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नारी शक्ति: वादों से लेकर कर दिखाने तक: ब्रिक्स में भारत का योगदान

भारत ने 1 जनवरी 2026 को “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” की थीम के तहत ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली। महिलाओं से जुड़े मामलों में हमारा योगदान बेहद खास रहा है। हम सिर्फ़ कोई नारा या तारीफ़ के लिए सफल कहानियों का संग्रह पेश नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसा कामकाजी ढांचा लेकर आए हैं, जो करोड़ों महिलाओं तक पहुँचा है। यह ढांचा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से शुरू होकर जहाँ भी जाता है, वहाँ आगे और विकसित होने के लिए तैयार रहता है।

यही भारत की खास बात है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से  भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक राष्ट्रीय मिशन के तौर पर अपनाया है और इस काम को इतने बड़े पैमाने पर किया है, जिसकी बराबरी बेहद कम देश कर सकते हैं। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान, भारत ने वैश्विक सोच को “महिलाओं के विकास” से बदलकर “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” की ओर मोड़ने में मदद की। यह महज़ शब्दों का बदलाव नहीं था, बल्कि सोच का भी बदलाव था। महिलाओं को सिर्फ़ लाभार्थी के तौर पर देखने के बजाय, उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका में देखना। कोच्चि में हम इसी बदलाव से जुड़ा सवाल उठा रहे हैं: एक बार वादा करने के बाद, उसे बड़े पैमाने पर, आख़िरी गाँव की आख़िरी महिला तक कैसे पहुँचाया जाए? भारत ने पिछले दस सालों में सिर्फ़ सैद्धांतिक तौर पर नहीं, बल्कि असल में इस सवाल का जवाब दिया है।

भारत के लिए यह सोच नई नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है। विकास की भाषा के आने से काफी पहले ही, हमारी संस्कृति ने नारी को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्रोत माना था। ये तीनों ही वे आधार हैं, जिन पर कोई भी समाज तरक्की करता है और उन्हें देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता रहा है। दैवीय शक्ति को ही ‘शक्ति’ कहा जाता है और संस्कृत के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता भी प्रसन्न होते हैं। यह सम्मान सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं था: लोपामुद्रा और घोषा जैसी महिला ऋषियों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की और गार्गी और मैत्रेयी जैसी दार्शनिकों ने उपनिषदों के प्रसिद्ध वाद विवादों में अपनी बात मज़बूती से रखी। इसलिए, भारत के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास, किसी और से लिया हुआ विचार नहीं है, बल्कि एक प्राचीन विचार का ही आधुनिक रूप है।

शुरुआत फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से करते हैं। भारत की पंचायती राज संस्थाओं में चुने गए प्रतिनिधियों में से लगभग आधी महिलाएँ हैं, जो दुनिया में चुनी हुई महिला नेताओं के सबसे बड़े समूहों में से एक है। इसके अलावा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का अंत सिर्फ़ प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां से इसकी शुरुआत होती है। ऐसा मॉडल, जो महिलाओं को सेवाएँ तो देता है, लेकिन उन सेवाओं को तय करने वाले फ़ैसलों में उन्हें शामिल नहीं करता, वह असल में महिलाओं के नेतृत्व वाला मॉडल नहीं है।

भारत में सेवा पहुँचाने का ढाँचा तीन हिस्सों पर टिका है, जो एक साथ मिलकर ही काम करते हैं। पहला हिस्सा है पहुँच: डिजिटल जन अवसंरचना, फ़ायदों को सीधे महिलाओं के हाथों तक पहुँचाती है। आधार से जुड़े ट्रांसफ़र उन बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर रहे हैं, जो पहले मदद पहुँचने से पहले ही उसे दूसरी तरफ़ मोड़ देते थे। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना इस पहुँच का व्यावहारिक उदाहरण है।  4.26 करोड़ से ज़्यादा माताओं को मातृत्व लाभ के तौर पर 20,060 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि सीधे उनके आधार से जुड़े खातों के ज़रिए मिली है। दूसरा हिस्सा है संस्थाएँ: डीएवाई-एनआरएलएम के तहत, 10.05 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से ज़्यादा स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जो दुनिया में महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक संस्थाओं का सबसे बड़ा नेटवर्क है। तीसरा हिस्सा है गतिशीलता—यानी मूल्य श्रृंखला में हमेशा सबसे नीचे बने रहने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ने का एक सोच-समझकर चुना गया रास्ता। भारत अब 65,949 एसएचजी महिलाओं को बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट यानी बीसी सखी के तौर पर तैनात कर रहा है, जो दूर-दराज़ के इलाकों में जमा, क्रेडिट, धनराशि भेजने और पेंशन सेवाएँ पहुँचाती हैं। जो महिला कभी किसी लाभ के लिए कतार में लगती थी, अब वही महिला उस लाभ को दूसरों तक पहुँचाती है।

कुल मिलाकर ये सब मिलकर भागीदारी को आमदनी और मालिकाना हक में बदलते हैं। लखपति दीदी पहल के तहत, जून 2025 तक 1.48 करोड़ स्वयं सहायता समूह महिलाओं की सालाना कमाई कम से कम 1 लाख रुपए तक पहुँच गई थी और जनवरी 2026 में शुरू किए गए उद्यमिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय अभियान का मकसद 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के ज़रिए 50 लाख अतिरिक्त महिलाओं को प्रशिक्षण देना है। तरक्की का यही रास्ता औपचारिक कारोबार में भी दिखता है: पीएमएमवाई के तहत दिए गए ऋण में से 69 प्रतिशत और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ के लाभार्थियों में से 84 प्रतिशत महिलाएँ हैं। डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त 2.12 लाख स्टार्टअप्स में से 1.02 लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या हिस्सेदार है और इनमें से कई स्टार्टअप बड़े शहरों के बजाय छोटे शहरों में हैं। हम ब्रिक्स को ये ब्रांड नाम नहीं, बल्कि उनके पीछे की कहानी पेश करते हैं: पहले पहुँच, फिर संस्थाएँ और फिर लाभार्थी से उद्यमी बनने का एक व्यवस्थित मार्ग।

आँकड़े भी इस बदलाव को दिखाते हैं। भारत में महिलाओं की कामकाजी आबादी में भागीदारी 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है और इसी दौरान महिलाओं में बेरोज़गारी दर 5.6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हो गई है। अब पहले से कहीं ज़्यादा महिलाएँ कार्यबल का हिस्सा हैं, इसलिए हमारा फोकस अब अगले चरण पर है, उनके काम की गुणवत्ता और आमदनी को और बेहतर बनाना।

इस साल महिलाओं से जुड़े कामों के लिए चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र तय किए गए हैं और इनमें से एक सीधे हमारे अनुभव से जुड़ा है: जलवायु कार्यवाही, खाद्य सुरक्षा और पोषण में महिलाओं की भूमिका। इस बारे में साक्ष्य भी साफ नतीजे बयां करते हैं: जब फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाएं शामिल होती हैं, तो पोषण बेहतर मिलता है और समुदाय चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। झारखंड में महिला किसानों को ऐसी बीजों की किस्मों की जानकारी है, जो सूखे के दौरान भी बची रहती हैं। राजस्थान में महिला पशुपालकों को उन रास्तों की भी जानकारी है, जिनसे सूखे के समय मवेशियों को सुरक्षित ले जाया जा सकता है। भारत का काम ऐसे संस्थान बनाना रहा है, जो इस जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करें, न कि इसे नज़रअंदाज़ करें। मिशन पोषण 2.0 आंगनवाड़ी नेटवर्क के ज़रिए चलाया जाता है, जिसमें महिलाएं काम करती हैं और वे ही लोगों तक सेवा पहुंचाने की भरोसेमंद कड़ी होती हैं। जलवायु के अनुसार ढलने का काम भी इसी तरह होता है, चाहे वह लद्दाख में महिलाओं द्वारा बनाए गए ऊंचे इलाकों में पानी जमा करने के ढांचे हों या ओडिशा के तट पर वनस्पति के घने इलाकों को बचाने वाली समितियां। महिलाएं अब सिर्फ़ अनुकूलन की तकनीक का इस्तेमाल करने वाली नहीं रह गई हैं, बल्कि वे खुद इसे आगे बढ़ा भी रही हैं: नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को खेती में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह ज़्यादा कौशल और ज़्यादा आमदनी वाले काम की ओर एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है।

एक खास बात जो पूरी तरह से भारत की वास्तविक विशेषता बन गई है।  एक ज़िला एक उत्पाद पहल के तहत अब 761 ज़िलों में 1,102 उत्पाद शामिल हैं। महिला समूह हथकरघा, जीआई टैग वाले शिल्प और क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों जैसे स्थानीय विशेष उत्पादों को ब्रांडेड और तेज़ी से निर्यात होने वाले उत्पादों में बदल रहे हैं। सरकार भी इन उत्पादों के लिए बाज़ार तक पहुँचने का रास्ता बना रही है: अवसर योजना के तहत हवाई अड्डों पर महिलाओं के लिए आरक्षित रिटेल जगह और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत महिला-संचालित उद्यमों के लिए जेम पर एक खास स्थान। असल मायनों में यह टिकाऊ व्यवस्था है, जिसके तहत स्थानीय सामग्री, स्थानीय कौशल और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला, जो समुदाय के भीतर ही अपना मूल्य बनाए रखती हैं और ये विकास का ऐसा रूप भी है, जिसके लिए किसी महिला को बाज़ार तक पहुँचने के लिए अपना ज़िला छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास सरकार द्वारा की गई महज़ कोई घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे एक-एक हिस्से को जोड़कर तब तक बनाया और संचालित किया जाता है, जब तक कि यह उस आखिरी महिला तक न पहुँच जाए, जिसके लिए इसे बनाया गया था। जुलाई में कोच्चि में होने वाली मंत्रियों की बैठक में, भारत इस मॉडल को एक योगदान के तौर पर पेश करेगा, न कि किसी ऐसे उपाय के तौर पर, जिसे दूसरों को भी अपनाना ही हो। इसका मकसद यह है कि दूसरे इससे सीख सकें और इसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढाल सकें। यही व्यवस्था और इसके सफल होने के सबूत, भारत ब्रिक्स के सामने रख रहा है। यह आदान-प्रदान दोनों तरफ से होता है: भारत कोच्चि में अपने ब्रिक्स सहयोगियों के बेहतरीन तौर-तरीकों से सीखने और अपने अनुभव साझा करने के लिए तैयार है।

(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

बिश्केक में SCO विमेन्स फोरम 2026 में भारत ने महिला-नेतृत्व वाले विकास के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री, श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने आज किर्गिज़ गणराज्य के बिश्केक में आयोजित एससीओ विमेन्स फोरम 2026 को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया। उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) तथा उसके पारस्परिक सम्मान, समानता और सर्वसम्मति के सिद्धांतों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि की और साझेदारी को सुदृढ़ करने तथा संगठन के साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका विषय पर आयोजित पैनल सत्र में भारत का उद्घाटन वक्तव्य और प्रारंभिक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए मंत्री महोदया ने इस बात पर बल दिया कि महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि उसकी सबसे सशक्त प्रेरक शक्तियों में से एक हैं। यही महिला-नेतृत्व वाले विकास के संबंध में भारत की परिकल्पना और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य का मूल आधार है।

मंत्री महोदया ने उल्लेख किया कि लगभग 10 करोड़ महिलाएं 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं, जिनमें से 30 लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। उन्होंने मिशन शक्ति और मिशन पोषण 2.0 को महिलाओं की सुरक्षा, देखभाल तथा आर्थिक भागीदारी को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख स्तंभों के रूप में रेखांकित किया।

भारत ने पूरे क्षेत्र में महिलाओं के आर्थिक नेतृत्व और कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए एससीओ के साझेदार देशों के साथ अपने अनुभव साझा करने तथा सहयोग को और सुदृढ़ करने की अपनी तत्परता भी दोहराई।

नारी शक्ति का दशक, विकसित भारत का उत्कर्ष

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

देश के किसी भी गाँव, बस्ती या सुदूर इलाके में जाइए- हर घर की रसोई में एक जैसी बदली हुई हवा महसूस होगी l चूल्हे के जिस काले धुएँ ने कभी नई दुल्हन की आँखों में आँसू भरे थे, उज्ज्वला की नीली लौ ने उसे विदा कह दिया है। जो माँ कभी कोसों दूर से पानी ढोती थी, आज उसकी बेटी के पास ‘हर घर जल’ का अपना नल है। खेत के पीछे की वह शर्मनाक मजबूरी अब इतिहास है- आँगन में स्वच्छ भारत का शौचालय गरिमा के साथ खड़ा है। सिर पर पक्की छत है, और उसके मालिकाना हक पर पहली बार- घर की महिला का नाम लिखा है। पर्स में जन-धन की पासबुक है और फोन में यूपीआई का ऐप है।


यह किसी पोस्टर पर छपी कोई काल्पनिक तस्वीर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण का एक ऐसा सच है, जिसे देश की करोड़ों महिलाएँ हर रोज़ जी रही हैं। यह उस दौर की दास्तान है जिसमें Women Led Development के विजन के साथ भारतीय नारी विकसित भारत की शिल्पकार बन रही है। इस बदलाव की विशालता को समझने के लिए एक दशक पीछे लौटिए। एक समय मातृ मृत्यु दर 212 थी। निर्भया जैसी घटना पर देश का आक्रोश सड़कों पर था, लेकिन व्यवस्था में नीतिगत इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती थी। महिला आरक्षण विधेयक 1996 से चार बार अधर में लटका रहा और ट्रिपल तलाक पर दशकों तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। चूल्हा साँसों में कालिख घोलता था। दूरस्थ हैंडपंप रोज़मर्रा की बेबसी का प्रतीक था l भारतीय नारी एक नई सुबह की प्रतीक्षा में अपने हिस्से की उम्मीद बचाए हुए थी l


शुरुआत करते हैं सबसे पवित्र आँकड़े—जीवन का अधिकार से। देश में मातृ मृत्यु दर तेजी से घटकर 212 से 88 पर आ गई है। UN-MMEIG के अनुसार जहाँ वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु दर में महज़ 48% की कमी आई, वहीं भारत ने 86% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है। संस्थागत प्रसव 38.7% से बढ़कर 90.6% हो चुका है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने चार करोड़ से अधिक माताओं के बैंक खातों में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक सीधे हस्तांतरित कर सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ बचपन की नींव मजबूत की है।


देश में बने 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालयों ने महिलाओं को गरिमा दी l10.5 करोड़ से अधिक उज्ज्वला कनेक्शनों ने धुएँ से मुक्ति दी। आज 16 करोड़ से अधिक घरों तक नल का पानी पहुँच चुका है—जबकि 2014 में महज 17% परिवारों के पास यह सुविधा थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के लगभग 4 करोड़ घरों में से 73% घर महिलाओं के नाम पर हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सरकारी रिकॉर्ड्स पर माँ-बहनों का नाम गर्व से दर्ज है।


गरिमा से स्वामित्व आया, और स्वामित्व ने निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिया। आर्थिक भागीदारी का यह विस्तार बैंक खाते से शुरू होकर उद्यमिता तक पहुँचा है l लगभग 56 करोड़ जन-धन खातों में 56% खाते महिलाओं के नाम पर हैं।


विश्व बैंक मानता है- भारत ने एक दशक में खाता-स्वामित्व के जेंडर गैप को शून्य पर ला दिया है, जो वैश्विक वित्तीय समावेशन के इतिहास में अभूतपूर्व है। मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक जमानत-मुक्त ऋणों में से 68% ऋण महिलाओं को मिले हैं। स्टैंड-अप इंडिया ने महिला उद्यमियों को 43,000 करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं और दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत 91 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं। बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है।


हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।
(SHGs) ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है।” निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें ‘लखपति दीदियाँ’ बन चुकी हैं।


यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट है l देश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (LFPR) वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुँच चुकी है । सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है । उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1 के पार है और STEM शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है। यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, SRS, NFHS, PLFS, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र—हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुँच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है।


इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थी l इसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ। आजजमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएँ राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं।


मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही है l Women Helpline-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है । मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आँगनवाड़ी—ये नारी-नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं।


बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियाँ हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है। हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय ‘सह-निर्माता’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।


(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।)