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प्रधानमंत्री ने धरती माता द्वारा समस्‍त मानवता को एक ही परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकारने की विशेषता को दर्शाने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया

दिल्ली /सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज एक संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया। इसका अर्थ है कि धरती माता समस्त मानवता को एक परिवार मानती है। श्री मोदी ने कहा कि धरती मां के लिए यह संपूर्ण विश्व एक घर के समान है, जहां प्रत्येक संस्कृति का अपना महत्व और सम्मान है।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर पोस्ट में लिखा:

“धरती माता पूरी मानवता को एक परिवार मानती हैं। उनके लिए यह पूरा संसार एक घर की तरह है, जहां हर संस्कृति का अपना महत्त्व और सम्मान है।

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्।

सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती ॥”

धरती माता विभिन्न भाषाएं बोलने वाले और विभिन्न धर्मों और परंपराओं का पालन करने वाले लोगों को एक ही परिवार के सदस्य के रूप में अपनाती है। ईश्वर करे कि यह धरती मां हमारे लिए समृद्धि की हजारों धाराएं प्रवाहित करती रहे, ठीक उसी प्रकार जैसे एक शांत और स्‍नेहमयी गौ माता दूध प्रदान करती है।

बुद्ध पूर्णिमा पर उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णनने दिया करुणा का संदेश

चित्रा पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, जब मंदिरों में उत्सव मनाए जा रहे हैं, मैं प्रार्थना करता हूँ कि हर घर में खुशी और समृद्धि आए। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर अपने सभी भाइयों और बहनों को शुभकामनाएँ देते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

भारत ने दुनिया को जो अनेक उपहार दिए हैं, उनमें से बौद्ध धर्म सर्वोच्च है। भगवान गौतम बुद्ध का जीवन और उनकी शिक्षाएँ आज भी विश्वभर के लाखों लोगों के जीवन को आलोकित कर रही हैं। भारत ने दुनिया को आत्मबोध का महत्व सिखाया। “बुद्ध” शब्द ही “जाग्रत व्यक्ति” का संकेत देता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मानवता को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाने वाली इस महान आत्मा का जन्म और ज्ञान प्राप्ति, दोनों एक ही दिन हुए।

राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण वैभव और ऐश्वर्य के बीच हुआ। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने आध्यात्मिक सत्य की खोज के लिए अपने महल, पत्नी, पुत्र और सभी सांसारिक संपत्तियों का त्याग कर दिया। छह वर्षों की कठोर साधना के बाद उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे परम ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बन गए। चार आर्य सत्यों की प्राप्ति और नैतिक आचरण के मार्ग ने एक नए दर्शन की शुरुआत की, जिसने विश्व इतिहास में भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। सारनाथ (वाराणसी के पास) में उन्होंने पाँच तपस्वियों को अपना पहला उपदेश दिया। “धर्मचक्र प्रवर्तन” के नाम से प्रसिद्ध इस उपदेश ने बौद्ध धर्म की नींव रखी और बौद्ध परंपरा की औपचारिक शुरुआत की।

समय के साथ असंख्य लोग उनकी शिक्षाओं से प्रेरित हुए। मगध के राजा बिंबिसार ने राजगीर में वेणुवन विहार दान किया। धनी अनाथपिंडिक ने जेतवन वन को स्वर्ण मुद्राओं से ढँककर वहाँ विहार निर्माण के लिए दान दिया। ऐसे कार्य भारत में प्राचीन काल से चली आ रही धार्मिक आस्था और दानशीलता के गहरे विश्वास को दर्शाते हैं।

इन विहारों के माध्यम से चार आर्य सत्यों का प्रचार हुआ—इच्छा दुख का मूल है; इच्छा का त्याग करने से दुख दूर किए जा सकते हैं; और अष्टांगिक मार्ग का पालन कर दुखों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। बुद्ध ने उपदेश दिया: अतीत पर मत सोचो, वर्तमान में जियो; ईमानदारी में शक्ति है; मन सभी कार्यों का मूल है, इसलिए सकारात्मक सोच विकसित करो; कठिन समय में भयभीत होकर पीछे मत हटो; जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा है, इसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाओ; शब्दों से आघात पहुँच सकता है, इसलिए मधुर वाणी बोलो; प्रेम और अहिंसा आवश्यक हैं; निरंतर सीखते रहो।

बौद्ध दर्शन को मणिमेकलाई और कुंडलकेशी जैसे तमिल साहित्यिक ग्रंथों में सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि समय के साथ कई प्राचीन ग्रंथ लुप्त हो गए हैं, उनका योगदान अमूल्य है।

इस प्रकार महाकाव्य “मणिमेकलाई” (अधिरै पिचैयिटा काथै : 84-90) बौद्ध धर्म के सार को स्पष्ट करता है। बुद्ध ने पाँच नैतिक सिद्धांतों पर विशेष बल दिया—अहिंसा, चोरी न करना, कामाचार से बचना, सत्य बोलना और नशे से दूर रहना। उन्होंने सिखाया कि मन ही सभी चीजों का मूल है; सकारात्मक विचार और सद्कर्म ही व्यक्ति और समाज में संतुलन और शांति ला सकते हैं। इसी कारण उन्हें “एशिया का प्रकाश” कहा जाता है।

मुझे नरेंद्र मोदी के “मन की बात” कार्यक्रम में कहे गए शब्द याद आते हैं: “भगवान गौतम बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि शांति हमारे भीतर से शुरू होती है और स्वयं पर विजय सबसे बड़ी जीत है।”

बुद्ध की शिक्षाओं की परिवर्तनकारी शक्ति इस बात से स्पष्ट होती है कि उन्होंने सम्राट अशोक जैसे योद्धा शासक को शांति और करुणा का समर्थक बना दिया। अशोक ने शिलालेखों और स्तूपों के माध्यम से बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार किया। सांची स्तूप और सारनाथ के स्तूप आज भी विश्वभर के लोगों को आकर्षित करते हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

भिक्षुओं और परिवार के सहयोग से अशोक ने पूरे एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार किया। महावंश के अनुसार उनके पुत्र महेंद्र ने इसे श्रीलंका तक पहुँचाया। माना जाता है कि बौद्ध भिक्षुओं ने तमिलनाडु में भी इस धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बौद्ध भिक्षुओं ने बिना भेदभाव के निःशुल्क चिकित्सा और शिक्षा प्रदान की। उन्होंने त्रिपिटक जैसे पवित्र ग्रंथों की शिक्षा दी, जातक कथाएँ सुनाईं और ध्यान के माध्यम से लोगों को मानसिक शांति की ओर अग्रसर किया। दान—विशेषकर भूखों को भोजन कराना—को एक मूल कर्तव्य माना गया।

हजारों वर्षों से इस भूमि पर अनेक आध्यात्मिक विचारधाराएँ विकसित हुई हैं। चाहे बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, भारत ने सभी को एकता की भावना से अपनाया है। बौद्ध धर्म ने जीवनपर्यंत सीखने पर विशेष जोर दिया और बड़े पैमाने पर शिक्षण संस्थान स्थापित किए। पाँचवीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रमुख केंद्र बना, जहाँ लगभग 10,000 विद्यार्थी और 1,500 विद्वान थे।

इसी प्रकार कांचीपुरम, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे केंद्रों ने भारत की बौद्धिक शक्ति को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। चीन के भिक्षु फाह्यान और विद्वान ह्वेनसांग जैसे लोग भारत आए और यहाँ अध्ययन किया।

सिद्धार्थ की कठोर तपस्या से द्रवित होकर सुजाता ने उन्हें खीर अर्पित की, जिससे उन्हें पुनः शक्ति मिली। बुद्ध पूर्णिमा के दिन हम इस करुणा को खीर बनाकर स्मरण करते हैं।

“प्रेम ही आनंद का स्रोत है; प्रेम ही संसार का प्रकाश है; और प्रेम ही सबसे बड़ी शक्ति है”—बुद्ध की ये शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि प्रेम और शांति पूरे विश्व में फैले।

नए साल में नई आशा: एक भारत की भावना
  •  श्री सी. पी. राधाकृष्णन

मुझे अत्यंत हर्ष है कि मैं भारत और विश्वभर के सभी लोगों को बैसाखी, रोंगाली बिहू, महा बिषुबा पना संक्रांति, पोइला बोइशाख, विषु और तमिल पुथांडु के अवसर पर अपनी पारंपरिक नववर्ष की शुभकामनाएँ देता हूं, जो ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाते हैं। ये सभी शुभ अवसर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आएं।

चिथिरई का महीना कृषि की तैयारियों का समय होता है। किसान अपनी ज़मीन को उपजाऊ बनाने के लिए उस पर काम करना शुरू कर देते हैं। चूंकि हमारे लोग मानते हैं कि मेहनत से ही प्रगति होती है, इसलिए वे श्रम की शुरुआत का जश्न मनाते हैं। पूरे देश में, हमें इसी तरह के उत्सव देखने को मिलते हैं, जो भारत में एकता और साझा संस्कृति के उदाहरण हैं।

उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब में, लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण में, केरल में विशु मनाया जाता है, जहां शुभ वस्तुओं (कानी) को देखना एक महत्वपूर्ण रिवाज है। असम में लोग बिहू मनाते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख को उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

इसी प्रकार मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी लोग इस अवधि को विभिन्न पारंपरिक रूपों में नववर्ष के रूप में मनाते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में देशभर से श्रद्धालु गंगा में पवित्र स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं, जो इस अवसर की पवित्रता को दर्शाता है।

तेलुगु भाषी लोगों ने हाल ही में अपना नववर्ष उगादी के रूप में मनाया, जबकि मराठी और कोंकणी समुदाय अपना नववर्ष गुड़ी पड़वा के रूप में मनाते हैं। हम एक प्राचीन सभ्यता से संबंधित हैं, जिसका प्रमाण हमारे पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से मिलता है। ब्रह्मांड के प्रति उनकी सटीक समझ इन नववर्ष उत्सवों में झलकती  है।

इसी प्रकार, तमिल नववर्ष एक अत्यंत विशेष अवसर है, जो हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव मनाता है। यह एक ऐसा पर्व है जो परंपरा, परिवार, आध्यात्मिकता और अनुशासित जीवन शैली को एक साथ जोड़ता है। यह एक नई शुरुआत का संकेत देता है और हमें पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए नई आशा के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

आज हम वैश्विक कैलेंडर का पालन करते हैं, लेकिन हमें अपने तमिल कैलेंडर को भी याद रखना चाहिए, जो अपनी विशेषता के कारण केवल दिनों और महीनों को ही नहीं, बल्कि वर्षों को भी नाम देता है। ऐसे कुल 60 वर्ष-नाम होते हैं, और इस वर्ष का नाम “पराभव” है, जो इस चक्र का 40वां वर्ष है।

‘खगोल विज्ञान’शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका अर्थ है तारों के नियमों का अध्ययन। तमिल में इसे “वाणियल” कहा जाता है। हजारों वर्ष पहले ही तमिल विद्वानों ने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और उन्होंने खगोलीय पिंडों की गति तथा उनके प्रभाव का अध्ययन किया था।

प्राचीन तमिल साहित्य, जैसे कि पतिरुप्पट्टू, ब्रह्मांड की प्रकृति और गति का वर्णन करता है। श्लोकों में बताया गया है कि संसार पाँच तत्वों से बना है और आकाशीय शक्तियों से शासित है। सिरुपनरुप्पदई जैसी अन्य रचनाएं ग्रहों की गति का उल्लेख करती हैं।

संगम साहित्य में ग्रहों और तारों के संदर्भ मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराणनुरु में शनि को काला (मैम्मीन) बताया गया है। आकाशीय प्रभावों के अध्ययन की परंपरा “कनियान” कहलाने वाले विद्वानों से जुड़ी थी। माना जाता है कि कवि कनियान पूंगुंद्रनार ने अपना नाम इसी परंपरा से लिया है। यहां तक ​​कि तोलकाप्पियम जैसे प्राचीन ग्रंथ भी ऐसे विद्वानों को “अरीवर” कहते हैं। ‘अकनानुरु’ जैसे साहित्य से पता चलता है कि विवाह जैसे शुभ आयोजन उचित तिथियों और समय का चुनाव करके संपन्न किए जाते थे।यह परंपरा आज भी तमिलनाडु में जारी है। चिथिरई के पहले दिन मंदिरों में पंचांग पढ़ा जाता है और लोग इसे सुनने के लिए एकत्रित होते हैं।

पंचांग में पाँच तत्व होते हैं: वार (दिन), तिथि, करण, नक्षत्र और योग। इनके आधार पर वर्षा, कृषि और वर्ष से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज समय को मापने के लिए सौर और चंद्र दोनों प्रणालियों का उपयोग करते थे। आज आधुनिक विज्ञान उन्नत उपकरणों से ग्रहण की गणना करता है, लेकिन पहले भी इन घटनाओं का अध्ययन कर उन्हें सटीक रूप से बताया जाता था।

हमारे पूर्वजों से मिला ज्ञान हमारी धरोहर है। हमें इसे सुरक्षित रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए। मंदिरों में पंचांग का पाठ सुनना इस परंपरा का सम्मान करने का एक तरीका है। नववर्ष का एक और पहलू यह दिखाता है कि हमारे लोग प्रकृति की समृद्धि का कितना सम्मान करते थे। घरों में फल और फूल जैसी शुभ वस्तुओं को सजाया जाता है और सुबह सबसे पहले उन्हें देखा जाता है।

वसंत ऋतु वह समय है, जब प्रकृति खुद को नया रूप देती है। पेड़-पौधे फिर से हरे-भरे हो जाते हैं और फूल-फल खिलते हैं। प्रकृति के साथ तालमेल में रहने वाले तमिल लोग “कणी कणल” की परंपरा के जरिए इस समृद्धि को देखकर वर्ष की शुरुआत करते हैं।

इसी तरह, इस दिन बनने वाले पारंपरिक भोजन में सभी स्वाद शामिल होते हैं, यहाँ तक कि कड़वा भी। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों तरह के अनुभव होते हैं, और हमें उन्हें संतुलन के साथ स्वीकार करना चाहिए।

इन त्योहारों में पूरे देश में और दुनिया के उन हिस्सों में भी, जहां भारतीय समुदाय रहते हैं, एक समानता दिखाई देती है। ये उत्सव हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता की याद दिलाते हैं, साथ ही देश की एकता को भी दिखाते हैं। ये हमें मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा देते हैं।

मैं युवाओं से आग्रह करता हूँ कि वे नए साल को सकारात्मक सोच, विश्वास और समर्पण के साथ मनाएं  और अपने पूर्वजों के दिखाए रास्ते पर चलें। आइए हम देश की प्रगति में योगदान देने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ें।

हमारा भारत हमेशा से अपनी सभ्यता के मूल्यों में एक रहा है और आगे भी एक बना रहेगा। बड़ों के आशीर्वाद से युवा पीढ़ी ‘एक भारत’ की भावना के साथ आगे बढ़े और 2047 तक ‘श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण में सफल हो।

(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)

उच्च शिक्षा विभाग ने मिशन साधना सप्ताह 2026 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर एक संवादपूर्ण सत्र का आयोजन किया

उच्च शिक्षा विभाग ने 2 अप्रैल से 8 अप्रैल, 2026 तक मनाए गए स्ट्रेंथनिंग एडैप्टिव डेवलपमेंट एंड ह्यूमेन एप्टिट्यूड फॉर नेशनल एडवांसमेंट (साधना) सप्ताह 2026 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर एक संवादपूर्ण सत्र का सफलतापूर्वक आयोजन किया।

यह सप्ताह क्षमता विकास आयोग (सीबीसी) के स्थापना दिवस तथा नागरिक-केंद्रित सुशासन के लिए भारत की एक महत्वपूर्ण पहल, मिशन कर्मयोगी के पाँच वर्ष पूरे होने का प्रतीक है।

स्वागत भाषण उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव (प्रशासन) सैयद एकराम रिज़वी द्वारा दिया गया, जिन्होंने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत क्षमता विकास आयोग की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि यह नागरिक-केंद्रित सुशासन के लिए ज्ञान, कौशल और क्षमता बढ़ाने हेतु विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रम उपलब्ध कराता है।

यह सत्र समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और शासन में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता पर संरचित सहकर्मी अधिगम (पियर लर्निंग) तथा सार्थक विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करने के लिए तैयार किया गया था। इसमें यह भी रेखांकित किया गया कि भारत की समृद्ध बौद्धिक परंपराएँ समस्या-समाधान, नवाचार और नीतिनिर्माण के आधुनिक दृष्टिकोणों को कैसे दिशा प्रदान कर सकती हैं।

कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण आईआईटी हैदराबाद के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहन राघवन् का संबोधन था। ये हेरिटेज साइंस एंड टैक्नोलॉजी विभाग के संस्थापक प्रमुख रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भी जुड़े हुए हैं। डॉ. राघवन् ने अपने अंतर्विषयी कार्य से प्राप्त अनुभव साझा किए, जो प्रौद्योगिकी, विज्ञान और भारत की ज्ञान परंपराओं के बीच सेतु का कार्य करते हैं।

प्रोफेसर महोदय ने रेखांकित किया कि भले ही भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) की बाजार संभावनाएँ व्यापक हैं, किंतु इसकी वास्तविक शक्ति उच्च शिक्षा में इसकी परिवर्तनकारी भूमिका में निहित है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आईकेएस को एक अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक बहु-विषयी रूपरेखा के रूप में देखा जाना चाहिए, जो विज्ञान, अभियांत्रिकी, मानविकी और प्रबंधन जैसे मौज़ूदा शैक्षणिक क्षेत्रों को समृद्ध कर सकती है। उच्च शिक्षा में आईकेएस के एकीकरण के माध्यम से विश्वविद्यालय रटने पर आधारित लर्निंग से आगे बढ़कर ऐसे समग्र मॉडल की ओर अग्रसर हो सकते हैं, जो ज्ञान, अनुप्रयोग और मूल्यों (धर्म) का समन्वय करता है। प्रोफेसर ने इस बात का भी उल्लेख किया कि यह दृष्टिकोण समकालीन शैक्षिक सुधारों के अनुरूप है, जो भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत पर आधारित अनुसंधान, नवाचार और समालोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करता है। आईकेएस को अपनाने वाले संस्थान अंतर्विषयी कार्यक्रम विकसित कर सकते हैं, मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा दे सकते हैं तथा ऐसे स्नातक तैयार कर सकते हैं, जो न केवल दक्ष पेशेवर हों, बल्कि सांस्कृतिक रूप से सजग और सामाजिक रूप से उत्तरदायी नागरिक भी हों। उन्होंने बल दिया कि इस प्रकार का एकीकरण एक ऐसे शिक्षा तंत्र के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो भविष्य के लिए तैयार हो, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हो और अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ हो।

इसके पश्चात एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र के रूप में प्रतिभागियों के साथ संवाद हुआ। सत्र में एक समेकित शिक्षा प्रणाली को आकार देने में भारतीय ज्ञान प्रणाली की निरंतर प्रासंगिकता तथा सतत् राष्ट्रीय प्रगति के लिए शासन प्रक्रियाओं में पारंपरिक ज्ञान को समाहित करने के महत्व पर बल दिया गया।

इस सत्र में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। विचार प्रवर्तक नेताओं और व्यवहारिक विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर, उच्च शिक्षा विभाग ने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत ज्ञान-आधारित, अनुकूलनशील और मानवीय शासन तंत्र के संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने छत्रपति शिवाजी महाराज को उनकी पुण्यतिथि पर नमन किया

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय स्वाभिमान के अमर प्रतीक और राष्ट्र-गौरव के रक्षक हैं

समुद्र पर नियंत्रण के महत्व को समझते हुए उनके द्वारा बनाई गई शक्तिशाली नौसेना उनके अद्वितीय रणनीतिक कौशल और दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता का प्रतिबिंब है

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन किया।

X पर एक पोस्ट में, श्री अमित शाह ने कहा, “भारतीय स्वाभिमान के अमर प्रतीक और राष्ट्र-गौरव के रक्षक छत्रपति शिवाजी महाराज जी का स्मरण कर उनके चरणों में वंदन करता हूँ। धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने लोगों को एकजुट किया और हिंदवी स्वराज की स्थापना की। समुद्र पर नियंत्रण के महत्व को समझते हुए उनके द्वारा बनाई गई शक्तिशाली नौसेना उनके अद्वितीय रणनीतिक कौशल और दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता का प्रतिबिंब है। एक शासक कैसे एक साथ स्वसंस्कृति और स्वभाषा की रक्षा कर सकता है तथा लोककल्याण के आदर्श भी स्थापित कर सकता है, उनका जीवन इसका आदर्श है। उनका अथक संघर्ष और जीवनगाथा अनंतकाल तक देशवासियों को मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती रहेगी।”