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गुरदासपुर : 2.7 किलो हेरोइन बरामद, एक आरोपी गिरफ्तार, साथी फरार

गुरदासपुर / सत्ता संदेश

रिपोर्ट : जतिंदर सोढ़ी

गुरदासपुर पुलिस और इंटेलिजेंस विभाग को नशा तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में बड़ी सफलता मिली है। देर रात रावी नदी के किनारे बसे गांवों में चलाए गए संयुक्त ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने करीब 2.7 किलोग्राम हेरोइन बरामद कर एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के दौरान आरोपी का एक साथी मौके से फरार होने में कामयाब रहा।

SSP आदित्य के अनुसार, बहरामपुर पुलिस और इंटेलिजेंस विभाग की टीमों ने रावी नदी के आसपास के इलाकों में संयुक्त अभियान चलाया था। इसी दौरान पुलिस ने बलविंदर सिंह उर्फ नीटा को करीब पांच पैकेट हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया। बरामद नशे की कुल मात्रा लगभग 2.7 किलोग्राम बताई गई है।

पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी रावी नदी के उस पार स्थित गांव का रहने वाला है और वर्तमान में चंडीगढ़ के नई आबादी गांव में रह रहा था। कार्रवाई के दौरान उसके साथ मौजूद एक अन्य व्यक्ति मौके से फरार हो गया, जिसकी तलाश पुलिस द्वारा की जा रही है।

मामले में बहरामपुर थाने में NDPS एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आरोपी के नशा तस्करी से जुड़े कौन-कौन से लिंक हैं और बरामद हेरोइन की सप्लाई कहां की जानी थी।

SSP आदित्य ने दावा किया कि इस कार्रवाई से नशा तस्करी से जुड़े एक बड़े नेटवर्क को झटका लगा है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में पुलिस द्वारा लगातार कार्रवाई करते हुए हेरोइन की बड़ी खेप बरामद की गई है।

गुरदासपुर पुलिस का कहना है कि सीमावर्ती इलाकों में नशा तस्करी पर लगाम लगाने के लिए निगरानी और सर्च ऑपरेशन लगातार जारी रहेंगे।

PM Modi Meeting: राज्य मंत्रियों के साथ 3 घंटे चली बैठक, योजनाओं के लाभ पर जोर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक दर्जन से अधिक राज्य मंत्रियों और स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। प्रधानमंत्री कार्यालय सेवा तीर्थ में हुई यह बैठक तीन घंटे से अधिक समय तक चली। बैठक में विभिन्न मंत्रालयों में किए गए सुधारों, नई पहलों और अब तक की प्रगति का मंत्रियों ने प्रधानमंत्री के सामने विस्तृत ब्यौरा रखा।

सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रालयों के कामकाज में समयबद्धता, गुणवत्ता और पारदर्शिता को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। उन्होंने मंत्रियों से कहा कि केंद्र सरकार की योजनाओं और परियोजनाओं को तय समयसीमा के भीतर पूरा किया जाए और उनके क्रियान्वयन में गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता न हो।

योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक पहुंचाने पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य मंत्रियों से विशेष रूप से कहा कि केंद्र सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ निर्धारित लाभार्थियों तक पहुंचना सुनिश्चित किया जाए। सरकार की योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब उनका सीधा फायदा लक्षित वर्ग तक पहुंचे।

सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री ने मंत्रियों को योजनाओं की जमीनी स्थिति पर लगातार नजर रखने और उनके प्रभाव का आकलन करने पर भी जोर दिया। बैठक में प्रशासनिक कामकाज को अधिक प्रभावी और परिणाम आधारित बनाने पर चर्चा हुई।

कैबिनेट मंत्री और शीर्ष नौकरशाह बैठक में नहीं थे

यह बैठक अपने स्वरूप को लेकर भी महत्वपूर्ण रही। सूत्रों के मुताबिक, यह अपनी तरह की पहली बैठक थी जिसमें किसी कैबिनेट मंत्री या शीर्ष नौकरशाह को शामिल नहीं किया गया। बैठक में केवल राज्य मंत्री और स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री मौजूद रहे।

जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री के साथ राज्य मंत्रियों की बैठकों का यह पहला दौर था। इसमें कृषि, शिक्षा, ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय जैसे महत्वपूर्ण विभागों से जुड़े राज्य मंत्री शामिल हुए।

सचिवों के साथ बैठकों के बाद मंत्रियों से संवाद

प्रधानमंत्री मोदी की राज्य मंत्रियों के साथ यह बैठक हाल ही में सचिवों के अलग-अलग एम्पावर्ड ग्रुप के साथ हुई बैठकों के बाद हुई है। इन बैठकों में सुशासन, सुरक्षा, कृषि, ग्रामीण विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई थी।

माना जा रहा है कि राज्य मंत्रियों के साथ बैठक का उद्देश्य मंत्रालयों की योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा के साथ-साथ उनके प्रभावी क्रियान्वयन को और मजबूत करना था।

गुजरात और महाराष्ट्र के दौरे पर PM मोदी

बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को गुजरात और महाराष्ट्र के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह 35,000 करोड़ रुपये से अधिक की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री सबसे पहले गुजरात के वडोदरा पहुंचेंगे। यहां वह कई विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे, विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे और उन्हें राष्ट्र को समर्पित करेंगे। इस दौरान वह एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि वह वडोदरा, नवसारी और मुंबई में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इन कार्यक्रमों में 35,000 करोड़ रुपये से अधिक की महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास शामिल है।

पश्चिमी डीएफसी के तीन प्रमुख सेक्शन होंगे राष्ट्र को समर्पित

प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) के तीन प्रमुख खंड भी देश को समर्पित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि इन परियोजनाओं से देश के लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

इसके अलावा प्रधानमंत्री मुंबई में आयोजित होने वाले ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में भी शामिल होंगे। यहां वह वित्तीय प्रौद्योगिकी और इससे जुड़े क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका पर अपने विचार रख सकते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की राज्य मंत्रियों के साथ हुई बैठक और इसके बाद गुजरात-महाराष्ट्र दौरे को सरकार के कामकाज में गति, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर सरकार के फोकस के तौर पर देखा जा रहा है।

PM Modi Mumbai Visit: कार्यक्रम स्थल से 2 संदिग्ध हिरासत में, फर्जी PMO ID और बंदूक मिलने का दावा

मुंबई / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंबई दौरे के बीच सुरक्षा एजेंसियों ने उनके कार्यक्रम स्थल से दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है। मुख्य संदिग्ध की पहचान 24 वर्षीय रोहन पारेख के रूप में बताई जा रही है। आरोप है कि उसने खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का अधिकारी बताया था और उसके पास एक फर्जी ID कार्ड मिला। उसके साथ मौजूद दूसरे व्यक्ति ने खुद को उसका बॉडीगार्ड बताया। उसके पास कथित तौर पर एक बंदूक भी बरामद हुई है।

सुरक्षा जांच के दौरान दोनों की पहचान और दावों को लेकर संदेह पैदा हुआ, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुंबई क्राइम ब्रांच आगे की जांच कर रही है।

PM मोदी आज मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का करेंगे उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार शाम करीब 5:45 बजे मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 के सातवें संस्करण का उद्घाटन करेंगे। यह सम्मेलन वित्तीय तकनीक यानी FinTech के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख वार्षिक आयोजनों में शामिल है।

ग्लोबल फिनटेक फेस्ट वर्ष 2020 से एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में विकसित हुआ है, जहां नीति-निर्माता, रेगुलेटर, केंद्रीय बैंक, वित्तीय संस्थान, फिनटेक और टेक्नोलॉजी कंपनियां, निवेशक, शिक्षाविद और अन्य वैश्विक हितधारक वित्तीय क्षेत्र के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते हैं।

GFF 2026 में इन तकनीकों पर रहेगा फोकस

GFF 2026 का मुख्य उद्देश्य संभावनाओं को ठोस परिणामों में बदलना और डिजिटल पेमेंट तथा वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में भारत की भूमिका को और मजबूत करना है।

सम्मेलन में एजेंटिक AI, प्रोग्रामेबल फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी समेत कई उभरती तकनीकों पर चर्चा होगी। इसके साथ ही इस बात पर भी विचार किया जाएगा कि नई तकनीकों के जरिए नागरिकों, कारोबारों और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए भरोसेमंद, समावेशी और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधान कैसे तैयार किए जा सकते हैं।

वडोदरा में पीएम मोदी ने WDFC के तीन सेक्शन किए राष्ट्र को समर्पित

मुंबई पहुंचने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वडोदरा के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां उन्होंने वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) के तीन प्रमुख सेक्शन देश को समर्पित किए।

ये तीनों सेक्शन करीब 326 किलोमीटर लंबे हैं और इन्हें 20,700 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से विकसित किया गया है। इनमें न्यू साणंद (नॉर्थ)-न्यू मकरपुरा, न्यू उमरगांव-न्यू सफाले और न्यू सफाले-न्यू JNPT सेक्शन शामिल हैं।

युवाओं से 25 मिनट संवाद, भ्रामक दावों से बचने की अपील

वडोदरा कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से करीब 25 मिनट संवाद भी किया। कार्यक्रम में लगभग 6 हजार युवाओं के शामिल होने की बात कही गई है।

प्रधानमंत्री ने युवाओं से झूठे दावों और भ्रामक बातों से सावधान रहने तथा तथ्यों की जांच करने की अपील की। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 के कार्यक्रम में शामिल होंगे।

फिलहाल मुंबई क्राइम ब्रांच द्वारा हिरासत में लिए गए दोनों संदिग्धों से पूछताछ की जा रही है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों की कार्यक्रम स्थल तक पहुंच कैसे हुई और उनके द्वारा किए गए दावों की वास्तविकता क्या थी।

Su-30MKI बनेगा और घातक! 300 KM तक मार करने वाली रूसी मिसाइल पर भारत की नजर

वर्ल्ड डेस्क / सत्ता संदेश

नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी के बीच एक बड़ा प्रस्ताव सामने आया है। भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों को रूस की लंबी दूरी की RVV-BD एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस करने के प्रस्ताव पर रक्षा मंत्रालय स्तर पर विचार किया जा रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात पर दुनिया की नजर है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, RVV-BD को Su-30MKI के साथ इंटीग्रेट करने के लिए विमान में जरूरी तकनीकी बदलाव किए जाने का प्रस्ताव है। मिसाइल की बताई गई मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर तक है। अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और आगे चलकर इसका तकनीकी एकीकरण सफल रहता है, तो भारतीय वायुसेना की Beyond Visual Range यानी BVR एयर कॉम्बैट क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

मोदी-पुतिन मुलाकात पर टिकी नजर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने की पुष्टि क्रेमलिन की ओर से की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच 11 सितंबर को द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। दोनों नेताओं के बीच रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग सहित कई मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

भारत सरकार के अनुसार, मोदी और पुतिन ने 31 अगस्त को बिश्केक में हुई मुलाकात के दौरान राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी। दोनों देशों ने अपनी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को आगे मजबूत करने पर भी सहमति जताई थी।

क्या है RVV-BD की खासियत?

RVV-BD रूस की लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके विभिन्न संस्करण लंबी दूरी के हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए विकसित किए गए हैं। करीब 300 किलोमीटर तक की बताई गई रेंज और बेहद तेज गति के कारण ऐसी मिसाइलें सामान्य लड़ाकू विमानों के साथ-साथ दुश्मन के हाई-वैल्यू एयरबोर्न प्लेटफॉर्म के खिलाफ भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

इनमें Airborne Early Warning and Control यानी AEW&C/AWACS विमान, निगरानी विमान और अन्य महत्वपूर्ण हवाई प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं। हालांकि वास्तविक प्रभाव मिसाइल के अंतिम संस्करण, सेंसर नेटवर्क, फायर-कंट्रोल सिस्टम और विमान के साथ उसके तकनीकी एकीकरण पर निर्भर करेगा।

Su-30MKI की ताकत में होगा इजाफा

Su-30MKI भारतीय वायुसेना के प्रमुख लड़ाकू विमानों में शामिल है और 260 से अधिक विमान भारतीय बेड़े में बताए जाते हैं। भारत इस फ्लीट के आधुनिकीकरण पर भी काम कर रहा है, जिसमें एवियोनिक्स, सेंसर और अन्य प्रणालियों को अपग्रेड किया जा रहा है।

ऐसे में अगर RVV-BD का Su-30MKI के साथ सफल एकीकरण होता है, तो विमान की लंबी दूरी से हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। खास तौर पर आधुनिक BVR युद्ध में लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी वायुसेना के लिए रणनीतिक बढ़त का अहम हिस्सा होती हैं।

रूस के साथ डील के साथ स्वदेशी विकल्प पर भी जोर

भारत रूस से लंबी दूरी की मिसाइल हासिल करने के विकल्प पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियारों के विकास पर भी जोर जारी है। DRDO की Astra मिसाइल श्रृंखला को लगातार विकसित किया जा रहा है और भविष्य में लंबी दूरी के स्वदेशी एयर-टू-एयर हथियार भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा भारत ने फ्रांस से Meteor एयर-टू-एयर मिसाइलों की खरीद भी की है। ऐसे में भारतीय वायुसेना की रणनीति में स्वदेशी और विदेशी दोनों तरह के लंबी दूरी के एयर-टू-एयर हथियारों का मिश्रण देखने को मिल रहा है।

क्या BRICS के दौरान आगे बढ़ेगा प्रस्ताव?

फिलहाल RVV-BD को लेकर किसी अंतिम डील या करार की घोषणा नहीं हुई है। इसे एक प्रस्ताव के तौर पर देखा जा रहा है, जिस पर तकनीकी, वित्तीय और रणनीतिक पहलुओं के आधार पर आगे फैसला होना है।

ऐसे में 11 सितंबर को होने वाली मोदी-पुतिन द्विपक्षीय बैठक और उसके बाद BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-रूस रक्षा सहयोग पर होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, मौजूदा रिपोर्टों में पुतिन-मोदी बातचीत के प्रमुख रक्षा मुद्दों में रूस के Su-57 लड़ाकू विमान से जुड़े तकनीकी सहयोग का भी उल्लेख किया गया है।

अगर RVV-BD प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और इसके इंटीग्रेशन तथा सप्लाई से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनती है, तो Su-30MKI की लंबी दूरी की BVR क्षमता को मजबूत करने की दिशा में यह एक अहम कदम साबित हो सकता है।

भारत की तीनों सेनाओं को बड़ी ताकत, DAC ने ₹1.10 लाख करोड़ की रक्षा खरीद को दी मंजूरी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की सैन्य क्षमता और ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने रक्षा खरीद के मोर्चे पर बड़ा फैसला लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में 7 सितंबर 2026 को हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) की बैठक में करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये की रक्षा खरीद के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है।

DAC ने इन प्रस्तावों को Acceptance of Necessity (AoN) यानी सैद्धांतिक प्रशासनिक मंजूरी दी है। इस रक्षा पैकेज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंजूर किए गए प्रस्तावों में करीब 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी। इससे देश के स्वदेशी रक्षा उद्योग, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भर भारत अभियान को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

सेना को मिलेंगे CBRN रेक्की व्हीकल और हाई मोबिलिटी व्हीकल

भारतीय सेना के लिए Chemical, Biological, Radiological and Nuclear (CBRN) Reconnaissance Vehicles की खरीद को मंजूरी दी गई है। इन वाहनों का इस्तेमाल ऐसे संवेदनशील इलाकों में किया जाएगा जहां रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल या परमाणु एजेंट के इस्तेमाल का खतरा हो।

CBRN रेक्की व्हीकल प्रभावित क्षेत्र की पहचान, खतरनाक एजेंट का पता लगाने, निगरानी और प्रदूषित इलाकों को चिन्हित करने में मदद करेंगे। इससे किसी CBRN हमले या युद्ध की स्थिति में सैनिकों को खतरनाक क्षेत्रों में ऑपरेशन करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।

इसके अलावा सेना के लिए High Mobility Vehicles (HMV) की खरीद भी की जाएगी। इन वाहनों का इस्तेमाल पहाड़ी, रेगिस्तानी और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में सैनिकों तथा सैन्य सामान की तेज आवाजाही के लिए किया जाएगा। इससे सेना की ऑपरेशनल मोबिलिटी और लॉजिस्टिक क्षमता मजबूत होगी।

माइन लेइंग और युद्ध क्षेत्र में मोबिलिटी होगी मजबूत

DAC ने सेना के लिए Self-Propelled Mechanical Mine Layers (MML) की खरीद को भी मंजूरी दी है। इनकी मदद से कठिन इलाकों में तेजी से और प्रभावी तरीके से बारूदी सुरंगें बिछाई जा सकेंगी।

इसके साथ ही सेना को Trawl Tanks और Sarvatra Bridge System भी मिलेंगे। ट्रॉल टैंक बारूदी सुरंगों और अन्य बाधाओं वाले क्षेत्रों में लड़ाकू फॉर्मेशन को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे, जबकि सर्वत्र ब्रिज सिस्टम नदियों और अन्य प्राकृतिक या कृत्रिम बाधाओं को पार करने में सैनिकों और सैन्य वाहनों की मदद करेगा।

इन दोनों क्षमताओं से सेना की Obstacle Crossing और Battlefield Mobility को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

सेना और वायुसेना के लिए Advanced Light Helicopters

रक्षा खरीद परिषद ने Advanced Light Helicopters (ALH) की खरीद को भी मंजूरी दी है। इन हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना दोनों के लिए किया जाएगा।

ALH अलग-अलग ऑपरेशनल परिस्थितियों में सैनिकों और सामान की आवाजाही, निगरानी तथा अन्य सैन्य अभियानों में उपयोगी होंगे। इससे दोनों सेनाओं की हेलिकॉप्टर आधारित ऑपरेशनल क्षमता को मजबूती मिलेगी।

नौसेना को मिलेगा स्वदेशी Arudhra Radar

भारतीय नौसेना के लिए Arudhra Radar की खरीद को भी मंजूरी दी गई है। इसे नौसेना के विभिन्न एयर स्टेशनों पर मौजूद पुराने Air Route Surveillance Radars को बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

Arudhra एक स्वदेशी मल्टी-फंक्शन रडार सिस्टम है। इसके शामिल होने से नौसेना के एयर स्टेशनों की हवाई निगरानी क्षमता को आधुनिक बनाने में मदद मिलेगी और एयर सर्विलांस नेटवर्क को अपग्रेड किया जा सकेगा।

स्वदेशी Marine Gas Turbine से घटेगी विदेशी निर्भरता

नौसेना के लिए Marine Gas Turbine (MGT) के डिजाइन और डेवलपमेंट के बाद इसकी खरीद को भी मंजूरी दी गई है। मरीन गैस टर्बाइन युद्धपोतों के प्रोपल्शन सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

इस तकनीक का स्वदेशी विकास भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में महत्वपूर्ण नौसैनिक प्रोपल्शन तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

वायुसेना को मिलेगा नया Electronic Warfare सिस्टम

भारतीय वायुसेना की वारफाइटिंग क्षमता बढ़ाने के लिए भी कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। इनमें Ground-Based Multi-Purpose Jammer (GBMPJ) प्रमुख है।

यह इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम दुश्मन के रडार और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर को जाम या बाधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है और यह सिस्टम भारतीय वायुसेना को इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम में ऑपरेशनल बढ़त हासिल करने में मदद कर सकता है।

तीनों सेनाओं में RFID आधारित स्मार्ट एक्सेस सिस्टम

DAC ने तीनों सेनाओं के लिए Defence Forces Secure Access Card (DEFSAC) System को भी मंजूरी दी है।

इसके तहत मौजूदा पेपर आधारित पहचान पत्र, पास और परमिट व्यवस्था को RFID आधारित स्मार्ट कार्ड सिस्टम से बदलने की योजना है। इसका उद्देश्य सैन्य प्रतिष्ठानों और संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश व्यवस्था को ज्यादा सुरक्षित और आधुनिक बनाना है।

DEFSAC को इंटरऑपरेबल बनाया जाएगा, जिससे तीनों सेनाओं में पहचान और एक्सेस कंट्रोल सिस्टम को बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकेगा।

98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से, स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बड़ा फायदा

DAC के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल करीब ₹1.10 लाख करोड़ की रक्षा खरीद नहीं है, बल्कि इसका भारतीय रक्षा उद्योग पर संभावित प्रभाव भी है।

करीब 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से किए जाने का मतलब है कि सैन्य वाहन, रडार, हेलिकॉप्टर, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्माण में भारतीय कंपनियों की भूमिका बढ़ेगी।

इससे देश के रक्षा उद्योग को बड़े ऑर्डर मिलने, उत्पादन क्षमता बढ़ने, नई तकनीक के विकास, रोजगार और सप्लाई चेन को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों के लिए विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में भी यह फैसला अहम माना जा रहा है।

कुल मिलाकर DAC की यह मंजूरी भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ देश के स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

संवाद से परिणाम तक: आसियान-भारत कृषि सहयोग के तीन दशकों को किसानों की समृद्धि में बदलना

एम. एल. जाट और नवीन पी. सिंह

जब भारत और आसियान के 11 सदस्य देशों के अधिकारी और मंत्री नई दिल्ली में दो दिवसीय बैठक के लिए एकत्र हो रहे हैं, तो इस साझेदारी का वास्तविक सार किसी साझा विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि 1992 से लगातार विकसित किए गए अनुसंधान, प्रशिक्षण और ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में निहित है।

नई दिल्ली में 9 सितंबर को आयोजित होने वाली कृषि एवं वानिकी पर 9वीं आसियान-भारत मंत्रिस्तरीय बैठक (AIMMAF) एक स्थापित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी: मंत्रियों के विचारार्थ तकनीकी सिफारिशों पर चर्चा और उन्हें अंतिम रूप देने के लिए कृषि एवं वानिकी पर 10वां आसियान-भारत कार्य समूह (AIWGAF) एक दिन पहले बैठक करेगा। हालांकि यह एक औपचारिक प्रक्रिया या 1992 में भारत-आसियान क्षेत्रीय संवाद शुरू होने के बाद से विकसित तंत्र का एक सामान्य दौर लग सकता है, लेकिन औपचारिकताओं से परे जाकर यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस संस्थागत साझेदारी ने तीन दशकों में क्या हासिल किया है। इसलिए, यह बैठक न केवल प्रगति की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि इस दीर्घकालिक सहयोग को पूरे क्षेत्र के किसानों की समृद्धि, आजीविका और खाद्य प्रणालियों के लिए अधिक ठोस परिणामों में बदलने का भी अवसर देती है।

साझा कृषि वास्तविकताएं, साझा अवसर

भारत और ग्यारह आसियान सदस्य देश—जिनमें अक्टूबर 2025 में शामिल हुआ नया सदस्य तिमोर-लेस्ते भी शामिल है, अपार कृषि विविधता और विकास क्षमता वाले क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आसियान के कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन क्षेत्र लगभग 93 मिलियन नौकरियों को सहारा देते हैं, जबकि भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्र लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल को रोज़गार प्रदान करते हैं।

दोनों ही क्षेत्रों में खेत मुख्य रूप से छोटे और खंडित हैं, उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, तथा दोनों क्षेत्रों में एक जैसी फसलें और ईकोसिस्टम सीमाओं के पार फैले हुए हैं। इनमें धान, दालें, फल और मसालों से लेकर पशुधन, मत्स्पालन, मैंग्रोव और वन तक शामिल हैं। दोनों क्षेत्र जलवायु परिवर्तनशीलता, सीमा पार से आने वाले कीट-रोगों और कटाई के बाद होने वाले निरंतर नुकसान के बढ़ते दबाव का भी सामना कर रहे हैं।

यह समानताएं कृषि ज्ञान और प्रौद्योगिकियों को परस्पर साझा करने के लिए बेहद अनुकूल बनाती हैं, जिससे ‘भारत-आसियान मध्यम अवधि कार्य योजना 2026–2030’ के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है। यह योजना आसियान की नई ‘खाद्य, कृषि और वानिकी क्षेत्रीय योजना 2026–2030’ और इसके छह रणनीतिक स्तंभों-स्थिरता, डीकार्बोनाइजेशन, खाद्य सुरक्षा, व्यापार कनेक्टिविटी, डिजिटल नवाचार और सतत वन प्रबंधन-के अनुरूप है।

भारत का कृषि ज्ञान और तकनीकी आधार

इस साझेदारी में भारत का योगदान दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्तपोषित कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणालियों में से एक पर आधारित है। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत 114 अनुसंधान संस्थान तथा ब्यूरो, 80 कृषि विश्वविद्यालय और 731 जिला-स्तरीय विस्तार केंद्र (कृषि विज्ञान केंद्र) शामिल हैं। पिछले 12 वर्षों में इस नेटवर्क ने फसलों की 3,800 से अधिक किस्में जारी की हैं, जिनमें से लगभग 3,100 विशेष रूप से जलवायु अनुकूलता के लिए और लगभग 200 बेहतर पोषण गुणों के साथ विकसित की गई हैं। इसे एक राष्ट्रीय जीन बैंक का भी समर्थन प्राप्त है, जिसमें करीब 4,70,000 प्रविष्टियां (accessions) संरक्षित हैं।

भारत के कृषि रूपांतरण का पैमाना उसके उत्पादन में हुई वृद्धि में दिखता है। खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के लगभग 25.2 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 37.7 करोड़ टन हो गया है, जबकि इसी अवधि में दूध उत्पादन करीब 14.6 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 24.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है। मत्स्पालन में, उत्पादन पिछले दशक में लगभग दोगुना होकर करीब 2 करोड़ टन हो गया है, जो अनुमानित 3 करोड़ आजीविकाओं को सहारा दे रहा है; साथ ही 49 फिनफिश और शेलफिश प्रजातियों के लिए कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं।

यही वह विशेषज्ञता है जिसे भारत इस साझेदारी में लाता है-किसी श्रेष्ठता के दावे के रूप में नहीं, बल्कि उन कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों द्वारा गढ़े गए एक ठोस संसाधन आधार के रूप में, जो दक्षिण पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों से काफी मेल खाते हैं।

व्यावहारिक धरातल पर क्या है यह सहयोग

अनुसंधान अवसंरचना से परे, इस साझेदारी का अधिक ठोस योगदान मानव पूंजी के निर्माण और ज़मीनी स्तर के विस्तार को मजबूत करने में रहा है। आसियान-भारत फैलोशिप कार्यक्रम सदस्य देशों के छात्रों को प्रमुख भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जिससे वे क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के रूप में पहचाने गए क्षेत्रों में अनुसंधान और विशेषज्ञता से परिचित होते हैं।

भारत की अपनी विस्तार पहल भी यह दर्शाती हैं कि इस तरह के सहयोग को किस बड़े पैमाने पर व्यवहार में लाया जा सकता है। विकसित कृषि संकल्प अभियान 13.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंचा और अनुसंधान एवं नीतिगत ध्यान के लिए 500 से अधिक प्राथमिकता वाले मुद्दों की पहचान की। एक संबंधित आउटरीच पहल ने 728 जिलों में 1,34,000 से अधिक कार्यक्रम चलाए, 6,650 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए और 1,00,000 से अधिक फील्ड प्रदर्शन किए, जबकि इसका डिजिटल प्रसार लगभग 5 करोड़ हितधारकों तक पहुंचा।

ये घरेलू अनुभव आसियान के लिए केवल अपने बड़े पैमाने के कारण ही प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी हैं क्योंकि ये अपेक्षाकृत कम लागत वाले और व्यापक पहुंच वाले विस्तार मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र के छोटे किसानों की कृषि प्रणालियों के अनुसार ढाला जा सकता है। अवसर इस बात में है कि मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच केवल औपचारिक आदान-प्रदान से आगे बढ़कर ऐसे तंत्र बनाए जाएं जो ज्ञान, तकनीक और प्रशिक्षण को सीधे किसानों से जोड़ें-और यह केवल व्यापार उपकरणों के बजाय संस्थागत सहयोग के माध्यम से हो।

साझेदारी में अभी कहां काम बाकी है: अनुसंधान से ज़मीनी प्रभाव तक

एक ईमानदार आकलन यह है कि यह सहयोग अभी भी काफी हद तक अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और मंत्रालयों तक ही सीमित है। सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय विस्तार नेटवर्कों तक इसकी पहुंच तुलनात्मक रूप से सीमित है, जो इसके लाभों को व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत खेतों तक पहुंचा सकते हैं।

सात विषयगत क्षेत्र वर्तमान में इस तकनीकी सहयोग का आधार हैं: खाद्य और पोषण सुरक्षा; सतत वानिकी और मैंग्रोव प्रबंधन; पुनर्योजी (regenerative) एवं जलवायु-अनुकूल कृषि; पशुधन, डेयरी और पशु स्वास्थ्य; मत्स्यपालन और नीली अर्थव्यवस्था; कटाई उपरांत प्रबंधन और मूल्य श्रृंखलाएं; तथा डिजिटल कृषि। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र गहरे जुड़ाव के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है।

अगला कदम एक मजबूत संस्थागत अनुवर्ती कार्रवाई होना चाहिए: आसियान की परिस्थितियों में तनाव-सहनशील फसल किस्मों के बहु-स्थानिक परीक्षण, कीट-निगरानी के व्यावहारिक संयुक्त प्रोटोकॉल, और कटाई के बाद के नुकसान को मापने के लिए समान पद्धतियां, जिससे देशों के बीच सार्थक तुलना संभव हो सके। मत्स्य और वानिकी समुदाय, जिनकी आजीविका इन क्षेत्रों के निर्णयों से सीधे प्रभावित होती है, विशेष रूप से ऐसे सहयोग से लाभान्वित होंगे जो केवल अनुसंधान विनिमय से आगे बढ़कर व्यावहारिक और ज़मीनी स्तर की सहायता तक पहुंचे।

साझेदारी का आकलन घोषणाओं से नहीं, परिणामों से हो

इसलिए 9वीं AIMMAF का मूल्यांकन उसके संयुक्त बयान की भाषा से नहीं, बल्कि बैठक के बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। वास्तविक और कड़ी परीक्षा-विशेषकर भारत और आसियान में कृषि के विशाल पैमाने को देखते हुए-यह है कि क्या यह सहयोग 2026–2030 की कार्य योजना के दौरान मापने योग्य परिणाम देता है या नहीं।

इसका अर्थ कुछ ठोस प्रश्न पूछना है: आसियान की परिस्थितियों में भारत की कितनी फसल किस्मों का परीक्षण और उन्हें अपनाया गया? आसियान फैलोशिप से निकले कितने छात्र अपने राष्ट्रीय कृषि तंत्र को मजबूत करने के लिए वापस लौटे? क्या संयुक्त कीट-निगरानी और कटाई उपरांत प्रोटोकॉल सहमत रूपरेखाओं से आगे बढ़कर नियमित व्यवहार में आए? और क्या भारत के सिद्ध विस्तार मॉडलों को आसियान के छोटे किसानों की अर्थव्यवस्था के अनुसार सार्थक रूप से ढाला गया?

ये परिणाम इस सप्ताह नई दिल्ली में तुरंत दिखाई नहीं देंगे। ये समय के साथ खेतों, प्रयोगशालाओं, संस्थानों और अंततः 10वीं AIMMAF में प्रस्तुत साक्ष्यों में उभरेंगे। वहीं इस साझेदारी की वास्तविक सफलता का आकलन किया जाना चाहिए: भारत और आसियान भर के किसानों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका, लचीलेपन, उत्पादकता और आय में।

(लेखक क्रमशः सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) तथा महानिदेशक, ICAR और सहायक महानिदेशक (अंतर्राष्ट्रीय संबंध), नई दिल्ली हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)

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भारत की 7.8% विकास दर पर सवाल और जवाब: आर्थिक मजबूती के पीछे क्या है?

डॉ. सौरभ गर्ग और डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन

अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन और अरविंद सुब्रमण्यन ने यह पूछा है कि जिस तिमाही में ऊर्जा के क्षेत्र में जोरदार झटके लगे हों, उसमें भारत की विकास दर आखिर 7.8 प्रतिशत कैसे हो सकती है। बेशक, यह एक उचित सवाल है। इसका एक जवाब भी है और वह जवाब पिछले कुछ वर्षों से सबके सामने ही है। 

समय से ही शुरुआत करते हैं। इस तिमाही की अवधि अप्रैल से जून 2026 तक थी। इससे ठीक पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इजराइल के बीच का संघर्ष चरम पर पहुंच गया था। तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और भारत ने इसका असर महसूस किया। हालांकि मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस जबरदस्त व्यवधान में कमी आई। मई आते-आते दबाव के बदल छंट गए। जून तक, मुश्किल दौर बीत चुका था। तीन महीने वाली तिमाही की शुरुआत के कुछ मुश्किल हफ्ते उस तिमाही के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं बना देते।

उन महीनों के सबूत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। ऑटोमोबाइल की बिक्री में निरंतर बढ़ोतरी हुई। एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की मदद से बैंक ऋण और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। जीएसटी की दरों में कटौती के बावजूद, इसका संग्रह मजबूत बना रहा और हाल ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में इसमें 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2025-26 तक के तीन वर्षों में, जीएसटी के सकल संग्रह में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ‘नॉमिनल जीडीपी’ में 31.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये दोनों आंकड़े बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं और दोनों ही लगभग एक-दूसरे से मेल खाते हैं। जीएसटी रिटर्न कंपनियां दाखिल करती हैं। ऋण संबंधी आंकड़े बैंकों से आते हैं। व्यापार के आंकड़े  बंदरगाहों से आते हैं। इनमें से कोई भी आंकड़ा सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा तैयार नहीं किया जाता है।

अर्थव्यवस्था आखिर टिकी क्यों रही? क्योंकि कई सुधारों को एक साथ अपनाया गया। वर्ष 2022-23 के बाद से केन्द्र सरकार का पूंजीगत व्यय 65 प्रतिशत बढ़ा है और इस वर्ष इसमें 11.5 प्रतिशत और बढ़ोतरी का बजट रखा गया है। एक दशक में बनाई गई सड़कें, बंदरगाहें और बिजली संयंत्र तेल के महंगे होने पर ठप्प नहीं पड़े। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अनौपचारिक गतिविधियों के एक बड़े हिस्से को औपचारिक बनाया और उन्हें मापी जा सकने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल किया है। दिवाला संहिता ने डूबे हुए कर्ज (बैड डेट) से निपटने के बैंकों और कंपनियों के तौर-तरीकों को बदल दिया। रियल एस्टेट कानून ने उस सेक्टर को साफ-सुथरा बनाया, जो कभी अटकी हुई परियोजनाओं और पैसे के अपारदर्शी लेन-देन के लिए जाना जाता था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2023 में उस सफाई अभियान का उल्लेख किया था। उसने नई दिल्ली पर कोई मेहरबानी नहीं की थी।

इसके बाद, तेल की कीमतों में अचानक आए उछाल से निपटने के लिए सरकार ने जो कुछ किया, वह भी सामने है। उसने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ आम परिवारों और कंपनियों पर नहीं डाला। उसने इसकी लागत खुद वहन की। राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) का उद्देश्य ही यही है और भारत ने इसे तैयार किया है। इसका सबूत 2 सितंबर को मिला। जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया और इसके साथ ही स्थिर संभावना भी जताई। इसके अलावा, देश की रेटिंग सीमा (कंट्री सीलिंग) को भी ए कर दिया। भारत को तीन दशकों से अधिक समय से ‘ए’ रेटिंग नहीं मिली है। एजेंसी ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, जीएसटी, दिवाला संहिता और सकल गैर-निष्पादित ऋण अनुपात (ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग लोन रेश्यो) के 1.8 प्रतिशत तक कम होने का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने उच्च पूंजीगत व्यय को जारी रखते हुए भी अपने राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025 में जीडीपी  के 4.7 प्रतिशत से घटाकर वित्तीय 2026 में 4.4 प्रतिशत कर लिया। टोक्यो स्थित एक रेटिंग समिति के लिए दिल्ली में किसी को खुश करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने भी उन्हीं सुधारों को देखा और वही नतीजा निकाला।

अब आलोचना के मुख्य बिंदु पर आते हैं। लेखकगण पूछते हैं कि अगर आज ये संकेतक 7.8 प्रतिशत की विकास दर को सही ठहराते हैं, तो पूर्व के वर्षों में वैसी ही विकास दर कमजोर संकेतकों के साथ क्यों संभव हुई थी? यह मान लेना कि विकास हमेशा एक जैसी चीजों से ही संभव होती है, जरूरी नहीं है। निर्यात और औपचारिक ऋण से प्रेरित तिमाही, घरेलू खर्च या सरकारी निवेश से चलने वाले वर्ष जैसी नहीं होगी। पूर्व के वर्षों में विकास के अपने कारण थे, जो उस समय साफ दिख रहे थे। वर्ष 2024-25 तक, शेयर बाजार तेजी से चढ़ा और अधिक संख्या में भारतीयों ने निवेश करना शुरू किया। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। गैर-बैंक और तकनीक-आधारित ऋणदाता तेजी से बढ़े। वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल संसाधनों का प्रवाह तीन वर्षों में 72 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंकों की  हिस्सेदारी 96 प्रतिशत बढ़ी। ये असली कारण थे। बस, वे अलग थे।

मार्च 2023 से मार्च 2026 के बीच सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को दिए गए बकाया ऋण में 66.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 में भी यह बढ़ोतरी लगभग 25 प्रतिशत की दर से जारी थी। ऐसा कहा जाता है कि ऊर्जा की कीमतों में अचानक उछाल से छोटी कंपनियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। लेकिन उन्हें ऋण देने वाले इस बात से सहमत नहीं दिखते। ऋणदाता आम तौर पर उन कंपनियों को ऋण नहीं देते, जिनके असफल होने की आशंका होती है।

लेखकों के तर्क की तह में यह बात छिपी है कि सांख्यिकी मंत्रालय का काम सरकार की छवि को बेहतर दिखाना है। लेकिन आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते। वर्ष 2023-24 के लिए, मंत्रालय ने विकास दर के अनुमान को 9.2 प्रतिशत (पुरानी श्रृंखला के तहत) से घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया था। यानी, उन्होंने खुद ही लगभग दो प्रतिशत अंक कम कर दिए। अन्य आरोपों के मामले में भी गणित खिलाफ जाता है।

वर्ष 2024-25 में, नई श्रृंखला के तहत नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम रही – 9.8 प्रतिशत  के मुकाबले 9.4 प्रतिशत  – जबकि असल विकास बढ़ी। नॉमिनल जीडीपी  सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों का आधार होती है। सरकार सबसे ज़्यादा इसी आंकड़े को ऊंचा रखना चाहती है। अगर कोई मंत्रालय आंकड़ों में हेरफेर करता है, तो वह ऐसा अपनी कीमत पर नहीं करता। वर्ष 2024-25 और 2025-26 को मिलाकर देखें, तो नई श्रृंखला के तहत औसत असल विकास दर 7.0 प्रतिशत से बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो जाती है। यह आधा प्रतिशत अंक अधिक है। अगर तीन वर्षों – 2023-24 से 2025-26 – को लें, तो नई में औसत ग्रोथ पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम है – 7.7 प्रतिशत  के मुकाबले 7.4 प्रतिशत।

लेखकगण अपनी बात एक कहावत के साथ खत्म करते हैं। वे लिखते हैं कि जो नियम आज लागू होता है, वही नियम पहले भी लागू होना चाहिए। यह सिद्धांत सही है। हमारी बस यही मांग है कि इसे पूरी तरह से लागू किया जाए। पिछले सालों के आंकड़े भी मौजूद हैं: जैसे घरेलू बचत, क्रेडिट में बढ़ोतरी, संसाधनों का प्रवाह, करों से होने वाली कमाई और निवेशकों का बढ़ता दायरा। अगर आप कुछ ही संकेतकों को देखें, तो पिछला समय कमजोर लग सकता है। लेकिन अगर आप सभी संकेतकों पर गौर करें, तो ऐसा नहीं लगता।

भारत ने एक बड़े झटके का सामना किया और आगे बढ़ता रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि उसने एक दशक में अपनी क्षमता बढ़ाई थी और वित्तीय मजबूती हासिल की थी। यह एक ठोस नतीजा है, न कि कोई बनावटी बात।

(लेखक सौरभ गर्ग, सचिव, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार)

NITTTR Chandigarh का 59वां वार्षिक दिवस, Outstanding Researcher Award से सम्मानित हुए प्रो. रूपिंदर सिंह

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (NITTTR), चंडीगढ़ ने सोमवार को अपना 59वां वार्षिक दिवस उत्साह और उमंग के साथ मनाया। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन मानद विश्वविद्यालय (विशिष्ट श्रेणी) के रूप में संस्थान ने इस अवसर पर तकनीकी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, अनुसंधान और उद्योग-अकादमिक सहयोग में अपनी उपलब्धियों को सामने रखा।

वार्षिक दिवस समारोह में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति और आईआईटी रुड़की के पूर्व निदेशक प्रो. ए. के. चतुर्वेदी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने NITTTR चंडीगढ़ को संस्थान की उपलब्धियों के लिए बधाई देते हुए भविष्य में निरंतर विकास और उत्कृष्टता की दिशा में आगे बढ़ने की शुभकामनाएं दीं।

प्रो. चतुर्वेदी ने संस्थान में सुधार और नई दिशा तय करने के लिए फैकल्टी सदस्यों के बीच नियमित विचार-मंथन सत्र आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी और शैक्षणिक क्षेत्रों में भारत को वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनाने में NITTTR चंडीगढ़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।

समारोह में राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष और IGNOU, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. नागेश्वर राव विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे संस्थान युवाओं के चरित्र और भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

प्रो. राव ने NITTTR चंडीगढ़ की भूमिका को विकसित भारत, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लक्ष्यों से जोड़ते हुए अधिक संख्या में MOOCs (Massive Open Online Courses) विकसित करने की संभावनाओं पर भी जोर दिया।

इस अवसर पर NITTTR चंडीगढ़ के निदेशक प्रो. (डॉ.) भोला राम गुर्जर ने संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में संस्थान की प्रमुख उपलब्धियों, नई पहलों और महत्वपूर्ण मील के पत्थरों की जानकारी दी गई। उन्होंने उच्च शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और तकनीकी कार्यबल के कौशल विकास के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्यों को रेखांकित किया।

तकनीकी शिक्षा में उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कार

वार्षिक दिवस समारोह के दौरान तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले संस्थानों और शिक्षाविदों को सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ पॉलिटेक्निक’ और ‘सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज’ पुरस्कार प्रदान किए गए।

वहीं, NITTTR चंडीगढ़ के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रो. रूपिंदर सिंह को अनुसंधान के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए Outstanding Researcher Award से सम्मानित किया गया। उन्हें प्रशस्ति पत्र के साथ 1 लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई।

उद्योग और शिक्षा जगत के बीच बेहतर तालमेल पर मंथन

वार्षिक दिवस समारोह के हिस्से के रूप में PHD Chamber of Commerce and Industry (PHDCCI) के सहयोग से ‘इंडस्ट्री-अकादमिक इंटीग्रेशन मीट’ का भी आयोजन किया गया।

बैठक में उद्योग जगत के वरिष्ठ पेशेवरों और अकादमिक प्रशासकों ने हिस्सा लिया। इस दौरान उद्योगों में तेजी से हो रहे तकनीकी और प्रक्रियागत बदलावों, बदलती कौशल एवं योग्यता आवश्यकताओं और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों को भविष्य की कार्यक्षमता और रोजगार की जरूरतों के अनुरूप बनाने पर चर्चा हुई।

प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा जगत और उद्योग के बीच मजबूत तालमेल से विद्यार्थियों को बदलते रोजगार बाजार के लिए बेहतर ढंग से तैयार किया जा सकता है।

सांस्कृतिक संध्या ने बांधा समां

कार्यक्रम का समापन एक जीवंत सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ। इसमें NITTTR चंडीगढ़ के विद्यार्थियों, फैकल्टी सदस्यों और कर्मचारियों ने अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता का प्रदर्शन किया।

59वां वार्षिक दिवस समारोह संस्थान की अकादमिक और व्यावसायिक उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ-साथ एक समावेशी, जीवंत और समग्र शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देने के संकल्प को भी दर्शाता है।

एशियन गेम्स 2026 के लिए SAI NSNIS पटियाला से 11 सदस्यीय बॉक्सिंग टीम रवाना

पटियाला / सत्ता संदेश

पटियाला, 8 सितंबर 2026: एशियन गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI), नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NSNIS), पटियाला से 11 सदस्यीय बॉक्सिंग टीम को आज आधिकारिक तौर पर रवाना किया गया। जापान के आइची प्रान्त के नागोया में आयोजित होने वाले एशियन गेम्स के लिए बॉक्सर, कोच और सपोर्ट स्टाफ की टीम इंस्टीट्यूट कैंपस से रवाना हुई।

SAI NSNIS पटियाला में प्रशिक्षण लेने वाले इन 11 मुक्केबाजों का चयन एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया गया है। पुरुष वर्ग में जादुमणि सिंह मंडेन्गबाम (55 किग्रा), सचिन (60 किग्रा), सुमित (70 किग्रा), अंकुश (80 किग्रा), कपिल पोखरिया (90 किग्रा) और नरेंद्र (90+ किग्रा) शामिल हैं।

वहीं महिला वर्ग में साक्षी (51 किग्रा), प्रीति (54 किग्रा), प्रिया (60 किग्रा), परवीन (65 किग्रा) और लवलीना बोरगोहेन (75 किग्रा) भारत की चुनौती पेश करेंगी।

टीम की रवानगी के अवसर पर डिप्टी डायरेक्टर जनरल/SED श्री विनीत कुमार ने खिलाड़ियों से मुलाकात कर उन्हें आगामी प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि पूरा देश उनकी सफलता और पदक का इंतजार कर रहा है। उन्होंने टीम की तैयारियों पर भरोसा जताते हुए खिलाड़ियों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।

SAI NSNIS पटियाला प्रशासन ने भी पूरी टीम को एशियन गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन और पदक जीतने के अभियान के लिए शुभकामनाएं दी हैं। अब सभी की नजरें नागोया में होने वाले मुकाबलों पर हैं, जहां भारतीय मुक्केबाज देश के लिए पदक जीतने के लक्ष्य के साथ रिंग में उतरेंगे।

PGIMER Chandigarh ने पूरे किए 63 साल, स्थापना दिवस पर AI आधारित हेल्थकेयर के भविष्य का विजन पेश

PGIMER Chandigarh के 63वें स्थापना दिवस पर BHU के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि AI डॉक्टरों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमताओं को बढ़ाकर स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव लाएगा। PGI में अब 3000 बेड की क्षमता और मरीजों की वेटिंग लिस्ट में लगातार कमी का दावा किया गया।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

स्वास्थ्य सेवा, चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में देश के प्रमुख संस्थानों में शामिल पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ ने उत्कृष्टता के 63 वर्ष पूरे कर लिए हैं। संस्थान के 63वें स्थापना दिवस समारोह में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के भविष्य पर विशेष जोर दिया गया। समारोह में मुख्य अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि आने वाले समय में एआई डॉक्टरों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमताओं को कई गुना बढ़ाकर स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।

पीजीआईएमईआर के NINE ऑडिटोरियम में आयोजित स्थापना दिवस समारोह में डॉ. अलका राव, निदेशक IMTECH चंडीगढ़, पीजीआईएमईआर के पूर्व निदेशक प्रो. योगेश चावला, डीन अकादमिक्स प्रो. संजय जैन, डीन रिसर्च प्रो. संजीव हांडा, चिकित्सा अधीक्षक-सह-प्रमुख अस्पताल प्रशासन विभाग प्रो. अशोक कुमार, वित्तीय सलाहकार रविंदर सिंह सहित संस्थान के पूर्व एवं वर्तमान डीन, विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग अधिकारी और अन्य कर्मचारी मौजूद रहे।

प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने मुख्य संबोधन में पीजीआईएमईआर को एक सच्ची राष्ट्रीय धरोहर बताते हुए कहा कि संस्थान का योगदान केवल चंडीगढ़ या उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं, चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि आज स्वास्थ्य सेवाओं में एआई को डॉक्टरों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनकी विशेषज्ञता और निर्णय क्षमता को मजबूत करने वाले एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में देखना चाहिए। उनके अनुसार, एआई का सबसे प्रभावी उपयोग उन परिस्थितियों में हो रहा है जहां यह डॉक्टरों को हटाने के बजाय उन्हें बेहतर निर्णय लेने, अधिक जानकारी का विश्लेषण करने और मरीजों तक बेहतर सेवाएं पहुंचाने में मदद कर रहा है।

प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि एआई अब केवल तकनीक का आकर्षण या फैशनेबल विषय नहीं रह गया है। यह स्वास्थ्य सेवा, चिकित्सा अनुसंधान और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में तेजी से अपनी जगह बना रहा है। ऐसे में स्वास्थ्य संस्थानों को इससे दूरी बनाने के बजाय जिम्मेदारी और समझदारी के साथ इसे अपनाना होगा।

उन्होंने बताया कि एआई क्लिनिकल रिकॉर्ड, पैथोलॉजी रिपोर्ट और वैज्ञानिक साहित्य सहित बड़ी मात्रा में चिकित्सा संबंधी जानकारी का विश्लेषण करने में डॉक्टरों की मदद कर सकता है। इससे डॉक्टरों को आवश्यक जानकारी तेजी से उपलब्ध हो सकती है और उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि हो सकती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई विशेषज्ञता का स्थान नहीं लेगा, बल्कि डॉक्टरों के पास उपलब्ध ज्ञान और सूचना की क्षमता को बढ़ाएगा।

चिकित्सा अनुसंधान में एआई की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस तकनीक की मदद से शोधकर्ता अब ऐसे प्रश्नों की जांच कर सकते हैं, जिन पर पहले काम करना बहुत महंगा या अत्यधिक समय लेने वाला होता था। उन्होंने कहा कि एआई के कारण स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल रही हैं।

प्रो. चतुर्वेदी ने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप हेल्थकेयर एआई विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल पश्चिमी देशों के डेटा पर प्रशिक्षित एआई सिस्टम भारतीय मरीजों की रोग-प्रवृत्तियों, आबादी और स्वास्थ्य संबंधी वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं समझ सकते। इसलिए भारत को केवल एआई तकनीक का उपभोक्ता बने रहने के बजाय भारतीय जरूरतों और परिस्थितियों के अनुरूप अपने समाधान विकसित करने होंगे।

उन्होंने दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं, रेडियोलॉजी, अस्पताल प्रबंधन और साक्ष्य आधारित निर्णय लेने में एआई की बड़ी संभावनाओं का उल्लेख किया। साथ ही कहा कि सर्जरी जैसे जटिल शारीरिक कार्यों के क्षेत्र में एआई को अभी और विकास की जरूरत है।

चिकित्सा शिक्षा के भविष्य पर बोलते हुए प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि आने वाले समय में केवल तथ्यों को याद करना पर्याप्त नहीं होगा। मेडिकल शिक्षा को क्लिनिकल निर्णय क्षमता, वैज्ञानिक साक्ष्यों के मूल्यांकन, आलोचनात्मक सोच और मरीजों के साथ प्रभावी संवाद पर अधिक ध्यान देना होगा।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एआई के भविष्य को लेकर कहा कि इसकी पहली पीढ़ी ने इंसानों को जानकारी खोजने में मदद की, अगली पीढ़ी निर्णय लेने में सहायता कर रही है और भविष्य की पीढ़ी इंसानों को कार्रवाई करने में मदद करेगी।

इससे पहले पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने संस्थान की बढ़ती क्षमता, मरीजों के बढ़ते विश्वास, किफायती स्वास्थ्य सेवाओं और लगातार कम होती वेटिंग लिस्ट पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा दो प्रमुख केंद्रों के उद्घाटन के बाद संस्थान की क्षमता में बड़ा विस्तार हुआ है। एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर और एडवांस्ड न्यूरोसाइंस सेंटर के शुरू होने से पीजीआईएमईआर में 800 नए बेड जुड़े हैं। पहले संस्थान में करीब 2200 बेड थे, जो अब बढ़कर 3000 हो गए हैं।

प्रो. विवेक लाल ने कहा कि पीजीआईएमईआर का उद्देश्य केवल इलाज की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं को आम मरीज की पहुंच में लाना है। उन्होंने आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से मरीजों को मिलने वाले लाभ और अमृत फार्मेसी आउटलेट्स के जरिए उपलब्ध किफायती जेनेरिक दवाओं का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के इलाज में मरीजों को करोड़ों रुपये की बचत हो रही है। संस्थान में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद वेटिंग लिस्ट कम हो रही है, जो सेवा वितरण प्रणाली में सुधार और संस्थान की बढ़ती क्षमता का संकेत है।

पीजीआईएमईआर के निदेशक ने संस्थान की प्रगति का श्रेय डॉक्टरों, नर्सिंग अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और प्रशासनिक स्टाफ सहित पूरे पीजीआई परिवार को दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में संस्थान बुनियादी ढांचे, डायग्नोस्टिक सेवाओं, मानव संसाधन और अन्य उभरते स्वास्थ्य संस्थानों के साथ सहयोग को और मजबूत करेगा।

उन्होंने विशेष रूप से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थानों के साथ सहयोग और मार्गदर्शन की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि पीजीआईएमईआर देश में उभरते स्वास्थ्य और चिकित्सा संस्थानों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार है।

स्थापना दिवस समारोह के दौरान संस्थान के 35 कर्मचारियों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, पीजीआईएमईआर निदेशक प्रो. विवेक लाल, डीन अकादमिक्स प्रो. संजय जैन और डीन रिसर्च प्रो. संजीव हांडा ने सम्मानित कर्मचारियों को प्रशंसा प्रमाण-पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किए।

सम्मानित होने वालों में हॉस्पिटल अटेंडेंट, सैनिटेशन स्टाफ, माली, सुरक्षा कर्मचारी, प्रशासनिक अधिकारी, लैब टेक्नीशियन, टेक्निकल असिस्टेंट और नर्सिंग अधिकारियों सहित विभिन्न विभागों के कर्मचारी शामिल रहे।

समारोह के अंत में डीन रिसर्च प्रो. संजीव हांडा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसके साथ ही पीजीआईएमईआर के 63वें स्थापना दिवस समारोह का औपचारिक समापन हुआ।

पीजीआईएमईआर ने अपने 63 वर्षों के सफर में स्वास्थ्य सेवा, चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में एक मजबूत पहचान बनाई है। अब संस्थान का फोकस आधुनिक तकनीक, बढ़ती मरीज क्षमता और एआई जैसे उभरते क्षेत्रों को अपनाते हुए स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक प्रभावी, किफायती और सुलभ बनाने पर है।