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सुप्रीम कोर्ट से राहत, एशियाई खेल 2026 चयन ट्रायल्स में उतरेंगी विनेश फोगाट

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Vinesh Phogat को बड़ी राहत देते हुए Supreme Court of India ने शुक्रवार को एशियाई खेल 2026 के चयन ट्रायल्स में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी। इसके बाद अब विनेश 30 और 31 मई को आयोजित होने वाले ट्रायल्स में भाग ले सकेंगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति P. S. Narasimha और न्यायमूर्ति Alok Aradhe की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिया। मामला Wrestling Federation of India (डब्ल्यूएफआई) की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले विनेश फोगाट को चयन ट्रायल्स में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी। इसके खिलाफ डब्ल्यूएफआई उच्चतम न्यायालय पहुंचा था। हालांकि शीर्ष अदालत ने फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए विनेश को ट्रायल्स में भाग लेने की मंजूरी दे दी।

इस फैसले के बाद भारतीय कुश्ती जगत में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि विनेश फोगाट देश की सबसे चर्चित और अनुभवी महिला पहलवानों में गिनी जाती हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए कई महत्वपूर्ण पदक जीते हैं और महिला कुश्ती को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।

पिछले कुछ समय से भारतीय कुश्ती प्रशासन और खिलाड़ियों के बीच विवाद लगातार चर्चा में रहा है। ऐसे में विनेश फोगाट का चयन ट्रायल्स में हिस्सा लेना खेल जगत और प्रशंसकों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

खेल विशेषज्ञों का कहना है कि चयन ट्रायल्स में अनुभवी और शीर्ष खिलाड़ियों की मौजूदगी से प्रतिस्पर्धा का स्तर मजबूत होगा और भारतीय टीम को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुनने में मदद मिलेगी।

एशियाई खेल 2026 को ध्यान में रखते हुए भारतीय पहलवान अभी से तैयारी में जुटे हुए हैं। चयन ट्रायल्स को आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए टीम गठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि विनेश फोगाट ट्रायल्स में कैसा प्रदर्शन करती हैं और क्या वह एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने में सफल हो पाती हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सेवानिवृत्त हो रहे न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मित्तल की सराहना की

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Surya Kant ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त हो रहे न्यायाधीशों J. K. Maheshwari और Pankaj Mithal की शुक्रवार को खुलकर सराहना की। प्रधान न्यायाधीश ने दोनों न्यायाधीशों की विनम्रता, न्यायिक विवेक और न्यायपालिका के प्रति समर्पण को उल्लेखनीय बताया।

उच्चतम न्यायालय में आयोजित विदाई संबोधन के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि दोनों न्यायाधीशों ने अपने कार्यकाल में संतुलित दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और न्यायिक मर्यादा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया कि न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने जटिल मामलों की सुनवाई के दौरान गहरी कानूनी समझ और शांत स्वभाव का परिचय दिया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उनकी कार्यशैली आने वाली पीढ़ियों के न्यायाधीशों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगी।

दोनों न्यायाधीश एक जून से 12 जुलाई तक की आंशिक अदालती कार्य अवधि के दौरान सेवानिवृत्त होंगे। इस अवधि में उच्चतम न्यायालय में सीमित पीठों के माध्यम से नियमित और जरूरी मामलों की सुनवाई की जाती है।

Supreme Court of India में अपने कार्यकाल के दौरान दोनों न्यायाधीश कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई का हिस्सा रहे हैं। कानूनी समुदाय में उन्हें शांत, संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाले न्यायाधीशों के रूप में देखा जाता है।

न्यायपालिका से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की विदाई केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह उनके योगदान और न्यायिक विरासत को सम्मान देने का अवसर भी होती है।

कानूनी जगत में यह भी माना जाता है कि न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मित्तल ने विभिन्न संवैधानिक, प्रशासनिक और नागरिक मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय देकर न्यायिक प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान दिया है।

फिलहाल न्यायिक समुदाय और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी दोनों न्यायाधीशों के कार्यकाल की सराहना करते हुए उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

भोजशाला परिसर विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली नई याचिका दाखिल

नयी दिल्ली: / सत्ता संदेश

Supreme Court of India में मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद में एक नई याचिका दायर की गई है। इस याचिका में Madhya Pradesh High Court के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर बताया गया था।

यह मामला लंबे समय से विवादित रहा है, जिसमें धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलू जुड़े हुए हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार तथा Archaeological Survey of India (एएसआई) ले सकते हैं।

नई याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष तथ्यात्मक और कानूनी दृष्टि से विवादास्पद है, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आग्रह किया है कि मामले की विस्तृत सुनवाई की जाए और सभी ऐतिहासिक साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

भोजशाला परिसर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से मतभेद चले आ रहे हैं। एक पक्ष इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे एक ऐतिहासिक मस्जिद स्थल के रूप में देखता है।

इस मामले में पहले भी कई बार अदालतों में सुनवाई हो चुकी है और विभिन्न आदेश दिए गए हैं। हाल के हाईकोर्ट आदेश के बाद यह विवाद फिर से कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक रिपोर्टों और कानूनी पहलुओं का संतुलित मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है। एएसआई की भूमिका भी इस प्रकार के विवादों में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह देश की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन से जुड़ी प्रमुख संस्था है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका पर अगली सुनवाई की तारीख तय होनी बाकी है, और सभी पक्षों की नजर अब शीर्ष अदालत के रुख पर टिकी है।

घर खरीदारों के पैसों की कथित हेराफेरी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, ईडी और आरबीआई से मांगा जवाब

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Supreme Court of India ने घर खरीदारों के पैसों की कथित हेराफेरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और कई रियल एस्टेट कंपनियों से जवाब तलब किया है। यह मामला नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र की आवासीय परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये के कथित दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है।

प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति Vipul M. Pancholi शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और 15 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह याचिका वंदना सभरवाल द्वारा दायर की गई है, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें पेश कीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे परियोजनाओं से जुड़े घर खरीदारों से एकत्र किए गए हजारों करोड़ रुपये का कथित रूप से गलत तरीके से उपयोग किया गया और नियामक निगरानी में गंभीर खामियां रही हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है और यदि बड़े पैमाने पर धन के दुरुपयोग के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह हजारों परिवारों को प्रभावित कर सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता की कमी और नियामक संस्थाओं की सीमित निगरानी के कारण इस तरह की समस्याएं बार-बार सामने आती रही हैं। इसी कारण केंद्र सरकार, ईडी और आरबीआई से विस्तृत जवाब मांगा गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहल घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा और रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। इस मामले पर अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी, जिसमें सभी पक्षों के जवाबों पर विचार किया जाएगा।

ट्रांसजेंडर कानून को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की केंद्र की मांग

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की है। केंद्र का कहना है कि एक ही कानून से जुड़े मामलों पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों में सुनवाई होने से विरोधाभासी फैसले आने की संभावना बन सकती है, इसलिए मामले की एकरूपता बनाए रखने के लिए सर्वोच्च अदालत में संयुक्त सुनवाई जरूरी है।

बुधवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र द्वारा दायर स्थानांतरण याचिकाओं पर शुक्रवार को तत्काल सुनवाई की जाए।

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 के खिलाफ देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं लंबित हैं। इन सभी मामलों में समान कानूनी और संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और स्पष्टता बनाए रखने के लिए सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करना उचित होगा।

सूत्रों के अनुसार, कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में संशोधित अधिनियम के कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्तियां जताई गई हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कुछ प्रावधान ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों, पहचान और समानता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। वहीं, केंद्र सरकार का पक्ष है कि यह कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अलग-अलग उच्च न्यायालयों में समान मुद्दों पर अलग-अलग फैसले आते हैं, तो इससे कानूनी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे मामलों में आमतौर पर सर्वोच्च अदालत सभी याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर एक साथ सुनवाई करती है, ताकि पूरे देश में एक समान कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके।

ट्रांसजेंडर अधिकारों का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में देश में व्यापक चर्चा का विषय रहा है। उच्चतम न्यायालय पहले भी ट्रांसजेंडर समुदाय को समान अधिकार और सम्मानजनक जीवन देने को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले दे चुका है। ऐसे में इस संशोधन अधिनियम को लेकर चल रही कानूनी चुनौती को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित याचिकाओं को सर्वोच्च अदालत में स्थानांतरित किया जाएगा या नहीं।

वीवीपैट पर्चियों पर समय दर्ज करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को सौंपा फैसला

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

चुनावी पारदर्शिता और मतदान प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में उच्चतम न्यायालय ने वीवीपैट पर्चियों पर वोट डालने का सटीक समय दर्ज करने की मांग संबंधी याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचन आयोग को सौंप दिया है। अदालत ने कहा कि यह एक तकनीकी विषय है, जिस पर फैसला लेने का अधिकार और विशेषज्ञता निर्वाचन आयोग के पास है।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को इस जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया मुद्दा चुनावी निष्पक्षता और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है, लेकिन वीवीपैट प्रणाली में तकनीकी बदलाव संभव हैं या नहीं, इसका आकलन निर्वाचन आयोग ही बेहतर तरीके से कर सकता है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि चुनावों में अधिक पारदर्शिता और सत्यापन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वीवीपैट पर्चियों पर मतदान का सटीक समय दर्ज करने की मांग एक तकनीकी प्रकृति का विषय है और यह निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय इस स्तर पर सीधे कोई तकनीकी निर्देश जारी करने के बजाय संबंधित संवैधानिक संस्था को इस विषय पर विचार करने का अवसर देना उचित समझता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित जनहित याचिका निर्वाचन आयोग को भेजी जाए, ताकि आयोग इस पर आवश्यक विचार कर सके और जरूरत पड़ने पर तकनीकी विशेषज्ञों की राय लेकर उचित निर्णय ले सके।

याचिका में दावा किया गया था कि यदि प्रत्येक वीवीपैट पर्ची पर मतदाता द्वारा वोट डालने का सटीक समय अंकित किया जाए, तो इससे चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही में और अधिक सुधार होगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि समय दर्ज होने से मतदान रिकॉर्ड का बेहतर सत्यापन संभव होगा और किसी भी विवाद या जांच की स्थिति में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता मजबूत होगी।

गौरतलब है कि वीवीपैट यानी ‘वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल’ प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से जुड़ी होती है, जिसके माध्यम से मतदाता यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसका वोट सही उम्मीदवार को दर्ज हुआ है। मतदान के बाद कुछ सेकंड के लिए मशीन में एक पर्ची दिखाई देती है, जिसमें उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिन्ह प्रदर्शित होता है। यही पर्ची बाद में सत्यापन प्रक्रिया में उपयोग की जाती है।

हाल के वर्षों में चुनावी पारदर्शिता को लेकर वीवीपैट प्रणाली को लेकर कई बहसें और याचिकाएं सामने आती रही हैं। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा समय-समय पर वीवीपैट के उपयोग और उसके सत्यापन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे निर्वाचन आयोग को भविष्य में तकनीकी सुधारों पर विचार करने का अवसर मिलेगा।

कॉकरोच जनता पार्टी मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तत्काल सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

Supreme Court of India ने सोमवार को फर्जी वकीलों और कथित तौर पर व्यंग्यात्मक डिजिटल मंच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़ी गतिविधियों की जांच की मांग करने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बनी सीजेपी को लेकर दायर इस याचिका पर अदालत ने फिलहाल कोई तात्कालिक राहत देने से मना कर दिया।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख अधिवक्ता एन.के. गोस्वामी ने किया। उन्होंने अदालत से इस मामले में जल्द सुनवाई की मांग करते हुए आरोप लगाया कि फर्जी वकीलों और डिजिटल मंच की गतिविधियों से न्याय व्यवस्था और समाज में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

हालांकि, पीठ ने तत्काल सुनवाई की मांग को स्वीकार नहीं किया। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह इस मुद्दे को “इतने भावुक तरीके” से न लें। अदालत की इस टिप्पणी को मामले में फिलहाल संयम बरतने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

बताया जा रहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी नामक यह डिजिटल मंच व्यंग्यात्मक और राजनीतिक कटाक्ष से जुड़े कंटेंट के कारण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है। इसके कई पोस्ट और वीडियो को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा बताया, जबकि कुछ ने इसकी सामग्री पर आपत्ति जताई है।

याचिका में कथित तौर पर मंच से जुड़े लोगों की गतिविधियों और फर्जी वकीलों के नेटवर्क की जांच कराने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए यह स्पष्ट संकेत दिया कि हर वायरल या चर्चित विषय पर आपात सुनवाई जरूरी नहीं होती।

अब माना जा रहा है कि याचिकाकर्ता नियमित प्रक्रिया के तहत मामले को सूचीबद्ध कराने की कोशिश करेगा, जिसके बाद भविष्य में इस पर सुनवाई हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट से पूर्व आबकारी आयुक्त को राहत, छत्तीसगढ़ शराब नीति घोटाले के दो मामलों में मिली जमानत

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को कई करोड़ रुपये के शराब नीति घोटाले से जुड़े दो मामलों में जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि अन्य सह-आरोपी पहले ही जमानत पर बाहर हैं और मुकदमों के निष्कर्ष तक पहुंचने में अभी काफी समय लगेगा।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मुख्य मामले से जुड़े दो अलग-अलग मामलों और संबंधित धनशोधन मामले में सुनवाई करते हुए पूर्व अधिकारी को यह राहत प्रदान की।

पीठ ने कहा कि दास को कथित तौर पर इस मामले का “मुख्य सूत्रधार” बताया गया है, और उन पर आरोप है कि उन्होंने राज्य की आबकारी नीति तैयार करने में भूमिका निभाई ताकि अन्य सह-आरोपियों को लाभ पहुंचाया जा सके।

जमानत देते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि दास को दो अलग-अलग मामलों में क्रमशः 18 सितंबर 2025 और 19 दिसंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था।

अदालत ने उन पर वही जमानत शर्तें लागू कीं जो अन्य सह-आरोपियों पर लागू हैं। इसके तहत उन्हें राज्य से बाहर रहना होगा और वह केवल मुकदमे की सुनवाई तथा जांच में शामिल होने के लिए ही छत्तीसगढ़ आ सकेंगे।

हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि वह भविष्य में जमानत की शर्तों में ढील देने की मांग कर सकते हैं।

इससे पहले एक मार्च को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में उप सचिव रहीं सौम्या चौरसिया को भी शराब घोटाले से जुड़े दो मामलों में जमानत दी थी।

बिक्रम सिंह मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: आय से ज़्यादा संपत्ति मामले में ज़मानत मिली

पंजाब डेस्क: शिरोमणि अकाली दल के सीनियर नेता और पंजाब के पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने आय से ज़्यादा संपत्ति मामले में उनकी ज़मानत अर्ज़ी मंज़ूर कर ली है। गौरतलब है कि मजीठिया को 25 जून, 2025 को उनके अमृतसर वाले घर से गिरफ़्तार किया गया था और तब से वे नई नाभा जेल में बंद हैं।

40 हज़ार पेज की चार्जशीट और आरोप: विजिलेंस ब्यूरो ने मजीठिया के ख़िलाफ़ मोहाली कोर्ट में 40 हज़ार पेज की चार्जशीट फ़ाइल की है, जिसमें पता चला है कि उन्होंने 700 करोड़ रुपये की गैर-कानूनी संपत्ति जमा की है। इस मामले में पंजाब पुलिस के पूर्व अधिकारियों और ED अधिकारियों समेत करीब 200 सरकारी गवाह बनाए गए हैं।

पॉलिटिकल रिएक्शनशिरोमणि अकाली दल: पार्टी के चीफ स्पोक्सपर्सन एडवोकेट अर्शदीप सिंह कलेर ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि भले ही इसमें समय लगा, लेकिन इंसाफ हुआ है। उन्होंने कहा कि मजीठिया के बाहर आने से पूरे अकाली दल में खुशी की लहर है।

आम आदमी पार्टी: पंजाब के कैबिनेट मिनिस्टर हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि बेल मिलने का मतलब यह नहीं है कि वह बरी हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि मजीठिया के खिलाफ पक्के सबूत हैं और लीगल प्रोसेस जारी रहेगा।

2027 के चुनाव पर असर पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मजीठिया की जाट सिख वोट बैंक और माझा इलाके में मजबूत पकड़ है। उनकी रिहाई से 2027 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को बड़ी बढ़त मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, राधा स्वामी सत्संग ब्यास के हेड बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों और मजीठिया के बीच जेल में हुई मुलाकात को भी पॉलिटिकल तौर पर अहम माना जा रहा है।

वह जेल से कब रिहा होंगे? मजीठिया को NDPS केस में पहले ही बेल मिल चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर की कॉपी मिलने और लीगल प्रोसेस पूरा होने के बाद वह जल्द ही जेल से बाहर आ सकते हैं। हालांकि, सरकारी काम में रुकावट डालने के एक अलग केस में उनकी बेल को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है।

दिल्ली दंगा केस: उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका; सुप्रीम कोर्ट ने बेल पिटीशन खारिज की, 5 दूसरे दोषियों को राहत

नेशनल डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम फैसले में दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद और शरजील इमाम की बेल पिटीशन खारिज कर दी। कोर्ट ने साफ किया है कि दोनों के खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) के तहत केस चलता रहेगा।

पांच दूसरे दोषियों को बेल मिली: हालांकि, कोर्ट ने इसी केस में नामजद पांच दूसरे दोषियों को बड़ी राहत दी है। बेल पाने वालों में गुलफिशा, मीरान, सलीम, शिफा और शादाब शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि हाई कोर्ट ने सही आधार पर फैसला दिया था, लेकिन यह राहत लंबे समय तक जेल में रहने के पहलू को ध्यान में रखते हुए दी गई है।

कोर्ट की अहम बातें:

अलग हालात: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के हालात दूसरे दोषियों से क्वालिटेटिवली अलग हैं।

नेशनल सिक्योरिटी: कोर्ट के मुताबिक, नेशनल सिक्योरिटी और पब्लिक ऑर्डर बनाए रखना संविधान के ज़रूरी पहलू हैं।

संवैधानिक अधिकार बनाम स्पेशल कानून: कोर्ट ने माना कि पर्सनल लिबर्टी संविधान के आर्टिकल 21 का सेंटर है और प्री-ट्रायल डिटेंशन को सज़ा नहीं माना जा सकता। हालांकि, UAPA का सेक्शन 43D(5) बेल के आम नियमों से अलग है, जो पार्लियामेंट ने खास हालात के लिए बनाए हैं।

टेररिस्ट एक्ट का एक्सप्लेनेशन: कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत टेररिस्ट एक्ट में सिर्फ हिंसा ही नहीं बल्कि ज़रूरी सर्विसेज़ में रुकावट और इकॉनमी को खतरे में डालना भी शामिल है।कोर्ट ने कहा कि सिर्फ ट्रायल में देरी के आधार पर ऐसे गंभीर मामलों में छूट नहीं दी जा सकती और हर केस के अलग-अलग पहलुओं पर विचार करना ज़रूरी है।