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भारत की भूली-बिसरी लौकी-वर्गीय सब्जियों पर वैज्ञानिकों की जेनेटिक नजर, बेहतर पैदावार की उम्मीद

मोहाली / सत्ता संदेश

लौकी, तोरई, करेला, नेनुआ और चिचिंडा जैसी सब्जियां भले ही भारतीय रसोई में बेहद आम हों, लेकिन कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में लंबे समय तक इन फसलों को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। अब वैज्ञानिक इन ‘भूली-बिसरी’ या ‘अनाथ फसलों’ की पैदावार और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इनके जेनेटिक रहस्यों को समझने में जुटे हैं।

लौकी-वर्गीय सब्जियां उत्तर भारत के गांवों में आम तौर पर घरों और खेतों में मचान पर उगती दिखाई देती हैं। ये सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने वाली सब्जियां हैं, लेकिन पोषण की दृष्टि से इनका महत्व काफी अधिक है। ऐसे समय में जब भारतीय भोजन में चावल और गेहूं जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अधिक है, ये सब्जियां शरीर को कई जरूरी विटामिन और खनिज उपलब्ध कराती हैं।

कृषि वैज्ञानिक ऐसी फसलों को ‘अनाथ फसलें’ कहते हैं। इनका महत्व स्थानीय स्तर पर बहुत अधिक होता है, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक ब्रीडिंग में इन्हें चावल, गेहूं, कपास और टमाटर जैसी प्रमुख फसलों की तुलना में लंबे समय तक कम प्राथमिकता मिली।

ज्यादा नर फूल, कम फल बनना बड़ी चुनौती

लौकी-वर्गीय फसलों की एक प्रमुख समस्या इनके फूलों की प्रकृति है। इन पौधों में नर फूलों की संख्या मादा फूलों के मुकाबले बहुत अधिक होती है। जबकि फल केवल मादा फूलों से बनता है। इसके अलावा मादा फूल परागण के लिए बहुत कम समय के लिए तैयार रहता है और इसके लिए मधुमक्खियों जैसे परागण करने वाले कीटों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। पौधा लंबे समय तक तेजी से बढ़ता है, लेकिन उसकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ऐसे नर फूलों के निर्माण में खर्च हो जाता है जो फल नहीं देते।

इसे आसान भाषा में समझें तो किसान के लिए यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें संसाधन ज्यादा खर्च हो रहे हैं, लेकिन उसके मुकाबले फल कम मिल रहे हैं।

IISER मोहाली की टीम तलाश रही जेनेटिक समाधान

इसी समस्या का समाधान तलाशने के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER) मोहाली में डॉ. रवि देवानी की टीम, फ्रांस के पेरिस-सैक्ले स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट साइंसेज में डॉ. बेंदहमाने के रिसर्च ग्रुप के साथ मिलकर काम कर रही है।

वैज्ञानिकों का लक्ष्य अधिक खाद या कीटनाशक के इस्तेमाल के बजाय उन जेनेटिक निर्देशों को समझना है, जो पौधे में यह तय करते हैं कि फूल नर बनेगा या मादा।

इस शोध के लिए फिलहाल लौकी को शुरुआती मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है। लौकी का जीनोम मैप किया जा चुका है और इसमें नए जेनेटिक निर्देशों को शामिल करने की तकनीक भी उपलब्ध है। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए यह दूसरी कम-अनुसंधान वाली लौकी-वर्गीय फसलों की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

हाइब्रिड बीज उत्पादन में भी हो सकता है फायदा

आज बेहतर हाइब्रिड बीज तैयार करने के लिए बीज कंपनियों को दो अलग-अलग पौधों के बीच नियंत्रित क्रॉस कराना पड़ता है। इसके लिए एक पौधे के नर फूल से पराग लेकर उसे दूसरे पौधे के मादा फूल तक पहुंचाना पड़ता है। यह प्रक्रिया समय लेने वाली और श्रमसाध्य होती है, जिसका असर बीज उत्पादन की लागत पर भी पड़ता है।

खरबूजे और खीरे जैसी कुछ फसलों में वैज्ञानिक ऐसी प्लांट लाइनों को विकसित करने में सफल रहे हैं जिनमें अधिकांश फूल मादा होते हैं। इससे पौधे की ऊर्जा फल उत्पादन की दिशा में अधिक इस्तेमाल हो सकती है और हाइब्रिड बीज उत्पादन की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है।

भारतीय लौकी-वर्गीय सब्जियों में इस तरह की रणनीति पर अभी काफी काम किया जाना बाकी है।

जलवायु परिवर्तन और मधुमक्खियों की घटती संख्या भी चुनौती

लौकी-वर्गीय फसलों के लिए केवल फूलों का लिंग ही चुनौती नहीं है। परागण के लिए कीटों पर निर्भरता भी भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती है।

बढ़ती गर्मी, हीट वेव और परागण करने वाले कीटों की घटती संख्या ऐसी फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। अगर मादा फूल के थोड़े समय के परागण योग्य रहने के दौरान पर्याप्त परागण नहीं हुआ, तो फल बनने की संभावना कम हो जाती है।

इसीलिए वैज्ञानिक ऐसे पौधों की संभावनाएं तलाश रहे हैं जिन्हें परागण की इस निर्भरता से कम प्रभावित किया जा सके।

हर्माफ्रोडाइट फूल और पार्थेनोकार्पी पर भी नजर

शोध की एक दिशा ऐसे फूलों की ओर है जिनमें नर और मादा दोनों प्रजनन अंग एक ही फूल में मौजूद हों। ऐसे हर्माफ्रोडाइट फूल कुछ परिस्थितियों में बाहरी परागण पर निर्भरता कम कर सकते हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण संभावना ‘पार्थेनोकार्पी’ है। इसका अर्थ है बिना निषेचन के फल का विकसित होना। अगर लौकी-वर्गीय फसलों में ऐसी क्षमता विकसित की जा सके, तो फल बनने के लिए समय पर मधुमक्खियों या अन्य परागण करने वाले कीटों की मौजूदगी पर निर्भरता कम हो सकती है।

इससे गर्मी की लहरों और कमजोर परागण वाले मौसम में भी उत्पादन को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।

खीरे और खरबूजे से मिले जेनेटिक संकेत

डॉ. बेंदहमाने और डॉ. रवि देवानी की टीम ने खरबूजे और खीरे में फूलों के लिंग को नियंत्रित करने वाले जेनेटिक स्विच की पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण शोध किए हैं। इन शोधों को ‘साइंस’, ‘नेचर’ और ‘नेचर प्लांट्स’ जैसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल्स में प्रकाशित किया जा चुका है।

हालांकि, सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या लौकी और उससे जुड़ी दूसरी फसलों में भी फूलों के लिंग को नियंत्रित करने वाले वही जेनेटिक स्विच मौजूद हैं।

लौकी और खीरे के बीच विकासवादी दूरी काफी पुरानी है। दोनों का अंतिम साझा पूर्वज करोड़ों वर्ष पहले मौजूद था। इतने लंबे समय में दोनों पौधों के जेनेटिक निर्देशों में काफी बदलाव हो चुके हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि खीरे में काम करने वाला जेनेटिक स्विच लौकी में भी उसी तरह काम करे।

यही सवाल अब वैज्ञानिकों के लिए अगले चरण के शोध का केंद्र है। अगर इन फसलों में फूलों के लिंग, परागण और फल बनने की प्रक्रिया को जेनेटिक स्तर पर बेहतर ढंग से नियंत्रित करने में सफलता मिलती है, तो भारत की पारंपरिक और लंबे समय से उपेक्षित लौकी-वर्गीय सब्जियों की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

बाइरैक निदेशक जितेंद्र कुमार ने IISER मोहाली में संभाला प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस का कार्यभार

मोहाली / सत्ता संदेश

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) मोहाली को यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि प्रतिष्ठित जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) जितेन्द्र कुमार ने 03 अगस्त, 2026 से संस्थान में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में कार्यभार ग्रहण किया है।

डॉ. कुमार जैव-प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, नवाचार, प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण, उद्यमिता तथा विज्ञान नीति के क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हैं। आईआईएसईआर मोहाली से जुड़ने से पूर्व वे भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बाइरैक)के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्यरत थे। इस दौरान उन्होंने भारत के जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार पारितंत्र को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाइरैक में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने नीति निर्माण, प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण, वित्तपोषण तंत्र के विकास तथा जैव-प्रौद्योगिकी आधारित स्टार्ट-अप्स के मार्गदर्शन से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण पहलों का नेतृत्व किया। उनके प्रयासों से देश में जैव-प्रौद्योगिकी आधारित नवाचार और उद्यमिता को उल्लेखनीय गति मिली।
बाइरैक से पूर्व वे बैंगलोर जैव नवाचार केंद्र के प्रबंध निदेशक भी रहे। यह केंद्र भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग तथा कर्नाटक सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की संयुक्त पहल है। इस दायित्व के दौरान उन्होंने जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार तथा स्टार्ट-अप पारितंत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डॉ. कुमार ने जैव-प्रौद्योगिकी में पीएच.डी. की उपाधि सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएमटेक), चंडीगढ़  से, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से संबद्ध है, प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय एट शिकागो तथा द ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में पोस्ट-डॉक्टोरल अनुसंधान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने द ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी से प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं व्यावसायीकरण विषय में एमबीए भी प्राप्त किया, जो विज्ञान एवं नवाचार प्रबंधन दोनों क्षेत्रों में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है। वर्ष 2009 में भारत लौटने के पश्चात उन्होंने आईकेपी नॉलेज पार्क, हैदराबाद में उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया, जहाँ उन्होंने स्टार्ट-अप्स तथा नवाचार पारितंत्र के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।
अपने विशिष्ट व्यावसायिक जीवन के दौरान डॉ. कुमार ने जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार, अनुप्रयुक्त अनुसंधान, प्रौद्योगिकी प्रबंधन, इनक्यूबेशन तथा उद्यमिता के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने नवाचार पारितंत्र की स्थापना, अनेक जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप्स के मार्गदर्शन, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय जैव-प्रौद्योगिकी तथा स्टार्ट-अप नीतियों के निर्माण तथा अनेक उच्च प्रभाव वाले अनुसंधान एवं नवाचार कार्यक्रमों का सफल नेतृत्व किया है। उनके योगदान का प्रमाण उनके वैज्ञानिक शोध-पत्रों, पेटेंटों, नीति निर्माण संबंधी पहलों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त अनेक सम्मान एवं पुरस्कारों से मिलता है।

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली के निदेशक प्रो. अनिल त्रिपाठी ने डॉ. जितेन्द्र कुमार का स्वागत करते हुए कहा, “मैं डॉ. जितेन्द्र कुमार का भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में हार्दिक स्वागत करता हूँ। प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं व्यावसायीकरण के क्षेत्र में उनका व्यापक अनुभव न केवल भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली में, बल्कि पूरे ट्राइसिटी क्षेत्र और उससे आगे भी एक सशक्त एवं जीवंत उद्यमशीलता संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस का पद ऐसे प्रतिष्ठित पेशेवरों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता की सर्वोच्च ऊँचाइयों को प्राप्त किया हो तथा जो अपने अनुभव एवं ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के इच्छुक हों।”

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली के डीन (संकाय), प्रो. जसजीत सिंह बगला ने डॉ. कुमार का स्वागत करते हुए कहा, “हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि डॉ. जितेन्द्र कुमार प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में आईआईएसईआर मोहाली से जुड़े हैं। जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, उद्यमिता तथा विज्ञान नीति के क्षेत्र में उनका असाधारण नेतृत्व हमारे संस्थान के उस प्रयास को और अधिक सशक्त करेगा, जिसके माध्यम से मौलिक अनुसंधान को समाज एवं उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ा जा सके। नवाचार पारितंत्र के विकास तथा स्टार्ट-अप्स के संवर्धन में उनका अनुभव हमारे संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों को अनुप्रयुक्त अनुसंधान तथा उद्यमशीलता से संबंधित नई संभावनाओं से जोड़ने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।”

प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में डॉ. कुमार संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा नवप्रवर्तकों के साथ मिलकर अंतःविषयक अनुसंधान को बढ़ावा देंगे, नवाचार एवं उद्यमिता को प्रोत्साहित करेंगे, उद्योग–शैक्षणिक संस्थानों के मध्य सहयोग को सुदृढ़ करेंगे तथा वैज्ञानिक अनुसंधानों को समाज एवं उद्योग के लिए उपयोगी प्रौद्योगिकियों में रूपांतरित करने की दिशा में कार्य करेंगे।
उनकी नियुक्ति से भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली के अनुप्रयुक्त अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास तथा नवाचार-आधारित शिक्षा को नई गति मिलने की अपेक्षा है।

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान मोहाली को विश्वास है कि डॉ. कुमार की विशेषज्ञता एवं अनुभव के माध्यम से अनुसंधान, नवाचार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा उद्यमिता के क्षेत्रों में नए अवसर विकसित होंगे और संस्थान विज्ञान में उत्कृष्टता तथा उसके सामाजिक उपयोग के अपने उद्देश्य को और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकेगा।