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भारत ने कैसे किया होर्मुज संकट का मुकाबला : हरदीप सिंह पुरी  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब फरवरी के अंत में होर्मुज की खाड़ी बंद हुई, तो भारत सरकार ने एक प्राथमिकता का चयन किया – हमारे देश के नागरिकों, विशेष रूप से सबसे कमजोर समुदायों, को अभूतपूर्व आपूर्ति और मूल्य व्यवधानों से सुरक्षित रखना। इस प्राथमिकता के आस-पास ही अन्य प्रयास किये जाने थे। यह भावना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थी और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा व्यवधान के लगभग चार महीनों तक बनी रही। 

तथ्यों के पता चलने से पहले ही भारत को लेकर निर्णय किये जा रहे थे: तर्क यह था कि एक ऐसा देश, जो अपने  कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, होर्मुज के बंद होने से संभल नहीं पायेगा, जिससे होकर दुनिया का 20-30% से अधिक हाइड्रोकार्बन गुजरता है। पेट्रोल पंप में कुछ ही दिनों में तेल ख़त्म हो जाएगा, कीमतें आसमान छुएंगी (जैसे कि कई अन्य देशों में हुआ) और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आज स्टॉक भरे हुए हैं, पंप खुले हैं, और भारतीय उपभोक्ता ने इस संकट के दौरान ऊर्जा के लिए दुनिया के किसी भी अन्य उपभोक्ता की तुलना में कम भुगतान किया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे कैसे किया गया और इससे गलत आख्यानों को जवाब भी मिल जाएगा।

28 फरवरी को ईरान पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर सबसे महत्वपूर्ण मार्ग-खंड बंद हो गया और एलपीजी आपूर्ति ने भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश की, क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका और मध्य पूर्व ही प्रमुख एलपीजी निर्यातक हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी पहले मध्य पूर्व से आती थी और यह आपूर्ति तुरंत लगभग शून्य हो गई। फिर आपूर्ति और मांग, दोनों को लेकर एक युद्धकक्ष ऑपरेशन शुरू हुआ, हर कार्गो, हर रिफाइनरी, हर बॉटलिंग प्लांट की निगरानी की गयी, ताकि पूरे देश के सभी रसोईघरों में खाना पकाने के लिए आग जलती रहे।

आपूर्ति के संबंध में, 8 मार्च को एलपीजी नियंत्रण आदेश पारित किया गया, जिसके तहत सभी रिफाइनरियों को अपना एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए सभी सी3-सी4 कार्बन स्ट्रीम को बदलने का निर्देश दिया गया। जो रिफाइनरी कभी कुकिंग गैस नहीं बनाती थीं, बदलाव किया गया और उत्पादन 35  टीएमटी प्रति दिन से बढ़कर 54 टीएमटी प्रति दिन हो गया। युद्ध की सर्वाधिक विभीषिका के दौरान, जब होर्मुज से कोई भी जहाज बाहर नहीं निकल रहा था, तब 12 से अधिक भारतीय एलपीजी जहाजें चुपचाप होर्मुज से बिना कोई टोल दिए निकाल दी गईं – किसी भी देश के लिए यह सबसे बड़ी संख्या थी। कार्गो सुरक्षित किए गए तथा यानबू और फुजैरा बंदरगाहों से लाल सागर रास्ते के जरिए कार्गो जहाज-से-जहाज स्थानांतरित किये गये। अमेरिका से कार्गो को सुरक्षित करने की स्थिति में भी खाली जहाज भेजे गए, नए माल लेने के लिए जहाज हॉर्मुज के अंदर भेजे गए तथा अल्जीरिया, जापान और कनाडा जैसे कई देशों के साथ नई आपूर्ति व्यवस्था शुरू की गयी। मैंने हर उस देश के ऊर्जा मंत्री से कई बार बात की, जो एलपीजी निर्यात कर सकता था। मैं यह बात कहना चाहता हूँ कि खाड़ी क्षेत्र के अंदर या बाहर का हर उत्पादक, जिसके साथ हमने व्यापार किया, हमारे साथ खड़ा रहा। 

हालांकि, आपूर्ति प्रयास का केवल आधा हिस्सा था, क्योंकि मांग को भी प्राथमिकता देना जरूरी था। घरों में जाने वाला रसोई गैस पूरा सुरक्षित रखा गया और इस कीमती आपूर्ति को काले बाज़ारियों से बचाने के लिए डिजिटल सत्यापन कोड अनिवार्य किया गया। हर नागरिक को उनके ज़रूरत के समय सिलेंडर मिलें, लेकिन कोई भी सिलेंडर जमा न कर सके, इसके लिए 25 दिन और 45 दिन की सीमा लगाई गई। चूँकि, वाणिज्यिक सिलेंडरों को नियंत्रित नहीं किया जाता और कोई भी खरीदार उपलब्ध पूरी आपूर्ति एक साथ खरीद सकता था, इसलिए इन्हें उद्योग संघों और राज्य नागरिक आपूर्ति विभागों के माध्यम से भेजा गया, ताकि हर किसी को पर्याप्त मिले और कोई भी जमा न कर सके। उद्योग को पाइप प्राकृतिक गैस अपनाने के लिए कहा गया, बड़े रसोईघरों और प्रतिष्ठानों को अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जहाँ संभव था और घरेलू पाइप गैस और सीएनजी को बिना कटौती वाले वर्ग में रखा गया। सरकार के सभी विभागों ने मिलकर नगर निगम की शीघ्र मंज़ूरी के ज़रिए पाइप गैस कनेक्शनों की ओर बदलाव को संभव बनाया। कई उपभोक्ता, जिनमें प्रवासी भी शामिल थे, एजेंट से सिलेंडर खरीदते थे, जो अब डीएसी की शर्तों के कारण सिलेंडर नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पूरे देश में 5 किलो का मुफ्त व्यापार सिलेंडर उपलब्ध कराया गया, जब तक इसका इस्तेमाल लगभग दोगुना नहीं हो गया। लोगों में भय पैदा करने वाले और खराब स्थिति बताने वाले झूठी अफवाहें फैलाने लगे और झूठे वीडियो शेयर करने लगे ताकि कमी, घबराहट और अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके, जबकि सरकार हर दिन युद्धकक्ष मोड में कई क्रांतिकारी कदम उठा रही थी, ताकि देश में किसी भी जगह आपूर्ति में बाधा न आये।

इस सब के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का दृढ़ संकल्प था – भारतीय नागरिक को सुरक्षा दी जायेगी चाहे खजाने पर कितना भी बोझ क्यों न पड़े —रूस-यूक्रेन संघर्ष और जीवन को संकट में डालने वाली कोविड चुनौती से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौरान यही ‘भारत की राह’ रही है। फरवरी और जून के बीच, रसोई गैस के अंतरराष्ट्रीय मानक, सऊदी सी पी, में लगभग 50% की वृद्धि हुई, और फिर भी, उस आयात दर पर ₹1,600 से अधिक की कीमत वाला सिलेन्डर उज्ज्वला घर तक ₹642 में पहुँचा। मोदी सरकार हर उज्ज्वला सिलेंडर पर लगभग ₹900 का और हर अन्य घर के लिए जाने वाले सिलेंडर पर करीब ₹600 का नुकसान उठाती है, आज सभी भारतीय परिवार अपने रसोई गैस के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन या फ्रांस के घरों की तुलना में बहुत कम भुगतान कर रहे हैं।

मार्च में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती का साहसिक निर्णय लिया गया, जिससे कीमत-वृद्धि में कमी आयी, जबकि कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी हो गयी थी और सरकारी तेल कंपनियों ने इस तिमाही में हर दिन 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाया। इसी अवधि में, अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 40% से अधिक और ब्रिटेन में करीब 20% बढ़ी, जबकि यूरोप के बड़े हिस्से में भी दहाई अंक की वृद्धि हुई, लेकिन भारत में कीमत में लगभग 7% की ही वृद्धि हुई।

एक और कहानी यह थी कि पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, विदेशी भंडार ख़त्म हो जाएंगे और हमारी आर्थिक संभावनाएँ धुंधली हो जाएंगी। भंडार खुद जवाब देते हैं, जो लगभग 690 बिलियन डॉलर के करीब है। यह संघर्ष शुरू होने के सप्ताह में रिकॉर्ड किये गये उच्चतम दर से केवल थोडा कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है।

यह कहा गया कि भारत के पास केवल 8 या 9 दिन का भंडार है और उसके पास ज्यादा भंडार रखने की वास्तविक क्षमता नहीं है, यह दावा 1.5 बिलियन लोगों वाली बड़ी ऊर्जा अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को गलत रूप में समझता है। आप किसी देश को कुछ गुफाओं से नहीं चला सकते, क्योंकि जमीन के भीतर रखी गई ऊर्जा से कुछ भी कमाई नहीं होती और उसे रखने में बहुत ज़्यादा खर्च भी आता है। इसके बजाय आप इसे इम्पोर्ट टर्मिनल, डिपो, पाइपलाइन, रिफाइनरी और पूरे देश में फैले स्टोरेज के सिस्टम के जरिए चलाते हैं, और आज भारत के पास 24 रिफाइनरी हैं, 47,000 किलोमीटर से ज्यादा तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, और 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं जो प्रतिदिन करीब 8 करोड़ लोगों की सेवा करते हैं।

उस प्रणाली की वास्तविकता की जांच, महाप्रलय का भय दिखाने वाले किसी भविष्यवक्ता की स्लाइड पर दिखाए गए आंकड़े से नहीं होती। असली जांच है – आधुनिक समय के सबसे बड़े ऊर्जा संकट के लगभग चार महीने गुजर जाने के बाद, क्या देश को अपने लोगों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी, क्या ईंधन सिर्फ सम-विषम नंबर प्लेट्स के हिसाब से देना पड़ा, क्या घर में ऑफिस बनाना पड़ा या क्या हर दिन 5 बजे अपने पंप बंद करने पड़े। भारत को इनमें से कोई काम नहीं करना पड़ा। यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पिछले कई सालों में इसकी तैयारी की गई थी। हमारे कच्चे तेल के बास्केट को 27 देशों से बढ़ाकर 41 करना, हमारे आयात टर्मिनल को दुगना करना, और प्रधानमंत्री मोदी के तहत एक दशक में बनाए गए पाइपलाइन और भंडार, होर्मुज के बंद होने पर ये सभी चीजें उपयोगी साबित हुईं; यही वजह थी कि रोशनी जलती रही।

इस स्तर का संकट एक देश को उसकी असली क्षमता दिखाता है। भारत ने होर्मुज के बंद होने की बाधा पार की और देश में कहीं भी बिना किसी कमी के आपूर्ति जारी रही। इस अनुभव से सीख लेकर, हम अपनी ऊर्जा सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त क्षमताओं का निर्माण करेंगे, लेकिन जब इस संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक पंक्ति मौजूद रहनी चाहिए: मानव स्मृति का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट हमारे तटों तक पहुंचा, लेकिन 150 करोड़ भारतीय नागरिक सुरक्षित रहे।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)  

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पंडित नेहरू के इंडिया से मोदी के भारत तक का सफर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 10 जून को हमारे इतिहास के लगातार सबसे लंबे समय तक सेवा में रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए। इस दरमियान काफी समय तक भारतीय शासन की सेवा करने के नाते मैं कह सकता हूं कि मोदीजी की उपलब्धि कार्यकाल की लंबाई नहीं है। उन्होंने इस पद पर रहते हुए जो कुछ किया, वास्तविक उपलब्धि वह है। 

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मोदीजी ने 10 जून, 2026 को प्रधानमंत्री के पद पर अपना लगातार 4399वां दिन पूरा कर लिया। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के 1952 में पहली निर्वाचित सरकार से 1964 में उनके निधन तक लगातार प्रधानमंत्री रहने के कीर्तिमान को पीछे छोड़ दिया। 1947 से देखें तो सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री के पद पर रहने का रिकॉर्ड अब भी पंडित नेहरू के नाम ही है। लेकिन मोदीजी ने उन्हें हमारे गणराज्य के इतिहास में लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित शासन प्रमुख रहने के मामले में पीछे छोड़ दिया है। इस दरमियान मैंने अपना कामकाजी जीवन शासन के अंदर गुजारा है। इस उपलब्धि में मेरी दिलचस्पी गणित के लिहाज से कम है। मेरी ज्यादा दिलचस्पी इसमें है कि इस उपलब्धि को कैसे मापा जा सकता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सिखाया है कि सरकार को इस बात से आंका जाना चाहिए कि कतार के आखिर में खड़े आदमी तक क्या कुछ पहुंचता है। इसे ही अंत्योदय कहते हैं। पंडित नेहरू के ‘इंडिया’ और मोदीजी के ‘भारत’ के बीच का फासला वह दूरी है जिसे इस आखिरी आदमी ने तय किया है।

एक निष्पक्ष मूल्यांकन करें तो देखते हैं कि पंडित नेहरू को विरासत में क्या मिला था। उन्हें विरासत में एक ऐसा विभाजित उपमहाद्वीप मिला जो इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापन से जूझ रहा था,  दो सदियों के औपनिवेशिक शोषण से खोखली हो चुकी अर्थव्यवस्था मिली, ऐसी आबादी मिली जिसमें पाँच में से एक से भी कम लोग पढ़-लिख सकते थे और औसत उम्र तीस साल के आस-पास थी। उस विरासत के आधार पर उन्होंने एक ऐसा संवैधानिक लोकतंत्र खड़ा किया जो टिका रहा, जबकि एक के बाद एक स्वतंत्र हुए कई अन्य देश सेना के जनरलों या तानाशाहों के कब्ज़े में चले गए। ‘योजना आयोग’ दिशा तय करता था, सार्वजनिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर मजबूत पकड़ थी और लाइसेंस प्रणाली यह तय करती थी कि कौन क्या उत्पादन कर सकता है। विश्वविद्यालय, प्रयोगशालाएँ, परमाणु और अंतरिक्ष कार्यक्रम – आज़ाद भारत की संस्थागत नींव उन्हीं वर्षों में रखी गई थी। मैं 1974 में विदेश सेवा में आया और जिस भारत का मैंने प्रतिनिधित्व किया, वह एक गंभीर देश था जिसने अपनी व्यवस्था की क्षमता के अनुसार पूरी गरिमा के साथ अभावों का सामना करने का रास्ता चुना था।

उस व्यवस्था की कीमत तब तक साफ दिखने लगी थी जब तक मैं अपने करियर के मध्य पड़ाव पर पहुँचा। सरकार ने योजनाओं का आवंटन करना तो सीख लिया था, लेकिन वह वितरण करना नहीं सीख पायी थी। दिल्ली में घोषित किसी योजना और गाँव में मिलने वाले लाभ के बीच का जो फ़ासला था, वहीं सारा पैसा गायब हो जाता था। एक पूर्व प्रधानमंत्री का यह मानना कि हर एक रुपये में से सिर्फ पंद्रह पैसे ही गरीबों तक पहुँच पाते हैं, इस मॉडल पर अपने आप में एक बड़ा सवाल था। सरकार योजना तो बना सकती थी, लेकिन वह लोगों तक पहुँच नहीं पाती थी।

2014 में मोदी जी को जो विरासत मिली, उसका भी उतना ही ईमानदार मूल्यांकन होना चाहिए। उन्होंने एक ऐसी अर्थव्यवस्था की कमान संभाली थी जिसे बाज़ार ने ‘फ़्रैजाइल फ़ाइव’ (पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं) की श्रेणी में रखा था; जो अटकी हुई परियोजनाओं के बोझ तले दबी थी, दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति और भ्रष्टाचार से घिरी थी जिसने शासन पर से जनता के भरोसे को ही खोखला कर दिया था। इसका समाधान उन्होंने एक बिल्कुल अलग तरह की व्यवस्था बनाकर किया।

‘योजना आयोग’ की जगह ‘नीति आयोग’ ने ले ली, जो राज्यों को निर्देश देने के बजाय उन्हें साथ लेकर चलता है। पहचान (पहचान पत्र), बैंक खाता और मोबाइल फोन को एक साथ जोड़ा गया और सरकार ने बिचौलियों के बजाय, जो चार दशकों से अपना कमीशन ले रहे थे, नागरिकों को सीधे भुगतान करना शुरू कर दिया। ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ एक निर्णायक माध्यम है जो बहुत साधारण लगता है लेकिन इसने शासन के इरादे की बजाय वास्तविक लाभ के मिलने पर ध्यान केंद्रित किया।

इसके बाद जो हुआ, वह एक ‘मंच’ के रूप में सरकार की नई परिकल्पना थी। भारत ने सार्वजनिक डिजिटल ढांचा और एक ऐसी पहचान व्यवस्था बनाई जो पूरे उपमहाद्वीप में काम करती है। एक ऐसा भुगतान नेटवर्क खड़ा किया गया जिसका आज पूरी दुनिया अध्ययन कर रही है। पचास करोड़ से अधिक जनधन खातों ने उन परिवारों के लिए औपचारिक बैंकिंग के दरवाजे खोल दिए, जहाँ यह सुविधा पहले कभी नहीं पहुँची थी। नीति आयोग के अनुमान के अनुसार, इसी दशक में लगभग पच्चीस करोड़ भारतीय गरीबी से बाहर आए हैं और जिस अर्थव्यवस्था को बाजारों ने खारिज कर दिया था, वह अब किसी भी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। जो सरकार कभी नागरिक और उसकी जरूरत के बीच में रुकावट बन जाती थी, वह अब किनारे हटकर उसका आगे बढ़ने का मार्ग बना रही है। ‘भारत’ शब्द के पीछे यही मूल भावना है।

मैं जिस पद पर हूँ, वहाँ से इस बदलाव के बारे में बात कर सकता हूँ। साल 2014 में, हमारे पेट्रोल में इथेनॉल संमिश्रण का स्तर 1.53 प्रतिशत था। इस वर्ष हम बीस प्रतिशत के स्तर पर पहुँच चुके हैं—एक ऐसा लक्ष्य जो कभी 2030 के लिए तय किया गया था और जिसे हमने आधा दशक पहले ही हासिल कर लिया है। वह पैसा जो कभी कच्चे तेल की खरीद के लिए देश से बाहर चला जाता था, वह अब हमारे किसानों तक पहुँच रहा है, जो हमें अन्न देने वाले ‘अन्नदाता’ के साथ-साथ अब ऊर्जा देने वाले ‘ऊर्जादाता’ भी बन गए हैं। इन्हीं वर्षों में, उज्ज्वला योजना ने पहली बार दस करोड़ से अधिक गरीब परिवारों तक रसोई गैस पहुँचाई और इसकी सब्सिडी बिना किसी बिचौलिये के सीधे लाभार्थी के खाते में भेजी गई। यह ‘अंत्योदय’ का ही एक रूप है, जो अब लीटर और सिलेंडर के माध्यम से साकार हो रहा है। अब योजनाएँ समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को नज़रअंदाज़ नहीं करतीं, बल्कि उन्हीं को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं।

यही लेखा-जोखा ईंट और स्टील के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। ‘आवास योजना’ के तहत उन परिवारों के लिए लगभग चार करोड़ पक्के मकान बनाए गए हैं, जिनके पास अपना कोई घर नहीं था। 2014 में केवल पांच शहरों में मेट्रो चलती थी, आज बीस से अधिक शहरों में दौड़ रही है। हवाई अड्डों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है, और ‘उड़ान’ योजना ने उन छोटे शहरों के लोगों के लिए भी हवाई यात्रा मुमकिन बना दी है, जहाँ के लोग पहले सिर्फ़ आसमान से गुज़रते हुए हवाई जहाज़ों को देखा करते थे। रेलवे का लगभग पूरी तरह से विद्युतीकरण कर दिया गया है और अब वहां देश में ही निर्मित सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनें चल रही हैं। ये सब कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं। हर बदलाव का मतलब है—लंबी लाइनें खत्म हुईं, सफ़र में अब पूरा दिन बर्बाद नहीं होता और टपकने वाली छत की जगह एक मज़बूत छत मिल गई है।

बाकी चीज़ों के साथ-साथ वित्तीय ढांचा भी बदला। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने, अपनी शुरुआती तमाम दिक्कतों के बावजूद, देश को एक साझा राष्ट्रीय बाजार दिया—एक ऐसा बाजार जिसे बनाने के प्रयास में पिछले दो दशकों की हर वह सरकार नाकाम रही थी जिसने इसके लिए कोशिश की थी। केंद्र और राज्य अब ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार करने की सुगमता) और वितरण (सेवाओं को जनता तक पहुँचाने) की गुणवत्ता पर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, यह आवंटन को लेकर होने वाले पुराने झगडे से कहीं अधिक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है।

इसी भरोसे ने विदेशों में भारत की छवि को बदला है और देश का प्रतिनिधित्व करने के अपने वर्षों के अनुभव के आधार पर मैं यह बात कह सकता हूँ। पंडित नेहरू की ‘गुटनिरपेक्षता’ की नीति एक ऐसे गरीब और नए देश के लिए समझदारी भरा कदम था जो किसी एक पक्ष को चुनने का जोखिम नहीं उठा सकता था। वहीं, ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की मौजूदा नीति एक ऐसे देश का रुख है जो चाहता है कि हर पक्ष उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश करे। भारत अपनी जी-20 की अध्यक्षता को केवल राजधानी तक सीमित रखने के बजाय संघ के हर एक राज्य तक लेकर गया और भारत को ‘विकासशील और अल्पविकसित देशों की आवाज के रूप में पेश करने की इस रणनीति ने एक पुरानी विकासात्मक कमजोरी को नेतृत्व के दावे में बदल दिया। जो देश अपने घरेलू स्तर पर नीतियों के क्रियान्वयन को लेकर आश्वस्त होता है, वह दुनिया के सामने एक अलग ही तरह से बात करता है।

इतने बड़े पैमाने पर किये गए काम की समीक्षा तो होती ही है और हमारे देश जैसे बहस-मुबाहिसे वाले लोकतंत्र में तो यह ज़रूर होगी। लेकिन सरकार से पूछे जाने वाले सवाल स्पष्ट रूप से बदल गए हैं और यही इस सफ़र में तय की गई दूरी का पैमाना है। पंडित नेहरू के भारत में यह सवाल पूछा जाता था कि सरकार क्या दे सकती है। मोदी जी के भारत में यह पूछा जाता है कि सरकार क्या काम पूरा करके दिखा सकती है और साथ ही उसका सबूत दिखाने पर भी जोर दिया जाता है।

इसीलिए 10 जून का दिन खास है और इसमें दिनों की गिनती उतनी अहमियत नहीं रखती। पंडित नेहरू ने भारतीय राज्य का ढांचा खड़ा किया था। मोदी जी ने इसे नए सिरे से तैयार किया है ताकि यह उस नागरिक तक पहुंच सके जिसके नाम पर इसे बनाया गया था। मैंने राज्य के इन दोनों रूपों में सेवा की है और मैं जानता हूं कि कतार में खड़ा आखिरी व्यक्ति किस बदलाव को हमेशा याद रखेगा। जो वादा कभी कहीं पहले भरोसे पर मानना ​​पड़ता था, वह अब सीधे उसके अपने हाथों में पहुँच रहा है। यही वह ‘विकसित भारत’ है जिसे हमने 2047 तक बनाने का संकल्प लिया है और जैसा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- इसकी शुरुआत, कतार के उसी आखिरी व्यक्ति तक पहुँच कर होती है।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)

महंगाई का बड़ा झटका: देश भर में पेट्रोल और डीजल ₹3 प्रति लीटर हुए महंगे

बिजनेस डेस्क : मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ गया है। सरकार ने देश भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी करने का फैसला लिया है। यह नई दरें शुक्रवार सुबह से लागू हो गई हैं।

प्रमुख शहरों में तेल के नए दाम:-दिल्ली: पेट्रोल की कीमत बढ़कर ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर हो गया है।

मुंबई: यहाँ पेट्रोल ₹106.68 और डीजल ₹93.14 प्रति लीटर की दर से बिक रहा है।

कोलकाता: पेट्रोल के दाम ₹108.74 और डीजल के ₹95.13 प्रति लीटर पहुँच गए हैं।

चेन्नई: यहाँ पेट्रोल ₹103.67 और डीजल ₹95.25 प्रति लीटर मिल रहा है।

क्यों बढ़ी कीमतें? केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस हफ्ते की शुरुआत में ही संकेत दिए थे कि वैश्विक अनिश्चितता और तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर बढ़ते ₹2 लाख करोड़ के वित्तीय दबाव के कारण कीमतें बढ़ सकती हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले आखिरी बार 2022 में कीमतें बढ़ाई गई थीं। पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ अब CNG के दामों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे परिवहन और माल ढुलाई महंगी होने की आशंका है।