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पीएम स्वनिधि योजना: स्ट्रीट वेंडर्स के एम्पावरमेंट और फाइनेंशियल इनक्लूजन के लिए एक ट्रांसफॉर्मेटिव टूलम

मनोहर लाल / विद्युत मंत्री

भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2050 तक देश की लगभग 50% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी। अभी, लगभग 66% शहरी वर्कफ़ोर्स इनफ़ॉर्मल सेक्टर में शामिल है, जो शहरी अर्थव्यवस्था का एक अहम पिलर है। इस इनफ़ॉर्मल सेक्टर में स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका खास तौर पर खास है। ये लाखों वेंडर्स जो फल, सब्ज़ी, चाय, नाश्ता, कपड़े और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतें देते हैं, न सिर्फ़ करोड़ों नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत करते हैं। इसके बावजूद, फ़ॉर्मल बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच लंबे समय तक सीमित रही। क्रेडिट हिस्ट्री न होने की वजह से, उन्हें अक्सर ज़्यादा ब्याज़ दरों पर इनफ़ॉर्मल लोन लेना पड़ता था, जिससे उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने में खर्च हो जाता था।

भारतीय स्ट्रीट वेंडर्स बदलते ग्लोबल हालात और अलग-अलग आर्थिक रुकावटों के बीच भी अपनी हिम्मत और मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। PM SWANIDHI ने इस एंटरप्रेन्योरशिप की भावना को नई एनर्जी दी है। यह सिर्फ़ क्रेडिट देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, पहचान और नए मौकों का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है।

इस स्कीम की सफलता का मुख्य आधार “होल ऑफ़ गवर्नमेंट अप्रोच” रहा है, जिसमें केंद्र, राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और बैंकिंग संस्थानों के मिलकर किए गए प्रयासों ने इसे पूरे देश में अभूतपूर्व तरीके से आगे बढ़ाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं।

इस स्कीम के तहत, लाखों वेंडर्स के बैंक अकाउंट एक्टिवेट किए गए, उनके फाइनेंशियल व्यवहार को रिकॉर्ड किया जाने लगा और पहली बार, उनके लिए एक फॉर्मल क्रेडिट हिस्ट्री बनाई गई। इससे उन्हें भविष्य में ज़्यादा लोन और फाइनेंशियल सर्विस मिलना आसान हो गया है और वे आज बैंक के सम्मानित ग्राहक और उद्यमी बनकर उभरे हैं।

इस स्कीम का एक और ज़रूरी पहलू डिजिटल एम्पावरमेंट है। UPI और QR-कोड आधारित पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कैशबैक इंसेंटिव दिए गए हैं। इस पहल ने अब तक 55 लाख वेंडर्स को डिजिटल इकॉनमी से जोड़ा है, उनके लेन-देन को ट्रांसपेरेंट बनाया है और उनकी फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी को मज़बूत किया है। स्कीम का विज़न सिर्फ़ बिज़नेस तक ही सीमित नहीं रहा है। ‘स्वनिधि से समृद्धि’ पहल के ज़रिए, बेनिफिशियरीज़ और उनके परिवारों को भारत सरकार की आठ बड़ी वेलफेयर स्कीम्स से जोड़ा गया है। अब तक इन स्कीम के तहत 50 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है और 1.52 करोड़ से ज़्यादा लोगों को फ़ायदे दिए जा चुके हैं। पेंशन, इंश्योरेंस, हेल्थ सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी जैसी सुविधाओं तक पहुँच देकर, यह पहल स्ट्रीट वेंडर्स और उनके परिवारों के लिए एक बड़े सोशल सिक्योरिटी सिस्टम का ज़रिया बन गई है। इसके अलावा, FSSAI के साथ मिलकर फ़ूड सेफ्टी और हाइजीन पर ट्रेनिंग भी दी गई है, जिससे खास तौर पर स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स की क्वालिटी, हाइजीन और कस्टमर का भरोसा बढ़ा है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इस स्कीम का योगदान काफ़ी सराहनीय रहा है। कुल बेनिफिशियरीज़ में से लगभग 46% महिलाएँ हैं। इससे उनकी इनकम, सामाजिक इज़्ज़त और परिवार के फ़ैसलों में हिस्सेदारी बढ़ी है। साल 2023 और 2025 में किए गए इंडिपेंडेंट इम्पैक्ट असेसमेंट ने भी इस स्कीम के दूरगामी असर की पुष्टि की है। लगभग 95% बेनिफिशियरीज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार फ़ॉर्मल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से लोन लिया है, जो फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इतना ही नहीं, लगभग 30% बेनिफिशियरी PM SWANIDHI से आगे बढ़कर दूसरे फॉर्मल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से लोन भी ले पाए हैं, जो उनके बढ़ते फाइनेंशियल कॉन्फिडेंस और मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल का सबूत है। इस स्कीम के बेनिफिशियरी की इनकम में सालाना लगभग 20% की एवरेज ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके साथ ही, हाउसिंग, न्यूट्रिशन, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन जैसे एरिया में भी सुधार देखा गया है। 2023 और 2025 के बीच UPI बेस्ड ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल लगभग 45% से बढ़कर 83% हो गया है। स्कीम के बड़े पैमाने पर और पॉजिटिव असर को देखते हुए, अगस्त 2025 में, केंद्रीय मंत्रालय ने इसके रीस्ट्रक्चर्ड फॉर्म को मार्च 2030 तक बढ़ाने की मंजूरी दी। रीस्ट्रक्चर्ड स्कीम के तहत, स्ट्रीट वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी गई है और स्कीम का दायरा अर्बन लोकल बॉडीज से आगे बढ़ाकर सेंसस टाउन्स/पेरी अर्बन तक कर दिया गया है। इसके साथ ही, कैपेसिटी बिल्डिंग पर खास जोर दिया जा रहा है ताकि स्ट्रीट वेंडर्स बदलती इकोनॉमिक जरूरतों के हिसाब से अपने बिजनेस को और मजबूत कर सकें। SWANIDHI क्रेडिट कार्ड की शुरुआत भी इसी कड़ी में एक अहम कदम है। यह सुविधा स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी तुरंत की फाइनेंशियल और पर्सनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म बिना ब्याज का क्रेडिट देती है। हालांकि PM SWANIDHI योजना ने स्ट्रीट वेंडर्स को फाइनेंशियल ताकत दी है, लेकिन आज कई जगहों पर उन्हें शहर की प्लानिंग के स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें प्लान्ड वेंडिंग जगहों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कोई तय जगह न होने की वजह से उनकी रोजी-रोटी और ग्राहकों तक पहुंच पर असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए, आने वाले सालों में राज्य सरकारों और शहरी लोकल बॉडीज़ को स्ट्रीट वेंडर्स को शहरी प्लानिंग के फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में एक छोटी सी पहल – स्ट्रीट फूड हब के ज़रिए, उन्हें सुविधाजनक और ऑर्गनाइज़्ड कमर्शियल जगहें उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे

भारत और ओमान द्वारा एक नए आर्थिक गलियारे को गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और ओमान के बीच वाणिज्यिक रिश्ते सदियों से चलते आ रहे हैं। दोनों देशों का एक साझा इतिहास प्राचीन नावों के पाल पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा है और पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए कायम रहा है। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) इस सभ्यतागत बंधन को और मजबूत करता है। एक ऐसे दौर में जब वैश्विक व्यापार भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद से जूझ रहा है, यह समझौता भरोसेमंद साझेदारों के साथ आर्थिक जुड़ाव को गहरा करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वर्ष 2022 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद, यह सीईपीए खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को मजबूती से स्थापित करता है। 

द्विपक्षीय व्यापार में लगातार विस्तार हुआ है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह 11.18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि, सेवाओं का व्यापार 2024 में 863 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। आर्थिक रिश्तों का विविधीकरण हुआ है और इसमें परंपरागत वस्तुओं से परे इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का समावेश हुआ है। फिर भी, काफी अनछुई संभावनाएं अभी भी बाकी हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवर आवाजाही और नियामकीय सहयोग को शामिल करके, यह सीईपीए अधिक सुदृढ़, समन्वित और व्यापक आर्थिक साझेदारी का एक व्यापक ढांचा तैयार करता है।

भारतीय निर्यात के विकास का प्रवेश द्वार

इस सीईपीए के तहत ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच हासिल है। इस समझौते से पहले, भारत के निर्यात का सिर्फ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ही सर्वाधिक तरजीह वाले देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की व्यवस्था के तहत ओमान में शुल्क-मुक्त प्रवेश करता था, जबकि शेष पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। इस सीईपीए के तहत, भारत के वर्तमान निर्यात की 99.38 प्रतिशत मात्रा अब शुल्क-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाएगी।

भारतीय निर्यातकों की दृष्टि से, ये लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं। ओमान के ‘विजन 2040’ के तहत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विविधीकरण में उसके द्वारा किए जा रहे निवेश से मांग में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में 875.83 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात के 2030 तक बढ़कर 1.3 से 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होने का अनुमान है। शून्य शुल्क की सुविधा के जरिए वस्त्र एवं परिधान सेक्टर को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। इससे तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी और साथ ही रोजगार भी सृजित होगा।

मौके व्यापक और विविध हैं। आयात पर निर्भर ओमान का दवा बाजार भारतीय कंपनियों के लिए मजबूत संभावनाएं पेश करता है। नियामकीय मंजूरियों में तेजी, गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की मान्यता और प्रमुख उत्पादों के शुल्क-मुक्त पहुंच से अनुपालन संबंधी लागत में कमी आएगी और बाजार में पैठ बढ़ेगी। चावल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और कन्फेक्शनरी सहित कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण आधारित निर्यात को भी लाभ होगा।

खुलते बाजार, हितों का संरक्षण

भारत के हालिया व्यापार समझौतों के अनुरूप, इस सीईपीए में एक संतुलित और सुविचारित दृष्टिकोण का समावेश है। जहां एक ओर भारत प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने एवं वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में शामिल होने के लिए बाजारों को खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहा है। दुग्ध तथा अनाज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के साथ-साथ रबर, वस्त्र और जूते जैसे उद्योग सुरक्षित बने हुए हैं। यह दृष्टिकोण बाहरी बाजारों तक पहुंच  और घरेलू कमजोरियों से बचाव को एक साथ जोड़ता है।

भारत ने ओमान से आयात होने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर लागू होने वाली अपनी 77 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों को उदार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे ओमान के प्रमुख निर्यातों, खासकर मेथनॉल और निर्जल अमोनिया जैसे औद्योगिक इनपुट को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। ओमान को धातुओं और मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला में तरजीही बाजार पहुंच हासिल होगी। इससे हमारे दोनों देशों को कम उत्पादन लागत का लाभ उठाने में मदद मिलेगी।

जिन क्षेत्रों में भारत के रक्षात्मक हित हैं, उन क्षेत्रों में टैरिफ दर कोटा (टीआरक्यू) के जरिए  ओमान को पहुंच प्रदान की गई है। यह व्यवस्था निर्दिष्ट मात्रा की सीमा के भीतर खजूर, संगमरमर और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल जैसे उत्पादों के तरजीही निर्यात की अनुमति देती है। बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जुड़ाव का यह तरीका प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ-साथ संक्रमण काल ​​के दौरान कमजोर क्षेत्रों को सहायता भी प्रदान करता है।

व्यापार, प्रतिभा और विश्वास

यह सीईपीए भारतीय सेवा प्रदाताओं को उन सभी क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं प्रदान करता है, जहां भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत है। इनमें आईटी, पेशेवर सेवाएं और निर्माण क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले प्रावधानों के साथ, भारतीय कंपनियों को ओमान में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने के अधिक मौके मिलेंगे।

प्रतिभाओं की दृष्टि से भी, यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। कंपनी के भीतर स्थानांतरित कर्मचारियों (इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी) की सीमा को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर, भारतीय कंपनियों को अब विशिष्टता प्राप्त कर्मचारियों को आसानी से तैनात करने तथा बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने की सुविधा मिल गई है। इसके अलावा, किसी भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में पहली बार, ओमान ने स्वतंत्र पेशेवरों के लिए एक समर्पित आवाजाही की व्यवस्था स्थापित की है। अब जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कारखानों में श्रमिकों की कमी हो रही है और आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर एआई एवं रोबोटिक्स के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में यह प्रावधान भारतीय प्रतिभाओं के लिए दुनिया भर में एक सशक्त मिसाल कायम करता है।

इस सीईपीए में समर्पित स्वास्थ्य सेवा का एक परिशिष्ट भी शामिल है, जो आयुर्वेद जैसी पारंपरिक प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में शामिल करने में सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, यह चिकित्सा पेशेवरों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित करता है। इसके अलावा, एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा समझौते से संबंधित बातचीत से भविष्य में भारतीय प्रवासी समुदाय को दोहरे योगदान के बोझ से बचाया जा सकेगा।

क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण

भारत-ओमान सीईपीए नियामकीय सहयोग, सामंजस्यपूर्ण मानकों और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करके टैरिफ से परे जाता है। यह भारत के आधुनिक व्यापार समझौतों से जुड़े उच्च मानकों को दर्शाता है और सीमा के भीतर मौजूद वाणिज्य में रुकावट डालने वाली विभिन्न बाधाओं को दूर करता है।

भारत एक बेहद ही एकीकृत क्षेत्रीय व्यापार संरचना की नींव रख रहा है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़े सभी साझेदार मिलकर अब वैश्विक जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत और वस्तुओं एवं सेवाओं के वैश्विक आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित, ओमान को एक अनूठी भौगोलिक हैसियत हासिल है। सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमान के लॉजिस्टिक्स व औद्योगिक केन्द्र भारत की मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी विशेषज्ञता एवं प्रतिभाओं को व्यापक मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ जोड़कर मूल्य श्रृंखलाओं को एकीकृत कर सकते हैं। इसका परिणाम क्षेत्रीय संपर्क और विकास के लिए निर्मित एक साझेदारी के रूप में सामने होगा।

व्यापार समझौते तभी सफल होते हैं जब वे भरोसा पैदा करते हैं, व्यवसायों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं और अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी साझेदारी बनाने के लिए आगे बढ़ाते हैं। यह सीईपीए ठीक यही काम कर रहा है। यह सदियों पुराने रिश्ते को इक्कीसवीं सदी की हकीकतों के अनुरूप एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में परिवर्तित कर रहा है।  

भारत ने श्रमिकों, किसानों, MSME के लिए खाड़ी देश में अवसरों के द्वार खोले

दिल्ली / सत्ता संदेश

1 जून से लागू हो रहा भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस मिशन की एक निर्णायक उपलब्धि है, जिसका लक्ष्य नए बाजार खोलने और रोजगार सृजन को गति देने के जरिये भारत के छात्रों, कारीगरों, महिलाओं, किसानों, मछुआरों और एमएसएमई के लिए वैश्विक समृद्धि के मार्ग बनाना है।         

भारत और ओमान के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं और लोगों के आपसी संबंध प्रगाढ़ हैं। ओमान में लगभग 7 लाख भारतीय रहते हैं, जिनमें वे व्यापारी परिवार भी शामिल हैं, जिनकी जड़ें 200–300 साल पुरानी हैं। ओमान से भारत को भेजी जाने वाली वार्षिक धनराशि लगभग 2 बिलियन डॉलर है, जबकि देश में 6,000 से अधिक भारतीय उद्यम कार्यरत हैं। 

दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ करता है। यह तुरंत ही ओमान में 98% टैरिफ लाइनों के लिए 100 प्रतिशत शुल्क मुक्त बाजार पहुंच की सुविधा देता है, जिसमें 99.38 प्रतिशत निर्यात शामिल है।

यह सीईपीए से पहले की प्रणाली की तुलना में एक उल्लेखनीय सुधार को दर्शाता है। पहले की प्रणाली में केवल 15.3 प्रतिशत भारतीय निर्यात ओमान में शून्य शुल्क के साथ प्रवेश कर सकते थे। भारत की ऐसी वस्तुएं, जिन पर वर्तमान में ओमान में 5 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है और जिनकी कीमत लगभग 3.64 बिलियन डॉलर के निर्यात के बराबर है, अब काफी अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी।

भारत के एमएसएमई क्षेत्र के लिए, यह समझौता परिवर्तनकारी हो सकता है, क्योंकि सीईपीए से लाभान्वित होने वाले कई क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों की प्रमुखता है। लोहा और इस्पात, वस्त्र, चमड़ा, वाहन कल-पुर्जे और औद्योगिक उपकरण जैसे कुछ क्षेत्रों में एमएसएमई को बड़े अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिससे उत्पादन, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

बढ़ती वैश्विक अस्थिरता के युग में, सीईपीए भारतीय निर्यातकों को, जो आर्थिक मंदी और बढ़ते व्यापार बाधाओं का सामना कर रहे हैं, अपने बाजारों को विविध बनाने और परंपरागत बाजारों पर निर्भरता कम करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

रोज़गार सृजन – यह व्यापार समझौता श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, खाद्य प्रसंस्करण, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लाभ पहुँचाता है, जो भारत के प्रमुख रोजगार प्रदाता हैं।

ओमान को होने वाले वस्त्र निर्यात में वृद्धि से उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, पानीपत, कोयंबटूर, करूर, भदोही, मुरादाबाद, जयपुर और अहमदाबाद जैसे प्रमुख क्लस्टर में रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। भारत भर के कारीगर और बुनकर भी अपने उत्पादों की उच्च अंतरराष्ट्रीय मांग से लाभान्वित होंगे।

भारत भर में, विशेष रूप से तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में, साथ ही महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों समेत चमड़ा और जूता के प्रमुख केंद्रों में भी रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

रत्न और आभूषण क्षेत्र एक अन्य उदाहरण है, जो दिखाता है कि सीईपीए रोजगार वृद्धि को किस प्रकार तेज करेगा। भारत के पास पहले से ही कटे और पॉलिश किए हुए हीरे, सोने और चांदी के आभूषण तथा हस्तनिर्मित आभूषण उत्पादन में मजबूत क्षमताएं हैं। शुल्क बाधाओं के हटने से, भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय और एशियाई प्रतिस्पर्धियों पर निर्णायक बढ़त मिलेगी। उद्योग जगत का अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में ओमान को होने वाला निर्यात बढ़ कर 150 मिलियन डॉलर तक हो सकता है। इससे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के आभूषण निर्माण केन्द्रों में महत्वपूर्ण रोजगार संभावनाएं सृजित होने की उम्मीद है।

किसान और मछुआरे – घरेलू किसानों और संवेदनशील कृषि हितों की सुरक्षा के लिए, भारत ने गेहूं, चावल, मक्का, मोटे अनाज, डेयरी, फल, सब्जियां, खाद्य तेल, तिलहन, चाय, कॉफी और शहद जैसे प्रमुख उत्पादों पर कोई टैरीफ छूट नहीं दी है।

घी, शहद, मीठे बिस्कुट, अंडे और कुछ मिष्ठान्न उत्पादों में भारत को प्रतिद्वंद्वियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा, जिससे देश के कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और ग्रामीण आय में वृद्धि होगी।

यह समझौता भारत के राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) प्रमाणन की स्वीकृति और मान्यता भी प्रदान करता है, जो भारतीय किसानों को ओमान में, जो एक प्रमुख खाद्य आयातक है, जैविक उत्पाद बेचने के लिए विशाल अवसर देगा।

समुद्री उत्पादों में भी विशाल संभावनाएँ हैं, जिनका अब तक उपयोग नहीं हो पाया है। 2022 और 2024 के बीच ओमान का समुद्री उत्पादों का आयात लगभग 119 मिलियन डॉलर था। भारत से आयात केवल 7.75 मिलियन डॉलर था, जिससे भारतीय समुद्री खाद्य निर्यात जैसे झींगा और जमे हुए कटलफिश के लिए विशाल अवसर मौजूद हैं। श्रम-गहन समुद्री उत्पाद उद्योग मछली पकड़ने, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, शीत-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स और निर्यात संचालन में अतिरिक्त नौकरियाँ उत्पन्न कर सकता है।  

दवा और पारंपरिक चिकित्सा – यूएसएफडीए, ईएमए, यूके एमएचआरए और टीजीए जैसे नियामकों द्वारा अनुमोदित भारतीय दवाएं 90 दिनों के भीतर ओमान में स्वचालित विपणन प्राधिकार प्राप्त करेंगी — जो भारतीय फार्मा निर्यातकों के लिए एक बड़ी सफलता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि सीईपीए भारत की पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं के लिए अवसर पैदा करता है। यह पारंपरिक चिकित्सा में संयुक्त अनुसंधान की व्यवस्था करता है।  

सेवाएँ और आवागमन – समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू सेवा और आवागमन में निहित है। ओमान ने भारत के लिए विशिष्ट निर्यात क्षेत्रों में व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की है, जिनमें पेशेवर सेवाएँ, कंप्यूटर और आईटी सेवाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन, अनुसंधान और विकास तथा पर्यावरण सेवाएँ शामिल हैं। लेखा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, निर्माण, शिक्षा और परामर्श जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों को बेहतर बाज़ार पहुँच से लाभ मिलने की उम्मीद है।  

महत्त्वपूर्ण रूप से, ओमान ने भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों के लिए आवागमन प्रतिबद्धताओं में वृद्धि पर सहमति व्यक्त की है। अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों और संविदा सेवा प्रदाताओं को चार साल तक रहने की अनुमति दी जाएगी, जबकि व्यवसाय आगंतुकों और स्वतंत्र पेशेवरों को आसान अस्थायी प्रवेश की सुविधा मिलेगी। इसने अंतर-कॉर्पोरेट स्थानांतरित कर्मियों के लिए ऊपरी-सीमा को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है।

विकसित देशों के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की मोदी सरकार की पहल  प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाने के प्रधानमंत्री के मिशन का हिस्सा है।

ओमान के साथ समझौता याद दिलाता है कि व्यापार; विकास, रोजगार सृजन और साझा समृद्धि का एक शक्तिशाली उपकरण है। एक विभाजित और संरक्षणवादी दुनिया में, पीएम मोदी स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि एक नया, आत्मविश्वासी भारत पीछे नहीं हटेगा। यह साझेदारियों, प्रतिस्पर्धा और वैश्विक सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ेगा।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं।)

एआई का जनजातीय भाषाओं में संवादः समावेशी विकास का द्योतक या जनजातीय गरिमा को प्रौद्योगिकी का समर्थन 

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

हमारे देश भर में फैले जंगलों, पहाड़ियों और दूरदराज की बस्तियों में, एक शांत लेकिन सफल परिवर्तन चल रहा है। जनजातीय समुदाय लंबे समय से भारत की विकास गाथा के केंद्र में अपने उचित स्थान का इंतजार कर रहे थे। आज वे राष्ट्र की प्रगति के सक्रिय वास्तुकार के रूप में उभर रहे हैं। जनजातीय गरिमा उत्सव की यही भावना है: विकसित भारत की यात्रा का एक राष्ट्रीय उत्सव, जहां प्रगति भूगोल या परिस्थिति का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का समान रूप से अधिकार है।

महत्वाकांक्षा का पैमाना

यह समझने के लिए कि प्रौद्योगिकी जनजातीय विकास के लिए अपरिहार्य क्यों हो गई है, किसी को पहले चुनौती की व्यापकता को समझना चाहिए। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए), राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और संबंधित पहलों में 549 जिलों और 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,911 ब्लॉकों के 63,000 से अधिक गांवों को शामिल किया गया है, जिससे 5.5 करोड़ से अधिक आदिवासी नागरिक लाभान्वित हुए हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) पर विशेष ध्यान देने के साथ, इन प्रयासों का उद्देश्य आवास, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कनेक्टिविटी और आजीविका जैसी आवश्यक सेवाओं का सम्पूर्ण कवरेज सुनिश्चित करना है। इस तरह के विविध और विस्तृत इलाके में हर परिवार तक पहुंचने के लिए ऐसी प्रणाली की आवश्यकता होती है जो डेटा-संचालित, कनेक्टेड और उत्तरदायी होती है और यही हम तैयार कर रहे हैं।

इस वर्ष जनजातीय गरिमा उत्सव का आयोजन लगभग चार विषयगत सप्ताह के आसपास किया जा रहा है, जो एक साथ जनजातीय विकास के पूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। उद्घाटन का विषय, “विकास के एक वाहक के रूप में प्रौद्योगिकी”, इस बात को दर्शाता है कि कैसे डिजिटल सिस्टम, विज्ञान और नवाचार भारत के कुछ दूरस्थ समुदायों तक शासन और अवसर का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण के केंद्र में एक सरल सिद्धांत निहित है: जनजातीय भाषाओं, संस्कृतियों, विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पर्याप्त सम्मान करते हुए विकास को अंतिम दूरी तक पहुंचना चाहिए। 

प्रौद्योगिकी द्वारा जनजातीय गरिमा को बढ़ावा 

उद्देश्य के साथ निर्देशित होने पर प्रौद्योगिकी क्या हासिल कर सकती है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बिरसा 101 यानी सिकल सेल रोग के लिए भारत की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर-आधारित जीन थेरेपी है। सिकल सेल रोग लंबे समय से जनजातीय आबादी के लिए स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है और भारत अब समानता और पहुंच में निहित उन्नत विज्ञान के साथ उस चुनौती का जवाब दे रहा है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से अनुसंधान, नैदानिक परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। सीएसआईआर-आईजीआईबी में हाल ही में एक संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और सिकल सेल योद्धाओं को एक साथ लाया गया, जो वैज्ञानिक प्रगति और प्रयासों के पीछे की मानवीय तात्कालिकता दोनों को दर्शाता है।

साझा लक्ष्य स्पष्ट है: एक किफायती, एकमुश्त उपचारात्मक उपचार विकसित करना जो जरूरतमंद हर आदिवासी परिवार तक पहुंच सके। बीआईआरएसए 101 केवल चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि से भी बढ़कर है। यह एक घोषणा है कि भारत का सबसे उन्नत विज्ञान अपने सबसे पात्र समुदायों की सेवा करेगा।

यह दृढ़ विश्वास एक पहल से कहीं अधिक गहरा है। ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) और आयुर्जेनोमिक्स जैसे प्रयास दर्शाते हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक आदिवासी समुदायों द्वारा लंबे समय से संरक्षित समृद्ध औषधीय और पारिस्थितिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, मान्यीकरण और संरक्षण में मदद कर सकती है।

समावेशन की यही भावना इस बात को आकार दे रही है कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जनजातीय विकास के साथ जोड़ा जा रहा है। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में, मंत्रालय ने एक सरल लेकिन दृढ विश्वास पर आधारित एआई-सक्षम प्लेटफार्मों की श्रृंखला प्रस्तुत की, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भाषा एक बाधा नहीं है जिसे दूर किया जाना है, बल्कि एक पहचान है जिसका उत्सव मनाया जाना चाहिए। आदि वाणी, जनजातीय भाषाओं के लिए एआई-संचालित अनुवादक, टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट और टेक्स्ट-टू-स्पीच अनुवाद, ओसीआर और आदिवासी भाषाओं में सरकारी योजना की जानकारी के वितरण का समर्थन करता है, जिससे नागरिकों को घर पर बोलने वाली भाषा में सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ने में सक्षम बनाया जाता है। ट्राइबॉट एक बहुभाषी संवादी एआई सहायक है, जो दूरदराज के क्षेत्रों में नागरिकों को तत्क्षण मार्गदर्शन और शिकायत निपटारे में सहायता प्रदान करके इस प्रयास को और मजबूत करता है। भगवान बिरसा मुंडा सेल और आईआईटी दिल्ली के साथ आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान भी इन प्रयासों पर चर्चा की गई, जो जनजातीय भाषाओं के दीर्घकालिक संरक्षण और सुदृढ़ीकरण सहित एआई के सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और समुदाय-केंद्रित इस्तेमाल पर केंद्रित थी।

प्रौद्योगिकी सांस्कृतिक अभिकथन और आर्थिक सशक्तिकरण का एक शक्तिशाली माध्यम भी बन रही है। आगामी ट्राइबएक्स प्लेटफॉर्म का उद्देश्य जनजातीय कलाओं, भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान, संगीत, शिल्प और सांस्कृतिक अनुभवों को बढ़ावा देने के लिए एक डिजिटल इकोसिस्टम बनाना है। इस प्रयास को पूरा करते हुए, जनजातीय भारत का प्रस्तावित जीआई संभावित कला और शिल्प एटलस भौगोलिक संकेत क्षमता के साथ जनजातीय हस्तशिल्प, वन उत्पादों और पारंपरिक कला रूपों का डिजिटल रूप से मानचित्रण करेगा, जिससे ब्रांडिंग, बाजार पहुंच और जनजातीय बौद्धिक विरासत की पहचान को मजबूत करने में मदद मिलेगी। पायलट आधार पर पांच राज्यों के जनजातीय अनुसंधान संस्थानों में इनोवेशन हब की योजना बनाई गई है, जो नवाचार के नेतृत्व वाले आदिवासी उद्यमियों और स्टार्टअप के लिए डिजाइन और उत्पाद विकास सहायता, जीआईएस-आधारित योजना डैशबोर्ड और इनक्यूबेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को जोड़कर और आगे बढ़ेंगे। 

प्रौद्योगिकी जनजातीय समुदायों तक शासन के तरीके को समान रूप से बदल रही है। पीवीटीजी घरेलू सर्वेक्षणों के लिए पीएम-जनमन के तहत सर्वेक्षण सेतु दूरदराज के क्षेत्रों में कल्याण वितरण की तत्क्षण, जियो-टैग निगरानी को सक्षम बनाता है। 18 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में संचालित, इस प्लेटफॉर्म ने 8,552 सर्वेक्षणकर्ताओं के समर्थन के साथ पहले ही 3.43 लाख घरेलू प्रस्तुतियां दर्ज की हैं। इस तरह की डेटा-संचालित प्रणालियां यह सुनिश्चित करने में मदद करती हैं कि प्रत्येक पात्र परिवार की पहचान की जाए और उसे आवश्यक सेवाओं से जोड़ा जाए। इसके साथ ही मंत्रालय दावा प्रस्तुतीकरण, जीआईएस-आधारित मानचित्रण, वर्कफ्लो की निगरानी और शिकायत निवारण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक एआई-सक्षम वन अधिकार अधिनियम शासन मंच विकसित कर रहा है। साथ में, ये पहल आदिवासी नागरिकों के लिए शासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और सुलभ बना रही हैं।

जनजातीय समुदाय: विकसित भारत के वाहक

एक क्षण ऐसा होता है, जो उस सार को पकड़ लेता है, जिसके लिए हम काम कर रहे होते हैं। यह किसी नीतिगत दस्तावेज या मंत्रिस्तरीय समीक्षा में नहीं पाया जाता है। यह तब पाया जाता है जब दूरदराज की बस्ती की एक आदिवासी महिला, तकनीक से, भाषा से सशक्त होती है और उसे इस बात का अहसास होता हो कि उसकी बात को राष्ट्र सुन रहा है। ऐसे में वह अपनी शर्तों पर सरकारी सेवाओं से जुड़ती है और पूरी गरिमा के साथ जवाब प्राप्त करती है। वह क्षण किसी यात्रा का अंत नहीं है। यह भारत की राष्ट्रीय गाथा में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

जनजातीय गरिमा उत्सव इस संदेश को गर्व के साथ ले जाता है। जनजातीय समुदाय, अपनी दृढता, अपने पारिस्थितिक ज्ञान, अपनी कलात्मक परंपराओं और इस भूमि में अपनी गहरी जड़ों के साथ, विकसित भारत की दहलीज पर इंतजार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इसके सबसे शक्तिशाली और प्रेरक वाहकों में शामिल हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी दूरियों को पाटती है, जैसे-जैसे विज्ञान उपचार प्रदान करता है, जैसा कि एआई जंगलों और पहाड़ियों की भाषाओं में बोलता है, और जैसे-जैसे शासन सबसे दूर के गांव के अंतिम परिवार तक पहुंचता है, हम हर दिन भारत के करीब आते हैं जो न केवल व्यापकता के रूप में विकसित है, बल्कि अपनी मानवता में परिपूर्ण है। यह वह विकसित भारत है जिसे हम माननीय प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित होकर एक साथ मिलकर निर्मित कर रहे हैं। 

(लेखिका भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव हैं) 

ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद – इसके मुख्य स्तंभों पर एक नज़र

नियंत्रित युद्ध की रणनीति

पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने बीती 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में बड़ी संख्या में निर्दोष पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इसके जवाब में भारत ने सावधानीपूर्वक चुने गए नौ लक्ष्यों के खिलाफ एक अभूतपूर्व और सटीक सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान में भारत की धरती पर हमलों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे प्रमुख आतंकवादी ढांचों को नष्ट कर दिया गया। भारत ने आम नागरिकों को नुकसान से बचाने का प्रयास किया, जबकि इसके उलट पाकिस्तान ने नागरिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर स्थिति को और भड़काया। उसके ये प्रयास असफल रहे और भारत ने पाकिस्तान में आतंकवादी नेटवर्क का समर्थन करने वाले महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों पर प्रभावी जवाबी कार्रवाई की।

भारत ने केवल चार दिनों के भीतर ही अपने उद्देश्यों को हासिल कर लिया। स्थापित सैन्य चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा किए गए युद्धविराम के अनुरोध को भारत ने स्वीकार कर लिया। किसी भी प्रकार की गलत जानकारी या बाद में किए गए फेरबदल के प्रयास इस तथ्य को नहीं बदल सकते कि भारत ने नियंत्रित युद्ध का प्रदर्शन करते हुए सैन्य जीत हासिल की, जो कि बहुत कम देखने को मिलती है।

इतिहास में ऐसे लंबे युद्धों के कई उदाहरण हैं, जिनसे बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी। इनमें पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका रूस-यूक्रेन संघर्ष, और वियतनाम व अफगानिस्तान जैसे लंबे समय तक चले युद्ध शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक नुकसान, क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक अव्यवस्था पैदा की। यहां तक कि दक्षिण एशिया में जारी संघर्ष की भी भारी कीमत केवल लड़ने वाले पक्ष ही नहीं, बल्कि वैश्विक समुदाय को भी चुकानी पड़ती है। इसके विपरीत, भारतीय नेतृत्व के दृढ़ संकल्प और सैन्य पेशेवर दक्षता के कारण ऑपरेशन सिंदूर एक अंतहीन युद्ध बनने से बच गया।


पाकिस्तान की नींव पर प्रहार

पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई अत्यंत प्रभावशाली रही। भारत ने एक समन्वित अभियान के तहत पाकिस्तान के भीतर गहराई तक हमला किया और पाकिस्तान व पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में मौजूद महत्वपूर्ण आतंकवादी लॉन्च पैड्स को निशाना बनाकर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। पीओजेके से लेकर पंजाब के सियालकोट और बहावलपुर जैसे स्थानों तक किए गए हमलों ने भारत की पहुंच और सटीकता को प्रदर्शित किया। नूर खान और सरगोधा एयरबेस जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले कर यह संदेश दिया गया कि पाकिस्तान में कोई भी आतंकवादी सुरक्षित ठिकाना भारत की पहुंच से बाहर नहीं है।

इन हमलों का पैमाना और सटीकता अभूतपूर्व थी। इनमें यूसुफ अज़हर, अब्दुल मलिक रऊफ और मुदासिर अहमद सहित 100 से अधिक आतंकवादियों को समाप्त कर दिया गया।


कम लागत में अधिक प्रभाव

ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान की परमाणु धमकी के दावों को गलत साबित कर दिया। यूक्रेन या गाज़ा जैसे संघर्षों के विपरीत, जहां व्यापक विनाश हुआ है, इस अभियान में पाकिस्तान के आतंकवादी और सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा, जबकि भारत में इसका प्रभाव लगभग नगण्य रहा। दुनिया की नजरों में भारत की एकीकृत वायु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली (IACCS), विशेष रूप से स्वदेशी ‘आकाशतीर’ सिस्टम ने पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर महत्वपूर्ण ठिकानों की रक्षा की।

भारत में आर्थिक व्यवधान बहुत कम रहा। विरोधी पर भारी कीमत थोपते हुए अपने क्षेत्र पर प्रभाव को सीमित रखने का यह अंतर भारत की सावधानीपूर्ण योजना, तकनीकी क्षमता और सटीक क्रियान्वयन को दर्शाता है। भारतीय वायुसेना ने राफेल विमान, SCALP मिसाइल और हैमर बम का उपयोग करते हुए पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय कर मिशन को मात्र 23 मिनट में पूरा कर लिया।

10 मई को भारत ने कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हुए 11 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और उनकी क्षमताओं को कमजोर कर दिया। भारत एक ही अभियान में किसी परमाणु हथियार संपन्न देश के 11 एयरबेस को निशाना बनाने वाला पहला देश बन गया। इस अभियान में पाकिस्तान वायुसेना की लगभग 20% संपत्तियां नष्ट हो गईं। भोलारी एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचा।


साझेदारी, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण (JAI)

ऑपरेशन सिंदूर ने साझेदारी, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण का स्पष्ट प्रदर्शन किया। वायुसेना ने समुद्री दबाव बनाए रखा, जबकि थलसेना और वायुसेना ने मिलकर आतंकवादी और सैन्य ठिकानों पर समन्वित हमले किए। इस अभियान ने 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के गठन और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने जैसे सुधारों को भी प्रमाणित किया। रक्षा उत्पादन 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,54,000 करोड़ रुपये हो गया।

ड्रोन आयात पर प्रतिबंध और PLI योजना जैसी नीतियों ने घरेलू अनुसंधान को बढ़ावा दिया। आज 75% रक्षा खरीद घरेलू स्रोतों से हो रही है और 25% रक्षा अनुसंधान निजी क्षेत्र के लिए आरक्षित है। लगभग 90% गोला-बारूद का स्वदेशीकरण हो चुका है और 2027-28 तक पूर्ण स्वदेशीकरण की उम्मीद है। ब्रह्मोस, आकाश, तेजस और एंटी-ड्रोन प्लेटफॉर्म जैसी प्रणालियों ने भारत की क्षमता को और मजबूत किया।


राजनीतिक इच्छाशक्ति: सफलता की कुंजी

सैन्य सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। पिछले एक दशक में भारत ने आतंकवाद के जवाब में संतुलित सैन्य विकल्प अपनाने की नीति को मजबूत किया है। नेतृत्व ने सोच-समझकर जोखिम उठाने और आतंकवादियों को जहां भी हों, वहीं निशाना बनाने की प्रतिबद्धता दिखाई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिए गए निर्णय—चाहे सिंधु जल संधि को स्थगित करना हो या संतुलित सैन्य कार्रवाई—सभी योजनाबद्ध और रणनीतिक रहे हैं। इसका उद्देश्य स्पष्ट रहा है: आतंकवादियों और उनके समर्थक ढांचे को कहीं भी निशाना बनाना।


समग्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण

ऑपरेशन सिंदूर ने “संपूर्ण राष्ट्र” दृष्टिकोण को प्रदर्शित किया, जिसमें सशस्त्र बलों, सरकार और निजी क्षेत्र के बीच समन्वय स्थापित किया गया। स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों ने ड्रोन और काउंटर-यूएएस सिस्टम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसरो ने सैटेलाइट आधारित निगरानी प्रदान की, जबकि गलत सूचना से निपटने और जनसंचार प्रबंधन के लिए विशेष प्रयास किए गए।

सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने के लिए विपक्षी दलों को साथ लेकर विभिन्न देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीतिक एकता कितनी आवश्यक है।


(C:\Users\HP\AppData\Local\Temp\ksohtml6676\wps1.png इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के महानिदेशक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

मजदूर दिवस 2026: 16 घंटे की गुलामी से 8 घंटे के अधिकार तक, जानें क्यों खून से लिखी गई है ‘मई दिवस’ की कहानी

नई दिल्ली: हर साल 1 मई की तारीख दुनिया भर में ‘मजदूर दिवस’ या ‘मई दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। यह दिन केवल एक छुट्टी नहीं, बल्कि उन लाखों श्रमिकों के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने औद्योगिक क्रांति के दौरान अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी।

संघर्ष की शुरुआत: 16 घंटे का काम और अमानवीय स्थितियाँ इस दिवस की जड़ें 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति में छिपी हैं। उस दौर में नई फैक्ट्रियां खुल रही थीं और मशीनीकरण बढ़ रहा था, लेकिन मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मजदूरों को दिन में 14 से 16 घंटे तक काम करना पड़ता था। न केवल पुरुष, बल्कि बच्चों से भी काम कराया जाता था और महिलाओं को बहुत कम मजदूरी दी जाती थी। कार्यस्थलों पर सुरक्षा का अभाव था और धूल-धुएं के बीच मजदूरों की सेहत बिगड़ रही थी।

‘8 घंटे’ की मांग और शिकागो का आंदोलन: शोषण के खिलाफ मजदूरों ने एकजुट होकर यूनियन बनाना शुरू किया। उनकी सबसे प्रमुख मांग थी कि काम के घंटे तय किए जाएं। उनका नारा था— “आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने लिए”। इसी मांग को लेकर 1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में एक विशाल आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें करीब तीन लाख मजदूर सड़कों पर उतर आए।

हेमार्केट अफेयर: जब सड़कों पर बहा खून 3 मई 1886 को एक फैक्ट्री के बाहर प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में कई मजदूर मारे गए। इसके विरोध में 4 मई को शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में एक शांतिपूर्ण सभा बुलाई गई। वहां अचानक हुए एक बम धमाके के बाद पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला दीं, जिसमें कई मजदूर और पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना को इतिहास में ‘हेमार्केट अफेयर’ के नाम से जाना जाता है। इस मामले में बाद में चार मजदूर नेताओं को फांसी दे दी गई।

वैश्विक मान्यता और भारत में शुरुआत : हेमार्केट की घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। साल 1889 में पेरिस में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह फैसला लिया गया कि हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा।भारत की बात करें तो यहाँ पहली बार 1 मई 1923 को चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में मजदूर दिवस मनाया गया था। इसका आयोजन ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ ने किया था और इसी दिन पहली बार भारत में लाल झंडा फहराया गया था।

आज की चुनौतियां: भले ही आज कई श्रम कानून बन चुके हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मजदूरों की स्थिति अब भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। असंगठित क्षेत्र में आज भी कई जगह मजदूरों को 12 घंटे तक काम करना पड़ता है। न्यूनतम मजदूरी और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज की असली ताकत यही मेहनतकश लोग हैं और उनके अधिकारों का सम्मान करना अनिवार्य है।

बुद्ध पूर्णिमा पर उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णनने दिया करुणा का संदेश

चित्रा पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, जब मंदिरों में उत्सव मनाए जा रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूँ कि हर घर में खुशी और समृद्धि आए। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर अपने सभी भाइयों और बहनों को शुभकामनाएँ देते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

भारत ने दुनिया को जो अनेक उपहार दिए हैं, उनमें से बौद्ध धर्म सर्वोच्च है। भगवान गौतम बुद्ध का जीवन और उनकी शिक्षाएँ आज भी विश्वभर के लाखों लोगों के जीवन को आलोकित कर रही हैं। भारत ने दुनिया को आत्मबोध का महत्व सिखाया। “बुद्ध” शब्द ही “जाग्रत व्यक्ति” का संकेत देता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानवता को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाने वाली इस महान आत्मा का जन्म और ज्ञान प्राप्ति, दोनों एक ही दिन हुए।

राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण वैभव और ऐश्वर्य के बीच हुआ। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने आध्यात्मिक सत्य की खोज के लिए अपने महल, पत्नी, पुत्र और सभी सांसारिक संपत्तियों का त्याग कर दिया। छह वर्षों की कठोर साधना के बाद उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे परम ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बन गए। चार आर्य सत्यों की प्राप्ति और नैतिक आचरण के मार्ग ने एक नए दर्शन की शुरुआत की, जिसने विश्व इतिहास में भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। सारनाथ (वाराणसी के पास) में उन्होंने पाँच तपस्वियों को अपना पहला उपदेश दिया। “धर्मचक्र प्रवर्तन” के नाम से प्रसिद्ध इस उपदेश ने बौद्ध धर्म की नींव रखी और बौद्ध परंपरा की औपचारिक शुरुआत की।

समय के साथ असंख्य लोग उनकी शिक्षाओं से प्रेरित हुए। मगध के राजा बिंबिसार ने राजगीर में वेणुवन विहार दान किया। धनी अनाथपिंडिक ने जेतवन वन को स्वर्ण मुद्राओं से ढँककर वहाँ विहार निर्माण के लिए दान दिया। ऐसे कार्य भारत में प्राचीन काल से चली आ रही धार्मिक आस्था और दानशीलता के गहरे विश्वास को दर्शाते हैं।

इन विहारों के माध्यम से चार आर्य सत्यों का प्रचार हुआ—इच्छा दुख का मूल है; इच्छा का त्याग करने से दुख दूर किए जा सकते हैं; और अष्टांगिक मार्ग का पालन कर दुखों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। बुद्ध ने उपदेश दिया: अतीत पर मत सोचो, वर्तमान में जियो; ईमानदारी में शक्ति है; मन सभी कार्यों का मूल है, इसलिए सकारात्मक सोच विकसित करो; कठिन समय में भयभीत होकर पीछे मत हटो; जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा है, इसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाओ; शब्दों से आघात पहुँच सकता है, इसलिए मधुर वाणी बोलो; प्रेम और अहिंसा आवश्यक हैं; निरंतर सीखते रहो।

बौद्ध दर्शन को मणिमेकलाई और कुंडलकेशी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि समय के साथ कई प्राचीन ग्रंथ लुप्त हो गए हैं, उनका योगदान अमूल्य है।

इस प्रकार महाकाव्य “मणिमेकलाई” (अधिरै पिचैयिटा काथै : 84-90) बौद्ध धर्म के सार को स्पष्ट करता है। बुद्ध ने पाँच नैतिक सिद्धांतों पर विशेष बल दिया—अहिंसा, चोरी न करना, कामाचार से बचना, सत्य बोलना और नशे से दूर रहना। उन्होंने सिखाया कि मन ही सभी चीजों का मूल है; सकारात्मक विचार और सद्कर्म ही व्यक्ति और समाज में संतुलन और शांति ला सकते हैं। इसी कारण उन्हें “एशिया का प्रकाश” कहा जाता है।

मुझे नरेंद्र मोदी के “मन की बात” कार्यक्रम में कहे गए शब्द याद आते हैं: “भगवान गौतम बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि शांति हमारे भीतर से शुरू होती है और स्वयं पर विजय सबसे बड़ी जीत है।”

बुद्ध की शिक्षाओं की परिवर्तनकारी शक्ति इस बात से स्पष्ट होती है कि उन्होंने सम्राट अशोक जैसे योद्धा शासक को शांति और करुणा का समर्थक बना दिया। अशोक ने शिलालेखों और स्तूपों के माध्यम से बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार किया। सांची स्तूप और सारनाथ के स्तूप आज भी विश्वभर के लोगों को आकर्षित करते हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

भिक्षुओं और परिवार के सहयोग से अशोक ने पूरे एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार किया। महावंश के अनुसार उनके पुत्र महेंद्र ने इसे श्रीलंका तक पहुँचाया। माना जाता है कि बौद्ध भिक्षुओं ने तमिलनाडु में भी इस धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बौद्ध भिक्षुओं ने बिना भेदभाव के निःशुल्क चिकित्सा और शिक्षा प्रदान की। उन्होंने त्रिपिटक जैसे पवित्र ग्रंथों की शिक्षा दी, जातक कथाएँ सुनाईं और ध्यान के माध्यम से लोगों को मानसिक शांति की ओर अग्रसर किया। दान—विशेषकर भूखों को भोजन कराना—को एक मूल कर्तव्य माना गया।

हजारों वर्षों से इस भूमि पर अनेक आध्यात्मिक विचारधाराएँ विकसित हुई हैं। चाहे बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, भारत ने सभी को एकता की भावना से अपनाया है। बौद्ध धर्म ने जीवनपर्यंत सीखने पर विशेष जोर दिया और बड़े पैमाने पर शिक्षण संस्थान स्थापित किए। पाँचवीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रमुख केंद्र बना, जहाँ लगभग 10,000 विद्यार्थी और 1,500 विद्वान थे।

इसी प्रकार कांचीपुरम, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे केंद्रों ने भारत की बौद्धिक शक्ति को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। चीन के भिक्षु फाह्यान और विद्वान ह्वेनसांग जैसे लोग भारत आए और यहाँ अध्ययन किया।

सिद्धार्थ की कठोर तपस्या से द्रवित होकर सुजाता ने उन्हें खीर अर्पित की, जिससे उन्हें पुनः शक्ति मिली। बुद्ध पूर्णिमा के दिन हम इस करुणा को खीर बनाकर स्मरण करते हैं।

“प्रेम ही आनंद का स्रोत है; प्रेम ही संसार का प्रकाश है; और प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति है”—बुद्ध की ये शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि प्रेम और शांति पूरे विश्व में फैले।

भारत–न्यूजीलैंड ने नए आर्थिक संघ की शुरुआत की दोनों देशों के लोगों के लिए एक लाभकारी समझौता: राजेश अग्रवाल    

दिल्ली/सत्ता संदेश

आधुनिक आर्थिक इतिहास के अधिकाँश समय के लिए व्यापार का तर्क सरल था: तुलनात्मक लाभ। यह प्रणाली काम करती थी – जब तक कि यह समझौता नहीं हुआ था। हाल के वर्षों में, भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन के साथ, व्यापार समझौतों की संरचना का फिर से निर्माण किया जा रहा है। समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के लिए, सवाल अब यह नहीं है कि एकीकृत होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह कि कितना गहराई से और कितनी तेजी से एकीकृत होना चाहिए। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की अपनी महत्वाकांक्षा की ओर आगे बढ़ रहा है।  देश ने पूर्व —इस बार भारत-प्रशांत क्षेत्र — की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है। भारत ऐसे साझेदारों की तलाश में है, जो आर्थिक एकीकरण और अपने नागरिकों की समृद्धि के लिए इसके दृष्टिकोण को साझा करते हैं। न्यूजीलैंड के रूप में, भारत को बिल्कुल ऐसा ही देश मिला।

यह रिश्ता लंबे समय से बन रहा था और पहली नज़र में इसका विस्तार व्यापार से आगे तक है। लगभग 3,00,000 भारतीय मूल के लोग न्यूज़ीलैंड में रहते हैं, जो इसकी आबादी का लगभग 5 प्रतिशत हैं— ये एक ऐसे सेतु का निर्माण करते हैं, जो उतना ही सांस्कृतिक है, जितना कि आर्थिक। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि द्विपक्षीय वस्तु व्यापार वित्त वर्ष 2024–25 में 1.3 बिलियन डॉलर पहुंच गया और पिछले वर्ष की तुलना में इसमें 49 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी — यह आंकड़ा तेज वृद्धि का संकेत देता है। सेवा व्यापार भी 13 प्रतिशत बढ़ गया है। दो क्रिकेट राष्ट्रों का एक साथ आना, न केवल रोमांचक है, बल्कि पहले से चल रही साझेदारी को भी रेखांकित करता है।

प्रतिस्पर्धी निर्माण केंद्रों के बीच व्यापार समझौतों के विपरीत, इस साझेदारी की ताकत इसकी पूरक भूमिका में निहित है। भारत पैमाने की पेशकश करता है: 1.4 अरब लोग, एक उभरता हुआ मध्यम वर्ग और एक विश्वस्तरीय डिजिटल और सेवा अवसंरचना। न्यूजीलैंड विशेषज्ञता की पेशकश करता है: उच्च-तकनीक कृषि, सतत वानिकी और विशिष्ट निर्माण तकनीक। दोनों देशों की पूरक भूमिका ही इस साझेदारी की नींव है।

बेहतर बाजार पहुंच:

एफटीए स्पष्टता और आकर्षक विशेषताओं के साथ संतुलन स्थापित करता है। भारत ने संवेदनशील उत्पादों को बाहर रखा है, जैसे डेयरी, अधिकांश पशु उत्पाद, सब्जियां, चीनी, कृत्रिम शहद, वसा और तेल, हथियार और गोला-बारूद, तांबा और एल्युमिनियम के सामान। शत-प्रतिशत भारतीय निर्यात पर शुल्क हटा दिए गये हैं, जिससे निरंतर मौजूद बाधा समाप्त हो गयी है: यह बाधा प्रमुख शुल्क लाइनों पर 10 प्रतिशत तक के शुल्क के रूप में मौजूद थी। यह प्रगति श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे वस्त्र, परिधान, चमड़ा, सिरामिक और कालीन तथा उच्च-वृद्धि वाले वाहन और इंजीनियरिंग उद्योगों के लिए तत्काल प्रतिस्पर्धा आधारित प्रोत्साहन प्रदान करती है। भारत का वस्त्र और परिधान निर्यात, जो पहले से ही वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा है, अब न्यूजीलैंड के बाजार में प्रवेश कर रहा है, जो लगभग 1.9 बिलियन डॉलर मूल्य के ऐसे सामानों का वार्षिक आयात करता है और शून्य-शुल्क पहुँच की सुविधा देता है। इंजीनियरिंग निर्यात, जो दुनिया भर में 110 बिलियन डॉलर से भी अधिक हो गया है, अब ऐसे बाज़ार में भी वैसी ही गति पकड़ रहा है, जो 11 बिलियन डॉलर के इंजीनियरिंग उत्पाद आयात करता है। चमड़ा, दवाएँ, समुद्री उत्पाद और प्लास्टिक—ये सभी क्षेत्र जो पहले टैरिफ़ की वजह से बाधित थे—अब आगे बढ़ने और फलने-फूलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।   

भारत-प्रशांत क्षेत्र में विविधीकरण और विस्तार: 

यह समझौता दोनों देशों को उनके पारंपरिक बाजारों से हटकर अपने व्यापार में विविधता लाने में मदद करता है। एक ओर, यह भारत को न्यूजीलैंड—जो संसाधनों से समृद्ध एक विकसित अर्थव्यवस्था है—में शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच प्रदान करता है; वहीं दूसरी ओर, न्यूजीलैंड की कंपनियों के लिए यह न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारतीय बाजार, जहाँ 1.46 अरब लोग रहते हैं, के द्वार खोलता है, बल्कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था तक भी पहुंच सुनिश्चित करता है। इसके अलावा, यह न्यूजीलैंड को चीन पर अपनी निर्यात निर्भरता कम करने में मदद करता है—क्योंकि उसके कुल माल निर्यात का 28% से अधिक हिस्सा चीन जाता है—और साथ ही इसकी आयात आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुदृढ़ता लाने में भी सहायक सिद्ध होता है। अब भारत की पहुंच केवल किसी एक विकसित अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पहुंच दक्षिण प्रशांत क्षेत्र के एक व्यापक क्षेत्रीय इकोसिस्टम तक हो गई है। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अधिक निश्चितता और बड़े पैमाने पर अपना परिचालन करना कहीं अधिक आसान हो गया है। यह बाज़ार तक पहुँच में बिखराव को कम करता है और उन व्यवसायों के लिए एक सुगम मार्ग तैयार करता है, जो प्रशांत क्षेत्र में अपना विस्तार करना चाहते हैं।  

भारत में व्यापार-आधारित विकास कई विकल्प देता है। देश के स्तर पर, भारत-न्यूज़ीलैंड एफटीए से व्यापक और संरचना निहित लाभ मिलने की उम्मीद है, जो भारत के निर्यात आधार के भौगोलिक रूप से व्यापक और क्षेत्रीय रूप से विशिष्ट स्वरूप को प्रतिबिंबित करता है। गुजरात के रसायन और रत्न, महाराष्ट्र की दवाएं और वाहन कल-पुर्ज़े, तमिलनाडु के वस्त्र, उत्तर प्रदेश के चमड़े और हस्तशिल्प, पंजाब के कृषि-आधारित उत्पाद, कर्नाटक की दवाएं और इलेक्ट्रॉनिक्स तथा पश्चिम बंगाल की चाय और इंजीनियरिंग सामान—ये सभी बेहतर मूल्य प्रतिस्पर्धा से लाभ प्राप्त करने की स्थिति में हैं। आंध्र प्रदेश और केरल जैसी तटीय अर्थव्यवस्थाओं को समुद्री निर्यात में बेहतर मूल्य प्राप्ति होगी, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र को चाय, मसाले, बांस और जैविक उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार पहुँच मिल सकती है। अब निर्यात में और विविधता लायी जा सकती है।

सौभाग्य से, व्यापार दोनों तरफ से होता है। भारत ने अपनी 70.03% टैरिफ लाइनों पर टैरिफ में ढील दी है, जबकि 29.97% टैरिफ लाइनों को छूट से बाहर रखा है; इसमें न्यूज़ीलैंड के साथ मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार के 95% मूल्य को शामिल किया गया है। उद्योग के लिए हमारे मुख्य इनपुट पर तुरंत ड्यूटी खत्म कर दी गई है। लकड़ी और लकड़ी के गूदे जैसे आयात से कागज़, पैकेजिंग, फ़र्नीचर और निर्माण क्षेत्रों को मदद मिलेगी। यह समझौता ऊन, और लौह व अलौह पदार्थों के कचरे और स्क्रैप तक पहुँच को भी बेहतर बनाता है, जिससे घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिलेगी। ये विनिर्माण को बढ़ावा देने वाले कारक हैं। इनकी लागत कम करके, यह समझौता एक महत्वपूर्ण काम करता है: यह भारतीय विनिर्माण के प्रतिस्पर्धा आधार को बदल देता है।

न्यूज़ीलैंड के लिए, हिसाब-किताब अलग है। भारत का मतलब है बड़ा पैमाना—विविधीकरण की रणनीति में एक ज़रूरी कड़ी, जो इतने बड़े मौके देती है कि कुछ ही देश उसकी बराबरी कर सकते हैं। 422 अरब डॉलर से ज़्यादा के विदेशी निवेश के साथ, न्यूज़ीलैंड की वैश्विक मौजूदगी पहले से ही काफी बड़ी है। भारत सिर्फ़ एक बाज़ार ही नहीं, बल्कि उत्पादन, तकनीक और मानव संसाधन के क्षेत्र में भी साझेदारी का अवसर देता है। 20 अरब डॉलर के निवेश के वादे के साथ, इस रिश्ते का दीर्घावधि रणनीतिक स्वरूप है—एक ऐसा स्वरूप जो रोज़गार पैदा करने, क्षमताओं को मजबूत करने और लेन-देन वाले जुड़ाव से आगे बढ़कर एक ऐसी साझेदारी में विकसित होने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है जो स्थायी, अंतर्निहित और लंबे समय तक चलने वाली हो।

वस्तु व्यापार से आगे का एफटीए

शायद इस साझेदारी का सबसे अहम पहलू इसकी बुनियादी बातों पर वापसी है: कृषि। कृषि तकनीक एक मुख्य स्तंभ के तौर पर उभरती है। यह समझौता एक ‘कृषि उत्पादकता साझेदारी’ की रूपरेखा तैयार करता है, जो ज्ञान के आदान-प्रदान की दिशा में आगे बढ़ती है। प्रशीतन-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स, सटीक खेती और कटाई के बाद के प्रबंधन में न्यूज़ीलैंड की विशेषज्ञता, पैदावार बढ़ाने और बर्बादी कम करने की भारत की ज़रूरत के अनुरूप है। कीवी फल, सेब और शहद के लिए कार्य योजनाएँ तथा उत्पादकों के लिए ‘उत्कृष्टता केंद्र’ और तकनीकी सहायता, बाज़ार तक पहुँच के साथ के साथ जोड़ी गई हैं। सेब, कीवी फल और मानुका शहद जैसे उत्पादों का आयात टैरिफ़ दर कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और मौसमी समय-सीमा के ज़रिए नियंत्रित किया गया है—ये ऐसे तंत्र हैं जिन्हें उपभोक्ता की पसंद और घरेलू सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसकी बनावट बहुत सोच-समझकर, लगभग सर्जिकल सटीकता के साथ तैयार की गई है।

सेवाओं के क्षेत्र में, यह समझौता एक नए क्षेत्र में कदम रखता है: प्रतिभा का संस्थागत रूप देना। आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा और अन्य क्षेत्रों के कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए 5,000 वीज़ा का एक समर्पित कोटा, अस्थायी आवाजाही के लिए एक व्यवस्थित मार्ग की सुविधा देता है। तीन साल तक वैध रहने वाले ये वीज़ा, न्यूज़ीलैंड में श्रम की अनुमानित कमी—जिसके 2045 तक 250,000 श्रमिकों तक पहुँचने का अनुमान है—को पूरा करने के साथ-साथ भारत के विशाल पेशेवर आधार का लाभ उठाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। आयुष चिकित्सकों, योग प्रशिक्षकों, भारतीय रसोइयों और संगीत शिक्षकों को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है, जिससे कुशल पेशेवरों की आवाजाही की परिभाषा पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर और व्यापक हो गई है। 

छात्रों के आवागमन और पढ़ाई के बाद काम करने के वीज़ा से जुड़े प्रावधान, पढ़ाई के दौरान हर हफ़्ते 20 घंटे तक काम करने के अधिकार की गारंटी देते हैं और पढ़ाई के बाद वहाँ रहने की सुविधा देते  हैं – एसटीईएम स्नातकों के लिए तीन साल तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार साल तक। इन प्रावधानों को एक संधि के दायरे में शामिल करके, उन्हें घरेलू नीति में होने वाले बदलावों की अस्थिरता से सुरक्षित रखा गया है।

पूर्वानुमान, सबसे पहले

यह समझौता एक ऐसी दुनिया में पूर्वानुमान को सुनिश्चित करने का एक प्रयास है, जहाँ ऐसा अवसर कम ही मिलता है।  

इस समझौते का दायरा इससे भी कहीं अधिक विस्तृत है: एमएसएमई में सहयोग; भौगोलिक संकेतकों के लिए यूरोपीय मानकों के अनुरूप बौद्धिक संपदा अधिकार; दवाओं की मंज़ूरी में तेज़ी लाना; और डिजिटल सीमा शुल्क प्रक्रियाएँ—जिसमें खराब होने वाली वस्तुओं के लिए निकासी का समय घटकर मात्र 24 घंटे रह गया है। इन प्रावधानों को एक औपचारिक संधि में शामिल करके, यह एफटीए  व्यापक सहयोग और मानव पूंजी के विकास के लिए एक उत्प्रेरक का काम करता है। 27 अप्रैल 2026 को, दोनों देशों ने एक ऐसी साझेदारी को औपचारिक रूप दिया है, जो आने वाले दशकों तक उनके क्षेत्रीय जुड़ाव को आकार देगी।

व्यापार समझौतों की भाषा में, यह एक सफलता है। भू-राजनीति की भाषा में, यह एक ताल-मेल है।

(लेखक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के सचिव हैं) 

भारत–न्यूजीलैंड एफटीए: किसानों, युवाओं, नौकरियों और विकास के लिए महिलाओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक समझौता

दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए), जिस पर सोमवार को हस्ताक्षर किये जायेंगे, विकसित दुनिया के साथ भारत की सहभागिता में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को किसानों, महिलाओं, युवाओं और रोजगार सृजक उद्योगों के लिए ठोस लाभ में बदलने से जुड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण में हुई निर्णायक प्रगति को प्रतिबिंबित करता है।

यह एफटीए प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जिसमें यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ शामिल हैं, के साथ हुए कई ऐतिहासिक व्यापार समझौतों के बाद हो रहा है। ये समझौते वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं और निर्यातकों को दुनिया की कुछ सबसे लाभकारी अर्थव्यवस्थाओं में, यहां तक कि वर्तमान वैश्विक अनिश्चितता और उथल-पुथल के बीच भी, प्रतिस्पर्धा आधारित बढ़त प्रदान करते हैं।

निर्यात और रोजगार को मजबूत बढ़ावा 

दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी इस समझौते के केंद्र में न्यूजीलैंड की यह प्रतिबद्धता है कि वह तुरंत ही सभी भारतीय उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर देगा, जिससे उस बाजार में एक महत्वपूर्ण बाधा दूर होगी, जहाँ हमारे प्रमुख निर्यात पर वर्तमान में 10% शुल्क लगाया जाता है।

यह वस्त्र, कालीन, धागे, कपड़े, फुटवियर, बैग, बेल्ट, वाहन घटक, मशीनरी, उपकरण, रत्न और आभूषण तथा हस्तशिल्प जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है। रोजगार के अवसरों का सृजन करने वाले ये उद्योग भारत के एमएसएमई इकोसिस्टम की रीढ़ हैं और इन्हें मूल्य प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुँच से लाभ मिलेगा। इससे निर्यात बढ़ेगा और निर्माण केन्द्रों, कारीगर समुदायों और लघु उद्यमों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। 

यह समझौता उस व्यापक दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जो 2014 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भारत की व्यापार नीति का मार्गदर्शन कर रहा है। यह समावेश, सशक्तिकरण और साझा समृद्धि में निहित है। व्यापार को राष्ट्रीय परिवर्तन के उपकरण के रूप में देखा जाता है, जो किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों को लाभ पहुंचाता है।

नारी शक्ति

इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह भारत का पहला महिला-नेतृत्व वाला एफटीए है। वार्ता टीम की लगभग सभी सदस्य महिलायें थीं। इनमें मुख्य वार्ताकार, उप मुख्य वार्ताकार, क्षेत्र प्रमुख और न्यूजीलैंड में भारत की राजदूत शामिल हैं।

यह उपलब्धि मोदी सरकार में महिलाओं के बढ़ते महत्व को दर्शाती है। यह शासन, नेतृत्व और विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है और  राष्ट्रीय विकास के संचालक के रूप में नारी शक्ति के विचार को सुदृढ़ करती है।

किसान पहले

एफटीए की संरचना कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गयी है। न्यूज़ीलैंड कीवी, सेब और शहद के लिए कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं का समर्थन करेगा। इन पहलों में बेहतर बीज सामग्री, अनुसंधान सहयोग, किसानों के लिए क्षमता निर्माण, बागवानी प्रबंधन प्रथाएं, कटाई के बाद सुधार, खाद्य सुरक्षा प्रणाली और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना शामिल है। सेब उत्पादकों और सतत मधुमक्खी पालन तौर-तरीकों के लिए परियोजनाएं उत्पादन और गुणवत्ता मानकों को बढ़ाएंगी, जिससे कृषि समृद्धि में वृद्धि होगी।

इसके साथ ही, भारत ने अपने प्रमुख कृषि हितों की मजबूती से सुरक्षा की है। डेयरी उत्पादों (जैसे दूध, क्रीम, व्हे, दही और पनीर); प्याज, चना, मटर, मकई, बादाम, चीनी और कुछ ख़ास तेल और वसा जैसी संवेदनशील वस्तुओं को शुल्क छूट से बाहर रखा गया है। समझौता सुनिश्चित करता है कि घरेलू किसान हानिकारक आयात प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहें। किसानों और मछुआरों के हितों की रक्षा करना सभी व्यापार वार्ताओं में भारत के दृष्टिकोण का केंद्र रहा है।

युवा और पेशेवर

समझौते का एक प्रमुख स्तंभ छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए बढ़ी हुई आवागमन की सुविधा है, जो भारत के युवाओं के लिए नए वैश्विक मार्ग का निर्माण करती है।

किसी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते में पहली बार, न्यूजीलैंड ने भारतीय छात्रों के आवागमन और अध्ययन के बाद काम करने के अवसरों के लिए एक संरचना-युक्त रूपरेखा पेश की है। भारतीय छात्रों पर कोई संख्यात्मक सीमा नहीं है। छात्रों को अध्ययन के दौरान प्रति सप्ताह कम से कम 20 घंटे काम करने की अनुमति दी जाएगी, जबकि अध्ययन के बाद काम करने के अधिकार – एसटीईएम  स्नातकों के लिए तीन वर्षों तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार वर्षों तक – बढ़ाए गये हैं।

समझौता किसी भी समय 5,000 भारतीय पेशेवरों तक के लिए अस्थायी रोजगार प्रवेश वीज़ा मार्ग पेश करता है, जिसके तहत आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, निर्माण तथा योग, आयुर्वेद, भारतीय व्यंजन और संगीत शिक्षा जैसे चयनित पारंपरिक क्षेत्रों में तीन वर्षों तक रहने की अनुमति होगी। 

इसके अलावा, एक वर्किंग हॉलीडे वीज़ा योजना प्रत्येक वर्ष 1,000 युवा भारतीयों को न्यूज़ीलैंड में 12 महीने तक रहने और काम करने की अनुमति देगी, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक अनुभव को मजबूती मिलेगी।

निवेश और नवाचार

न्यूजीलैंड ने भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इससे विनिर्माण, अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं, नवाचार इकोसिस्टम और रोजगार सृजन को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक ‘पुनर्संतुलन खंड’ शामिल किया गया है, जिससे भारत को यह अधिकार मिलता है कि यदि निवेश संबंधी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं होतीं हैं, तो वह सुधारात्मक कदम उठा सकता है। यह समझौता अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कौशल विकास और नवाचार-आधारित क्षेत्रों में सहयोग को भी बढ़ावा देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दीर्घकालिक विकासात्मक साझेदारियों में व्यापार पूरक भूमिका निभाएगा।

व्यापार रणनीति

भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करने की स्पष्ट और भरोसेमंद व्यापार रणनीति को प्रतिबिंबित करता है, जो भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए सार्थक बाजार पहुँच की सुविधा देता है और घरेलू संवेदनशीलताओं का सम्मान करता है। 

आज भारत ताकत और विश्वसनीयता की स्थिति के साथ वार्ता करता है। पहले के दशकों में व्यापार समझौतों को अक्सर संवेदनशील क्षेत्रों को अपर्याप्त सुरक्षा दिए बिना अंतिम रूप दिया जाता था, इसके विपरीत वर्तमान वार्ताएं सुनिश्चित करती हैं कि कृषि, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह से सुरक्षित रहें।

जैसे-जैसे भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपनी सहभागिता को प्रगाढ़ कर रहा है, विकसित दुनिया के साथ हुए व्यापार समझौते इस तथ्य का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि व्यापार नीति को कैसे राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित किया जा सकता है, जिससे विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में समावेशी वृद्धि और दीर्घावधि आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित होती है।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)         

भारत का फार्मा सेक्टर : नवाचार और  युवाओं के लिए नया आकाश

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक ‘नवाचार-आधारित’ वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित 10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है। 

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को री-स्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम ‘उद्योग-अकादमिक साझेदारी’ को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।