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भारत-दक्षिण अफ्रीका ने एआई, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण में सहयोग बढ़ाने पर जताई सहमति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और दक्षिण अफ्रीका ने भविष्य की प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को नई गति देने पर सहमति व्यक्त की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अवसंरचना, उन्नत विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी और नवाचार आधारित साझेदारी दोनों देशों के संबंधों के अगले चरण की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरकर सामने आई हैं।

यह सहमति केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और दक्षिण अफ्रीका की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार उपमंत्री डॉ. नोमालुंगेलो जीना के बीच नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में आयोजित उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक के दौरान बनी। बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ वैज्ञानिक, नीति निर्माता और अधिकारियों ने भाग लिया।

नवाचार आधारित साझेदारी पर जोर

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के संबंधों को पारंपरिक अनुसंधान सहयोग से आगे बढ़ाकर नवाचार-संचालित साझेदारी में बदलने की आवश्यकता है, जो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक प्रभाव पैदा कर सके।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास पूरक क्षमताएं हैं, जिनका उपयोग कर विकासशील देशों के लिए किफायती, समावेशी और विस्तार योग्य तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स, नवाचार एजेंसियों और उद्योग जगत के बीच गहन सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।

एआई, क्वांटम तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर फोकस

बैठक के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, साइबर-भौतिक प्रणालियां, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्टार्टअप आधारित नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे नवाचार पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल है और राष्ट्रीय स्तर पर चल रही विभिन्न तकनीकी पहलों के कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर पैदा हुए हैं।

उन्होंने कहा कि विज्ञान का उद्देश्य केवल शोध तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे ऐसे समाधानों में परिवर्तित किया जाना चाहिए जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाएं, रोजगार सृजित करें और अर्थव्यवस्था को मजबूती दें।

स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी और वैक्सीन अनुसंधान में नए अवसर

दोनों देशों ने जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स, टीका विकास, स्वास्थ्य तकनीकों और महामारी तैयारी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कोविड-19 महामारी के अनुभव ने मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियों और वैज्ञानिक साझेदारियों की आवश्यकता को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन निर्माण, किफायती स्वास्थ्य तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी में भारत की विशेषज्ञता दक्षिण अफ्रीका के साथ सहयोग के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

उन्नत विनिर्माण और डिजिटल तकनीकों में साझेदारी

बैठक में उन्नत सामग्री, विनिर्माण, भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी और डिजिटल अवसंरचना को भारत-दक्षिण अफ्रीका संयुक्त समिति के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया। दोनों पक्षों ने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच संवाद बढ़ाकर इन क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं विकसित करने पर सहमति व्यक्त की।

दक्षिण अफ्रीका ने नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, स्वास्थ्य विज्ञान, डिजिटल तकनीक, कौशल विकास और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग को और मजबूत करने की इच्छा जताई।

खगोल विज्ञान में सहयोग की समीक्षा

बैठक के दौरान दोनों देशों ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में चल रहे सहयोग की भी समीक्षा की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्क्वायर किलोमीटर ऐरे (SKA) परियोजना को 21वीं सदी की सबसे महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक पहलों में से एक बताते हुए कहा कि यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि इस परियोजना से वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, तकनीकी नवाचार और मानव संसाधन विकास को बढ़ावा मिलेगा।

ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण की भूमिका

डॉ. जितेंद्र सिंह ने दक्षिण अफ्रीका को अगस्त 2026 में चेन्नई में आयोजित होने वाली ब्रिक्स विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार मंत्रिस्तरीय बैठक में सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स सहयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, जल संसाधन प्रबंधन और सटीक कृषि जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान एवं नवाचार के नए अवसर प्रदान कर रहा है।

वहीं, दक्षिण अफ्रीका ने भारत को साइंस फोरम साउथ अफ्रीका-2026 में भाग लेने का निमंत्रण दिया, जो अफ्रीका के प्रमुख वैज्ञानिक संवाद मंचों में से एक माना जाता है।

30 वर्षों से मजबूत वैज्ञानिक साझेदारी

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग की नींव वर्ष 1995 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समझौते से पड़ी थी। तब से दोनों देश खगोल विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, भूविज्ञान और उन्नत सामग्रियों सहित कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं।

दोनों देशों ने अब तक लगभग 150 सह-वित्तपोषित अनुसंधान परियोजनाओं को समर्थन दिया है और भविष्य में इस सहयोग को और व्यापक बनाने पर सहमति जताई है।

बैठक का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि भारत और दक्षिण अफ्रीका अनुसंधान उत्कृष्टता, प्रौद्योगिकी विकास, स्टार्टअप सहयोग और वैज्ञानिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक मजबूत एवं भविष्य उन्मुख नवाचार साझेदारी का निर्माण करेंगे, जो दोनों देशों के विकास के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को भी नई दिशा देगी।

एआई क्षेत्र में संभावित प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में सीसीआई: चेयरपर्सन

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की चेयरपर्सन रवनीत कौर ने सोमवार को कहा कि आयोग कृत्रिम मेधा (एआई) के क्षेत्र में उभरने वाली प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयार कर रहा है जिनमें एल्गोरिथम संबंधी मिलीभगत भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि निगरानी संस्था खेल, नागर विमानन, ‘पेंट व वार्निश’ तथा मद्य क्षेत्रों में भी प्रतिस्पर्धा-विरोधी मामलों की जांच कर रही है।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) बाजार में अनुचित व्यापारिक गतिविधियों पर नजर रखता है।

उन्होंने कहा, ‘‘ …हम कृत्रिम मेधा (एआई) के क्षेत्र में उभरने वाली किसी भी प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधि के खिलाफ कार्रवाई करने की तैयारी कर रहे हैं।’’

कौर ने कहा, ‘‘ हमने संभावित प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधियों की पहचान की है… जिसमें कृत्रिम मेधा (एआई) की मूल्य श्रृंखला में अत्यधिक केंद्रीकरण शामिल हो सकता है। इसमें एल्गोरिथम आधारित मिलीभगत, लक्षित मूल्य भेदभाव, स्वयं को प्राथमिकता देना या कृत्रिम मेधा (एआई) में किसी प्रकार की अपारदर्शिता शामिल हो सकती है।’’

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने पिछले वर्ष कृत्रिम मेधा (एआई) और प्रतिस्पर्धा पर एक बाजार अध्ययन भी जारी किया था।

राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित प्रतिस्पर्धा कानून के अर्थशास्त्र पर 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन में आयोग की चेयरपर्सन ने कहा कि नियामक के पास आए करीब 90 प्रतिशत प्रतिस्पर्धा-विरोधी मामलों का निपटारा किया जा चुका है।

उन्होंने कहा, ‘‘ हमें हर क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा-विरोधी मामलों की जानकारी मिलती है। आयोग को कुल 1,360 प्रतिस्पर्धा-विरोधी सूचनाएं प्राप्त हुई हैं और इनमें से 1,211 मामलों का निपटारा किया जा चुका है।’’

इस मौके पर में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने कहा कि विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए एक मजबूत प्रतिस्पर्धा व्यवस्था आवश्यक है।

उन्होंने प्रतिस्पर्धा कानून के संदर्भ में अतिवाद और अत्यधिक नियमन से बचने और संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

 ट्रांसलेशनल रिसर्च में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एवं एथ्नोफार्माकोलॉजी

मोहाली, 24 फरवरी 2026: नाईपर, मोहाली के प्राकृतिक उत्पाद विभाग तथा सोसाइटी फॉर एथ्नोफार्माकोलॉजी (एसएफईसी ), कोलकाता के सहयोग से संयुक्त रूप से सोसाइटी फॉर एथ्नोफार्माकोलॉजी की 13वीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस (SFEC–ICTRE 2026) एवं एथ्नोफार्माकोलॉजी में ट्रांसलेशनल रिसर्च पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन – आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में पारंपरिक चिकित्सा का एकीकरण का आयोजन 26–28 फरवरी, 2026 को नाईपर ,मोहाली, पंजाब में किया जाएगा।

सम्मेलन की थीम “ट्रांसलेशनल रिसर्च में एआई एवं एथ्नोफार्माकोलॉजी” है, जिसका उद्देश्य प्राचीन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ जोड़ना है।

तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में 500 से अधिक प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है, जिनमें यूरोप एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के 10 से अधिक देशों से आने वाले प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय वक्ता, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, पारंपरिक वैद्य, नीति-निर्माता, नियामक विशेषज्ञ, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, आयुष विशेषज्ञ, स्टार्ट-अप, शोधार्थी एवं विद्यार्थी शामिल होंगे। आयोजन सचिव एवं नाईपर के प्रोफेसर संजय जाचक के अनुसार, यह सम्मेलन क्षेत्र में एथ्नोफार्माकोलॉजी के क्षेत्र का एक प्रमुख और व्यापक आयोजन होगा। सम्मेलन की प्रमुख विशेषताओं में अकादमिक–उद्योग सहभागिता कार्यक्रम, पारंपरिक वैद्य सम्मेलन, आयुष संगोष्ठी, एआई एवं सिस्टम्स एथ्नोफार्माकोलॉजी सत्र, तकनीकी कार्यशालाएं तथा पैनल चर्चा शामिल रहेंगी।

वैज्ञानिक सत्रों में मेटाबोलोमिक्स आधारित शोध, नेटवर्क फार्माकोलॉजी, स्वास्थ्य एवं रोग में आंत माइक्रोबायोटा की भूमिका, प्राकृतिक उत्पादों का बायोप्रॉस्पेक्टिंग, न्यूट्रास्यूटिकल्स एवं फाइटोफार्मास्यूटिकल्स, प्राकृतिक उत्पादों की औषधीय रसायन, नियामक मामले, हर्बल औषधि विकास में सतत प्रौद्योगिकियां, फॉर्मुलेशन विकास तथा ट्रांसलेशनल ड्रग डिस्कवरी जैसे समसामयिक विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

प्रमुख हर्बल एवं न्यूट्रास्यूटिकल उद्योग जैसे हिमालय वैलनेस कंपनी, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, सामी- सबिंसा ग्रुप. फर्मंज़ा हेर्बल्स प्राइवेट लिमिटेड, नेचुरल रेमेडीज प्राइवेट लिमिटेड तथा इमामी हेल्थ केयर  सहित अन्य संस्थानों ने सम्मेलन में गहरी रुचि व्यक्त की है।

वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध शैक्षणिक प्रकाशन एवं वैज्ञानिक सूचना विश्लेषण कंपनी Elsevier ने भी सम्मेलन से जुड़ने की सहमति व्यक्त की है। पुलोक क. मुखर्जी, संस्थापक एसएफई एवं जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने जानकारी दी कि सम्मेलन के दौरान ऐनी मारी , सीनियर मैनेजर, एल्सेवियर पब्लिकेशन्स (फार्मास्यूटिक्स एवं फार्माकोलॉजी) की उपस्थिति में “सिस्टम्स एथ्नोफार्माकोलॉजी एवं सतत जैव-संसाधन” विषय पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की जाएगी।

एसएफई, भारत, जो वेस्ट बंगाल सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत है तथा इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर एथ्नोफार्माकोलॉजी से संबद्ध है, औषधीय पौधों, पारंपरिक चिकित्सा एवं प्राकृतिक उत्पादों पर अनुसंधान तथा ज्ञान के वैश्विक प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है।

नाईपर, मोहाली की स्थापना वर्ष 1994 में भारत सरकार के औषध विभाग, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन की गई थी। यह संस्थान औषधि शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार में उत्कृष्टता के लिए समर्पित ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ है। भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने इस भव्य सम्मेलन के आयोजन हेतु नाइपर-मोहाली के प्रयासों की सराहना करते हुए अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया है। नाईपर मोहाली के निदेशक प्रो. दुलाल पांडा ने कहा कि नाईपर ने औषधि खोज, फॉर्म्युलेशन विज्ञान, नियामक अनुसंधान तथा ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य समाधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण एवं अग्रणी भूमिका निभाई है। उन्होंने इस महत्वपूर्ण एवं सामयिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए प्रो. संजय जाचक को बधाई दी तथा सम्मेलन की पूर्ण सफलता की कामना की।

SFEC–ICTRE अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, उनके सतत उपयोग तथा आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उनके वैश्विक एकीकरण को सुदृढ़ बनाना है।