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भारतीय बजट का दिलचस्प इतिहास: पहली बार 1860 में पेश हुआ था बजट, जानें तब कितनी टैक्स छूट मिलती थी

नई दिल्ली: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को केंद्रीय बजट (Union Budget 2026) पेश करने जा रही हैं। यह आज़ाद भारत का 94वां बजट होगा। बजट पेश होने से पहले भारत में इसका इतिहास जानना बहुत दिलचस्प है क्योंकि पहले बजट और टैक्स के नियम आज से बहुत अलग थे।

आज़ादी से पहले पहला बजट (1860): भारत का पहला बजट आज़ादी से बहुत पहले 7 अप्रैल, 1860 को स्कॉटिश अर्थशास्त्री और राजनेता जेम्स विल्सन ने पेश किया था। विल्सन ‘द इकोनॉमिस्ट’ मैगज़ीन और ‘स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक’ के संस्थापक भी थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश शासन को हुए भारी आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए पहली बार ‘इनकम टैक्स’ का कॉन्सेप्ट लाया गया था।

तब कितनी टैक्स छूट मिलती थी? साल 1860 में बने नियमों के मुताबिक, जिन लोगों की सालाना इनकम 200 रुपये से कम थी, उन्हें कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था। जिनकी इनकम 200 से 500 रुपये के बीच थी, उन पर 2% और 500 रुपये से ज़्यादा वालों पर 4% टैक्स लगता था।

आजाद भारत का पहला बजट (1947): आज़ादी के बाद, देश का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को पहले फाइनेंस मिनिस्टर आर. के. शानमुखम चेट्टी ने पेश किया था। यह सिर्फ़ 7.5 महीने का ‘इंटरिम बजट’ था और इसमें कोई नया टैक्स नहीं लगाया गया था। उस समय, भारत का कुल बजट रेवेन्यू सिर्फ़ 171.15 करोड़ रुपये था।

बजट से जुड़े कुछ और ज़रूरी फैक्ट्स:टैक्स की ज़्यादा दर: 1973-74 के दौरान, भारत में सबसे ऊंचे स्लैब पर टैक्स रेट 97.5% तक पहुंच गया था।

समय में बदलाव: पहले बजट शाम 5:00 बजे पेश किया जाता था, लेकिन 2001 में यशवंत सिन्हा ने इसे बदलकर सुबह 11:00 बजे कर दिया।

ब्रीफकेस को अलविदा: 2019 में निर्मला सीतारमण ने ‘ब्रीफकेस’ का रिवाज खत्म कर दिया और ‘बही-खाता’ (लाल कपड़े में लिपटा हुआ एक टैबलेट) पेश करना शुरू किया।

भाषा: 1955 तक बजट सिर्फ़ इंग्लिश में पेश किया जाता था, जिसके बाद इसे हिंदी और इंग्लिश दोनों में पेश किया जाने लगा।

बजट 2026 की तैयारी: जानें सरकारी खजाने में लाखों करोड़ रुपये कहां से आते हैं और कैसे चलता है देश

बिजनेस डेस्क: देश का आम बजट 1 फरवरी, 2026 को संसद में पेश होने वाला है, जिसके लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अक्सर लोगों को लगता है कि सरकार सिर्फ टैक्स के पैसे से देश चलाती है, लेकिन कई दूसरे ज़रूरी सोर्स भी सरकारी खजाना भरने का काम करते हैं।

टैक्स – इकॉनमी की रीढ़: सरकार की इनकम का सबसे बड़ा सोर्स टैक्स है, जो दो तरह का होता है:

डायरेक्ट टैक्स: इसमें आम जनता द्वारा दिया जाने वाला इनकम टैक्स और कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला कॉर्पोरेट टैक्स शामिल है।

इनडायरेक्ट टैक्स: इसमें बाज़ार से खरीदे गए सामान पर लगने वाला GST और पेट्रोल-डीज़ल या शराब पर लगने वाली एक्साइज़ ड्यूटी (एक्साइज़ ड्यूटी) शामिल है। इस पैसे का इस्तेमाल एडमिनिस्ट्रेशन और वेलफेयर स्कीम चलाने के लिए किया जाता है।

नॉन-टैक्स रेवेन्यू: टैक्स के अलावा, सरकार कई दूसरी सर्विसेज़ से भी पैसा इकट्ठा करती है:

– सरकारी सर्विसेज़ की फीस और ट्रैफिक नियम तोड़ने पर लगने वाले चालान।

– रेलवे, सरकारी बैंक, पोस्टल डिपार्टमेंट और ONGC जैसी कंपनियों का प्रॉफिट।

– कोयला खदानों, मिनरल्स और मोबाइल नेटवर्क के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी से हज़ारों करोड़ रुपये।

जब खर्च इनकम से ज़्यादा हो (उधार): जब सरकार की इनकम खर्च से कम हो जाती है, तो सरकार उधार लेने का रास्ता अपनाती है। इसके लिए सरकार मार्केट में बॉन्ड जारी करती है, जिन्हें बैंक और इंश्योरेंस कंपनियां खरीद लेती हैं।

इसके अलावा, लोगों का PPF या पोस्ट ऑफिस स्कीम में जमा पैसा और विदेशी संस्थाओं से लिया गया लोन भी डेवलपमेंट के कामों में इस्तेमाल होता है। कभी-कभी सरकार अपनी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर भी फंड जुटाती है।