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बीकेसी के ‘सिटी पार्क’ को लेकर सियासत तेज, शिवसेना (उबाठा) विधायक ने लगाया ‘निजी इस्तेमाल’ का आरोप

मुंबई / सत्ता संदेश

Shiv Sena (UBT) के विधायक Varun Sardesai ने मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) स्थित एक सार्वजनिक उद्यान को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण यानी Mumbai Metropolitan Region Development Authority द्वारा विकसित “सिटी पार्क” आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं है और इसे केवल एमएमआरडीए अधिकारियों तथा उनके परिवारों के उपयोग तक सीमित कर दिया गया है।

सरदेसाई ने इस संबंध में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis को पत्र लिखकर मामले की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीकेसी इलाके में करीब पांच एकड़ में विकसित यह पार्क सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाया गया था, लेकिन वर्तमान में इसका इस्तेमाल केवल एमएमआरडीए अधिकारियों और उनके परिवारों द्वारा किया जा रहा है, जो पास स्थित जेटवान स्टाफ क्वार्टर में रहते हैं।

विधायक ने अपने पत्र में कहा कि यदि किसी सार्वजनिक परियोजना को आम नागरिकों के टैक्स के पैसे से विकसित किया गया है, तो उस पर सभी लोगों का समान अधिकार होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्क को “निजी एन्क्लेव” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों को वहां प्रवेश नहीं मिल पा रहा।

सरदेसाई ने मुख्यमंत्री से मांग की कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि पार्क को सार्वजनिक उपयोग के लिए पूरी तरह खोला जाए। उन्होंने कहा कि मुंबई जैसे महानगर में खुले सार्वजनिक स्थानों की भारी कमी है और ऐसे में किसी पार्क को सीमित लोगों तक रखना उचित नहीं है।

बीकेसी मुंबई का प्रमुख व्यावसायिक और प्रशासनिक क्षेत्र माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में कॉरपोरेट कार्यालय, सरकारी संस्थान और आवासीय परिसर स्थित हैं। ऐसे इलाके में सार्वजनिक पार्क और हरित क्षेत्र नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

इस मुद्दे पर अब राजनीतिक बहस भी तेज होती दिख रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि सार्वजनिक संपत्तियों का उपयोग पारदर्शी और सभी नागरिकों के लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए। वहीं अभी तक एमएमआरडीए की ओर से आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

शहरी विकास विशेषज्ञों का मानना है कि महानगरों में पार्क और सार्वजनिक स्थान केवल मनोरंजन के साधन नहीं होते, बल्कि वे पर्यावरण संतुलन और नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद जरूरी हैं। ऐसे में यदि किसी सार्वजनिक सुविधा की पहुंच सीमित की जाती है, तो यह शहरी प्रशासन और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।

फिलहाल इस मामले ने मुंबई की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और एमएमआरडीए इस विवाद पर क्या कदम उठाते हैं।

बिहार में सरकारी जमीन की हेराफेरी पर सरकार सख्त, मंत्री दिलीप जायसवाल ने अधिकारियों को दी चेतावनी

पटना / सत्ता संदेश

Bihar के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री Dilip Kumar Jaiswal ने सरकारी जमीनों के गलत हस्तांतरण और हेराफेरी को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा है कि ऐसी अनियमितताओं को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकारी भूमि को नियमों के विरुद्ध किसी व्यक्ति के नाम स्थानांतरित किया गया, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पटना में अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक के दौरान मंत्री ने कहा कि सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में सरकारी भूमि से जुड़े कई मामलों की शिकायतें सामने आई हैं, जिन्हें सरकार गंभीरता से ले रही है।

जायसवाल ने स्पष्ट निर्देश दिए कि भूमि रिकॉर्ड, दाखिल-खारिज और रजिस्ट्री प्रक्रियाओं में पूरी पारदर्शिता बरती जाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही, भ्रष्टाचार या मिलीभगत पाई गई, तो दोषियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी दोनों तरह की कार्रवाई की जाएगी।

मंत्री ने कहा कि कई बार सरकारी जमीन को फर्जी दस्तावेजों या रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर निजी व्यक्तियों के नाम कर दिया जाता है, जिससे सरकार को भारी नुकसान होता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों की पहचान कर तुरंत जांच कराई जाए और अवैध कब्जों को हटाने की प्रक्रिया तेज की जाए।

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग अब जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है। सरकार का मानना है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड और तकनीकी निगरानी से फर्जीवाड़े और अनियमितताओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में मंत्री का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि बिहार में जमीन विवाद और भूमि रिकॉर्ड से जुड़े मामलों को लंबे समय से गंभीर समस्या माना जाता रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे और फर्जी हस्तांतरण की शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार जमीन रिकॉर्ड प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में सफल होती है, तो इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही आम लोगों को भी भूमि संबंधी मामलों में राहत मिल सकेगी।

मंत्री ने अधिकारियों से यह भी कहा कि जनता की शिकायतों का समय पर समाधान किया जाए और किसी भी तरह की अनियमितता की जानकारी मिलने पर तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। सरकार ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में भूमि प्रबंधन और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर और सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।