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भारत दुनिया निवेशकों के लिए अवसर की भूमि: पीयूष गोयल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सिटी इंडिया कॉन्फ्रेंस 2026 में कहा कि भारत आज दुनिया का सबसे भरोसेमंद निवेश गंतव्य बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि भारत न केवल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, बल्कि आने वाले वर्षों में भी यह विकास की गति बनाए रखेगा।

वर्चुअल माध्यम से सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों और भू-राजनीतिक बदलावों के बावजूद भारत ने हर संकट को अवसर में बदला है। व्यापार, विनिर्माण, तकनीक और निवेश के क्षेत्र में देश लगातार मजबूत हो रहा है।

भारत पर बढ़ रहा वैश्विक भरोसा

गोयल ने बताया कि हाल ही में कनाडा और अमेरिका के निवेशकों व उद्योगपतियों के साथ हुई बैठकों में भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। उन्होंने कहा कि भारत को आज एक भरोसेमंद साझेदार, मजबूत लोकतंत्र और विशाल उपभोक्ता बाजार के रूप में देखा जा रहा है।

उनके अनुसार, वैश्विक निवेशकों के लिए अब सवाल यह नहीं है कि भारत में निवेश करना है या नहीं, बल्कि यह है कि वे भारत की विकास यात्रा में कितनी जल्दी शामिल होते हैं।

भारत में निवेश से कंपनियों को मिला बड़ा फायदा

मंत्री ने हुंडई और जेसीबी जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में लंबे समय तक निवेश करने वाली कंपनियों को बड़ा लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि आज जेसीबी भारत में बने उत्पादों का निर्यात 130 से अधिक देशों में कर रही है।

मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेगा कारोबार

पीयूष गोयल ने बताया कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में भारत ने 38 विकसित देशों के साथ 9 मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं। इससे भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौता 1 जून 2026 से लागू हो चुका है और अगले छह महीनों में दो से तीन अन्य महत्वपूर्ण व्यापार समझौते भी लागू होने की संभावना है।

100 नए औद्योगिक पार्क होंगे विकसित

सरकार देशभर में लगभग 3.5 अरब डॉलर की लागत से 100 आधुनिक औद्योगिक पार्क विकसित करेगी। इन पार्कों में तैयार फैक्ट्रियां, श्रमिक आवास, जल एवं बिजली सुविधाएं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय मंजूरियों जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

बुनियादी ढांचे पर बड़ा निवेश

गोयल ने बताया कि भारत बंदरगाहों, सड़कों, राजमार्गों, हवाई अड्डों और ग्रामीण संपर्क परियोजनाओं पर लगभग 130 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। पिछले एक दशक में देश की बंदरगाह और हवाई अड्डा क्षमता दोगुनी हो चुकी है।

सेमीकंडक्टर और AI पर फोकस

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य उभरती तकनीकों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि टाटा और एएसएमएल मिलकर भारत में पहला सेमीकंडक्टर उपकरण निर्माण संयंत्र स्थापित कर रहे हैं।

2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य

पीयूष गोयल ने कहा कि भारत 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने निवेशकों से भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनने का आह्वान करते हुए कहा कि देश में निवेश, नवाचार और विनिर्माण के लिए अपार अवसर मौजूद हैं।

उन्होंने विश्वास जताया कि भारत 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक विकास गाथा बनकर उभरेगा और वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक बाजार बना रहेगा।

भारत और ओमान द्वारा एक नए आर्थिक गलियारे को गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और ओमान के बीच वाणिज्यिक रिश्ते सदियों से चलते आ रहे हैं। दोनों देशों का एक साझा इतिहास प्राचीन नावों के पाल पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा है और पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए कायम रहा है। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) इस सभ्यतागत बंधन को और मजबूत करता है। एक ऐसे दौर में जब वैश्विक व्यापार भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद से जूझ रहा है, यह समझौता भरोसेमंद साझेदारों के साथ आर्थिक जुड़ाव को गहरा करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वर्ष 2022 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद, यह सीईपीए खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को मजबूती से स्थापित करता है। 

द्विपक्षीय व्यापार में लगातार विस्तार हुआ है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह 11.18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि, सेवाओं का व्यापार 2024 में 863 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। आर्थिक रिश्तों का विविधीकरण हुआ है और इसमें परंपरागत वस्तुओं से परे इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का समावेश हुआ है। फिर भी, काफी अनछुई संभावनाएं अभी भी बाकी हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवर आवाजाही और नियामकीय सहयोग को शामिल करके, यह सीईपीए अधिक सुदृढ़, समन्वित और व्यापक आर्थिक साझेदारी का एक व्यापक ढांचा तैयार करता है।

भारतीय निर्यात के विकास का प्रवेश द्वार

इस सीईपीए के तहत ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच हासिल है। इस समझौते से पहले, भारत के निर्यात का सिर्फ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ही सर्वाधिक तरजीह वाले देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की व्यवस्था के तहत ओमान में शुल्क-मुक्त प्रवेश करता था, जबकि शेष पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। इस सीईपीए के तहत, भारत के वर्तमान निर्यात की 99.38 प्रतिशत मात्रा अब शुल्क-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाएगी।

भारतीय निर्यातकों की दृष्टि से, ये लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं। ओमान के ‘विजन 2040’ के तहत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विविधीकरण में उसके द्वारा किए जा रहे निवेश से मांग में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में 875.83 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात के 2030 तक बढ़कर 1.3 से 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होने का अनुमान है। शून्य शुल्क की सुविधा के जरिए वस्त्र एवं परिधान सेक्टर को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। इससे तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी और साथ ही रोजगार भी सृजित होगा।

मौके व्यापक और विविध हैं। आयात पर निर्भर ओमान का दवा बाजार भारतीय कंपनियों के लिए मजबूत संभावनाएं पेश करता है। नियामकीय मंजूरियों में तेजी, गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की मान्यता और प्रमुख उत्पादों के शुल्क-मुक्त पहुंच से अनुपालन संबंधी लागत में कमी आएगी और बाजार में पैठ बढ़ेगी। चावल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और कन्फेक्शनरी सहित कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण आधारित निर्यात को भी लाभ होगा।

खुलते बाजार, हितों का संरक्षण

भारत के हालिया व्यापार समझौतों के अनुरूप, इस सीईपीए में एक संतुलित और सुविचारित दृष्टिकोण का समावेश है। जहां एक ओर भारत प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने एवं वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में शामिल होने के लिए बाजारों को खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहा है। दुग्ध तथा अनाज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के साथ-साथ रबर, वस्त्र और जूते जैसे उद्योग सुरक्षित बने हुए हैं। यह दृष्टिकोण बाहरी बाजारों तक पहुंच  और घरेलू कमजोरियों से बचाव को एक साथ जोड़ता है।

भारत ने ओमान से आयात होने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर लागू होने वाली अपनी 77 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों को उदार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे ओमान के प्रमुख निर्यातों, खासकर मेथनॉल और निर्जल अमोनिया जैसे औद्योगिक इनपुट को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। ओमान को धातुओं और मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला में तरजीही बाजार पहुंच हासिल होगी। इससे हमारे दोनों देशों को कम उत्पादन लागत का लाभ उठाने में मदद मिलेगी।

जिन क्षेत्रों में भारत के रक्षात्मक हित हैं, उन क्षेत्रों में टैरिफ दर कोटा (टीआरक्यू) के जरिए  ओमान को पहुंच प्रदान की गई है। यह व्यवस्था निर्दिष्ट मात्रा की सीमा के भीतर खजूर, संगमरमर और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल जैसे उत्पादों के तरजीही निर्यात की अनुमति देती है। बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जुड़ाव का यह तरीका प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ-साथ संक्रमण काल ​​के दौरान कमजोर क्षेत्रों को सहायता भी प्रदान करता है।

व्यापार, प्रतिभा और विश्वास

यह सीईपीए भारतीय सेवा प्रदाताओं को उन सभी क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं प्रदान करता है, जहां भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत है। इनमें आईटी, पेशेवर सेवाएं और निर्माण क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले प्रावधानों के साथ, भारतीय कंपनियों को ओमान में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने के अधिक मौके मिलेंगे।

प्रतिभाओं की दृष्टि से भी, यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। कंपनी के भीतर स्थानांतरित कर्मचारियों (इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी) की सीमा को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर, भारतीय कंपनियों को अब विशिष्टता प्राप्त कर्मचारियों को आसानी से तैनात करने तथा बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने की सुविधा मिल गई है। इसके अलावा, किसी भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में पहली बार, ओमान ने स्वतंत्र पेशेवरों के लिए एक समर्पित आवाजाही की व्यवस्था स्थापित की है। अब जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कारखानों में श्रमिकों की कमी हो रही है और आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर एआई एवं रोबोटिक्स के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में यह प्रावधान भारतीय प्रतिभाओं के लिए दुनिया भर में एक सशक्त मिसाल कायम करता है।

इस सीईपीए में समर्पित स्वास्थ्य सेवा का एक परिशिष्ट भी शामिल है, जो आयुर्वेद जैसी पारंपरिक प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में शामिल करने में सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, यह चिकित्सा पेशेवरों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित करता है। इसके अलावा, एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा समझौते से संबंधित बातचीत से भविष्य में भारतीय प्रवासी समुदाय को दोहरे योगदान के बोझ से बचाया जा सकेगा।

क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण

भारत-ओमान सीईपीए नियामकीय सहयोग, सामंजस्यपूर्ण मानकों और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करके टैरिफ से परे जाता है। यह भारत के आधुनिक व्यापार समझौतों से जुड़े उच्च मानकों को दर्शाता है और सीमा के भीतर मौजूद वाणिज्य में रुकावट डालने वाली विभिन्न बाधाओं को दूर करता है।

भारत एक बेहद ही एकीकृत क्षेत्रीय व्यापार संरचना की नींव रख रहा है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़े सभी साझेदार मिलकर अब वैश्विक जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत और वस्तुओं एवं सेवाओं के वैश्विक आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित, ओमान को एक अनूठी भौगोलिक हैसियत हासिल है। सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमान के लॉजिस्टिक्स व औद्योगिक केन्द्र भारत की मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी विशेषज्ञता एवं प्रतिभाओं को व्यापक मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ जोड़कर मूल्य श्रृंखलाओं को एकीकृत कर सकते हैं। इसका परिणाम क्षेत्रीय संपर्क और विकास के लिए निर्मित एक साझेदारी के रूप में सामने होगा।

व्यापार समझौते तभी सफल होते हैं जब वे भरोसा पैदा करते हैं, व्यवसायों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं और अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी साझेदारी बनाने के लिए आगे बढ़ाते हैं। यह सीईपीए ठीक यही काम कर रहा है। यह सदियों पुराने रिश्ते को इक्कीसवीं सदी की हकीकतों के अनुरूप एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में परिवर्तित कर रहा है।  

भारत–न्यूजीलैंड ने नए आर्थिक संघ की शुरुआत की दोनों देशों के लोगों के लिए एक लाभकारी समझौता: राजेश अग्रवाल    

दिल्ली/सत्ता संदेश

आधुनिक आर्थिक इतिहास के अधिकाँश समय के लिए व्यापार का तर्क सरल था: तुलनात्मक लाभ। यह प्रणाली काम करती थी – जब तक कि यह समझौता नहीं हुआ था। हाल के वर्षों में, भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन के साथ, व्यापार समझौतों की संरचना का फिर से निर्माण किया जा रहा है। समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के लिए, सवाल अब यह नहीं है कि एकीकृत होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह कि कितना गहराई से और कितनी तेजी से एकीकृत होना चाहिए। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की अपनी महत्वाकांक्षा की ओर आगे बढ़ रहा है।  देश ने पूर्व —इस बार भारत-प्रशांत क्षेत्र — की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है। भारत ऐसे साझेदारों की तलाश में है, जो आर्थिक एकीकरण और अपने नागरिकों की समृद्धि के लिए इसके दृष्टिकोण को साझा करते हैं। न्यूजीलैंड के रूप में, भारत को बिल्कुल ऐसा ही देश मिला।

यह रिश्ता लंबे समय से बन रहा था और पहली नज़र में इसका विस्तार व्यापार से आगे तक है। लगभग 3,00,000 भारतीय मूल के लोग न्यूज़ीलैंड में रहते हैं, जो इसकी आबादी का लगभग 5 प्रतिशत हैं— ये एक ऐसे सेतु का निर्माण करते हैं, जो उतना ही सांस्कृतिक है, जितना कि आर्थिक। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि द्विपक्षीय वस्तु व्यापार वित्त वर्ष 2024–25 में 1.3 बिलियन डॉलर पहुंच गया और पिछले वर्ष की तुलना में इसमें 49 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी — यह आंकड़ा तेज वृद्धि का संकेत देता है। सेवा व्यापार भी 13 प्रतिशत बढ़ गया है। दो क्रिकेट राष्ट्रों का एक साथ आना, न केवल रोमांचक है, बल्कि पहले से चल रही साझेदारी को भी रेखांकित करता है।

प्रतिस्पर्धी निर्माण केंद्रों के बीच व्यापार समझौतों के विपरीत, इस साझेदारी की ताकत इसकी पूरक भूमिका में निहित है। भारत पैमाने की पेशकश करता है: 1.4 अरब लोग, एक उभरता हुआ मध्यम वर्ग और एक विश्वस्तरीय डिजिटल और सेवा अवसंरचना। न्यूजीलैंड विशेषज्ञता की पेशकश करता है: उच्च-तकनीक कृषि, सतत वानिकी और विशिष्ट निर्माण तकनीक। दोनों देशों की पूरक भूमिका ही इस साझेदारी की नींव है।

बेहतर बाजार पहुंच:

एफटीए स्पष्टता और आकर्षक विशेषताओं के साथ संतुलन स्थापित करता है। भारत ने संवेदनशील उत्पादों को बाहर रखा है, जैसे डेयरी, अधिकांश पशु उत्पाद, सब्जियां, चीनी, कृत्रिम शहद, वसा और तेल, हथियार और गोला-बारूद, तांबा और एल्युमिनियम के सामान। शत-प्रतिशत भारतीय निर्यात पर शुल्क हटा दिए गये हैं, जिससे निरंतर मौजूद बाधा समाप्त हो गयी है: यह बाधा प्रमुख शुल्क लाइनों पर 10 प्रतिशत तक के शुल्क के रूप में मौजूद थी। यह प्रगति श्रम-गहन क्षेत्रों जैसे वस्त्र, परिधान, चमड़ा, सिरामिक और कालीन तथा उच्च-वृद्धि वाले वाहन और इंजीनियरिंग उद्योगों के लिए तत्काल प्रतिस्पर्धा आधारित प्रोत्साहन प्रदान करती है। भारत का वस्त्र और परिधान निर्यात, जो पहले से ही वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा है, अब न्यूजीलैंड के बाजार में प्रवेश कर रहा है, जो लगभग 1.9 बिलियन डॉलर मूल्य के ऐसे सामानों का वार्षिक आयात करता है और शून्य-शुल्क पहुँच की सुविधा देता है। इंजीनियरिंग निर्यात, जो दुनिया भर में 110 बिलियन डॉलर से भी अधिक हो गया है, अब ऐसे बाज़ार में भी वैसी ही गति पकड़ रहा है, जो 11 बिलियन डॉलर के इंजीनियरिंग उत्पाद आयात करता है। चमड़ा, दवाएँ, समुद्री उत्पाद और प्लास्टिक—ये सभी क्षेत्र जो पहले टैरिफ़ की वजह से बाधित थे—अब आगे बढ़ने और फलने-फूलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।   

भारत-प्रशांत क्षेत्र में विविधीकरण और विस्तार: 

यह समझौता दोनों देशों को उनके पारंपरिक बाजारों से हटकर अपने व्यापार में विविधता लाने में मदद करता है। एक ओर, यह भारत को न्यूजीलैंड—जो संसाधनों से समृद्ध एक विकसित अर्थव्यवस्था है—में शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच प्रदान करता है; वहीं दूसरी ओर, न्यूजीलैंड की कंपनियों के लिए यह न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारतीय बाजार, जहाँ 1.46 अरब लोग रहते हैं, के द्वार खोलता है, बल्कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था तक भी पहुंच सुनिश्चित करता है। इसके अलावा, यह न्यूजीलैंड को चीन पर अपनी निर्यात निर्भरता कम करने में मदद करता है—क्योंकि उसके कुल माल निर्यात का 28% से अधिक हिस्सा चीन जाता है—और साथ ही इसकी आयात आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुदृढ़ता लाने में भी सहायक सिद्ध होता है। अब भारत की पहुंच केवल किसी एक विकसित अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पहुंच दक्षिण प्रशांत क्षेत्र के एक व्यापक क्षेत्रीय इकोसिस्टम तक हो गई है। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अधिक निश्चितता और बड़े पैमाने पर अपना परिचालन करना कहीं अधिक आसान हो गया है। यह बाज़ार तक पहुँच में बिखराव को कम करता है और उन व्यवसायों के लिए एक सुगम मार्ग तैयार करता है, जो प्रशांत क्षेत्र में अपना विस्तार करना चाहते हैं।  

भारत में व्यापार-आधारित विकास कई विकल्प देता है। देश के स्तर पर, भारत-न्यूज़ीलैंड एफटीए से व्यापक और संरचना निहित लाभ मिलने की उम्मीद है, जो भारत के निर्यात आधार के भौगोलिक रूप से व्यापक और क्षेत्रीय रूप से विशिष्ट स्वरूप को प्रतिबिंबित करता है। गुजरात के रसायन और रत्न, महाराष्ट्र की दवाएं और वाहन कल-पुर्ज़े, तमिलनाडु के वस्त्र, उत्तर प्रदेश के चमड़े और हस्तशिल्प, पंजाब के कृषि-आधारित उत्पाद, कर्नाटक की दवाएं और इलेक्ट्रॉनिक्स तथा पश्चिम बंगाल की चाय और इंजीनियरिंग सामान—ये सभी बेहतर मूल्य प्रतिस्पर्धा से लाभ प्राप्त करने की स्थिति में हैं। आंध्र प्रदेश और केरल जैसी तटीय अर्थव्यवस्थाओं को समुद्री निर्यात में बेहतर मूल्य प्राप्ति होगी, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र को चाय, मसाले, बांस और जैविक उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार पहुँच मिल सकती है। अब निर्यात में और विविधता लायी जा सकती है।

सौभाग्य से, व्यापार दोनों तरफ से होता है। भारत ने अपनी 70.03% टैरिफ लाइनों पर टैरिफ में ढील दी है, जबकि 29.97% टैरिफ लाइनों को छूट से बाहर रखा है; इसमें न्यूज़ीलैंड के साथ मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार के 95% मूल्य को शामिल किया गया है। उद्योग के लिए हमारे मुख्य इनपुट पर तुरंत ड्यूटी खत्म कर दी गई है। लकड़ी और लकड़ी के गूदे जैसे आयात से कागज़, पैकेजिंग, फ़र्नीचर और निर्माण क्षेत्रों को मदद मिलेगी। यह समझौता ऊन, और लौह व अलौह पदार्थों के कचरे और स्क्रैप तक पहुँच को भी बेहतर बनाता है, जिससे घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिलेगी। ये विनिर्माण को बढ़ावा देने वाले कारक हैं। इनकी लागत कम करके, यह समझौता एक महत्वपूर्ण काम करता है: यह भारतीय विनिर्माण के प्रतिस्पर्धा आधार को बदल देता है।

न्यूज़ीलैंड के लिए, हिसाब-किताब अलग है। भारत का मतलब है बड़ा पैमाना—विविधीकरण की रणनीति में एक ज़रूरी कड़ी, जो इतने बड़े मौके देती है कि कुछ ही देश उसकी बराबरी कर सकते हैं। 422 अरब डॉलर से ज़्यादा के विदेशी निवेश के साथ, न्यूज़ीलैंड की वैश्विक मौजूदगी पहले से ही काफी बड़ी है। भारत सिर्फ़ एक बाज़ार ही नहीं, बल्कि उत्पादन, तकनीक और मानव संसाधन के क्षेत्र में भी साझेदारी का अवसर देता है। 20 अरब डॉलर के निवेश के वादे के साथ, इस रिश्ते का दीर्घावधि रणनीतिक स्वरूप है—एक ऐसा स्वरूप जो रोज़गार पैदा करने, क्षमताओं को मजबूत करने और लेन-देन वाले जुड़ाव से आगे बढ़कर एक ऐसी साझेदारी में विकसित होने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है जो स्थायी, अंतर्निहित और लंबे समय तक चलने वाली हो।

वस्तु व्यापार से आगे का एफटीए

शायद इस साझेदारी का सबसे अहम पहलू इसकी बुनियादी बातों पर वापसी है: कृषि। कृषि तकनीक एक मुख्य स्तंभ के तौर पर उभरती है। यह समझौता एक ‘कृषि उत्पादकता साझेदारी’ की रूपरेखा तैयार करता है, जो ज्ञान के आदान-प्रदान की दिशा में आगे बढ़ती है। प्रशीतन-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स, सटीक खेती और कटाई के बाद के प्रबंधन में न्यूज़ीलैंड की विशेषज्ञता, पैदावार बढ़ाने और बर्बादी कम करने की भारत की ज़रूरत के अनुरूप है। कीवी फल, सेब और शहद के लिए कार्य योजनाएँ तथा उत्पादकों के लिए ‘उत्कृष्टता केंद्र’ और तकनीकी सहायता, बाज़ार तक पहुँच के साथ के साथ जोड़ी गई हैं। सेब, कीवी फल और मानुका शहद जैसे उत्पादों का आयात टैरिफ़ दर कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और मौसमी समय-सीमा के ज़रिए नियंत्रित किया गया है—ये ऐसे तंत्र हैं जिन्हें उपभोक्ता की पसंद और घरेलू सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसकी बनावट बहुत सोच-समझकर, लगभग सर्जिकल सटीकता के साथ तैयार की गई है।

सेवाओं के क्षेत्र में, यह समझौता एक नए क्षेत्र में कदम रखता है: प्रतिभा का संस्थागत रूप देना। आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा और अन्य क्षेत्रों के कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए 5,000 वीज़ा का एक समर्पित कोटा, अस्थायी आवाजाही के लिए एक व्यवस्थित मार्ग की सुविधा देता है। तीन साल तक वैध रहने वाले ये वीज़ा, न्यूज़ीलैंड में श्रम की अनुमानित कमी—जिसके 2045 तक 250,000 श्रमिकों तक पहुँचने का अनुमान है—को पूरा करने के साथ-साथ भारत के विशाल पेशेवर आधार का लाभ उठाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। आयुष चिकित्सकों, योग प्रशिक्षकों, भारतीय रसोइयों और संगीत शिक्षकों को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है, जिससे कुशल पेशेवरों की आवाजाही की परिभाषा पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर और व्यापक हो गई है। 

छात्रों के आवागमन और पढ़ाई के बाद काम करने के वीज़ा से जुड़े प्रावधान, पढ़ाई के दौरान हर हफ़्ते 20 घंटे तक काम करने के अधिकार की गारंटी देते हैं और पढ़ाई के बाद वहाँ रहने की सुविधा देते  हैं – एसटीईएम स्नातकों के लिए तीन साल तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार साल तक। इन प्रावधानों को एक संधि के दायरे में शामिल करके, उन्हें घरेलू नीति में होने वाले बदलावों की अस्थिरता से सुरक्षित रखा गया है।

पूर्वानुमान, सबसे पहले

यह समझौता एक ऐसी दुनिया में पूर्वानुमान को सुनिश्चित करने का एक प्रयास है, जहाँ ऐसा अवसर कम ही मिलता है।  

इस समझौते का दायरा इससे भी कहीं अधिक विस्तृत है: एमएसएमई में सहयोग; भौगोलिक संकेतकों के लिए यूरोपीय मानकों के अनुरूप बौद्धिक संपदा अधिकार; दवाओं की मंज़ूरी में तेज़ी लाना; और डिजिटल सीमा शुल्क प्रक्रियाएँ—जिसमें खराब होने वाली वस्तुओं के लिए निकासी का समय घटकर मात्र 24 घंटे रह गया है। इन प्रावधानों को एक औपचारिक संधि में शामिल करके, यह एफटीए  व्यापक सहयोग और मानव पूंजी के विकास के लिए एक उत्प्रेरक का काम करता है। 27 अप्रैल 2026 को, दोनों देशों ने एक ऐसी साझेदारी को औपचारिक रूप दिया है, जो आने वाले दशकों तक उनके क्षेत्रीय जुड़ाव को आकार देगी।

व्यापार समझौतों की भाषा में, यह एक सफलता है। भू-राजनीति की भाषा में, यह एक ताल-मेल है।

(लेखक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के सचिव हैं) 

भारत–न्यूजीलैंड एफटीए: किसानों, युवाओं, नौकरियों और विकास के लिए महिलाओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक समझौता

दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए), जिस पर सोमवार को हस्ताक्षर किये जायेंगे, विकसित दुनिया के साथ भारत की सहभागिता में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को किसानों, महिलाओं, युवाओं और रोजगार सृजक उद्योगों के लिए ठोस लाभ में बदलने से जुड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण में हुई निर्णायक प्रगति को प्रतिबिंबित करता है।

यह एफटीए प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जिसमें यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ शामिल हैं, के साथ हुए कई ऐतिहासिक व्यापार समझौतों के बाद हो रहा है। ये समझौते वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं और निर्यातकों को दुनिया की कुछ सबसे लाभकारी अर्थव्यवस्थाओं में, यहां तक कि वर्तमान वैश्विक अनिश्चितता और उथल-पुथल के बीच भी, प्रतिस्पर्धा आधारित बढ़त प्रदान करते हैं।

निर्यात और रोजगार को मजबूत बढ़ावा 

दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी इस समझौते के केंद्र में न्यूजीलैंड की यह प्रतिबद्धता है कि वह तुरंत ही सभी भारतीय उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर देगा, जिससे उस बाजार में एक महत्वपूर्ण बाधा दूर होगी, जहाँ हमारे प्रमुख निर्यात पर वर्तमान में 10% शुल्क लगाया जाता है।

यह वस्त्र, कालीन, धागे, कपड़े, फुटवियर, बैग, बेल्ट, वाहन घटक, मशीनरी, उपकरण, रत्न और आभूषण तथा हस्तशिल्प जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है। रोजगार के अवसरों का सृजन करने वाले ये उद्योग भारत के एमएसएमई इकोसिस्टम की रीढ़ हैं और इन्हें मूल्य प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुँच से लाभ मिलेगा। इससे निर्यात बढ़ेगा और निर्माण केन्द्रों, कारीगर समुदायों और लघु उद्यमों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। 

यह समझौता उस व्यापक दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जो 2014 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भारत की व्यापार नीति का मार्गदर्शन कर रहा है। यह समावेश, सशक्तिकरण और साझा समृद्धि में निहित है। व्यापार को राष्ट्रीय परिवर्तन के उपकरण के रूप में देखा जाता है, जो किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों को लाभ पहुंचाता है।

नारी शक्ति

इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह भारत का पहला महिला-नेतृत्व वाला एफटीए है। वार्ता टीम की लगभग सभी सदस्य महिलायें थीं। इनमें मुख्य वार्ताकार, उप मुख्य वार्ताकार, क्षेत्र प्रमुख और न्यूजीलैंड में भारत की राजदूत शामिल हैं।

यह उपलब्धि मोदी सरकार में महिलाओं के बढ़ते महत्व को दर्शाती है। यह शासन, नेतृत्व और विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है और  राष्ट्रीय विकास के संचालक के रूप में नारी शक्ति के विचार को सुदृढ़ करती है।

किसान पहले

एफटीए की संरचना कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गयी है। न्यूज़ीलैंड कीवी, सेब और शहद के लिए कृषि उत्पादकता कार्ययोजनाओं का समर्थन करेगा। इन पहलों में बेहतर बीज सामग्री, अनुसंधान सहयोग, किसानों के लिए क्षमता निर्माण, बागवानी प्रबंधन प्रथाएं, कटाई के बाद सुधार, खाद्य सुरक्षा प्रणाली और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना शामिल है। सेब उत्पादकों और सतत मधुमक्खी पालन तौर-तरीकों के लिए परियोजनाएं उत्पादन और गुणवत्ता मानकों को बढ़ाएंगी, जिससे कृषि समृद्धि में वृद्धि होगी।

इसके साथ ही, भारत ने अपने प्रमुख कृषि हितों की मजबूती से सुरक्षा की है। डेयरी उत्पादों (जैसे दूध, क्रीम, व्हे, दही और पनीर); प्याज, चना, मटर, मकई, बादाम, चीनी और कुछ ख़ास तेल और वसा जैसी संवेदनशील वस्तुओं को शुल्क छूट से बाहर रखा गया है। समझौता सुनिश्चित करता है कि घरेलू किसान हानिकारक आयात प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहें। किसानों और मछुआरों के हितों की रक्षा करना सभी व्यापार वार्ताओं में भारत के दृष्टिकोण का केंद्र रहा है।

युवा और पेशेवर

समझौते का एक प्रमुख स्तंभ छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए बढ़ी हुई आवागमन की सुविधा है, जो भारत के युवाओं के लिए नए वैश्विक मार्ग का निर्माण करती है।

किसी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते में पहली बार, न्यूजीलैंड ने भारतीय छात्रों के आवागमन और अध्ययन के बाद काम करने के अवसरों के लिए एक संरचना-युक्त रूपरेखा पेश की है। भारतीय छात्रों पर कोई संख्यात्मक सीमा नहीं है। छात्रों को अध्ययन के दौरान प्रति सप्ताह कम से कम 20 घंटे काम करने की अनुमति दी जाएगी, जबकि अध्ययन के बाद काम करने के अधिकार – एसटीईएम  स्नातकों के लिए तीन वर्षों तक और डॉक्टर डिग्री के शोधार्थियों के लिए चार वर्षों तक – बढ़ाए गये हैं।

समझौता किसी भी समय 5,000 भारतीय पेशेवरों तक के लिए अस्थायी रोजगार प्रवेश वीज़ा मार्ग पेश करता है, जिसके तहत आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, निर्माण तथा योग, आयुर्वेद, भारतीय व्यंजन और संगीत शिक्षा जैसे चयनित पारंपरिक क्षेत्रों में तीन वर्षों तक रहने की अनुमति होगी। 

इसके अलावा, एक वर्किंग हॉलीडे वीज़ा योजना प्रत्येक वर्ष 1,000 युवा भारतीयों को न्यूज़ीलैंड में 12 महीने तक रहने और काम करने की अनुमति देगी, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक अनुभव को मजबूती मिलेगी।

निवेश और नवाचार

न्यूजीलैंड ने भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इससे विनिर्माण, अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं, नवाचार इकोसिस्टम और रोजगार सृजन को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक ‘पुनर्संतुलन खंड’ शामिल किया गया है, जिससे भारत को यह अधिकार मिलता है कि यदि निवेश संबंधी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं होतीं हैं, तो वह सुधारात्मक कदम उठा सकता है। यह समझौता अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कौशल विकास और नवाचार-आधारित क्षेत्रों में सहयोग को भी बढ़ावा देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दीर्घकालिक विकासात्मक साझेदारियों में व्यापार पूरक भूमिका निभाएगा।

व्यापार रणनीति

भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करने की स्पष्ट और भरोसेमंद व्यापार रणनीति को प्रतिबिंबित करता है, जो भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए सार्थक बाजार पहुँच की सुविधा देता है और घरेलू संवेदनशीलताओं का सम्मान करता है। 

आज भारत ताकत और विश्वसनीयता की स्थिति के साथ वार्ता करता है। पहले के दशकों में व्यापार समझौतों को अक्सर संवेदनशील क्षेत्रों को अपर्याप्त सुरक्षा दिए बिना अंतिम रूप दिया जाता था, इसके विपरीत वर्तमान वार्ताएं सुनिश्चित करती हैं कि कृषि, डेयरी और अन्य संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह से सुरक्षित रहें।

जैसे-जैसे भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपनी सहभागिता को प्रगाढ़ कर रहा है, विकसित दुनिया के साथ हुए व्यापार समझौते इस तथ्य का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि व्यापार नीति को कैसे राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित किया जा सकता है, जिससे विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में समावेशी वृद्धि और दीर्घावधि आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित होती है।

(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)