बाबू रजब अली कवि और पहले PhD डॉ. रुलिया सिंह सिद्धू का निधन
लुधियाना / सत्ता संदेश
साहित्य और एकेडमिक क्षेत्र की एक जानी-मानी हस्ती, प्रिंसिपल डॉ. रुलिया सिंह सिद्धू का न्यूज़ीलैंड में निधन हो गया है। पंजगराई (मोगा) में जन्मे और सेवापंथी संप्रदाय के संत मक्खन सिंह जी के बड़े भाई, डॉ. रुलिया सिंह सिद्धू ने न सिर्फ़ पंजाबी शिरोमणि कवि बाबू रजब अली जी के पंजाबी साहित्य में योगदान पर PhD की और डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की, बल्कि उन्होंने अपने साहित्य के क्षेत्र को भी बढ़ाया और पंजाबी साहित्य में दो नॉवेल ‘घुम्मनघेरी’ और ‘मस्या’ भी जोड़े।
इसके अलावा, उन्होंने गुरबानी साहित्य में भी हाथ आज़माया और ‘श्री जपजी साहिब’ के आसान विचार पर पैम्फलेट छपवाकर गुरु घरों और आम लोगों में बांटे ताकि उन्हें गुरबानी के असली मकसद के बारे में पता चल सके। वे लंबे समय से अपने बड़े बेटे नवजोत सिंह सिद्धू के साथ न्यूजीलैंड में रह रहे थे और वहीं उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके जाने से पंजाबी समाज और साहित्य जगत को एक ऐसा नुकसान हुआ है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। उनका अंतिम संस्कार न्यूजीलैंड में ही किया जाएगा। वे लंबे समय तक शहीद भगत सिंह म्युनिसिपल कॉलेज कोटकपूरा के प्रिंसिपल रहे।
डॉ. आतम हमराही जी की प्रेरणा से ही उन्होंने बाबू रजब अली जी पर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी। पंजाबी लोक विरासत अकादमी ,की ओर से श्रद्धांजलि देते हुए इस संस्था के चेयरमैन प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने कहा है कि डॉ. सिद्धू बहुत ही नेक और मासूम आत्मा थे। डॉ. आतम हमराही जी की वजह से ही वे 1976-77 से मुझ पर मेहरबान थे।
पिछले सालों में जब भी मैं बाबू रजब अली जी की पोती रेहाना रजब अली, जो साहीवाल (पाकिस्तान) में रहती हैं, से मिला हूं, तो वह रुलिया सिंह सिद्धू जी का एक बच्चे की तरह सम्मान करना कभी नहीं भूलतीं। अब उसका फ़ोन कभी नहीं आएगा, जिसकी कमी मुझे ज़िंदगी भर खलेगी।

