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केंद्रीय मंत्री श्री जे. पी. नड्डा का नाईपर, मोहाली में दौरा

मोहाली / सत्ता संदेश

श्री जगत प्रकाश नड्डा, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, ने शुक्रवार, 01 मई 2026 को राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईप), मोहाली का दौरा किया।

माननीय मंत्री नाईपर कन्वेंशन सेंटर पहुंचे जहां उनके साथ रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग (DoP), भारत सरकार से सचिव श्री मनोज जोशी, अवर सचिव सुश्री गीता अशोक एवं उप सचिव डॉ. किन्नी सिंह भी उपस्थित रहे।

इसके बाद बोर्ड रूम बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें नाईपर, मोहाली के निदेशक प्रो. दुलाल पांडा ने संस्थान की दृष्टि, प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPI) तथा स्ट्रेटेजिक रोडमैप प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति में उत्कृष्टता केंद्रों जैसे COE-AVAB एवं COE-बायोफार्मास्यूटिकल्स, संस्थान के नवाचार तंत्र तथा लाइसेंसिंग अवसरों पर विशेष प्रकाश डाला गया।

प्रो. पांडा ने बताया कि नाईपर, मोहाली शोध उत्कृष्टता के लिए समर्पित है, जिसने उत्कृष्ट एलुमनाई   तैयार किए हैं और नाईपर, मोहाली राष्ट्रीय विकास में निरंतर महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि संस्थान भारत सरकार के बायोफार्मा शक्ति मिशन को सुदृढ़ करने के लिए सेल एवं जीन थेरेपी, बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर्स, चिकित्सा उपकरण, एआई आधारित फार्माकोइन्फॉर्मेटिक्स तथा उन्नत औषधि वितरण प्रणालियों के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। इस दिशा में संस्थान ने बायोफार्मास्यूटिकल्स और रेगुलेटरी अफेयर्स में दो नए स्नातकोत्तर कार्यक्रम भी प्रारंभ किए हैं।

सचिव श्री मनोज जोशी ने संकाय एवं विद्यार्थियों के साथ संवाद किया और उद्योग सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा ट्रांसलेशनल रिसर्च को बढ़ाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए। उन्होंने प्रदर्शन को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया तथा एक्सटर्नल फंडिंग प्राप्त करने वाले संकाय के लिए प्रोत्साहन एवं उद्योग-प्रायोजित अनुसंधान बढ़ाने की बात कही। उन्होंने “पेपर पेटेंट” से आगे बढ़कर वास्तविक अनुप्रयोग एवं कमर्शियलाइजेशन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

अपने संबोधन में माननीय मंत्री श्री जे. पी. नड्डा ने भारत को बायोफार्मास्यूटिकल्स के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई, विशेष रूप से एपीआई, प्रमुख प्रारंभिक सामग्री, सिंथेसिस इंटरमीडिएट्स एवं बायोलॉजिक्स में। उन्होंने नाईपर, मोहाली में रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर  को सुदृढ़ करने हेतु पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया तथा संस्थान द्वारा उद्योग जगत के लिए तैयार पेशेवरों की सराहना की। अंत में उन्होंने नवाचार  एवं इनोवेशन  को गति देने के लिए निरंतर वित्तीय सहायता एवं नीतिगत सुधारों का आश्वासन दिया।

इसके उपरांत, दोपहर कन्वेंशन सेंटर के फोयर में एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जहां माननीय मंत्री जी ने ट्रांसलेशनल रिसर्च के परिणामों को दर्शाते पोस्टर एवं प्रोटोटाइप का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में नाईपर द्वारा किए जा रहे उद्योग सहयोग, पेटेंट तथा क्लिनिकल ट्रायल से संबंधित पहलु प्रदर्शित किये गए ।

माननीय मंत्री ने नाईपर, मोहाली के औषधीय रसीले पौधों (Medicinal Succulents) गार्डन का उद्घाटन भी किया तथा इसके पश्चात संस्थान की अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं का दौरा किया, जहां उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं से संवाद भी किया।

यह दौरा भारत सरकार की औषधि शिक्षा को सुदृढ़ करने, नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा बायोफार्मास्यूटिकल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को आगे बढ़ाने की सतत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

भारत का फार्मा सेक्टर : नवाचार और  युवाओं के लिए नया आकाश

श्रीमती अनुप्रिया पटेल

भारत आज दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुका है, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप अब हम केवल जेनेरिक दवा बनाने वाले देश से आगे बढ़कर एक नवाचारआधारित वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हैं। हमारी सरकार का उद्देश्य ऐसी नीतियां बनाना है जिससे देश के हर नागरिक कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं से मिल सकें। साथ ही सरकार निरंतर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दे रही है और भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए काम कर रही है।

भारत की अब तक की सफलता उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और गुणवत्ता मानकों पर आधारित रही है। विश्व की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और 60 प्रतिशत वैक्सीन आपूर्ति के साथ देश ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको देखते हुए भारत सरकार ने 8 से 10 वर्षों में देश को उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित बायोफार्मा और उन्नत चिकित्सीय उत्पादों का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

इसकी आधारशिला के रूप में हालिया केंद्रीय बजट में घोषित ₹10,000 करोड़ की ‘बायोफार्मा शक्ति’ पहल महत्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम देश में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार आधारित उद्योगों और अगली पीढ़ी की दवाओं के विकास को गति प्रदान करेगा।

आर्थिक आंकड़े भी इस बात को दर्शाते हैं कि भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्तमान में 50 अरब डॉलर का है। जिस रफ्तार से हम आगे बढ़ रहे हैं, 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इसे केवल संख्या नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के लिए बेहतर भविष्य के रोडमैप के तौर पर भी देखने की जरूरत है।

वर्तमान में फार्मास्युटिकल उद्योग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 30 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। 2030 तक हेल्थकेयर और फार्मा क्षेत्र में 20 से 25 लाख नए रोजगार सृजित होंने की उम्मीद है। बायोफार्मा, मेडटेक और क्लीनिकल रिसर्च जैसे उभरते क्षेत्रों ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं।

हमारी सरकार का मानना है कि युवाओं की सफलता की नींव एक मजबूत शैक्षणिक ढांचे पर टिकी होती है। इसी विजन को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बजट में फार्मा सेक्टर के लिए और भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। सरकार ने देश में तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, वर्तमान में कार्यरत सात नाईपर संस्थानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इन सात संस्थानों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंसकी स्थापना की गई है, जो अनुसंधान और विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इन केंद्रों के माध्यम से विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, नाईपर मोहाली में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल दवाओं की खोज एवं विकास, नाईपर अहमदाबाद में मेडिकल डिवाइसेज, नाईपर हैदराबाद में बल्क ड्रग्स, नाईपर कोलकाता में फ्लो केमिस्ट्री और सतत विनिर्माण, नाईपर रायबरेली में नोबेल ड्रग डिलीवरी सिस्टम, नाईपर गुवाहाटी में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा नाईपर हाजीपुर में बायोलॉजिकल थेरैप्यूटिक्स पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं। इन संस्थानों का सीधा लाभ हमारे विद्यार्थियों को मिलेगा। नाईपर केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह जाएंगे, बल्कि वे ऐसे केंद्र बनेंगे जहां छात्र उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर काम करेंगे। इससे हमारे छात्र केवल ‘जॉब सीकर’ नहीं बल्कि ‘जॉब क्रिएटर’ और नवाचारी बनेंगे।

बदलते दौर में काम करने के तरीके बदल रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक फार्मा सेक्टर के लगभग 30-35 प्रतिशत कार्यबल को रीस्किलिंग यानी नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। केयर डिलीवरी, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की परिभाषाएं बदल रही हैं। डेटा विश्लेषण, डिजिटल हेल्थ और नियामक मामलों में उच्च कौशल वाले युवाओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। हमारी सरकार का ध्यान इसी ‘स्किल गैप’ को भरने पर है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र क्लीनिकल रिसर्च और अनुसंधान और विकास में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करें।

शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी को कम करना हमारी प्राथमिकता है। जब तक हमारे कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतें एक समान नहीं होंगी, तब तक हम ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे।

इसीलिए, हम उद्योगअकादमिक साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं। इसी दिशा में, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल बिठाने के लिए नाईपर और उद्योग के बीच 356 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही स्किल डेवलपमेंट मिशनों के माध्यम से छात्रों को सीधे कंपनियों के साथ जुड़ने के मौके दिए जा रहे हैं। इससे न केवल युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी, बल्कि भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बनेगा।

औषधि क्षेत्र का विकास जीडीपी बढ़ाने के साथ-साथ देश के युवाओं को सशक्त बनाने का भी एक मिशन है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की नींव हमारे युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के कंधों पर है। नाईपर का विस्तार और बजट में किए गए प्रावधान इस बात का प्रमाण हैं। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बना रहे हैं जहां एक छात्र अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत से वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सके। भारत के औषधि क्षेत्र का यह स्वर्णिम युग हमारे युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है, जो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

  • लेखक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
भारत की औषधि रणनीति पैमाने से नवाचार की ओर बढ़ रही है, ताकि देश को बायोफार्मा और उच्च-मूल्य वाले चिकित्सा विज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके

जगत प्रकाश नड्डा           

वैश्विक स्तर पर, कुल औषधि राजस्व में बायोलॉजिक, बायोसिमिलर और विशेष दवाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गयी है। लंबे समय से जेनरिक दवाओं में अग्रणी देश होने के कारण ‘विश्व की फ़ार्मेसी’ के रूप में प्रसिद्ध भारत का औषधि उद्योग अब पैमाने से नवाचार की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत सरकार भविष्य के अनुरूप एक नीतिगत रूपरेखा को गति दे रही है, ताकि देश जेनरिक दवाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए इन उभरते क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त कर सके।

केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के मिशन बायोफार्मा निर्माण शक्ति की घोषणा इस दिशा में एक निर्णायक कदम को रेखांकित करती है। यह अगले 8 से 10 वर्षों में भारत को बायोफार्मा नवाचार और उच्च मूल्य वाली चिकित्सा सेवाओं के वैश्विक केन्द्र बनाने के देश के संकल्प का संकेत देती है। यह विज़न गहरी वैज्ञानिक क्षमताओं के निर्माण, नवाचार-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने और भारत को अगली पीढ़ी की दवाओं के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में उभरने में सक्षम बनाने पर आधारित होगा।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सीय क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को गति देना है। यह कार्यक्रम औषधि विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की मौजूदा पहलों का पूरक है, जैसे फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना (पीआरआईपी), अनुसंधान विकास और नवाचार योजना, बायोनेस्ट आदि, जिनका उद्देश्य जैव- औषधि समेत जीवन विज्ञान क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना है। ये पहलें भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने, उद्योग-अकादमी सहयोग को बढ़ावा देने तथा जेनेरिक दवाओं से नवाचार संचालित दवा अनुसंधान और विकास की ओर बदलाव को सक्षम करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ किण्वन-आधारित निर्माण क्षमताओं का विकास करना है। एंटिबायोटिक, वैक्सीन, एंज़ाइम और बायोलॉजिक्स के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, यह क्षेत्र लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। अवसंरचना में निवेश करके, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाकर तथा लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करके, भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में घरेलू क्षमता का निर्माण करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

भारत के नैदानिक ​​अनुसंधान इकोसिस्टम का विस्तार भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। 1,000 मान्यता प्राप्त नैदानिक ​​प्रयोग केंद्र स्थापित किये जायेंगे, जो वैश्विक दवा विकास गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। अपनी लागत लाभ और कुशल शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या के साथ, भारत कुशल और उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक ​​प्रयोग के लिए असाधारण अवसर प्रदान करता है। साथ ही, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और संस्थागत क्षमताओं को बढ़ाने से भारत की मौजूदा व्यवस्था वैश्विक मानकों के अधिक अनुरूप होगी, जिससे तेज अनुमोदन संभव होंगे और वैश्विक हितधारकों के बीच विश्वास बढ़ेगा।

पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने पीएलआई और थोक दवा (बल्क ड्रग) पार्क योजनाओं के सहारे सक्रिय औषधि सामग्री (एपीआई) और मुख्य आरंभिक सामग्रियों (केएसएम) के स्थानीय उत्पादन में तेज़ी से प्रगति हुई है। इससे देश में दवाओं की कीमतें घटाने में मदद मिली है, जो विश्व स्तर पर सबसे कम कीमतों में से एक है और इसके कारण नागरिकों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत किफायती बनी रहती है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना ने सस्ती कीमतों पर गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है, जिसके तहत 19,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं। कैंसर और दुर्लभ रोगों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं पर सीमा-शुल्क को सुव्यवस्थित करने जैसे पूरक उपाय जीवन रक्षक उपचारों तक पहुंच को और सुलभ बना रहे हैं। जैसे-जैसे उन्नत चिकित्सा प्रक्रियाएं अधिक व्यापक होंगी, किफायती दर और समान पहुंच सुनिश्चित करना केंद्रीय नीति की प्राथमिकता बनी रहेगी।

जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, भारत का उद्देश्य न केवल स्थापित बाजारों में बल्कि उभरते क्षेत्रों में, विशेष रूप से नवाचार-संचालित क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना है। सुधार, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नियामक समन्वय, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और तेजी से मंजूरी जैसे प्रयास व्यापार करने में आसानी को बढ़ा रहे हैं। गुणवत्ता मानकों और नियामक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाने से भारतीय औषधि उत्पादों पर वैश्विक विश्वास की निरंतरता सुनिश्चित होती है। हालांकि, आरएंडडी निवेश बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसका समाधान करने के लिए, सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूती देना आवश्यक होगा, ताकि दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रहा जा सके।

नीतिगत समर्थन, तकनीकी प्रगति और बाजार का आपसी समन्वय; औषधि क्षेत्र के लिए विकास का एक अद्वितीय अवसर प्रस्तुत करता है। भारत का घरेलू बाजार, जिसका मूल्य पहले से ही ₹4 लाख करोड़ से अधिक है, निरंतर विस्तार के लिए तैयार है। अगले दशक में, भारत न केवल जेनेरिक दवाओं में एक अग्रणी देश के रूप में, बल्कि नवोन्मेषी दवाओं, किण्वन-आधारित उत्पादों और अगली पीढ़ी की चिकित्सा-सेवाओं में भी एक शक्तिशाली केंद्र के रूप में उभरने के लिए बेहतर स्थिति में है।

निष्कर्ष के तौर पर, भारत का औषधि क्षेत्र नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, सुदृढ़ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा द्वारा परिभाषित होता है। बायोफार्मा शक्ति कार्यक्रम जैसी पहलों, नैदानिक अवसंरचना के विस्तार और लक्षित निर्माण प्रोत्साहनों के समर्थन से, भारत धीरे-धीरे मात्रा-संचालित जेनेरिक दवा केंद्र से उच्च-मूल्य वाले बायोफार्मा नवाचार अग्रणी देश की ओर आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में भारत की भूमिका को मजबूत करने और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न, विकसित भारत 2047 के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।  

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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री हैं)

गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन से भारत के फार्मा निर्यात को गति देने पर जोर

फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 से पूर्व उच्चस्तरीय संगोष्ठी आयोजित

चंडीगढ़, 10 अप्रैल 2026 – उद्योग जगत के अग्रणी, सरकारी अधिकारी एवं विभिन्न हितधारक आज होटल शिवालिक व्यू में आयोजित एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी में एकत्रित हुए। इस संगोष्ठी का विषय था—
“गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन के माध्यम से भारत के फार्मास्यूटिकल्स, फार्मा मशीनरी एवं उपकरण निर्यात का विस्तार”।

यह आयोजन आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 के दूसरे संस्करण के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्व कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया।
संगोष्ठी की शुरुआत भारत के उच्च मात्रा वाले जेनेरिक उत्पादक से उच्च मूल्य वाले वैश्विक नवाचार केंद्र की ओर परिवर्तन पर सारगर्भित चर्चा के साथ हुई। वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र के 50 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना के मद्देनज़र, “विकसित भारत @2047” के तहत भारत को “फार्मा पावरहाउस” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

इस मिशन के अंतर्गत जटिल बायोप्रोसेसिंग उपकरणों एवं उन्नत प्रयोगशाला उपकरणों में आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर बल दिया गया, साथ ही पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़ते हुए एआई आधारित ऑटोमेशन एवं सतत विनिर्माण जैसी फार्मा 4.0 तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया।
संगोष्ठी में भारत सरकार द्वारा नियामक ढांचे एवं निर्यात प्रोत्साहन पहलों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता के रूप में श्री यश गर्ग, आईएएस, महानिदेशक, आयुक्त, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, हरियाणा ने राज्य सरकार की विभिन्न पहलों पर प्रकाश डालते हुए हरियाणा को फार्मा मशीनरी एवं लैब उपकरण निर्माण एवं निर्यात के लिए एक संभावित केंद्र बताया।

वहीं श्री उत्पल कुमार आचार्य, संयुक्त महानिदेशक (डीजीएफटी, लुधियाना) ने निर्यात को सरल बनाने एवं नवाचार आधारित गुणवत्ता निर्माण को बढ़ावा देने हेतु सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर ईईपीसी इंडिया द्वारा आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गई तथा एक्सपो का आधिकारिक ब्रोशर भी जारी किया गया।

उद्योग प्रतिनिधियों ने एक्सपो के प्रति गहरी रुचि व्यक्त की तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता निर्माण समाधान, उभरते नवाचार, ऊर्जा दक्ष तकनीकें, उन्नत डायग्नोस्टिक एवं विश्लेषणात्मक उपकरणों तथा बायोफार्मा अनुसंधान की बदलती आवश्यकताओं के क्षेत्रों में भागीदारी की इच्छा जताई।

साथ ही रिवर्स बायर-सेलर मीट (RBSM) के माध्यम से अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया एवं अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों के खरीदारों से सीधे संपर्क के अवसरों पर भी चर्चा हुई।

कार्यक्रम में अन्य प्रमुख वक्ताओं में श्री अरुण शुक्ला (ईईपीसी इंडिया), डॉ. प्रदीप मट्टू (पूर्व संयुक्त औषधि आयुक्त), डॉ. गोविंद शंकर पांडे (सीईओ एवं एमडी, गैंप टेक्नोलॉजीज प्रा. लि.) तथा श्री जे. इमाम (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट–वर्क्स, अरिस्टो फार्मास्यूटिकल्स प्रा. लि.) शामिल थे।
वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सरकारी नियामक सहयोग एवं उद्योग नवाचार के बीच बेहतर समन्वय ही वर्ष 2047 तक भारत के इंजीनियरिंग निर्यात को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का आधार बनेगा।

यह संगोष्ठी ईईपीसी इंडिया द्वारा आयोजित की गई, जो इंजीनियरिंग क्षेत्र में व्यापार एवं निवेश प्रोत्साहन की प्रमुख संस्था है, जिसे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार का समर्थन प्राप्त है।

गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन से भारत के फार्मा निर्यात को गति देने पर जोर

फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 से पूर्व उच्चस्तरीय संगोष्ठी आयोजित

चंडीगढ़, 10 अप्रैल 2026 – उद्योग जगत के अग्रणी, सरकारी अधिकारी एवं विभिन्न हितधारक आज होटल शिवालिक व्यू में आयोजित एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी में एकत्रित हुए। इस संगोष्ठी का विषय था—
“गुणवत्ता नवाचार एवं अनुपालन के माध्यम से भारत के फार्मास्यूटिकल्स, फार्मा मशीनरी एवं उपकरण निर्यात का विस्तार”।

यह आयोजन आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 के दूसरे संस्करण के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्व कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया।

संगोष्ठी की शुरुआत भारत के उच्च मात्रा वाले जेनेरिक उत्पादक से उच्च मूल्य वाले वैश्विक नवाचार केंद्र की ओर परिवर्तन पर सारगर्भित चर्चा के साथ हुई। वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र के 50 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना के मद्देनज़र, “विकसित भारत @2047” के तहत भारत को “फार्मा पावरहाउस” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

इस मिशन के अंतर्गत जटिल बायोप्रोसेसिंग उपकरणों एवं उन्नत प्रयोगशाला उपकरणों में आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर बल दिया गया, साथ ही पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़ते हुए एआई आधारित ऑटोमेशन एवं सतत विनिर्माण जैसी फार्मा 4.0 तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया।
संगोष्ठी में भारत सरकार द्वारा नियामक ढांचे एवं निर्यात प्रोत्साहन पहलों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता के रूप में श्री यश गर्ग, आईएएस, महानिदेशक, आयुक्त, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, हरियाणा ने राज्य सरकार की विभिन्न पहलों पर प्रकाश डालते हुए हरियाणा को फार्मा मशीनरी एवं लैब उपकरण निर्माण एवं निर्यात के लिए एक संभावित केंद्र बताया।

वहीं श्री उत्पल कुमार आचार्य, संयुक्त महानिदेशक (डीजीएफटी, लुधियाना) ने निर्यात को सरल बनाने एवं नवाचार आधारित गुणवत्ता निर्माण को बढ़ावा देने हेतु सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर ईईपीसी इंडिया द्वारा आगामी फार्मा मॅकटेक एवं लैबनेक्स्ट एक्सपो 2026 पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गई तथा एक्सपो का आधिकारिक ब्रोशर भी जारी किया गया।

उद्योग प्रतिनिधियों ने एक्सपो के प्रति गहरी रुचि व्यक्त की तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता निर्माण समाधान, उभरते नवाचार, ऊर्जा दक्ष तकनीकें, उन्नत डायग्नोस्टिक एवं विश्लेषणात्मक उपकरणों तथा बायोफार्मा अनुसंधान की बदलती आवश्यकताओं के क्षेत्रों में भागीदारी की इच्छा जताई।

साथ ही रिवर्स बायर-सेलर मीट (RBSM) के माध्यम से अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया एवं अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों के खरीदारों से सीधे संपर्क के अवसरों पर भी चर्चा हुई।

कार्यक्रम में अन्य प्रमुख वक्ताओं में श्री अरुण शुक्ला (ईईपीसी इंडिया), डॉ. प्रदीप मट्टू (पूर्व संयुक्त औषधि आयुक्त), डॉ. गोविंद शंकर पांडे (सीईओ एवं एमडी, गैंप टेक्नोलॉजीज प्रा. लि.) तथा श्री जे. इमाम (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट–वर्क्स, अरिस्टो फार्मास्यूटिकल्स प्रा. लि.) शामिल थे।

वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सरकारी नियामक सहयोग एवं उद्योग नवाचार के बीच बेहतर समन्वय ही वर्ष 2047 तक भारत के इंजीनियरिंग निर्यात को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का आधार बनेगा।

यह संगोष्ठी ईईपीसी इंडिया द्वारा आयोजित की गई, जो इंजीनियरिंग क्षेत्र में व्यापार एवं निवेश प्रोत्साहन की प्रमुख संस्था है, जिसे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार का समर्थन प्राप्त है।