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मोरनी महिला ब्लॉक संगठन के द्वारा स्वयं सहायता समूह के लिए ‘शाइन’ कार्यक्रम का आयोजन

हरियाणा / सत्ता संदेश

भारतीय मानक ब्यूरो, हरियाणा शाखा कार्यालय द्वारा मोरनी महिला ब्लॉक संगठन की स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाओं के लिए शाइन स्टेंडर्स हेल्प इनफॉर्म एंड नर्चर इंपावर्ड वुमेन कार्यक्रम का आयोजन ब्लॉक मोरनी में किया गया। कार्यक्रम में 45 स्वयं सहायता समूह की महिलाओं एवं संगठन के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

बीआईएस हरियाणा शाखा कार्यालय के मानक संवर्धन अधिकारी आरती चौधरी ने प्रतिभागियों को भारतीय मानक ब्यूरो की भूमिका एवं कार्यों से अवगत कराया तथा गुणवत्ता, सुरक्षा और उपभोक्ता जागरूकता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने आईएसआई मार्क, हॉलमार्किंग, अनिवार्य पंजीकरण योजना तथा घरेलू उत्पादों, पोषण, स्वच्छता, महिलाओं एवं बच्चों से संबंधित विभिन्न भारतीय मानकों की जानकारी दी।

कार्यक्रम के दौरान बीआईएस केयर ऐप का लाइव प्रदर्शन किया गया, जिसके माध्यम से प्रतिभागियों को बीआईएस प्रमाणित उत्पादों की सत्यता जांचने तथा HUID के माध्यम से हॉलमार्कयुक्त स्वर्ण आभूषणों की प्रामाणिकता की पुष्टि करने की प्रक्रिया समझाई गई। विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़ी महिलाओं ने छोटे उद्यमों एवं उपभोक्ता उत्पादों से संबंधित मानकों के बारे में विशेष रुचि दिखाई।

प्रतिभागियों ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए बताया कि इस जागरूकता कार्यक्रम से उन्हें उपभोक्ता अधिकारों, गुणवत्ता मानकों तथा प्रमाणित उत्पादों की पहचान करने की बेहतर जानकारी प्राप्त हुई, जिससे वे सुरक्षित एवं जागरूक उपभोक्ता के रूप में सही खरीद निर्णय लेने में सक्षम होंगी।

नारी शक्ति: वादों से लेकर कर दिखाने तक: ब्रिक्स में भारत का योगदान

भारत ने 1 जनवरी 2026 को “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” की थीम के तहत ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली। महिलाओं से जुड़े मामलों में हमारा योगदान बेहद खास रहा है। हम सिर्फ़ कोई नारा या तारीफ़ के लिए सफल कहानियों का संग्रह पेश नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसा कामकाजी ढांचा लेकर आए हैं, जो करोड़ों महिलाओं तक पहुँचा है। यह ढांचा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से शुरू होकर जहाँ भी जाता है, वहाँ आगे और विकसित होने के लिए तैयार रहता है।

यही भारत की खास बात है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से  भारत ने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक राष्ट्रीय मिशन के तौर पर अपनाया है और इस काम को इतने बड़े पैमाने पर किया है, जिसकी बराबरी बेहद कम देश कर सकते हैं। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान, भारत ने वैश्विक सोच को “महिलाओं के विकास” से बदलकर “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” की ओर मोड़ने में मदद की। यह महज़ शब्दों का बदलाव नहीं था, बल्कि सोच का भी बदलाव था। महिलाओं को सिर्फ़ लाभार्थी के तौर पर देखने के बजाय, उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका में देखना। कोच्चि में हम इसी बदलाव से जुड़ा सवाल उठा रहे हैं: एक बार वादा करने के बाद, उसे बड़े पैमाने पर, आख़िरी गाँव की आख़िरी महिला तक कैसे पहुँचाया जाए? भारत ने पिछले दस सालों में सिर्फ़ सैद्धांतिक तौर पर नहीं, बल्कि असल में इस सवाल का जवाब दिया है।

भारत के लिए यह सोच नई नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है। विकास की भाषा के आने से काफी पहले ही, हमारी संस्कृति ने नारी को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्रोत माना था। ये तीनों ही वे आधार हैं, जिन पर कोई भी समाज तरक्की करता है और उन्हें देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता रहा है। दैवीय शक्ति को ही ‘शक्ति’ कहा जाता है और संस्कृत के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहाँ देवता भी प्रसन्न होते हैं। यह सम्मान सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं था: लोपामुद्रा और घोषा जैसी महिला ऋषियों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की और गार्गी और मैत्रेयी जैसी दार्शनिकों ने उपनिषदों के प्रसिद्ध वाद विवादों में अपनी बात मज़बूती से रखी। इसलिए, भारत के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास, किसी और से लिया हुआ विचार नहीं है, बल्कि एक प्राचीन विचार का ही आधुनिक रूप है।

शुरुआत फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से करते हैं। भारत की पंचायती राज संस्थाओं में चुने गए प्रतिनिधियों में से लगभग आधी महिलाएँ हैं, जो दुनिया में चुनी हुई महिला नेताओं के सबसे बड़े समूहों में से एक है। इसके अलावा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का अंत सिर्फ़ प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां से इसकी शुरुआत होती है। ऐसा मॉडल, जो महिलाओं को सेवाएँ तो देता है, लेकिन उन सेवाओं को तय करने वाले फ़ैसलों में उन्हें शामिल नहीं करता, वह असल में महिलाओं के नेतृत्व वाला मॉडल नहीं है।

भारत में सेवा पहुँचाने का ढाँचा तीन हिस्सों पर टिका है, जो एक साथ मिलकर ही काम करते हैं। पहला हिस्सा है पहुँच: डिजिटल जन अवसंरचना, फ़ायदों को सीधे महिलाओं के हाथों तक पहुँचाती है। आधार से जुड़े ट्रांसफ़र उन बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर रहे हैं, जो पहले मदद पहुँचने से पहले ही उसे दूसरी तरफ़ मोड़ देते थे। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना इस पहुँच का व्यावहारिक उदाहरण है।  4.26 करोड़ से ज़्यादा माताओं को मातृत्व लाभ के तौर पर 20,060 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि सीधे उनके आधार से जुड़े खातों के ज़रिए मिली है। दूसरा हिस्सा है संस्थाएँ: डीएवाई-एनआरएलएम के तहत, 10.05 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से ज़्यादा स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जो दुनिया में महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक संस्थाओं का सबसे बड़ा नेटवर्क है। तीसरा हिस्सा है गतिशीलता—यानी मूल्य श्रृंखला में हमेशा सबसे नीचे बने रहने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ने का एक सोच-समझकर चुना गया रास्ता। भारत अब 65,949 एसएचजी महिलाओं को बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट यानी बीसी सखी के तौर पर तैनात कर रहा है, जो दूर-दराज़ के इलाकों में जमा, क्रेडिट, धनराशि भेजने और पेंशन सेवाएँ पहुँचाती हैं। जो महिला कभी किसी लाभ के लिए कतार में लगती थी, अब वही महिला उस लाभ को दूसरों तक पहुँचाती है।

कुल मिलाकर ये सब मिलकर भागीदारी को आमदनी और मालिकाना हक में बदलते हैं। लखपति दीदी पहल के तहत, जून 2025 तक 1.48 करोड़ स्वयं सहायता समूह महिलाओं की सालाना कमाई कम से कम 1 लाख रुपए तक पहुँच गई थी और जनवरी 2026 में शुरू किए गए उद्यमिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय अभियान का मकसद 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के ज़रिए 50 लाख अतिरिक्त महिलाओं को प्रशिक्षण देना है। तरक्की का यही रास्ता औपचारिक कारोबार में भी दिखता है: पीएमएमवाई के तहत दिए गए ऋण में से 69 प्रतिशत और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ के लाभार्थियों में से 84 प्रतिशत महिलाएँ हैं। डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त 2.12 लाख स्टार्टअप्स में से 1.02 लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या हिस्सेदार है और इनमें से कई स्टार्टअप बड़े शहरों के बजाय छोटे शहरों में हैं। हम ब्रिक्स को ये ब्रांड नाम नहीं, बल्कि उनके पीछे की कहानी पेश करते हैं: पहले पहुँच, फिर संस्थाएँ और फिर लाभार्थी से उद्यमी बनने का एक व्यवस्थित मार्ग।

आँकड़े भी इस बदलाव को दिखाते हैं। भारत में महिलाओं की कामकाजी आबादी में भागीदारी 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है और इसी दौरान महिलाओं में बेरोज़गारी दर 5.6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हो गई है। अब पहले से कहीं ज़्यादा महिलाएँ कार्यबल का हिस्सा हैं, इसलिए हमारा फोकस अब अगले चरण पर है, उनके काम की गुणवत्ता और आमदनी को और बेहतर बनाना।

इस साल महिलाओं से जुड़े कामों के लिए चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र तय किए गए हैं और इनमें से एक सीधे हमारे अनुभव से जुड़ा है: जलवायु कार्यवाही, खाद्य सुरक्षा और पोषण में महिलाओं की भूमिका। इस बारे में साक्ष्य भी साफ नतीजे बयां करते हैं: जब फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाएं शामिल होती हैं, तो पोषण बेहतर मिलता है और समुदाय चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। झारखंड में महिला किसानों को ऐसी बीजों की किस्मों की जानकारी है, जो सूखे के दौरान भी बची रहती हैं। राजस्थान में महिला पशुपालकों को उन रास्तों की भी जानकारी है, जिनसे सूखे के समय मवेशियों को सुरक्षित ले जाया जा सकता है। भारत का काम ऐसे संस्थान बनाना रहा है, जो इस जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करें, न कि इसे नज़रअंदाज़ करें। मिशन पोषण 2.0 आंगनवाड़ी नेटवर्क के ज़रिए चलाया जाता है, जिसमें महिलाएं काम करती हैं और वे ही लोगों तक सेवा पहुंचाने की भरोसेमंद कड़ी होती हैं। जलवायु के अनुसार ढलने का काम भी इसी तरह होता है, चाहे वह लद्दाख में महिलाओं द्वारा बनाए गए ऊंचे इलाकों में पानी जमा करने के ढांचे हों या ओडिशा के तट पर वनस्पति के घने इलाकों को बचाने वाली समितियां। महिलाएं अब सिर्फ़ अनुकूलन की तकनीक का इस्तेमाल करने वाली नहीं रह गई हैं, बल्कि वे खुद इसे आगे बढ़ा भी रही हैं: नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को खेती में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह ज़्यादा कौशल और ज़्यादा आमदनी वाले काम की ओर एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है।

एक खास बात जो पूरी तरह से भारत की वास्तविक विशेषता बन गई है।  एक ज़िला एक उत्पाद पहल के तहत अब 761 ज़िलों में 1,102 उत्पाद शामिल हैं। महिला समूह हथकरघा, जीआई टैग वाले शिल्प और क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों जैसे स्थानीय विशेष उत्पादों को ब्रांडेड और तेज़ी से निर्यात होने वाले उत्पादों में बदल रहे हैं। सरकार भी इन उत्पादों के लिए बाज़ार तक पहुँचने का रास्ता बना रही है: अवसर योजना के तहत हवाई अड्डों पर महिलाओं के लिए आरक्षित रिटेल जगह और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के तहत महिला-संचालित उद्यमों के लिए जेम पर एक खास स्थान। असल मायनों में यह टिकाऊ व्यवस्था है, जिसके तहत स्थानीय सामग्री, स्थानीय कौशल और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला, जो समुदाय के भीतर ही अपना मूल्य बनाए रखती हैं और ये विकास का ऐसा रूप भी है, जिसके लिए किसी महिला को बाज़ार तक पहुँचने के लिए अपना ज़िला छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास सरकार द्वारा की गई महज़ कोई घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे एक-एक हिस्से को जोड़कर तब तक बनाया और संचालित किया जाता है, जब तक कि यह उस आखिरी महिला तक न पहुँच जाए, जिसके लिए इसे बनाया गया था। जुलाई में कोच्चि में होने वाली मंत्रियों की बैठक में, भारत इस मॉडल को एक योगदान के तौर पर पेश करेगा, न कि किसी ऐसे उपाय के तौर पर, जिसे दूसरों को भी अपनाना ही हो। इसका मकसद यह है कि दूसरे इससे सीख सकें और इसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढाल सकें। यही व्यवस्था और इसके सफल होने के सबूत, भारत ब्रिक्स के सामने रख रहा है। यह आदान-प्रदान दोनों तरफ से होता है: भारत कोच्चि में अपने ब्रिक्स सहयोगियों के बेहतरीन तौर-तरीकों से सीखने और अपने अनुभव साझा करने के लिए तैयार है।

(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

MLA संगोवाल की लीडरशिप में बाबा दीप सिंह नगर की पंचायत ने राशन किट बांटे

लुधियाना / सत्ता संदेश

विधायक जीवन सिंह संगोवाल की अगुवाई में बाबा दीप सिंह नगर की पंचायत द्वारा गांव की महिलाओं को राशन किट वितरित किए गए। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं और गांव के लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की ‘माताओं और बेटियों के सत्कार योजना’ की सराहना करते हुए कहा कि योजना के तहत बैंक खातों में राशि आने से उन्हें आर्थिक सहायता मिली है। अपनी खुशी का इजहार करते हुए महिलाओं ने लड्डू बांटे और ढोल की थाप पर नृत्य किया।

विधायक जीवन सिंह संगोवाल ने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण और जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए लगातार जनकल्याणकारी योजनाएं लागू कर रही है। उन्होंने लोगों से सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की।

इस अवसर पर गांव के सरपंच हरमेश सिंह, पंच सुरिंदर शर्मा, पंच दविंदर सिंह, प्रभजोत सिंह (ब्लॉक अध्यक्ष, युद्ध अगेंस्ट ड्रग्स), बलवीर सिंह गुरु, मास्टर दविंदर सिंह, जयपाल सिंह, जसविंदर सिंह सिद्धू, चमन लाल, सुखदीप सिंह, आशु तथा यूथ क्लब अध्यक्ष हंदीप शर्मा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

बिश्केक में SCO विमेन्स फोरम 2026 में भारत ने महिला-नेतृत्व वाले विकास के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री, श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने आज किर्गिज़ गणराज्य के बिश्केक में आयोजित एससीओ विमेन्स फोरम 2026 को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया। उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) तथा उसके पारस्परिक सम्मान, समानता और सर्वसम्मति के सिद्धांतों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि की और साझेदारी को सुदृढ़ करने तथा संगठन के साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका विषय पर आयोजित पैनल सत्र में भारत का उद्घाटन वक्तव्य और प्रारंभिक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए मंत्री महोदया ने इस बात पर बल दिया कि महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि उसकी सबसे सशक्त प्रेरक शक्तियों में से एक हैं। यही महिला-नेतृत्व वाले विकास के संबंध में भारत की परिकल्पना और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य का मूल आधार है।

मंत्री महोदया ने उल्लेख किया कि लगभग 10 करोड़ महिलाएं 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं, जिनमें से 30 लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। उन्होंने मिशन शक्ति और मिशन पोषण 2.0 को महिलाओं की सुरक्षा, देखभाल तथा आर्थिक भागीदारी को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख स्तंभों के रूप में रेखांकित किया।

भारत ने पूरे क्षेत्र में महिलाओं के आर्थिक नेतृत्व और कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए एससीओ के साझेदार देशों के साथ अपने अनुभव साझा करने तथा सहयोग को और सुदृढ़ करने की अपनी तत्परता भी दोहराई।

पश्चिम बंगाल में महिलाओं के लिए बड़ी खुशखबरी: 1 जून से सरकारी बसों में सफर होगा बिल्कुल मुफ्त

नेशनल डेस्क : पश्चिम बंगाल सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण और सार्वजनिक परिवहन तक उनकी पहुंच आसान बनाने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। राज्य सरकार ने घोषणा की है कि 1 जून 2026 से राज्य की सभी सरकारी बसों में महिलाएं मुफ्त में यात्रा कर सकेंगी। यह योजना छोटी और लंबी दूरी की सभी श्रेणियों की सरकारी बसों पर लागू होगी।

मुफ्त यात्रा के लिए अनिवार्य होगा ‘स्मार्ट कार्ड‘ : इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए महिलाओं को एक विशेष स्मार्ट कार्ड (क्यूआर कोड वाला डिजिटल कार्ड) बनवाना होगा। यह कार्ड प्राप्त करने के लिए लाभार्थियों को अपनी फोटो और नाम के साथ संबंधित क्षेत्र के बीडीओ (BDO) या एसडीओ (SDO) के पास आवेदन जमा करना होगा।

आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज: स्मार्ट कार्ड बनवाने के लिए महिलाएं निम्नलिखित में से कोई भी एक फोटो पहचान पत्र जमा कर सकती हैं:

-आधार कार्ड या मतदाता पहचान पत्र (EPIC)

-जॉब कार्ड (ग्रामीण रोजगार गारंटी)

-आयुष्मान भारत स्वास्थ्य कार्ड

-ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड या पासपोर्ट-स्कूल, कॉलेज या सरकारी/पब्लिक लिमिटेड कंपनियों द्वारा जारी पहचान पत्र।

जब तक कार्ड न मिले, तब तक क्या करें? सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक स्मार्ट कार्ड जारी नहीं हो जाते, तब तक महिलाएं अपने पास मौजूद वैध फोटो पहचान पत्र दिखाकर भी मुफ्त यात्रा कर सकती हैं। इस अंतरिम अवधि में, कंडक्टर पहचान सत्यापन के बाद महिला यात्रियों को ‘शून्य मूल्य टिकट’ (Zero Value Ticket) या थर्मल पेपर टिकट जारी करेंगे।

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने शी-मार्ट्स के माध्यम से पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले ग्रामीण विपणन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक रूपरेखा तैयार की


दिल्ली /सत्ता संदेश

डीएवाई-एनआरएलएम ने पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले ग्रामीण विपणन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए शी-मार्ट्स पर राष्ट्रीय परामर्श का नेतृत्व किया

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय (एमओआरडी) ने दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के माध्यम से 14-15 मई , 2026 को भुवनेश्वर, ओडिशा के मेफेयर कन्वेंशन हॉल में शी-मार्ट्स (स्वयं सहायता उद्यमी-ग्रामीण परिवर्तन के लिए विपणन के अवसर) पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया। इस परामर्श ने बजट घोषणा – 2026 के कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त किया। इस परामर्श की मेजबानी ओडिशा आजीविका मिशन (ओएलएम), मिशन शक्ति विभाग, ओडिशा सरकार ने की और राष्ट्रीय सहायता संगठन (एनएसओ) के रूप में पीआरएडीएएन ने इसे सुगम बनाया।

राज्य मिशन निदेशकों, सीईओ, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशनों (एसआरएलएम) के वरिष्ठ अधिकारियों, नाबार्ड के प्रतिनिधियों, क्षेत्र विशेषज्ञों, विकास कार्यकर्ताओं, वित्तीय संस्थानों और पारिस्थितिकी तंत्र भागीदारों ने एक साथ मिलकर महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण उद्यमों और बाजार प्रणालियों को मजबूत करने के लिए रणनीतिक हस्तक्षेपों पर विचार-विमर्श किया।

इस परामर्श का उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त जमीनी प्रतिक्रिया, सुझावों और प्रासंगिक जानकारियों के माध्यम से शी-मार्ट्स पहल के परिचालन दिशानिर्देशों को अंतिम रूप देना था। प्रमुख विषयों में संस्थागत संरचना, वित्तपोषण मॉडल, अभिसरण मार्ग, निगरानी प्रणाली, व्यावसायिक प्रक्रियाएं, शासन संरचनाएं, प्रौद्योगिकी एकीकरण और कार्यान्वयन रणनीतियां शामिल थीं।

उद्घाटन सत्र का नेतृत्व भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव श्री टी.के. अनिल कुमार ने किया, जिन्होंने वर्चुअल माध्यम से मुख्य उद्घाटन भाषण दिया। अपने मुख्य भाषण में, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि डीएवाई-एनआरएलएम का भविष्य उद्यम विकास और बाज़ार एकीकरण में निहित है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शी-मार्ट्स को सब्सिडी-आधारित संस्थागत मॉडलों के बजाय, महिलाओं के समूहों द्वारा संचालित, समुदाय के स्वामित्व वाले खुदरा और एकत्रीकरण प्रणालियों के रूप में उभरना चाहिए।

एमओआरडी की संयुक्त सचिव, सुश्री स्वाति शर्मा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस राष्ट्रीय परामर्श का उद्देश्य एक ऐसे कार्यकारी मंच के रूप में काम करना है, जहाँ राज्य/केंद्र शासित प्रदेश मसौदा रूपरेखा की गहन समीक्षा कर सकें, कार्यान्वयन में मौजूद कमियों की पहचान कर सकें और बड़े पैमाने पर इसे लागू करने के लिए व्यावहारिक विकल्प सुझा सकें।

एमओआरडी की संयुक्त सचिव, सुश्री रोहिणी आर. भाजीभाकरे भी वीबी-जीराम-जी की प्रमुख विशेषताओं को उजागर करने के लिए इस परामर्श में शामिल हुईं।

ओडिशा आजीविका मिशन की राज्य मिशन निदेशक डॉ. मोनिका प्रियदर्शनी ने मिशन शक्ति और सामुदायिक संस्थानों के माध्यम से विकेंद्रीकृत महिला नेतृत्व वाले उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में ओडिशा के अनुभव पर प्रकाश डाला।

डीएवाई-एनआरएलएम की ग्रामीण आजीविका विभाग की निदेशक, डॉ. मोलिश्री ने शी-मार्ट्स पहल के विकास और रणनीतिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया और आजीविका संवर्धन से उद्यम-आधारित ग्रामीण बाजार प्रणालियों की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत सरकार के वीबी-जीराम-जी की सहायक आयुक्त सुश्री दीक्षा सुप्याल बिष्ट ने वीबी-जीराम-जी और शी-मार्ट्स के बीच संभावित अभिसरण के अवसरों पर चर्चा की, विशेष रूप से महिला-केंद्रित बुनियादी ढांचे, मांग सृजन और बाजार समर्थन प्रणालियों के संबंध में।

पहले दिन का एक प्रमुख आकर्षण “ग्रामीण विपणन के लिए एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में ‘शी-मार्ट्स’ पर आयोजित राष्ट्रीय पैनल चर्चा थी। इस पैनल ने शी-मार्ट्स के लिए स्केलेबल डिज़ाइन सिद्धांतों पर विचार-विमर्श करने हेतु सरकार, वित्त, प्रौद्योगिकी और सामाजिक उद्यम क्षेत्रों के विविध दृष्टिकोणों को एक साथ लाया। इस परामर्श में व्यापक उप-समूह विचार-विमर्श भी शामिल था, जिसमें पाँच विषयगत समूहों ने शी-मार्ट्स के मसौदा परिचालन ढाँचे की गहन समीक्षा की; इस समीक्षा में और अधिक विस्तार, जोड़, हटाव और किन पहलुओं से बचना है—इन सभी बिंदुओं पर विशेष रूप से विचार किया गया।

परामर्श के दूसरे दिन मानव संसाधन संरचना एवं महिला नेतृत्व, तकनीकी डिजाइन एवं कार्यान्वयन रणनीति तथा क्षमता निर्माण संरचना पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिभागियों ने महिला नेतृत्व वाली शासन प्रणाली और सामुदायिक स्वामित्व को बनाए रखते हुए पेशेवर खुदरा प्रबंधन प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया।

दो-दिवसीय परामर्श के दौरान, इस बात पर एक मज़बूत आम सहमति बनी कि शी-मार्ट्स को सब्सिडी पर निर्भर खुदरा दुकानों के बजाय, विकेंद्रीकृत, महिलाओं के नेतृत्व वाले, पेशेवर रूप से प्रबंधित और समुदाय के स्वामित्व वाले उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

परामर्श प्रक्रिया राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों, डीएवाई-एनआरएलएम और पारिस्थितिकी तंत्र भागीदारों की ओर से शी-मार्ट्स के लिए अंतिम परिचालन दिशानिर्देशों को सुदृढ़ करने और देश भर में चरणबद्ध कार्यान्वयन का समर्थन करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ समाप्त हुई। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2029 तक 3 करोड़ अतिरिक्त ‘लखपति दीदी’ बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही, मंत्रालय ने एसआरएलएम को ‘शी-मार्ट्स’ स्थापित करने में सहायता देने का भी संकल्प लिया है। ये शी-मार्ट्स ऐसे टिकाऊ ग्रामीण विपणन मंच होंगे जो पूरे भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले उत्पादक समूहों के लिए आय के अवसर, उद्यम विकास, ब्रांडिंग और बाज़ार तक पहुँच को बेहतर बनाएंगे।

ट्रैक से संसद तक:

क्यों भारत के भविष्य का नेतृत्व महिलाओं को करना चाहिए

डॉ. पी टी ऊषा

मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है, पहले केरल की कच्ची सड़कों पर, फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में। हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है, कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी, जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है। मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है। अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है।

यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक, 2023—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है। यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा। यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है।

खेलों ने हमें क्या सिखाया है

जब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई, तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं, जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं। लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है। प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ, भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है।

पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू, विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं। वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने धीरे-धीरे ही सही, पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया। प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा, जब समर्थित होती है, तो उपलब्धि दिलाती है।

सबक साफ है। जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है, तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं, वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं।

हर भारतीय के लिए बेहतर शासन

भारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है। 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से, विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है।

ये महज़ “महिलाओं के मुद्दे” नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।

इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है। यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।

प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्व

भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है, जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है। यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है।

विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है, जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं, जैसे किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित कार्यस्थल, ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।

अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है।

सुरक्षा, गरिमा और भागीदारी

भारत भर में लाखों महिलाओं के लिए, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा, भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है। चाहे खेल हो, शिक्षा हो या कार्यस्थल, ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।

संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं। इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा, जो उत्तरदायी और सुलभ हो।

शासन तभी अधिक प्रभावी होता है, जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है, जिनकी वह सेवा करता है।

प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्ति

भारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है। उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है।

जब मणिपुर, झारखंड, राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है, तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है।

आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है।

भारत की महिलाओं ने खेल जगत, सशस्त्र बलों, विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है। विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है।

अब है कार्यवाही का वक्त

राज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद, मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। फिर भी, आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है। अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है।

भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए, विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता। आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता, न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है।

आगे का रास्ता साफ है। सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।

(लेखक राज्यसभा सांसद, भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ, भारत की अध्यक्ष हैं।)

नए भारत की एमएसएमई क्रांति के केंद्र में है नारी शक्ति
  • शोभा करंदलाजे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम का सितंबर 2023 में संसद में समर्थन करते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि भारत तभी आगे बढ़ सकता जब देश की नारियां भी इसके साथ ही उन्नति करें। उनका यह विश्वास एमएसएमई क्षेत्र (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) में सरकार के काम में हर रोज दिखाई देता है।

एमएसएमई  क्षेत्र को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। लेकिन अगर गहराई से देखें तो इसके दिल में महिला उद्यमियों का मूक बल बसता है। आखिरकार आज इस मूक बल को वह राष्ट्रीय मान्यता, संस्थागत समर्थन और नीतिगत गति मिल रही है जिसका वह हमेशा से हकदार है।

आँकड़े बयां करते हैं कहानी

भारत के एमएसएमई  इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत तक, ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ और ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ पर 3.11 करोड़ से अधिक महिला-नेतृत्व वाले उद्यम पंजीकृत हुए हैं। वास्तव में, ‘उद्यम’ और ‘उद्यम असिस्ट’ पंजीकरण के अनुसार, देश के कुल पंजीकृत एमएसएमई में महिला-स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है और ये रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। महिला उद्यमियों के लिए सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ के माध्यम से पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाना है। पूरी तरह से ऑनलाइन, कागज रहित और स्व-घोषणा पर आधारित इस व्यवस्था ने उस नौकरशाही बाधा को समाप्त कर दिया, जो महिलाओं के लिए एक बड़ी रुकावट बनी हुई थी। जनवरी 2023 में शुरू किए गए ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ ने अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत उन महिलाओं तक पहुँच बनाकर इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया, जिनके पास ‘पैन’ नंबर या ‘जीएसटीएन’  नहीं था। इसने उन्हें प्राथमिकता क्षेत्र में दिए जाने वाले ऋण और सरकारी योजनाओं के लाभों के दायरे में लाने का काम किया।

सरकार ने महिलाओं को विकास वाहक के रूप में अपने आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखने का निर्णय लिया है।

आर्थिक शक्ति के रूप में नारी शक्ति

प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि महिलाओं को सशक्त बनाना केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय रणनीति है। उन्होंने ही कहा था कि  जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो परिवार सशक्त होते हैं और जब परिवार सशक्त होते हैं, तो राष्ट्र निरंतर मज़बूत होता जाता है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ राजनीतिक क्षेत्र में इस दर्शन की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में, विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र में महिलाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता एक व्यापक और बहुआयामी नीतिगत ढांचे के रूप में सामने आई है, जो ऋण, कौशल, बाज़ार तक पहुंच, पहचान और गरिमा जैसे पहलुओं को समाहित करती है।

महिलाओं के लिए तैयार की गई एक नीतिगत संरचना

एमएसएमई मंत्रालय ने अपने हर बड़े कार्यक्रम और योजना में महिलाओं के सशक्तिकरण को व्यवस्थित रूप से शामिल किया है।

ये सभी मिलकर, आपूर्ति पक्ष पर आठ मुख्य श्रेणियों के माध्यम से उद्यमियों को सहायता प्रदान करते हैं: तकनीक तक पहुँच, ऋण और वित्त तक पहुँच, डिजिटलीकरण को बढ़ावा, अवसरंचना सहायता, औपचारिकीकरण और समावेशन, बाज़ार तक पहुँच, और उद्योग-स्तरीय कौशल विकास।

पिछले पाँच वर्षों में, प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत 3.2 लाख से ज़्यादा महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों को सहायता दी गई है। हाल के आँकड़ों के अनुसार, पीएमईजीपी के कुल लाभार्थियों में से 39% महिलाएँ हैं जो इस योजना की रूपरेखा और महिलाओं की कुछ कर दिखाने की ललक, दोनों को दर्शाता है।

सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट महिला ऋणदाताओं को 90 प्रतिशत तक का बढ़ा हुआ गारंटी कवर प्रदान करता है। इससे बैंक बिना कुछ गिरवी रखे महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हैं।

इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक खरीद नीति  में संशोधन कर यह अनिवार्य किया गया कि केंद्रीय मंत्रालय, विभाग और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम अपनी वार्षिक खरीद का कम से कम 3 प्रतिशत हिस्सा महिला-स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से ही खरीदें। इससे महिला उद्यमियों के लिए एक सुनिश्चित और अनुमानित बाज़ार तैयार होता है, जिससे सरकारी खर्च को महिलाओं के व्यवसाय की वृद्धि में बदला जा रहा है। यह देखकर खुशी होती है कि वित्त वर्ष 2025-26 में, केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों/केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा की गई कुल खरीद का 3.5 प्रतिशत हिस्सा महिला एमएसएमई  से ही खरीदा गया था।

‘जेडइडी’ (जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट) प्रमाणन योजना के तहत, महिला-स्वामित्व वाले एमएसएमई को प्रमाणन शुल्क पर सौ प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। ये विस्तृत विवरण काफी महत्वपूर्ण हैं और ये मंत्रालय के प्रयासों को दर्शाते हैं। मंत्रालय ने इस बारे में गहराई से विचार किया है कि महिलाओं को कहाँ कहाँ बाधाओं का सामना करना पड़ता है और ठीक उन्हीं बाधाओं को दूर करने के लक्ष्य के साथ सहायता दी गई।

‘महिला कॉयर योजना’, के तहत कॉयर क्षेत्र में काम करने वाली महिला कारीगरों को विशेष कौशल विकास और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। ‘एमएसएमई- व्यापार सशक्तिकरण और विपणन’ के तहत महिलाओं को मार्केटिंग के लिए मदद करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 5 लाख लाभार्थियों में से 50 प्रतिशत महिलाओं को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। ‘यशस्विनी अभियान’ में, एमएसएमई  योजनाओं और पंजीकरण से मिलने वाले लाभों के बारे में महिलाओं को जानकारी देने के लिए पूरे देश में विशेष जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। विशेष रूप से महिला उद्यमियों के लिए आयोजित ‘एमएसएमई आइडिया हैकाथॉन’ 3.0 के तहत 18,888 से अधिक आइडिया प्राप्त हुए, जो स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि महिलाओं में रचनात्मक और उद्यमशीलता की ऊर्जा का भंडार मौजूद है, जो बस बाहर आने का इंतज़ार कर रहा है।

इसके अलावा, मंत्रालय के पास एक समर्पित महिला उद्यमिता प्रकोष्ठ है, जो विभिन्न योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करके, महिलाओं के लिए प्राप्त परिणामों की निगरानी और मूल्यांकन करके, तथा इकोसिस्टम के हितधारकों के साथ जुड़कर महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए एक नोडल केंद्र के रूप में कार्य करता है।

इन सभी पहलों ने जेंडर टारगेटिंग (लैंगिक लक्ष्यीकरण) और अभिसरण पर ध्यान केंद्रित किया है। ये कदम योजनाओं के भीतर केवल एक सब्सिडी प्रावधान के रूप में ‘महिलाओं के समावेश’ से आगे बढ़कर, महिला-अनुकूल उद्यमिता सहायता के लिए एक अधिक सुविचारित और व्यापक ढांचे की ओर बढ़ने के सफर को दर्शाते हैं।

कौशल, आत्मविश्वास, समुदाय

क्रेडिट और बाज़ारों से परे, सरकार ने यह माना है कि उद्यमिता कौशल और आत्मविश्वास का भी विषय है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर में, जहाँ महिलाएँ पारंपरिक रूप से अपने समाज की आर्थिक रीढ़ रही हैं, लक्षित उद्यमिता विकास कार्यक्रमों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रशिक्षित प्रतिभागियों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक हो।

स्वयं सहायता समूहों को एमएसएमई सहायता तंत्रों के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे महिला उद्यमियों के ऐसे समुदाय बने हैं जो एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। वे न केवल अपना व्यवसाय खड़ा करते हैं, बल्कि आपस में जुड़कर एक मजबूत नेटवर्क भी तैयार करते हैं।

यह एक ऐसी सरकार है जो निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है। प्रत्येक बजट, प्रत्येक योजना और प्रत्येक पोर्टल का सरलीकरण उस विशाल इमारत की एक ईंट के समान है, जिसकी नींव प्रधानमंत्री मोदी ने एक सरल, किंतु क्रांतिकारी विचार के साथ रखी थी—कि भारत की महिलाएं एक ऐसी शक्ति हैं जिन्हें अब स्वतंत्र और सशक्त होने का अवसर मिलना चाहिए।

हर उद्यम में नारी शक्तिकी भावना

नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने दुनिया को बताया कि भारत की महिलाएँ यहाँ की संसद का हिस्सा हैं। इस सरकार की एमएसएमई नीतियां दुनिया को यह बता रही हैं कि भारत की महिलाएँ देश के बाजारों, कारखानों, उसकी निर्यात श्रृंखलाओं, उसके नवाचार केंद्रों और उसके बोर्डरूम्स की भी हकदार हैं।

ये उसी एक सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के अपने विज़न का आधार बनाया है। एक विकसित भारत वह भारत है, जहाँ 3 करोड़ से भी ज़्यादा महिला उद्यमी (और यह संख्या लगातार बढ़ रही है) विकास की असली ताकत हैं।

अभी हम उस लक्ष्य तक पूरी तरह नहीं पहुँचे हैं, लेकिन इस सरकार की देखरेख में और प्रधानमंत्री के पक्के इरादों के साथ, हम यकीनन उस राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

(लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।)

पंजाब में आप सरकार के 4 साल पूरे: सीएम भगवंत मान ने पेश किया रिपोर्ट कार्ड

पंजाब डेस्क: पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने सोमवार को अपनी सरकार के चार साल पूरे होने के अवसर पर चंडीगढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सरकार की प्रमुख उपलब्धियां साझा कीं। सीएम ने एक बड़ी घोषणा करते हुए बताया कि इस बार पंजाब हॉकी एशिया कप की मेजबानी करेगा, जिसके मुकाबले जालंधर और मोहाली में आयोजित किए जाएंगे।

खेल और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करते हुए, मान ने बताया कि राज्य गांवों में खेल के मैदानों के लिए 1,100 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक निवेश कर रहा है। इसके तहत 3,000 आधुनिक खेल मैदान बनाए जा रहे हैं और 6,000 अन्य मैदानों पर जल्द काम शुरू होगा। साथ ही, युवाओं की फिटनेस के लिए गांवों में 6,000 इनडोर जिम स्थापित किए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने अन्य प्रमुख क्षेत्रों में भी सफलता का दावा किया:

महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को 1,000 रुपये की वित्तीय सहायता देने का वादा पूरा किया गया और राज्य के 27,314 आंगनवाड़ी केंद्रों में 7.40 करोड़ से अधिक सैनिटरी पैड मुफ्त वितरित किए गए हैं।

पारदर्शी भर्ती: सीएम ने दावा किया कि पंजाब में भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की कोई घटना नहीं हुई है।

खिलाड़ियों का सम्मान: ओलंपिक पदक विजेता हॉकी खिलाड़ियों को 1 करोड़ रुपये और सरकारी नौकरी दी गई है, जबकि 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप विजेताओं को 4.91 करोड़ रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा के वादे केवल ‘जुमला’ साबित हुए, जबकि उनकी सरकार ने जमीन पर काम किया है।

पंजाब कैबिनेट का बड़ा फैसला: ‘मेरी रसोई’ योजना का आगाज़, 40 लाख परिवारों को मिलेगा मुफ्त राशन

पंजाब डेस्क : पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राज्य कैबिनेट की बैठक के बाद ‘मेरी रसोई’ (Meri Rasoi) योजना की शुरुआत करने का बड़ा ऐलान किया है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत प्रदेश के लगभग 40 लाख परिवारों को राशन की फूड किट दी जाएगी।

योजना की मुख्य बातें:किसे मिलेगा लाभ: यह योजना विशेष रूप से नीले कार्ड धारकों के लिए है।

क्या होगा किट में: प्रत्येक फूड किट में 2 किलो माह-छोले की दाल, 2 किलो चीनी, 1 किलो नमक, 2 किलो हल्दी पाउडर और 1 लीटर सरसों का तेल शामिल होगा।

राशन का वितरण: इस योजना के तहत लाभार्थियों को तीन महीने का राशन एक साथ दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पुरानी गेहूं वितरण योजना भी इसके साथ जारी रहेगी।

बजट सत्र और महिलाओं के लिए खास तोहफा: कैबिनेट ने आगामी बजट सत्र की तारीखों पर भी मुहर लगा दी है। पंजाब का बजट सत्र 6 मार्च से 16 मार्च तक चलेगा। ऐतिहासिक रूप से पहली बार, 8 मार्च (रविवार) को बजट पेश किया जाएगा। इसी दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री ने महिलाओं को 1,000 रुपये देने की घोषणा की है, जिसका औपचारिक ऐलान बजट के दौरान किया जाएगा।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु: मुख्यमंत्री मान ने गुरदासपुर मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यह अभी जांच का विषय है और पंजाब सरकार इसमें पूरा सहयोग करेगी। आगामी बजट को पूरी तरह से ‘लोक भलाई’ (Public Welfare) पर केंद्रित बताया गया है।