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आईटी नियम दूसरा संशोधन, 2026: भारत के डिजिटल शासन की दिशा में एक बड़ा कदम
  • श्री वैभव गग्गर, सुश्री काम्या वहिल

भारत का डिजिटल इकोसिस्टम तेज़ी से विकसित हुआ है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अब लोगों के संवाद करने और जानकारी तक पहुंचने के तरीकों में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। इससे जवाबदेही और ऑनलाइन नुकसान से जुड़ी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं और मौजूदा नियामक व्यवस्था को इसके अनुरूप विकसित होने की आवश्यकता है। इसी संदर्भ में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में प्रस्तावित बदलाव, जो 30 मार्च 2026 को प्रकाशित किए गए, भारत की डिजिटल नियामक प्रणाली में प्रक्रियागत कमियों को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। इन ड्राफ्ट संशोधनों का उद्देश्य भाग-II के तहत मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण, परामर्श और दिशा-निर्देशों के अनुरूप इंटरमीडियरीज़ की अनुपालना को मजबूत करना तथा भाग-III के तहत डिजिटल मीडिया कंटेंट नियमन प्रणाली की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना है।

सबसे पहले, नियम 3(1)(जी) और 3(1)(एच) के तहत डेटा संरक्षण और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की जिम्मेदारियों से संबंधित स्पष्टीकरण दिया गया है। प्रस्तावित संशोधन स्पष्ट करता है कि रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से जुड़े नियम अन्य लागू कानूनों के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों के अतिरिक्त होंगे। इससे वह अस्पष्टता दूर होती है, जिसके कारण कभी-कभी इंटरमीडियरीज़ अलग-अलग या न्यूनतम अनुपालन वाला दृष्टिकोण अपनाते थे। आईटी अधिनियम डिजिटल प्लेटफॉर्मों को अकेले काम करने की अनुमति नहीं देता। उन्हें आपराधिक प्रक्रिया कानून, वित्तीय नियमों और उनके उद्योग से जुड़े अन्य नियमन का भी पालन करना होता है। इस दृष्टि से यह स्पष्टीकरण उचित और आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संशोधन रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से संबंधित है, न कि डेटा तक पहुंच से। ऐसे डेटा का खुलासा कानूनी प्रक्रियाओं और संवैधानिक सुरक्षा के अधीन रहेगा। हालांकि, इस तरह का सामान्य सुरक्षा प्रावधान यह आशंका भी पैदा कर सकता है कि इंटरमीडियरीज़ उपयोगकर्ता डेटा को अनिश्चितकाल तक सुरक्षित रखें, क्योंकि विभिन्न कानूनी व्यवस्थाएं बिना आवश्यकता, उद्देश्य-सीमा या अनुपातिकता का उल्लेख किए ऐसी शर्तें लागू कर सकती हैं। यदि भविष्य में ऐसी चिंताएं सामने आती हैं, तो उन्हें दूर करने के लिए अतिरिक्त स्पष्टीकरण जारी किया जा सकता है।

दूसरा, प्रस्तावित नियम 3(4) मंत्रालय द्वारा जारी परामर्श, स्पष्टीकरण और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) को आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत बाध्यकारी दायित्व बनाने का प्रयास करता है। धारा 79 के तहत इंटरमीडियरीज़ को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए सीमित दायित्व से सुरक्षा प्राप्त थी, बशर्ते वे उचित प्रक्रिया का पालन करें और अवैध गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी न करें। यह प्रावधान उन्हें बड़े पैमाने पर उपयोगकर्ता सामग्री की निगरानी करने की बाध्यता से बचाता था। सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ मामले में कहा था कि “सेफ हार्बर” सिद्धांत इंटरमीडियरीज़ को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने से बचाता है, जब तक कि वे अवैध गतिविधि की “वास्तविक जानकारी” मिलने पर कार्रवाई करते हैं। इस सिद्धांत ने प्लेटफॉर्मों को सूचना प्रवाह में निष्पक्ष बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेकिन तब से डिजिटल इकोसिस्टम काफी बदल चुका है। प्लेटफॉर्म अब केवल निष्क्रिय मध्यस्थ नहीं रहे। उनका विशाल आकार और एल्गोरिद्म आधारित कार्यप्रणाली ऑनलाइन नुकसान और जनमत को प्रभावित करने के तरीकों को बदल चुकी है। ऐसे में केवल अदालत के आदेश या औपचारिक नोटिस पर आधारित मॉडल धीरे-धीरे अप्रभावी साबित हो रहा है। नियम 3(4) शासन व्यवस्था को अधिक लचीला बनाकर इस कमी को दूर करने का प्रयास करता है। यह कंटेंट हटाने के लिए कानूनी आदेश की आवश्यकता समाप्त नहीं करता, बल्कि प्रशासनिक साधनों के माध्यम से प्लेटफॉर्मों के संचालन को दिशा देने की कोशिश करता है। हालांकि, अत्यधिक हस्तक्षेप को लेकर चिंताएं भी जायज़ हैं। चूंकि “सेफ हार्बर” हमेशा शर्तों पर आधारित रहा है, इसलिए उचित आचरण के मानक समय के साथ बदल सकते हैं। इसे अधिक वैध और संतुलित बनाने के लिए यह आवश्यक होगा कि ऐसे परामर्श और SOP पारदर्शिता के साथ जारी किए जाएं, जिनमें प्रकाशन, तर्कसंगत कारण और जहां संभव हो, हितधारकों से परामर्श शामिल हो।

तीसरा, संशोधन प्रस्तावित करता है कि नियम 8.1 की उपधारा में बदलाव कर भाग-III के नियम 14, 15 और 16 को केवल प्रकाशकों पर ही नहीं, बल्कि इंटरमीडियरीज़ और उनके प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रकाशित समाचार एवं समसामयिक घटनाओं से जुड़े कंटेंट पर भी लागू किया जाए। “उपयोगकर्ता” और “प्रकाशक” के बीच का अंतर हमेशा स्पष्ट नहीं होता। यह डिजिटल मीडिया निगरानी ढांचे के दायरे का महत्वपूर्ण विस्तार है, जो पहले मुख्यतः संगठित समाचार प्रकाशकों तक सीमित था। संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी स्रोत से आने वाले कंटेंट के गंभीर उल्लंघनों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। इससे पारंपरिक प्रकाशकों और समान प्रकार की गतिविधियों में लगे डिजिटल माध्यमों के बीच नियामक समानता को बढ़ावा मिलेगा।

इस प्रकार, संशोधन नियामक समानता को मजबूत करता है और मौजूदा ढांचे की संरचनात्मक कमियों को दूर करने का प्रयास करता है। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाग-III का उपयोग केवल गंभीर और प्रणालीगत नुकसान पहुंचाने वाली उपयोगकर्ता-जनित सामग्री तक सीमित रहना चाहिए। अत्यधिक सख्ती से लागू किए जाने पर वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति और खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। इसलिए मंत्रालय यह विचार कर सकता है कि नियम 14 से 16 के तहत हस्तक्षेप स्पष्ट मानकों — जैसे पहुंच, प्रभाव और जोखिम — के आधार पर किया जाए तथा न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाए जाएं। इससे खुले और बहुलतावादी डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

अंत में, नियम 14 में “शिकायतों” शब्द को बदलकर “मामलों” किए जाने का प्रस्ताव एक प्रतिक्रियात्मक से अधिक सक्रिय नियामक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है। अंतर-विभागीय समिति (IDC) अब केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सरकार द्वारा संदर्भित व्यापक और प्रणालीगत मुद्दों पर भी विचार कर सकेगी। ऐसे समय में, जब संगठित दुष्प्रचार अभियान जैसी समस्याएं व्यक्तिगत शिकायतों के दायरे से बाहर होती हैं, यह लचीलापन समयानुकूल और आवश्यक दोनों है। हालांकि, IDC के अधिकार क्षेत्र के विस्तार के साथ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। विचार किए गए “मामलों” की प्रकृति का समय-समय पर खुलासा और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करेगा तथा मनमानी हस्तक्षेप की आशंकाओं को कम करेगा।

समग्र रूप से देखा जाए तो, ये ड्राफ्ट संशोधन भारत की इंटरमीडियरी जवाबदेही प्रणाली को आधुनिक बनाने का एक व्यावहारिक प्रयास हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि स्थिर कानूनी सिद्धांत तेजी से बदलती तकनीकी वास्तविकताओं का पूर्ण समाधान नहीं दे सकते। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती इनके क्रियान्वयन में निहित है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि विस्तारित नियामक शक्तियों का उपयोग पारदर्शी, अनुपातिक और इंटरनेट के खुले स्वरूप को बनाए रखने वाले तरीके से किया जाए। यदि सावधानीपूर्वक लागू किया गया, तो ये सुधार जवाबदेही और नवाचार के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं, बिना स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कमजोर किए।

(लेखक श्री वैभव गग्गर वरिष्ठ अधिवक्ता और सुश्री काम्या वहिल अधिवक्ता हैं।)