमाही की शुरुआत के कुछ मुश्किल हफ्ते उस तिमाही के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं बना देते।

उन महीनों के सबूत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। ऑटोमोबाइल की बिक्री में निरंतर बढ़ोतरी हुई। एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की मदद से बैंक ऋण और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। जीएसटी की दरों में कटौती के बावजूद, इसका संग्रह मजबूत बना रहा और हाल ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में इसमें 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2025-26 तक के तीन वर्षों में, जीएसटी के सकल संग्रह में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ‘नॉमिनल जीडीपी’ में 31.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये दोनों आंकड़े बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं और दोनों ही लगभग एक-दूसरे से मेल खाते हैं। जीएसटी रिटर्न कंपनियां दाखिल करती हैं। ऋण संबंधी आंकड़े बैंकों से आते हैं। व्यापार के आंकड़े  बंदरगाहों से आते हैं। इनमें से कोई भी आंकड़ा सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा तैयार नहीं किया जाता है।

अर्थव्यवस्था आखिर टिकी क्यों रही? क्योंकि कई सुधारों को एक साथ अपनाया गया। वर्ष 2022-23 के बाद से केन्द्र सरकार का पूंजीगत व्यय 65 प्रतिशत बढ़ा है और इस वर्ष इसमें 11.5 प्रतिशत और बढ़ोतरी का बजट रखा गया है। एक दशक में बनाई गई सड़कें, बंदरगाहें और बिजली संयंत्र तेल के महंगे होने पर ठप्प नहीं पड़े। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अनौपचारिक गतिविधियों के एक बड़े हिस्से को औपचारिक बनाया और उन्हें मापी जा सकने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल किया है। दिवाला संहिता ने डूबे हुए कर्ज (बैड डेट) से निपटने के बैंकों और कंपनियों के तौर-तरीकों को बदल दिया। रियल एस्टेट कानून ने उस सेक्टर को साफ-सुथरा बनाया, जो कभी अटकी हुई परियोजनाओं और पैसे के अपारदर्शी लेन-देन के लिए जाना जाता था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2023 में उस सफाई अभियान का उल्लेख किया था। उसने नई दिल्ली पर कोई मेहरबानी नहीं की थी।

इसके बाद, तेल की कीमतों में अचानक आए उछाल से निपटने के लिए सरकार ने जो कुछ किया, वह भी सामने है। उसने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ आम परिवारों और कंपनियों पर नहीं डाला। उसने इसकी लागत खुद वहन की। राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) का उद्देश्य ही यही है और भारत ने इसे तैयार किया है। इसका सबूत 2 सितंबर को मिला। जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया और इसके साथ ही स्थिर संभावना भी जताई। इसके अलावा, देश की रेटिंग सीमा (कंट्री सीलिंग) को भी ए कर दिया। भारत को तीन दशकों से अधिक समय से ‘ए’ रेटिंग नहीं मिली है। एजेंसी ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, जीएसटी, दिवाला संहिता और सकल गैर-निष्पादित ऋण अनुपात (ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग लोन रेश्यो) के 1.8 प्रतिशत तक कम होने का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने उच्च पूंजीगत व्यय को जारी रखते हुए भी अपने राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025 में जीडीपी  के 4.7 प्रतिशत से घटाकर वित्तीय 2026 में 4.4 प्रतिशत कर लिया। टोक्यो स्थित एक रेटिंग समिति के लिए दिल्ली में किसी को खुश करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने भी उन्हीं सुधारों को देखा और वही नतीजा निकाला।

अब आलोचना के मुख्य बिंदु पर आते हैं। लेखकगण पूछते हैं कि अगर आज ये संकेतक 7.8 प्रतिशत की विकास दर को सही ठहराते हैं, तो पूर्व के वर्षों में वैसी ही विकास दर कमजोर संकेतकों के साथ क्यों संभव हुई थी? यह मान लेना कि विकास हमेशा एक जैसी चीजों से ही संभव होती है, जरूरी नहीं है। निर्यात और औपचारिक ऋण से प्रेरित तिमाही, घरेलू खर्च या सरकारी निवेश से चलने वाले वर्ष जैसी नहीं होगी। पूर्व के वर्षों में विकास के अपने कारण थे, जो उस समय साफ दिख रहे थे। वर्ष 2024-25 तक, शेयर बाजार तेजी से चढ़ा और अधिक संख्या में भारतीयों ने निवेश करना शुरू किया। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। गैर-बैंक और तकनीक-आधारित ऋणदाता तेजी से बढ़े। वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल संसाधनों का प्रवाह तीन वर्षों में 72 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंकों की  हिस्सेदारी 96 प्रतिशत बढ़ी। ये असली कारण थे। बस, वे अलग थे।

मार्च 2023 से मार्च 2026 के बीच सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को दिए गए बकाया ऋण में 66.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 में भी यह बढ़ोतरी लगभग 25 प्रतिशत की दर से जारी थी। ऐसा कहा जाता है कि ऊर्जा की कीमतों में अचानक उछाल से छोटी कंपनियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। लेकिन उन्हें ऋण देने वाले इस बात से सहमत नहीं दिखते। ऋणदाता आम तौर पर उन कंपनियों को ऋण नहीं देते, जिनके असफल होने की आशंका होती है।

लेखकों के तर्क की तह में यह बात छिपी है कि सांख्यिकी मंत्रालय का काम सरकार की छवि को बेहतर दिखाना है। लेकिन आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते। वर्ष 2023-24 के लिए, मंत्रालय ने विकास दर के अनुमान को 9.2 प्रतिशत (पुरानी श्रृंखला के तहत) से घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया था। यानी, उन्होंने खुद ही लगभग दो प्रतिशत अंक कम कर दिए। अन्य आरोपों के मामले में भी गणित खिलाफ जाता है।

वर्ष 2024-25 में, नई श्रृंखला के तहत नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम रही – 9.8 प्रतिशत  के मुकाबले 9.4 प्रतिशत  – जबकि असल विकास बढ़ी। नॉमिनल जीडीपी  सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों का आधार होती है। सरकार सबसे ज़्यादा इसी आंकड़े को ऊंचा रखना चाहती है। अगर कोई मंत्रालय आंकड़ों में हेरफेर करता है, तो वह ऐसा अपनी कीमत पर नहीं करता। वर्ष 2024-25 और 2025-26 को मिलाकर देखें, तो नई श्रृंखला के तहत औसत असल विकास दर 7.0 प्रतिशत से बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो जाती है। यह आधा प्रतिशत अंक अधिक है। अगर तीन वर्षों – 2023-24 से 2025-26 – को लें, तो नई में औसत ग्रोथ पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम है – 7.7 प्रतिशत  के मुकाबले 7.4 प्रतिशत।

लेखकगण अपनी बात एक कहावत के साथ खत्म करते हैं। वे लिखते हैं कि जो नियम आज लागू होता है, वही नियम पहले भी लागू होना चाहिए। यह सिद्धांत सही है। हमारी बस यही मांग है कि इसे पूरी तरह से लागू किया जाए। पिछले सालों के आंकड़े भी मौजूद हैं: जैसे घरेलू बचत, क्रेडिट में बढ़ोतरी, संसाधनों का प्रवाह, करों से होने वाली कमाई और निवेशकों का बढ़ता दायरा। अगर आप कुछ ही संकेतकों को देखें, तो पिछला समय कमजोर लग सकता है। लेकिन अगर आप सभी संकेतकों पर गौर करें, तो ऐसा नहीं लगता।

भारत ने एक बड़े झटके का सामना किया और आगे बढ़ता रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि उसने एक दशक में अपनी क्षमता बढ़ाई थी और वित्तीय मजबूती हासिल की थी। यह एक ठोस नतीजा है, न कि कोई बनावटी बात।

(लेखक सौरभ गर्ग, सचिव, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार)

शिक्षक सिर्फ पढ़ाते नहीं, भविष्य गढ़ते हैं: शिक्षा में बदलती भूमिका और बढ़ती जिम्मेदारी

शिक्षक: शिक्षा के कलाकार : जयंत चौधरी

किसी को भी पहली बार पढ़ना सीखने का सटीक दिन याद नहीं होता। लेकिन लगभग हर व्यक्ति उन शिक्षकों को जरूर याद रखता है, जिन्होंने उसे पढ़ाया होता है। भूल जाने वाले पल और कभी न भुलाए जाने वाले व्यक्ति के बीच का यही अंतर हमें शिक्षण कार्य के बारे में कुछ बेहद जरूरी बातें बता जाता है। एक शिक्षक अपने पीछे ऐसी चीजें छोड़ जाता है, जिन्हें आसानी से आंक पाना संभव नहीं होता: कोशिश करने का आत्मविश्वास, डटे रहने का अनुशासन, सवाल पूछने की जिज्ञासा, या कभी-कभी मात्र यह भरोसा कि इंसान और भी बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए, शिक्षण को एक कला से कम कुछ भी नहीं माना जा सकता।

भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा हर वर्ष प्रदान किए जाने वाले ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ वास्तव में उन चुनिंदा लोगों के प्रति सम्मान होते हैं, जिनका योगदान दूसरों से कहीं बढ़कर रहा होता है। इन सबके अलावा, देश के हर कोने में – चाहे वह कक्षा हो या कौशल संबंधी प्रयोगशाला या पॉलिटेक्निक या खेल का मैदान या फिर संगीत कक्ष – विद्यार्थीगण धन्यवाद कहने का अपना-अपना तरीका ढूंढ ही लेते हैं। कभी हाथ से लिखी हुई एक टिप्पणी। कभी सुबह की सभा में आभार जताने का एक पल। कभी एक ऐसी खामोश सराहना जो दिन खत्म होने के काफी देर बाद तक शिक्षक के मन में बसी रहती है। ये कोई कमतर उत्सव नहीं हैं, बल्कि कई मायनों में ये सबसे सच्चे उत्सव हैं।

हालांकि, आंकड़े हमें एक और चिंताजनक कहानी बताते हैं। ओईसीडी का 2026 का ‘टीचर नॉलेज सर्वे’ किसी विषय की जानकारी होने और उसे पढ़ा पाने की क्षमता के बीच के अंतर की ओर इशारा करता है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि विषय का ज्ञान हमेशा कारगर शिक्षण-पद्धति में नहीं बदलता। बात बिल्कुल सरल, लेकिन बेहद जरूरी है: किसी चीज को गहराई से जानना और किसी दूसरे व्यक्ति को उसे सीखने में मदद करना – ये दोनों अलग-अलग कौशल  हैं। शिक्षण एक कला है और इसके लिए मानवीय रिश्तों एवं पढ़ाने के तरीकों की समझ के साथ-साथ कक्षा में थोड़ी नाटकीयता की भी जरूरत होती है।

यूनेस्को की ‘शिक्षकों से संबंधित वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में इस पेशे की उपेक्षा  करने की कीमत को आंकड़ों में दर्शाया गया है। दुनिया को 2030 तक 44 मिलियन अतिरिक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की जरूरत होगी। और, इनमें से आधे से अधिक की जरूरत केवल उन शिक्षकों की जगह लेने के लिए होगी जो नौकरी छोड़ रहे हैं। वहीं, मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीच्यूट का अनुमान है कि स्वचालन (ऑटोमेशन) के कारण 2030 तक दुनिया भर में 75 मिलियन से 375 मिलियन कामगारों को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में, योग्य शिक्षकों की अहमियत पहले से कहीं अधिक होगी।

भारत ने इस चुनौती को समय रहते भांप लिया है और इससे पूरी गंभीरता से निपटने की दिशा में कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत शुरू किए गए चार-वर्षीय ‘एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम’ में विषयगत   निपुणता तथा शिक्षण-पद्धति को एक ही स्नातक कि डिग्री में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे की ओर आकर्षित करना है। सेवा में कार्यरत शिक्षकों के बीच एक जैसे मानक सुनिश्चित करने हेतु, ‘शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय पेशेवर मानक (एनपीएसटी)’ के तहत करियर में तरक्की को मात्र वरिष्ठता के बजाय, पढ़ाने की असल गुणवत्ता से जोड़ा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का लाभ उठाने हेतु, ‘नेशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (एनएमएम)’ शिक्षकों को अलग-अलग क्षेत्रों के मार्गदर्शकों (मेंटर) से सीखने के लिए व्यवस्थित सहायता प्रदान करता है। मैंने भी इस मिशन के लिए एक मेंटर के तौर पर पंजीकरण कराया है। माननीय प्रधानमंत्री हर वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं से न केवल बधाई देने के लिए, बल्कि उनकी बातें सुनने, जमीनी स्तर की उनकी कहानियां जानने और उनसे एक ऐसा दृष्टिकोण साझा करने के लिए भी मिलते हैं जो केवल अनुभवी नेतृत्व से ही प्राप्त हो सकता है। शिक्षण एक रचनात्मक काम है और अलग-अलग क्षेत्रों से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया इस रचनात्मकता को नयापन प्रदान करती है।

भारत में ‘शिक्षक’ किसे माना जाए, इसका दायरा भी बढ़ाया जा रहा है और शायद यह सबसे अनूठा विचार है। ‘समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ (उल्लास)’ यानी ‘न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम’ इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर व्यक्ति को पढ़ा सकता है। इस वर्ष जब हम ‘अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मना रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के तहत नौ राज्यों एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों को पूरी तरह साक्षर घोषित किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के ‘विद्यांजलि’ पोर्टल में भी यही भावना दिखाई देती है। यह पोर्टल 8.75 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को ऐसे वॉलंटियरों से जोड़ता है जो एक उपहार के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं – चाहे वह नृत्य से संबंधित हो या गणित से या सार्वजनिक भाषण या फिर शिल्प से – को कक्षाओं में प्रदर्शित करते हैं। हर वॉलंटियर एक शिक्षक की भूमिका निभाता है। ये वॉलंटियर जो भी विषय पढ़ाते हैं, उसे बराबर का महत्व दिया जाता है। क्योंकि वास्तव में, शिक्षण कोई तकनीकी काम नहीं बल्कि एक कला है। हर अध्याय को पढ़ाने की योजना एक रचना जैसी होती है। हर व्याख्या एक प्रदर्शन सरीखी होती है। 

कोई भी कला किसी भी कलाकार में भेद नहीं करती। इसलिए हमारे मन में ऊंच-नीच की जो भी धारणा है, उसे परख कर खत्म करना जरूरी है। कभी-कभी संगीत  शिक्षक या शारीरिक शिक्षा के शिक्षक को पूरक और व्यावसायिक शिक्षा के  प्रशिक्षक को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता। यह वर्गीकरण न केवल  अनुचित है, बल्कि पूरी तरह गलत भी है। परीक्षा का दबाव बढ़ने पर संगीत या व्यायाम मन को शांत कर सकते हैं, जिससे तैयारी में मदद मिलती है। भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) के साथ, अनेक कला रूप विद्यार्थियों को आधुनिक दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक के लिए तैयार करेंगे। जैसे-जैसे खेल विश्वविद्यालय आकार ले रहे हैं और राष्ट्रीय खेल अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहे हैं, खेल प्रशिक्षक तथा शारीरिक शिक्षा के शिक्षक एक विश्वसनीय करियर के द्वार खोलेंगे। सटीक मैन्यूफैक्चरिंग सिखा रहे आईटीआई के प्रशिक्षक, ऐसे कौशल विकसित कर रहे हैं जो पुलों के निर्माण और अस्पतालों को सुदृढ़  बनाने में सहायक हैं। यही राष्ट्र निर्माण का एक दूसरा स्वरूप है।

आज के दौर में जब मशीनें लगभग हर उस काम को करने में सक्षम हो रही हैं जिसका पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, तब भी एक काम ऐसा है जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता – और वह है शिक्षक का काम: एक ऐसा शिक्षक जो एक विद्यार्थी में ऐसी क्षमता देख लेता है जिसे खुद विद्यार्थी अभी नहीं देख पा रहा होता है। इस काम का कोई एल्गोरिदम नहीं है। यह स्कूल की घंटी बजने पर खत्म नहीं होता। और यह देश भर के हर तरह के संस्थान में, हर विषय के हर शिक्षक से जुड़ा है। 

एक लैटिन कहावत इस तथ्य को सटीक ढंग से रेखांकित करती है: नॉन स्कोलाए सेड विताए डिस्सिमस (Non scholae sed vitae discimus)। हम स्कूल के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए सीखते हैं।

और इंसानी संभावनाओं का सच्चा कलाकार माना जाने वाला एक शिक्षक ही वही व्यक्ति है, जो इसे संभव बनाता है।

(लेखक केन्द्रीय शिक्षा तथा कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्यमंत्री हैं।)

भारत का विकास: आंकड़ों से आगे सबूतों को समझना : एस. महेंद्र देव और सौरभ गर्ग

5 जून 2026 को फाइनेंशियल ईयर 2025-26 (FY26) के लिए भारत के GDP अनुमान जारी होने और हाल ही में 31 अगस्त को फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए पहली तिमाही के अनुमान जारी होने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति पर काफी चर्चा हुई है। इन चर्चाओं में, ज़्यादातर लोगों ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर आशावादी रुख अपनाया है। हालांकि, एकेडमिक दुनिया के एक हिस्से ने अभी भी इन आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि भारत की नेशनल इनकम और GDP की गणना करने के तरीके में कुछ समस्याएं हैं, जिसके कारण इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर शक है। इस आर्टिकल में, हम उठाए गए इन महत्वपूर्ण आपत्तियों की जांच करेंगे और उनका जवाब देने की कोशिश करेंगे।

कई इंडिकेटर आर्थिक गति की पुष्टि करते हैं

फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत की वास्तविक GDP वृद्धि कई महत्वपूर्ण और लगातार उपलब्ध आर्थिक इंडिकेटर के मजबूत आधार पर टिकी हुई है। ये इंडिकेटर आर्थिक विस्तार की मजबूती और चौड़ाई को दिखाते हैं। कमर्शियल गाड़ियों की बिक्री में 18.3 परसेंट की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह सामान की आवाजाही और कमर्शियल डिमांड में मजबूती को दिखाता है। कंपनियां भविष्य में बढ़ती डिमांड की उम्मीद में अपनी गाड़ियों की संख्या बढ़ा रही हैं। इन्वेस्टमेंट के मोर्चे पर भी काफी मजबूती है। कैपिटल गुड्स का प्रोडक्शन 15.2 परसेंट बढ़ा, जबकि मशीनरी और इक्विपमेंट का इम्पोर्ट 51.5 परसेंट बढ़ा। सीमेंट प्रोडक्शन, तैयार स्टील की खपत और इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन से जुड़े सामानों का प्रोडक्शन भी पहली तिमाही में अच्छी तरह बढ़ा। ई-वे बिल जेनरेशन की संख्या भी डबल डिजिट में बढ़ती रही। वहीं, GST रेट में बड़े पैमाने पर बदलाव और रैशनलाइजेशन के बावजूद, कुल GST कलेक्शन में 8.4 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है। ये सभी इंडिकेटर एक साथ यह इशारा करते हैं कि अर्थव्यवस्था की असली गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं और आर्थिक विकास का आधार काफी लचीला और बड़ा है। खपत भी मजबूत बनी रही। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में घरेलू गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन और थ्री-व्हीलर की बिक्री से पता चलता है कि लोग अपनी ज़रूरतों, पसंद और डिमांड के हिसाब से खर्च कर रहे हैं।

ऐसा करने की क्षमता और मज़बूत हुई है। जून के आखिर में नॉन-फ़ूड बैंक क्रेडिट साल-दर-साल 18.3 परसेंट बढ़ा, जो मार्च में 15.9 परसेंट था। बैंक लोन तीनों सेक्टर – खेती, इंडस्ट्री और सर्विसेज़ – में मज़बूती से बढ़े हैं। मज़बूत इन्वेस्टमेंट, स्थिर कंजम्पशन, माल ढुलाई में बढ़ोतरी और बैंक लोन में बढ़ोतरी यह दिखाती है कि इकॉनमी का यह विस्तार टिकाऊ है।

डिफ्लेटर पर बहस

एक लगातार चिंता मौजूदा और स्थिर कीमतों पर GDP के बीच प्राइस एडजस्टमेंट, यानी GDP डिफ्लेशन से जुड़ी है। यह चिंता तब भी बनी हुई है, जब बेस ईयर में बदलाव के दौरान कैलकुलेशन के तरीके में काफ़ी सुधार किए गए हैं। पहली तिमाही के नतीजों के बाद से GDP डिफ्लेटर को लेकर उठाया गया सबसे ज़रूरी टेक्निकल सवाल भी इसी मुद्दे से जुड़ा है। इंटरनेशनल बेस्ट प्रैक्टिस के हिसाब से, रिवाइज़्ड नेशनल इनकम डेटा अब प्राइस एडजस्टमेंट के लिए होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के बजाय नए प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) का इस्तेमाल करता है। फरवरी 2026 के रिवीजन में कीमतों को सिर्फ़ एक लेवल पर एडजस्ट करने के ‘सिंगल डिफ्लेशन’ मेथड से हटकर, जहाँ मुमकिन हो ‘डबल डिफ्लेशन’ को अपनाया गया और दूसरे मामलों में प्रोडक्शन वॉल्यूम के आधार पर अनुमान लगाया गया।

खास तौर पर, WPI से PPI में बदलाव की वजह से हुए तुलनात्मक रूप से छोटे बदलाव हमारे पहले के असेसमेंट को और मज़बूत करते हैं। हमारा असेसमेंट यह था कि WPI के इस्तेमाल से GDP डेटा में कोई खास गड़बड़ी नहीं हुई, क्योंकि WPI और PPI के अंदरूनी अंदाज़े एक जैसे हैं। हालाँकि, GDP डिफ्लेटर में हाल के बदलावों को समझना थोड़ा मुश्किल रहा है क्योंकि इन्फ्लेशन के मेथड और कीमत के डेटा के सोर्स में एक साथ बदलाव हुए हैं। पहली तिमाही के आंकड़े जारी होने के बाद हुई चर्चा में भी इस पर ज़ोर दिया गया था।

हमने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ‘डबल डिफ्लेशन’ मेथड अपनाया है। इस मेथड के तहत, आउटपुट और प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों और सर्विसेज़ (इंटरमीडिएट कंजम्पशन) की कीमतों में बदलाव को अलग-अलग एडजस्ट किया जाता है। फिर दोनों की असली कीमतों के बीच के अंतर से रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) निकाला जाता है। इसे नेशनल इनकम कैलकुलेट करने का सबसे अच्छा ग्लोबल तरीका माना जाता है। जब प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें तैयार माल की कीमतों से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती हैं, तो मौजूदा कीमतों पर GVA में बढ़ोतरी असली GVA में बढ़ोतरी से कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में – जहाँ आउटपुट और कच्चे माल दोनों की कीमतें बढ़ रही हों – इम्प्लिसिट GVA डिफ्लेटर अभी भी नेगेटिव हो सकता है। डेवलप्ड देशों में भी ऐसे ही नतीजे देखे गए हैं, जिन्होंने डबल डिफ्लेशन मेथड अपनाया है। 2026-27 फाइनेंशियल ईयर के पहले क्वार्टर में, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी तैयार माल की कीमतों में बढ़ोतरी से ज़्यादा हो गई, जिससे GVA डिफ्लेटर में गिरावट आई।

इसके अलावा, कुछ सर्विस सेक्टर में मामूली कीमतों में बढ़ोतरी ने GVA डिफ्लेटर और स्टैंडर्ड CPI/WPI इंडेक्स के बीच के अंतर को और बढ़ा दिया। कॉन्स्टेंट कीमतों पर GVA के अनुमान जनरल या एग्रीगेट प्राइस इंडेक्स पर आधारित नहीं होते हैं; इसके बजाय, वे खास तरह के आउटपुट और इनपुट के हिसाब से बनाए गए 300 से ज़्यादा प्रोड्यूसर प्राइस और दूसरे प्राइस इंडेक्स के सावधानी से इस्तेमाल पर निर्भर करते हैं। इसलिए, कुछ अलग-थलग या बड़े पैमाने पर डेटा के आधार पर इन GVA अनुमानों पर सवाल उठाना सही नहीं है। ऐसा करने से लोगों में एक स्टैटिस्टिकल सिस्टम के बारे में गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं, जिसमें ज़्यादा ट्रांसपेरेंट और मज़बूत बनने के लिए लगातार सुधार किए गए हैं।

कंस्ट्रक्शन सेक्टर पर फोकस

अब हम कंस्ट्रक्शन सेक्टर के GVA पर फोकस करते हैं, जिस पर आम जनता और एक्सपर्ट्स का बहुत ध्यान जाता है। इस पर अलग से चर्चा की ज़रूरत है। इसका एक कारण यह है कि अगर कंस्ट्रक्शन सेक्टर का GVA डिफ्लेटर नॉन-कंस्ट्रक्शन सेक्टर के GVA डिफ्लेटर के करीब होता, तो टोटल GDP डिफ्लेटर भी आम जनता के GVA डिफ्लेटर के करीब होता।

समझने के ज़्यादा करीब होता। तो फिर इसका दूसरा संभावित आकलन क्या हो सकता है? एनालिटिकल ऑब्ज़र्वेशन ने मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इंडेक्स (IIP) की ग्रोथ को रियल मैन्युफैक्चरिंग GVA की ग्रोथ से जोड़ा है। चूंकि IIP असल में वॉल्यूम मापने वाला एक इंडेक्स है, इसलिए इसका सही एनालिटिकल इक्विवेलेंट कॉन्स्टेंट प्राइस पर मैन्युफैक्चरिंग GVA (ग्रॉस वैल्यू आउटपुट) है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 और 2024-25 में इन दोनों इंडिकेटर्स की एवरेज ग्रोथ लगभग एक जैसी रही। रियल GVA की एवरेज ग्रोथ 6.7 परसेंट और IIP की 6.6 परसेंट रही। इससे पता चलता है कि मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटीज़ को मापने वाले इन दोनों इंडिकेटर्स में बहुत ज़्यादा समानता है। इसलिए, जब हम एक जैसे नेचर के इकोनॉमिक डेटा की तुलना करते हैं, तो दोनों सोर्स से मिले सबूत एक-दूसरे के करीब लगते हैं।

अगर आउटपुट और प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले रॉ मटीरियल की कीमतें लगभग एक ही दिशा में बढ़ रही हैं, तो शॉर्ट टर्म में मैन्युफैक्चरिंग IIP और मैन्युफैक्चरिंग GVA की ग्रोथ की तुलना करना भी सही हो सकता है। लेकिन, IIP और GVA की तुलना करते समय सावधानी बरतने की ज़रूरत है, खासकर तब जब आउटपुट की कीमतें और प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले इनपुट की कीमतें अलग-अलग रेट से बदल रही हों। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर डिफ्लेटर को समझते समय इस अंतर को ध्यान में रखना भी ज़रूरी है। यहाँ समझने वाली एक ज़रूरी बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर प्रोडक्शन इनपुट का एक बड़ा खरीदार और दूसरे सेक्टर को इनपुट का एक बड़ा सप्लायर दोनों है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के कुल आउटपुट का लगभग 81 प्रतिशत इंटरमीडिएट कंजम्पशन – यानी प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले सामान और सर्विस – से आता है, जिससे GVA के तौर पर सिर्फ़ 19 प्रतिशत बचता है। नतीजतन, आउटपुट और इनपुट की कीमतों और मात्रा में छोटे बदलाव भी असल GVA में बहुत ज़्यादा बड़े बदलाव ला सकते हैं।

यह पैटर्न 2024-25 फाइनेंशियल ईयर और 2026-27 की पहली तिमाही दोनों में देखा गया; दोनों समय में, इनपुट की कीमतें आउटपुट की कीमतों से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ीं। इसका नतीजा GVA मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक नेगेटिव इम्प्लिसिट डिफ्लेटर रहा – यह नतीजा न सिर्फ़ स्टैटिस्टिकली मज़बूत है बल्कि आर्थिक रूप से भी सही है। इसके अलावा, लगातार कीमतों पर ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVO) के मुकाबले इंटरमीडिएट कंजम्प्शन का रेश्यो धीरे-धीरे कम हो रहा है, जो पहले के मुकाबले इनपुट इस्तेमाल में ज़्यादा एफिशिएंसी दिखाता है। यह ट्रेंड प्रोडक्ट और फैक्टर मार्केट में चल रहे सुधारों के हिसाब से है।

गलत और गुमराह करने वाले मेथड वाले कमेंट्स

हाल ही में, हमने कुछ एनालिसिस देखे हैं जिनमें 2014 के बाद भारत के इकोनॉमिक परफॉर्मेंस की तुलना कई दूसरे देशों को मिलाकर एक काल्पनिक तुलना करने वाले देश से की गई है। इन देशों की इकोनॉमी ने कथित तौर पर 2014 से पहले भारत की इकोनॉमी के बराबर परफॉर्म किया था। इस हिस्टोरिकल पैरेलल के आधार पर, यह अनुमान लगाने की कोशिश की गई है कि 2014 के बाद से भारत की पर कैपिटा GDP कितनी बढ़ी होगी।

दूसरे रिसर्चर्स के रिसर्च पेपर्स पर आधारित इस स्टडी ने भारत की नेशनल इनकम कैलकुलेट करने के तरीके पर गलत सवाल उठाया है। यह मानता है कि भारत के असल परफॉर्मेंस और काल्पनिक तुलना करने वाले देश के परफॉर्मेंस के बीच का गैप असल में GDP ग्रोथ रेट को कथित तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर बताने की वजह से एक “लोअर बाउंड” है। लेकिन यह साफ तौर पर नहीं बताता कि GDP कैलकुलेट करने के तरीके में गलती कहाँ है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि हम GDP कैलकुलेट करने के तरीके की ठोस, साफ़ और काम की आलोचना का स्वागत करते हैं। ऐसी जांच से मेथडोलॉजी में सुधार और अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। लेकिन गुमराह करने वाले कमेंट और बहुत ज़्यादा बड़े नतीजे ऐसा होने से रोकते हैं। खासकर तब जबइकॉनमी के लगभग सभी बड़े सेक्टर को कवर करने वाले तेज़ी से उपलब्ध हाई-फ़्रीक्वेंसी इकॉनमिक इंडिकेटर भी GDP डेटा में दिखने वाले इकॉनमिक ग्रोथ की रफ़्तार को कन्फ़र्म कर रहे हैं।

(श्री एस. महेंद्र देव और श्री सौरभ गर्ग, क्रम से प्रधानमंत्री की इकॉनमिक एडवाइज़री काउंसिल के चेयरमैन और मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के सेक्रेटरी हैं। MoSPI के इकॉनमिक एडवाइज़र एंटनी साइरिएक के साथ मिलकर लिखा गया है। बताए गए विचार उनके अपने हैं।)

एमएसएमई को मजबूत करने के लिए सुधारों का अगला चरण

संसद के दोनों सदन में हाल ही में पारित किया गया सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास संसोधन विधेयक, 2026 एक बहुत ही महत्वपूर्ण बदलाव है। एमएसएमई राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, एमएसएमई क्षेत्र ने विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। आज ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ पर 9 करोड़ से अधिक एमएसएमई पंजीकृत हैं, जो 40 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। एमएसएमई हमारी आर्थिकी में 31% तथा निर्यात में 50% योगदान देते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में एमएसएमई क्षेत्र की प्रमुख भागीदारी है। एमएसएमई भारत के विकास के सूत्रधार हैं। हाल के वर्षों में एमएसएमई क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है जो ‘उद्यम’ पर पंजीकृत उद्यमों की संख्या से ही स्पष्ट दिखती है, जो 1 अप्रैल 2023 को 1 करोड़ 65 लाख से बढ़कर 9 करोड़ से अधिक हो गए हैं।

वर्ष 2020 में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के वर्गीकरण को, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के बीच के अंतर को समाप्त करके, अधिक व्यापक और समावेशी बनाया गया था। इसके तहत टर्नओवर और निवेश दोनों पर आधारित एक समग्र मानदंड विकसित किया गया।  इसके पश्चात वर्ष 2025 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की निवेश सीमा ढ़ाई गुना बढ़ाकर क्रमश: ढ़ाई करोड़, पच्चीस करोड़ और एक सौ पच्चीस करोड़ की गई है एवं टर्नओवर को दो गुना बढ़ाकर क्रमश: दस करोड़, सौ करोड़ और पांच सौ करोड़ किया गया, जिसने इन उद्यमों को पूंजी निवेश बढ़ाने, विकास और तकनीकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। 

वित्त की उपलब्धता एमएसएमई क्षेत्र के विकास का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। मंत्रालय एमएसएमई क्षेत्र के लिए बैंक ऋण की उपलब्धता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत रहा है और इसके उल्लेखनीय परिणाम दिख रहे हैं। एमएसएमई को प्रदान किया गया बकाया ऋण, वर्ष 2014-15 में 10 लाख करोड़ रुपये था, जो कि अब बढ़कर 38 लाख 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (सीजीटीएमएसई), सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को दिए जाने वाले ऋण पर गारंटी उपलब्ध कराता है। इसके ज़रिए वर्ष 2000 से 2022 के बीच, सूक्ष्म और लघु उद्यमों को दी गई क्रेडिट गारंटी 3 लाख 14 हजार करोड़ रुपये थी, जो पिछले चार वर्षों में अर्थात् 2022-23 से 2025-26 तक बढ़कर 10 लाख 43 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गई। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत, वित्त वर्ष 2014-15 से अब तक लगभग 8 लाख 34 हजार सूक्ष्म उद्यमों को 24 हजार 903 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी सब्सिडी दी गई है, जिससे अनुमानित 75 लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। 

एमएसएमई मंत्रालय की सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए सार्वजनिक खरीद नीति 2012 के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रालय/विभाग/केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (सीपीएसई) के लिए सूक्ष्म और लघु उद्यमों से सालाना 25% खरीद करना अनिवार्य है; इसमें महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाली सूक्ष्म और लघु उद्यमों से 3% और एससी/एसटी उद्यमियों के स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से 4% खरीद शामिल है। विगत वर्षों में सूक्ष्म और लघु उद्यमों से खरीद में लगातार वृद्धि हुई है। वित्तीय-वर्ष 2020-21 में, सूक्ष्म और लघु उद्यमों से सार्वजनिक खरीद का मूल्य 40,717 करोड़ रुपये था जो कि वित्तीय-वर्ष 2025-26 में बढ़कर 1,15,801 करोड़ रुपये हो गया है, जो सीपीएसई द्वारा खरीद के लिए लक्षित 25 प्रतिशत की तुलना में 49 प्रतिशत से अधिक है। इसमें एससी/एसटी उद्यमियों के स्वामित्व वाले उद्यमों से 3,984 करोड़ रुपये की खरीद हुई और महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाली उद्यमों से 9,059 करोड़ रुपये की खरीद हुई है। 

एमएसएमई को उनका भुगतान समय पर दिलाने हेतु मंत्रालय ने कई सार्थक प्रयास किए हैं, ट्रेड्स इनमें से एक है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा विनियमित एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म है, जिसे भारत में एमएसएमई की लिक्विडिटी (नकदी) संबंधी चुनौतियों तथा कार्यशील पूंजी की आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में शुरु किया गया था। ट्रेड्स प्लेटफ़ॉर्म ने एमएसएमई क्षेत्र को मार्च 2026 तक 8,71,000 करोड़ रुपये की इनवॉइस डिसकाउंटिंग के माध्यम से समय पर भुगतान दिलवाया है। ट्रेड्स प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े एमएसएमई की संख्या अप्रैल 2022 में 34,430 थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 2,55,000 से अधिक हो गई है। वहीं, एमएसएमई की इनवॉइस डिसकाउंटिंग की राशि वर्ष 2021-22 में 40,000 करोड़ रुपये से बढ़कर, वित्त वर्ष 2025-26 में 3,47,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। ट्रेड्स पर इनवॉइस डिसकाउंटिंग का बढ़ता चलन, भारत सरकार के एमएसएमई के समयबद्ध भुगतान के प्रति संकल्प को दर्शाता है। 

इसी दिशा में विलंबित भुगतान और उससे जुड़े विवादों के निपटारे हेतु पूरे देश में 161 सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) स्थापित किए गए हैं। संशोधन में राज्यों को एमएसईएफसी की संरचना तय करने के लिए सक्षम बनाने के लिये प्रावधान लाए गए हैं जिससे आवश्यकतानुसार एमएसईएफसी का गठन किया जा सके। संबंधित पक्षों में समझौते के साथ विवाद सामाधान के पर्याप्त उपाय किए गए हैं। यह संशोधन विधेयक ऑनलाइन विवाद समाधान (ओडीआर) को सक्षम एवं सशक्त बनाता है, ताकि संबंधित पक्षों द्वारा अपने विवादों का समयबद्ध और किफायती तरीके से हल सुनिश्चित किया जा सके।

एमएसएमई मंत्रालय महिला उद्यमियों के विकास को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। मंत्रालय की अनेक योजनाओं में महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान है। आज उद्यम पोर्टल पर 39% से अधिक एमएसएमई महिलाओं के स्वामित्व में हैं, यानि 3.38 करोड़ के लगभग  एमएसएमई महिला स्वामित्व में हैं और जिनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।  क्रेडिट गारंटी योजना के तहत, महिलाओं के लिए 90% तक गारंटी कवरेज है और सालाना गारंटी फीस में 10% तक की छूट प्रदान की जाती है। खरीद और विपणन सहायता योजना के तहत ट्रेड फेयर में महिला उद्यमियों की भागीदारी पर 100% सब्सिडी दी जाती है, जबकि दूसरे उद्यमियों के लिए यह 80% है।  पीएमईजीपी में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को 35 प्रतिशत व शहरी क्षेत्र की महिलाओं को 25 प्रतिशत की सब्सिडी देने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति का विकास, मंत्रालय की प्राथमिकता है। आज उद्यम पर 1.24 करोड़  से अधिक एमएसएमई, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति  के उद्यमी के स्वामित्व में हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब योजना, एमएसएमई मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसे 2016 में माननीय प्रधानमंत्री ने शुरू किया था। इस योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति  के उद्यमियों की क्षमता बढ़ाना और उनके बीच “उद्यमिता संस्कृति” को बढ़ावा देना है। 

मंत्रालय की इन निरंतर पहलों और प्रयासों को और सशक्त बनाने के लिए एमएसएमई विकास संशोधन विधेयक, 2026 पास किया गया है। इसका उद्देश्य है—एमएसएमई क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों का समाधान करना, प्रशासनिक ढांचे में सुधार करना, व्यापार करने में सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) और नियमों का अनुपालन करने को बढ़ावा देना। इसके मुख्य घटक हैं:

  1. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमो के निःशुल्क एवं स्वैच्छिक रजिस्ट्रेशन के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को अधिसूचित करने की व्यवस्था करना। टर्नओवर और निवेश आधारित एमएसएमई वर्गीकरण को वैधानिक रूप देना।
  2. एमएसएमई की लिक्विडिटी (नकदी) से जुड़ी समस्याओं को हल करना। सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे एमएसएमई से खरीद के लिए इनवॉइस का निपटान ट्रेड्स के ज़रिए करें। साथ ही, राज्य सरकारों को भी अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए इसी प्रकार के प्रावधान अपनाने हेतु सशक्त किया गया है;
  3. राज्य सरकारों को सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) की संरचना को युक्तिसंगत बनाकर और अधिक एमएसईएफसी की स्थापना करने की सुविधा प्रदान करना;
  4. सूक्ष्म और लघु उद्यमो के पेमेंट में देरी से जुड़े विवादों के तेज़ी से निपटारे के लिए समय-सीमा तय करना;
  5. मध्यस्थता से हुए समझौते या आरबिट्रल अवॉर्ड की वसूली ‘भूमि राजस्व के बकाया’  के रूप में वसूलने की व्यवस्था करना;
  6. अगर डिक्री, अवॉर्ड या आदेश को रद्द करने का आवेदन छह महीने से अधिक समय से लंबित है, तो अदालतों को यह आदेश देने का अधिकार देना कि सूक्ष्म और लघु उद्यम सप्लायर्स को अवॉर्ड की गई राशि का कम से कम पचास प्रतिशत भुगतान किया जाए;
  7. कुछ प्रावधानों के उल्लंघन को अपराध की श्रेणी से हटाना (डिक्रिमिनलाइज़ करना) और दोषसिद्धि-आधारित जुर्माने की जगह अलग-अलग स्तर के दंड लागू करना, जिसमें पहली बार उल्लंघन पर चेतावनी देना भी शामिल है।

यह संशोधन हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श और संबंधित मुद्दों की सावधानीपूर्वक जांच के बाद किया गया है। समावेशी, टिकाऊ और रोज़गार-प्रधान आर्थिक विकास हासिल करने के लिए एक मज़बूत एमएसएमई सेक्टर ज़रूरी है। ये संशोधन ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप हैं। इस से उद्यमों के औपचारिकीकरण को बढ़ावा मिलेगा, उनके विस्तार का मार्ग प्रशस्त होगा और वे विकास के ‘चैंपियन’ बन सकेंगे।

(लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।)

नए भारत के दिल की धड़कनों में बसते हैं बिरसा : रंजना चोपड़ा

भारत जब अपने स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों को याद करता है तब छोटानागपुर के जंगलों से एक नाम अपनी दृढ़ नैतिक ताकत के साथ उभरता है। यह नाम भगवान बिरसा मुंडा का है जिन्हें ‘धरती आबा’ यानी भूमि के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। वह एक ऐतिहासिक हस्ती से आगे बढ़ कर गरिमा, प्रतिरोध और जनजातीय आत्मसम्मान के जीवंत प्रतीक भी हैं। उनकी सोच थी कि जनजातीय पहचान की रक्षा की जाए, समानता सार्थक हो और विकास आम जन तक न्याय के साथ पहुंचे। उनका यह सिद्धांत अब भी विकसित भारत की ओर देश की यात्रा को निर्देशित करता है। राष्ट्र ने पिछले 12 वर्षों में समावेशी विकास पर नए सिरे से बल दिया है। बिरसा मुंडा के सिद्धांत आज भी नए भारत की नीतियों, शासन और आकांक्षाओं को आकार दे रहे हैं। 

विरासत को मिला उसका सही स्थान

भगवान बिरसा मुंडा की विरासत देश भर में जनजातीय समुदायों के गीतों, आख्यानों, सामूहिक यादों में लंबे समय से जिंदा है। माननीय प्रधानमंत्री ने 2021 में बिरसा मुंडा के जन्म दिवस 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित कर उनकी विरासत को राष्ट्रीय मान्यता दी। इस मान्यता को और गहराई देते हुए बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर 15 नवंबर 2024 से 15 नवंबर 2025 तक जनजातीय गौरव वर्ष मनाया गया। इस दौरान जनजातीय गौरव और विरासत के जश्न में समूचे राष्ट्र में 2 लाख से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनकी पहुंच 3 करोड़ से अधिक नागरिकों तक रही।

देश भर में, इन आयोजनों ने जनजातीय जीवन की समृद्धि और विविधता को प्रदर्शित किया। नागालैंड के हॉर्नबिल महोत्सव और केरल के जनजातीय साहित्यिक महोत्सव से लेकर, झारखंड के राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म महोत्सव और तेलंगाना की ‘कैनो स्प्रिंट चैम्पियनशिप’ (डोंगी चालन प्रतियोगिता) तक, इन कार्यक्रमों ने जनजातीय संस्कृति, रचनात्मकता, खेल और लोककथाओं को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा किया। कुल मिलाकर, इनमें अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 लाख से अधिक जनजातीय नागरिकों की भागीदारी देखी गई। ये आयोजन इस बात की घोषणा थे कि आधुनिक भारत को आकार देने में जनजातीय विरासत एक जीवंत और सक्रिय शक्ति है।

जनजातीय सशक्तिकरण और समावेशन की दिशा में पिछले बारह वर्षों के निरंतर और केंद्रित राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, ‘जनजातीय गरिमा उत्सव 2026’ इस गति को चार विषयगत सप्ताहों के माध्यम से आगे ले जा रहा है, जो मिलकर जनजातीय विकास के संपूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। विशेष रूप से इसका तीसरा सप्ताह भारत के भविष्य से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न पर केंद्रित है: हम उन व्यक्तियों और समुदायों को कैसे पहचानें जिन्होंने इस राष्ट्र को आकार दिया और हम आने वाली पीढ़ी को उस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कैसे सशक्त बनाएं?

इतिहास में विस्मृत नामों की पुनर्स्थापना

इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की शुरुआत उन अनेक जनजातीय नायकों को पहचान देने से होती है, जिनका योगदान बहुत लंबे समय तक मुख्यधारा के ऐतिहासिक आख्यानों से गायब रहा। देश के जनजातीय क्षेत्रों में, शिक्षकों, कलाकारों, पारंपरिक चिकित्सकों और समाज सुधारकों की पीढ़ियों ने इन समुदायों को संजो कर रखा है और उनकी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है। उनकी कहानियाँ भारत की राष्ट्रीय स्मृति में एक सही और न्यायसंगत स्थान की हकदार हैं और उनके  इन योगदानों को दस्तावेजों में दर्ज करने तथा उन्हें याद रखने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

देश भर के जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) मौखिक इतिहास का  दस्तावेजीकरण करने, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को रिकॉर्ड करने और जनजातीय भाषाओं व सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने के प्रयास में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में, 26 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के 29 जनजातीय अनुसंधान संस्थान इस कार्य में जुटे हुए हैं, जिसके तहत 222 जनजातीय भाषाओं में 355 का प्रारंभिक दस्तावेजीकरण किया जा चुका है। ये प्रयास भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य सांस्कृतिक ज्ञान को संजोकर रखने में मदद कर रहे हैं।

राष्ट्रीय विमर्श में जनजातीय आवाज़ों को फिर से स्थापित करने का प्रयास ‘जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों’ के माध्यम से भी आकार ले रहा है, जिनकी परिकल्पना स्मृति और पहचान के स्थलों के रूप में की गई है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जनजातीय समुदायों की भूमिका को सम्मानित करने के लिए 10 राज्यों में ऐसे 11 संग्रहालयों को मंज़ूरी दी है। इनमें से चार संग्रहालयों का उद्घाटन पहले ही किया जा चुका है, जिनमें रांची में भगवान बिरसा मुंडा और नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह को समर्पित संग्रहालय शामिल हैं। इन संस्थानों के जरिए जनजातीय वीरों की गाथाओं के दस्तावेजीकरण और उन पर आधारित कार्यक्रमों के आयोजन से इन्हें भारत की सामूहिक ऐतिहासिक याद में स्थाई रूप से पिरोया जा रहा है।

मशाल थामने वालों को सशक्तिकरण 

अतीत को सम्मानित करने के साथ ही, यह यात्रा स्वाभाविक रूप से वर्तमान पीढ़ी को सशक्त बनाने की ओर बढ़ती है। यह बदलाव उन जनजातीय छात्रों की बढ़ती संख्या में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिन्हें मंत्रालय के छात्रवृत्ति कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है। अकेले चालू वर्ष में ही, पांच छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 26,01,979 जनजातीय छात्रों को सहायता प्रदान की गई है, जिसके लिए कुल 3825.54 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। इनमें से कई छात्र अपने परिवारों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति हैं, जो न केवल अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को, बल्कि पूरे समुदाय की आशाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। विशेष बात यह है कि वर्तमान छात्रवृत्ति लाभार्थियों में से 56% से अधिक महिलाएं हैं।

एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) का विस्तार भी शिक्षा तक पहुँच और अवसरों के प्रति इसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। स्वीकृत ईएमआरएस संस्थानों की संख्या वर्ष 2013-14 के 167 से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 723 हो गई है, जो 330% से अधिक की वृद्धि है – जबकि इसी अवधि के दौरान पहले से चल रहे स्कूलों की संख्या 123 से बढ़कर 499 हो गई है। छात्रों के नामांकन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो 0.34 लाख से बढ़कर 1.56 लाख छात्र हो गई है। जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करके, ईएमआरएस संस्थान मजबूत शैक्षिक नींव तैयार करने और देश भर के जनजातीय बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं।

ये आंकड़े केवल योजनाओं के विस्तार को ही नहीं दर्शाते; बल्कि ये एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। छात्रवृत्तियाँ और फेलोशिप वास्तव में आत्मविश्वास, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में किया जाने वाला निवेश हैं। हमारी प्रतिबद्धता अडिग है: किसी भी आदिवासी छात्र को भौगोलिक स्थिति, पृष्ठभूमि या शिक्षण संस्थानों तक सीमित पहुँच के कारण अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

महिला सशक्तिकरण की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति

शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस बदलाव के साथ-साथ, जनजातीय महिलाओं के नेतृत्व में भी जमीनी स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। पीढ़ियों से, जनजातीय महिलाएं अपनी संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और सामुदायिक जीवन की मूक संरक्षक रही हैं – वे परिवारों और परंपराओं को सहेजती आई हैं। भारत में लगभग 5.20 करोड़ जनजातीय महिलाएं हैं, जो कुल जनजातीय आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। समावेशी विकास में उनका नेतृत्व अब मुख्य भूमिका निभा रहा है।

वर्तमान में, 4,712 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से 3,365 कार्यरत हैं। इनसे 12.9 लाख से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं और इन लाभार्थियों में आधे से अधिक संख्या महिलाओं की है। ये प्रयास एक ओर जहाँ जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनजातीय महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

आगे बढ़ती हुई विरासत 

समारोह, स्मरण, शिक्षा और महिला नेतृत्व मिलकर एक बड़ी और निरंतर आगे बढ़ने वाली कहानी का हिस्सा बनते हैं—एक ऐसी कहानी, जिसमें जनजातीय समुदाय आत्मविश्वास और सम्मान के साथ भारत के भविष्य को नया आकार दे रहे हैं। ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ और ‘प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महा अभियान’  जैसी पहलों के माध्यम से, समन्वय और सहयोग के नए प्रतिमान के ज़रिए जमीनी स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। जनजातीय विद्वानों का उभरना, गुमनाम नायकों की पहचान और जनजातीय महिलाओं का बढ़ता नेतृत्व, यह सब मिलकर इस बात को दर्शाता है कि भगवान बिरसा मुंडा की विरासत आज के आधुनिक भारत में भी जीवंत है।

आज, भारत के 10.5 करोड़ से भी ज़्यादा आदिवासी नागरिक, देश की कहानी का एक सबसे प्रभावशाली और प्रगतिशील अध्याय हैं। वे राष्ट्रीय प्रगति के हाशिए पर नहीं हैं, बल्कि ‘विकसित भारत’ के संकल्प में सबसे मजबूत योगदान देने वालों में से हैं — जहाँ विद्वान नए कीर्तिमान रच रहे हैं, महिलाएँ नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ रही हैं और गुमनाम नायकों को आखिरकार राष्ट्रीय पहचान मिल रही है। इस यात्रा में, ‘धरती आबा’ की विरासत आगे बढ़ रही है।

पीएम स्वनिधि योजना: स्ट्रीट वेंडर्स के एम्पावरमेंट और फाइनेंशियल इनक्लूजन के लिए एक ट्रांसफॉर्मेटिव टूलम

मनोहर लाल / विद्युत मंत्री

भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2050 तक देश की लगभग 50% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी। अभी, लगभग 66% शहरी वर्कफ़ोर्स इनफ़ॉर्मल सेक्टर में शामिल है, जो शहरी अर्थव्यवस्था का एक अहम पिलर है। इस इनफ़ॉर्मल सेक्टर में स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका खास तौर पर खास है। ये लाखों वेंडर्स जो फल, सब्ज़ी, चाय, नाश्ता, कपड़े और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतें देते हैं, न सिर्फ़ करोड़ों नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत करते हैं। इसके बावजूद, फ़ॉर्मल बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच लंबे समय तक सीमित रही। क्रेडिट हिस्ट्री न होने की वजह से, उन्हें अक्सर ज़्यादा ब्याज़ दरों पर इनफ़ॉर्मल लोन लेना पड़ता था, जिससे उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने में खर्च हो जाता था।

भारतीय स्ट्रीट वेंडर्स बदलते ग्लोबल हालात और अलग-अलग आर्थिक रुकावटों के बीच भी अपनी हिम्मत और मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। PM SWANIDHI ने इस एंटरप्रेन्योरशिप की भावना को नई एनर्जी दी है। यह सिर्फ़ क्रेडिट देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, पहचान और नए मौकों का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है।

इस स्कीम की सफलता का मुख्य आधार “होल ऑफ़ गवर्नमेंट अप्रोच” रहा है, जिसमें केंद्र, राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और बैंकिंग संस्थानों के मिलकर किए गए प्रयासों ने इसे पूरे देश में अभूतपूर्व तरीके से आगे बढ़ाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं।

इस स्कीम के तहत, लाखों वेंडर्स के बैंक अकाउंट एक्टिवेट किए गए, उनके फाइनेंशियल व्यवहार को रिकॉर्ड किया जाने लगा और पहली बार, उनके लिए एक फॉर्मल क्रेडिट हिस्ट्री बनाई गई। इससे उन्हें भविष्य में ज़्यादा लोन और फाइनेंशियल सर्विस मिलना आसान हो गया है और वे आज बैंक के सम्मानित ग्राहक और उद्यमी बनकर उभरे हैं।

इस स्कीम का एक और ज़रूरी पहलू डिजिटल एम्पावरमेंट है। UPI और QR-कोड आधारित पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कैशबैक इंसेंटिव दिए गए हैं। इस पहल ने अब तक 55 लाख वेंडर्स को डिजिटल इकॉनमी से जोड़ा है, उनके लेन-देन को ट्रांसपेरेंट बनाया है और उनकी फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी को मज़बूत किया है। स्कीम का विज़न सिर्फ़ बिज़नेस तक ही सीमित नहीं रहा है। ‘स्वनिधि से समृद्धि’ पहल के ज़रिए, बेनिफिशियरीज़ और उनके परिवारों को भारत सरकार की आठ बड़ी वेलफेयर स्कीम्स से जोड़ा गया है। अब तक इन स्कीम के तहत 50 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है और 1.52 करोड़ से ज़्यादा लोगों को फ़ायदे दिए जा चुके हैं। पेंशन, इंश्योरेंस, हेल्थ सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी जैसी सुविधाओं तक पहुँच देकर, यह पहल स्ट्रीट वेंडर्स और उनके परिवारों के लिए एक बड़े सोशल सिक्योरिटी सिस्टम का ज़रिया बन गई है। इसके अलावा, FSSAI के साथ मिलकर फ़ूड सेफ्टी और हाइजीन पर ट्रेनिंग भी दी गई है, जिससे खास तौर पर स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स की क्वालिटी, हाइजीन और कस्टमर का भरोसा बढ़ा है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इस स्कीम का योगदान काफ़ी सराहनीय रहा है। कुल बेनिफिशियरीज़ में से लगभग 46% महिलाएँ हैं। इससे उनकी इनकम, सामाजिक इज़्ज़त और परिवार के फ़ैसलों में हिस्सेदारी बढ़ी है। साल 2023 और 2025 में किए गए इंडिपेंडेंट इम्पैक्ट असेसमेंट ने भी इस स्कीम के दूरगामी असर की पुष्टि की है। लगभग 95% बेनिफिशियरीज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार फ़ॉर्मल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से लोन लिया है, जो फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इतना ही नहीं, लगभग 30% बेनिफिशियरी PM SWANIDHI से आगे बढ़कर दूसरे फॉर्मल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से लोन भी ले पाए हैं, जो उनके बढ़ते फाइनेंशियल कॉन्फिडेंस और मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल का सबूत है। इस स्कीम के बेनिफिशियरी की इनकम में सालाना लगभग 20% की एवरेज ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके साथ ही, हाउसिंग, न्यूट्रिशन, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन जैसे एरिया में भी सुधार देखा गया है। 2023 और 2025 के बीच UPI बेस्ड ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल लगभग 45% से बढ़कर 83% हो गया है। स्कीम के बड़े पैमाने पर और पॉजिटिव असर को देखते हुए, अगस्त 2025 में, केंद्रीय मंत्रालय ने इसके रीस्ट्रक्चर्ड फॉर्म को मार्च 2030 तक बढ़ाने की मंजूरी दी। रीस्ट्रक्चर्ड स्कीम के तहत, स्ट्रीट वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी गई है और स्कीम का दायरा अर्बन लोकल बॉडीज से आगे बढ़ाकर सेंसस टाउन्स/पेरी अर्बन तक कर दिया गया है। इसके साथ ही, कैपेसिटी बिल्डिंग पर खास जोर दिया जा रहा है ताकि स्ट्रीट वेंडर्स बदलती इकोनॉमिक जरूरतों के हिसाब से अपने बिजनेस को और मजबूत कर सकें। SWANIDHI क्रेडिट कार्ड की शुरुआत भी इसी कड़ी में एक अहम कदम है। यह सुविधा स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी तुरंत की फाइनेंशियल और पर्सनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म बिना ब्याज का क्रेडिट देती है। हालांकि PM SWANIDHI योजना ने स्ट्रीट वेंडर्स को फाइनेंशियल ताकत दी है, लेकिन आज कई जगहों पर उन्हें शहर की प्लानिंग के स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें प्लान्ड वेंडिंग जगहों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कोई तय जगह न होने की वजह से उनकी रोजी-रोटी और ग्राहकों तक पहुंच पर असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए, आने वाले सालों में राज्य सरकारों और शहरी लोकल बॉडीज़ को स्ट्रीट वेंडर्स को शहरी प्लानिंग के फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में एक छोटी सी पहल – स्ट्रीट फूड हब के ज़रिए, उन्हें सुविधाजनक और ऑर्गनाइज़्ड कमर्शियल जगहें उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे

भारत और ओमान द्वारा एक नए आर्थिक गलियारे को गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और ओमान के बीच वाणिज्यिक रिश्ते सदियों से चलते आ रहे हैं। दोनों देशों का एक साझा इतिहास प्राचीन नावों के पाल पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा है और पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए कायम रहा है। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) इस सभ्यतागत बंधन को और मजबूत करता है। एक ऐसे दौर में जब वैश्विक व्यापार भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद से जूझ रहा है, यह समझौता भरोसेमंद साझेदारों के साथ आर्थिक जुड़ाव को गहरा करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वर्ष 2022 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद, यह सीईपीए खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को मजबूती से स्थापित करता है। 

द्विपक्षीय व्यापार में लगातार विस्तार हुआ है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह 11.18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि, सेवाओं का व्यापार 2024 में 863 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। आर्थिक रिश्तों का विविधीकरण हुआ है और इसमें परंपरागत वस्तुओं से परे इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का समावेश हुआ है। फिर भी, काफी अनछुई संभावनाएं अभी भी बाकी हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवर आवाजाही और नियामकीय सहयोग को शामिल करके, यह सीईपीए अधिक सुदृढ़, समन्वित और व्यापक आर्थिक साझेदारी का एक व्यापक ढांचा तैयार करता है।

भारतीय निर्यात के विकास का प्रवेश द्वार

इस सीईपीए के तहत ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच हासिल है। इस समझौते से पहले, भारत के निर्यात का सिर्फ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ही सर्वाधिक तरजीह वाले देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की व्यवस्था के तहत ओमान में शुल्क-मुक्त प्रवेश करता था, जबकि शेष पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। इस सीईपीए के तहत, भारत के वर्तमान निर्यात की 99.38 प्रतिशत मात्रा अब शुल्क-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाएगी।

भारतीय निर्यातकों की दृष्टि से, ये लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं। ओमान के ‘विजन 2040’ के तहत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विविधीकरण में उसके द्वारा किए जा रहे निवेश से मांग में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में 875.83 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात के 2030 तक बढ़कर 1.3 से 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होने का अनुमान है। शून्य शुल्क की सुविधा के जरिए वस्त्र एवं परिधान सेक्टर को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। इससे तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी और साथ ही रोजगार भी सृजित होगा।

मौके व्यापक और विविध हैं। आयात पर निर्भर ओमान का दवा बाजार भारतीय कंपनियों के लिए मजबूत संभावनाएं पेश करता है। नियामकीय मंजूरियों में तेजी, गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की मान्यता और प्रमुख उत्पादों के शुल्क-मुक्त पहुंच से अनुपालन संबंधी लागत में कमी आएगी और बाजार में पैठ बढ़ेगी। चावल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और कन्फेक्शनरी सहित कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण आधारित निर्यात को भी लाभ होगा।

खुलते बाजार, हितों का संरक्षण

भारत के हालिया व्यापार समझौतों के अनुरूप, इस सीईपीए में एक संतुलित और सुविचारित दृष्टिकोण का समावेश है। जहां एक ओर भारत प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने एवं वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में शामिल होने के लिए बाजारों को खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहा है। दुग्ध तथा अनाज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के साथ-साथ रबर, वस्त्र और जूते जैसे उद्योग सुरक्षित बने हुए हैं। यह दृष्टिकोण बाहरी बाजारों तक पहुंच  और घरेलू कमजोरियों से बचाव को एक साथ जोड़ता है।

भारत ने ओमान से आयात होने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर लागू होने वाली अपनी 77 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों को उदार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे ओमान के प्रमुख निर्यातों, खासकर मेथनॉल और निर्जल अमोनिया जैसे औद्योगिक इनपुट को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। ओमान को धातुओं और मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला में तरजीही बाजार पहुंच हासिल होगी। इससे हमारे दोनों देशों को कम उत्पादन लागत का लाभ उठाने में मदद मिलेगी।

जिन क्षेत्रों में भारत के रक्षात्मक हित हैं, उन क्षेत्रों में टैरिफ दर कोटा (टीआरक्यू) के जरिए  ओमान को पहुंच प्रदान की गई है। यह व्यवस्था निर्दिष्ट मात्रा की सीमा के भीतर खजूर, संगमरमर और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल जैसे उत्पादों के तरजीही निर्यात की अनुमति देती है। बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जुड़ाव का यह तरीका प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ-साथ संक्रमण काल ​​के दौरान कमजोर क्षेत्रों को सहायता भी प्रदान करता है।

व्यापार, प्रतिभा और विश्वास

यह सीईपीए भारतीय सेवा प्रदाताओं को उन सभी क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं प्रदान करता है, जहां भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत है। इनमें आईटी, पेशेवर सेवाएं और निर्माण क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले प्रावधानों के साथ, भारतीय कंपनियों को ओमान में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने के अधिक मौके मिलेंगे।

प्रतिभाओं की दृष्टि से भी, यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। कंपनी के भीतर स्थानांतरित कर्मचारियों (इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी) की सीमा को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर, भारतीय कंपनियों को अब विशिष्टता प्राप्त कर्मचारियों को आसानी से तैनात करने तथा बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने की सुविधा मिल गई है। इसके अलावा, किसी भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में पहली बार, ओमान ने स्वतंत्र पेशेवरों के लिए एक समर्पित आवाजाही की व्यवस्था स्थापित की है। अब जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कारखानों में श्रमिकों की कमी हो रही है और आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर एआई एवं रोबोटिक्स के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में यह प्रावधान भारतीय प्रतिभाओं के लिए दुनिया भर में एक सशक्त मिसाल कायम करता है।

इस सीईपीए में समर्पित स्वास्थ्य सेवा का एक परिशिष्ट भी शामिल है, जो आयुर्वेद जैसी पारंपरिक प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में शामिल करने में सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, यह चिकित्सा पेशेवरों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित करता है। इसके अलावा, एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा समझौते से संबंधित बातचीत से भविष्य में भारतीय प्रवासी समुदाय को दोहरे योगदान के बोझ से बचाया जा सकेगा।

क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण

भारत-ओमान सीईपीए नियामकीय सहयोग, सामंजस्यपूर्ण मानकों और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करके टैरिफ से परे जाता है। यह भारत के आधुनिक व्यापार समझौतों से जुड़े उच्च मानकों को दर्शाता है और सीमा के भीतर मौजूद वाणिज्य में रुकावट डालने वाली विभिन्न बाधाओं को दूर करता है।

भारत एक बेहद ही एकीकृत क्षेत्रीय व्यापार संरचना की नींव रख रहा है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़े सभी साझेदार मिलकर अब वैश्विक जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत और वस्तुओं एवं सेवाओं के वैश्विक आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित, ओमान को एक अनूठी भौगोलिक हैसियत हासिल है। सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमान के लॉजिस्टिक्स व औद्योगिक केन्द्र भारत की मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी विशेषज्ञता एवं प्रतिभाओं को व्यापक मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ जोड़कर मूल्य श्रृंखलाओं को एकीकृत कर सकते हैं। इसका परिणाम क्षेत्रीय संपर्क और विकास के लिए निर्मित एक साझेदारी के रूप में सामने होगा।

व्यापार समझौते तभी सफल होते हैं जब वे भरोसा पैदा करते हैं, व्यवसायों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं और अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी साझेदारी बनाने के लिए आगे बढ़ाते हैं। यह सीईपीए ठीक यही काम कर रहा है। यह सदियों पुराने रिश्ते को इक्कीसवीं सदी की हकीकतों के अनुरूप एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में परिवर्तित कर रहा है।  

भारत ने श्रमिकों, किसानों, MSME के लिए खाड़ी देश में अवसरों के द्वार खोले

दिल्ली / सत्ता संदेश

1 जून से लागू हो रहा भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस मिशन की एक निर्णायक उपलब्धि है, जिसका लक्ष्य नए बाजार खोलने और रोजगार सृजन को गति देने के जरिये भारत के छात्रों, कारीगरों, महिलाओं, किसानों, मछुआरों और एमएसएमई के लिए वैश्विक समृद्धि के मार्ग बनाना है।         

भारत और ओमान के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं और लोगों के आपसी संबंध प्रगाढ़ हैं। ओमान में लगभग 7 लाख भारतीय रहते हैं, जिनमें वे व्यापारी परिवार भी शामिल हैं, जिनकी जड़ें 200–300 साल पुरानी हैं। ओमान से भारत को भेजी जाने वाली वार्षिक धनराशि लगभग 2 बिलियन डॉलर है, जबकि देश में 6,000 से अधिक भारतीय उद्यम कार्यरत हैं। 

दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ करता है। यह तुरंत ही ओमान में 98% टैरिफ लाइनों के लिए 100 प्रतिशत शुल्क मुक्त बाजार पहुंच की सुविधा देता है, जिसमें 99.38 प्रतिशत निर्यात शामिल है।

यह सीईपीए से पहले की प्रणाली की तुलना में एक उल्लेखनीय सुधार को दर्शाता है। पहले की प्रणाली में केवल 15.3 प्रतिशत भारतीय निर्यात ओमान में शून्य शुल्क के साथ प्रवेश कर सकते थे। भारत की ऐसी वस्तुएं, जिन पर वर्तमान में ओमान में 5 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है और जिनकी कीमत लगभग 3.64 बिलियन डॉलर के निर्यात के बराबर है, अब काफी अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी।

भारत के एमएसएमई क्षेत्र के लिए, यह समझौता परिवर्तनकारी हो सकता है, क्योंकि सीईपीए से लाभान्वित होने वाले कई क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों की प्रमुखता है। लोहा और इस्पात, वस्त्र, चमड़ा, वाहन कल-पुर्जे और औद्योगिक उपकरण जैसे कुछ क्षेत्रों में एमएसएमई को बड़े अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिससे उत्पादन, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

बढ़ती वैश्विक अस्थिरता के युग में, सीईपीए भारतीय निर्यातकों को, जो आर्थिक मंदी और बढ़ते व्यापार बाधाओं का सामना कर रहे हैं, अपने बाजारों को विविध बनाने और परंपरागत बाजारों पर निर्भरता कम करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

रोज़गार सृजन – यह व्यापार समझौता श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, खाद्य प्रसंस्करण, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लाभ पहुँचाता है, जो भारत के प्रमुख रोजगार प्रदाता हैं।

ओमान को होने वाले वस्त्र निर्यात में वृद्धि से उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, पानीपत, कोयंबटूर, करूर, भदोही, मुरादाबाद, जयपुर और अहमदाबाद जैसे प्रमुख क्लस्टर में रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। भारत भर के कारीगर और बुनकर भी अपने उत्पादों की उच्च अंतरराष्ट्रीय मांग से लाभान्वित होंगे।

भारत भर में, विशेष रूप से तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में, साथ ही महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों समेत चमड़ा और जूता के प्रमुख केंद्रों में भी रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

रत्न और आभूषण क्षेत्र एक अन्य उदाहरण है, जो दिखाता है कि सीईपीए रोजगार वृद्धि को किस प्रकार तेज करेगा। भारत के पास पहले से ही कटे और पॉलिश किए हुए हीरे, सोने और चांदी के आभूषण तथा हस्तनिर्मित आभूषण उत्पादन में मजबूत क्षमताएं हैं। शुल्क बाधाओं के हटने से, भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय और एशियाई प्रतिस्पर्धियों पर निर्णायक बढ़त मिलेगी। उद्योग जगत का अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में ओमान को होने वाला निर्यात बढ़ कर 150 मिलियन डॉलर तक हो सकता है। इससे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के आभूषण निर्माण केन्द्रों में महत्वपूर्ण रोजगार संभावनाएं सृजित होने की उम्मीद है।

किसान और मछुआरे – घरेलू किसानों और संवेदनशील कृषि हितों की सुरक्षा के लिए, भारत ने गेहूं, चावल, मक्का, मोटे अनाज, डेयरी, फल, सब्जियां, खाद्य तेल, तिलहन, चाय, कॉफी और शहद जैसे प्रमुख उत्पादों पर कोई टैरीफ छूट नहीं दी है।

घी, शहद, मीठे बिस्कुट, अंडे और कुछ मिष्ठान्न उत्पादों में भारत को प्रतिद्वंद्वियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा, जिससे देश के कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और ग्रामीण आय में वृद्धि होगी।

यह समझौता भारत के राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) प्रमाणन की स्वीकृति और मान्यता भी प्रदान करता है, जो भारतीय किसानों को ओमान में, जो एक प्रमुख खाद्य आयातक है, जैविक उत्पाद बेचने के लिए विशाल अवसर देगा।

समुद्री उत्पादों में भी विशाल संभावनाएँ हैं, जिनका अब तक उपयोग नहीं हो पाया है। 2022 और 2024 के बीच ओमान का समुद्री उत्पादों का आयात लगभग 119 मिलियन डॉलर था। भारत से आयात केवल 7.75 मिलियन डॉलर था, जिससे भारतीय समुद्री खाद्य निर्यात जैसे झींगा और जमे हुए कटलफिश के लिए विशाल अवसर मौजूद हैं। श्रम-गहन समुद्री उत्पाद उद्योग मछली पकड़ने, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, शीत-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स और निर्यात संचालन में अतिरिक्त नौकरियाँ उत्पन्न कर सकता है।  

दवा और पारंपरिक चिकित्सा – यूएसएफडीए, ईएमए, यूके एमएचआरए और टीजीए जैसे नियामकों द्वारा अनुमोदित भारतीय दवाएं 90 दिनों के भीतर ओमान में स्वचालित विपणन प्राधिकार प्राप्त करेंगी — जो भारतीय फार्मा निर्यातकों के लिए एक बड़ी सफलता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि सीईपीए भारत की पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं के लिए अवसर पैदा करता है। यह पारंपरिक चिकित्सा में संयुक्त अनुसंधान की व्यवस्था करता है।  

सेवाएँ और आवागमन – समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू सेवा और आवागमन में निहित है। ओमान ने भारत के लिए विशिष्ट निर्यात क्षेत्रों में व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की है, जिनमें पेशेवर सेवाएँ, कंप्यूटर और आईटी सेवाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन, अनुसंधान और विकास तथा पर्यावरण सेवाएँ शामिल हैं। लेखा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, निर्माण, शिक्षा और परामर्श जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों को बेहतर बाज़ार पहुँच से लाभ मिलने की उम्मीद है।  

महत्त्वपूर्ण रूप से, ओमान ने भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों के लिए आवागमन प्रतिबद्धताओं में वृद्धि पर सहमति व्यक्त की है। अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों और संविदा सेवा प्रदाताओं को चार साल तक रहने की अनुमति दी जाएगी, जबकि व्यवसाय आगंतुकों और स्वतंत्र पेशेवरों को आसान अस्थायी प्रवेश की सुविधा मिलेगी। इसने अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों के लिए ऊपरी-सीमा को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है।

विकसित देशों के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की मोदी सरकार की पहल  प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाने के प्रधानमंत्री के मिशन का हिस्सा है।

ओमान के साथ समझौता याद दिलाता है कि व्यापार; विकास, रोजगार सृजन और साझा समृद्धि का एक शक्तिशाली उपकरण है। एक विभाजित और संरक्षणवादी दुनिया में, पीएम मोदी स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि एक नया, आत्मविश्वासी भारत पीछे नहीं हटेगा। यह साझेदारियों, प्रतिस्पर्धा और वैश्विक सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ेगा।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं।)