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सेमीकॉन 2.0 से भारत में डीप-टेक और स्वदेशी चिप उत्पादों को मिलेगा बढ़ावा

नई दिल्ली: भारत ने सेमीकंडक्टर डिजाइन और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में मजबूत क्षमता विकसित की है। भारतीय प्रतिभाएं दुनिया के कई उन्नत और जटिल चिप कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। अब देश के सामने बड़ी चुनौती इस इंजीनियरिंग क्षमता को व्यावसायिक और उद्यम मूल्य में बदलने की है, ताकि भारत में अनुसंधान एवं विकास, स्वदेशी बौद्धिक संपदा और वैश्विक बाजारों के लिए प्रतिस्पर्धी सेमीकंडक्टर उत्पाद विकसित किए जा सकें।

भारत सरकार के अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री शिवकुमार कल्याणरमण के अनुसार, भारत के लिए केवल वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में इंजीनियरिंग प्रतिभा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसे भारतीय और भारत-आधारित वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्यम तैयार करने की है, जो अपने उत्पादों की परिकल्पना और व्यावसायीकरण करें, अपनी मूल बौद्धिक संपदा पर स्वामित्व बनाए रखें तथा वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

उन्होंने कहा कि सेमीकंडक्टर अर्थव्यवस्था में भागीदारी और उसका स्वामित्व अलग-अलग विषय हैं। भारत लंबे समय से वैश्विक प्रौद्योगिकी उद्योग को कुशल इंजीनियरिंग प्रतिभा उपलब्ध कराता रहा है, लेकिन वास्तविक आर्थिक लाभ तब बढ़ सकता है जब इस क्षमता को स्वदेशी उत्पादों, प्लेटफॉर्म और बौद्धिक संपदा में बदला जाए।

सेमीकॉन 2.0 से बढ़ेगा दायरा

सेमीकॉन 2.0 इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 1,27,500 करोड़ रुपये के परिव्यय से स्वीकृत इस कार्यक्रम में चिप डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास, प्रतिभा विकास और व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पर जोर दिया गया है। यह केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 पर आधारित है, जिसका उद्देश्य उद्योग-आधारित अनुसंधान, तकनीकी विकास और कुशल कार्यबल को बढ़ावा देना है।

भारत के पहले सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 76,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ फैब्रिकेशन, पैकेजिंग और चिप डिजाइन में निवेश को प्रोत्साहित किया गया। दिए गए विवरण के अनुसार, इस कार्यक्रम के तहत 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के प्रतिबद्ध निवेश वाली 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें तीन परियोजनाओं ने वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है।

सेमीकॉन 2.0 में डिजाइन, फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, उपकरण एवं सामग्री, प्रतिभा विकास तथा अनुसंधान, विकास और डीप-टेक नवाचार को व्यापक रूप से शामिल किया गया है। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन और अनुसंधान, विकास एवं नवाचार कोष के माध्यम से भारत में अनुसंधान एवं विकास के अगले चरण को भी विस्तार मिलने की उम्मीद है।

स्टार्टअप्स के लिए बड़ा अवसर

भारतीय सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स के लिए अब अवसर केवल डिजाइन और इंजीनियरिंग सेवाओं तक सीमित रहने के बजाय अपने स्वयं के उत्पाद विकसित करने और स्वदेशी बौद्धिक संपदा तैयार करने का है। डिजाइन सहायता, उद्योग-आधारित अनुसंधान एवं विकास, विशेषज्ञ प्रतिभा और दीर्घकालिक निवेश को एक साथ लाकर डीप-टेक स्टार्टअप्स को आगे बढ़ाया जा सकता है।

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में पूंजी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सॉफ्टवेयर स्टार्टअप्स की तुलना में सेमीकंडक्टर कंपनियों को उत्पाद विकसित करने, परीक्षण, सत्यापन और निर्माण तक पहुंचने में अधिक समय और पूंजी की आवश्यकता होती है। डिजाइन के नए संस्करण, परीक्षण और निर्माण की प्रक्रिया लागत तथा तकनीकी जटिलता को बढ़ा सकती है। ऐसे में शुरुआती अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक लंबे समय तक समर्थन देने वाले निवेश तंत्र की जरूरत होगी।

उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग जरूरी

वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सेमीकंडक्टर कंपनियां विकसित करने के लिए केवल पूंजी पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता होगी, ताकि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सके।

साझा अनुसंधान, प्रोटोटाइप सुविधाओं तक पहुंच और स्वदेशी अनुसंधान के व्यावसायीकरण के प्रभावी तंत्र से नई तकनीकों को मजबूत बौद्धिक संपदा और व्यावसायिक उत्पादों में बदला जा सकता है।

भारत के उभरते सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम में 100 से अधिक स्टार्टअप्स चिप विकसित कर रहे हैं। अब चुनौती यह है कि इनमें से सक्षम कंपनियां केवल चिप डिजाइन तक सीमित न रहें, बल्कि अपने उत्पादों की दीर्घकालिक रणनीति और रोडमैप पर नियंत्रण स्थापित करें, ऐसी बौद्धिक संपदा तैयार करें जिसकी आसानी से नकल न हो सके और वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच बनाएं।

भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि देश वैश्विक मूल्य श्रृंखला का कितना हिस्सा आकर्षित करता है। महत्वपूर्ण यह भी होगा कि भारत अपने अनुसंधान, प्रतिभा और बौद्धिक संपदा के आधार पर कितने वैश्विक स्तर के तकनीकी उत्पाद और कंपनियां तैयार कर पाता है। स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास से विकसित और भारत में निर्मित चिप्स यदि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी उत्पादों का आधार बनते हैं, तो यह देश के तकनीकी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

(लेखक भारत सरकार के अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।)

भारत का फार्मा सेक्टर: नवाचार और युवाओं के लिए नया आकाश

श्री मती अनुप्रिया पटेल

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक ‘नवाचार–आधारित‘ वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित ₹10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है।

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस‘ की स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को री–स्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम ‘उद्योग–अकादमिक साझेदारी‘ को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।