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ग्रेट निकोबार: भारत की समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र : एडमिरल डी. के. जोशी

“जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।”

– कौटिल्य

कौटिल्य की यह सीख सदियों पहले ही शासन और रणनीति की मूल सोच का हिस्सा बन चुकी थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर सामने आई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इस बात से हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है।

यह भारतीय मानचित्र के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित एक दूरस्थ द्वीप जैसा प्रतीत होता है। ऐसी जगह जिसे दशकों से लगभग अछूता छोड़ दिया गया है और जिसे वैसे ही रहने देना चाहिए। परंतु ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के समीप स्थित यह द्वीप दुनिया की ओर भारत की सबसे अहम सामरिक अवसर में से एक है। 

अत: ग्रेट निकोबार के प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह केवल एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्‍न नहीं है। यह वास्तव में इस बात की सामरिक परीक्षा है कि क्या भारत अपनी इस दुर्लभ भौगोलिक बढ़त को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने के लिए तैयार है।

सदियों से हिंद महासागर ने भारत की नियति को आकार दिया है। इसी समुद्री क्षेत्र ने हमारे व्यापार, हमारे विचारों और हमारे  सभ्यतागत प्रभाव को विश्‍व भर में पहुंचाया, परन्‍तु कई बार यही हमारी कमजोरियों का कारण भी बना। तथापि, स्वतंत्रता के पश्‍चात् लंबे समय तक भारत की सामरिक सोच मुख्य रूप से स्‍थल-आधारित रही।

यह निर्विवाद है कि ग्रेट निकोबार अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। यह अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जो सम्‍पूर्ण द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 2 प्रतिशत है। इसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है।

यह दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्‍ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्‍ट्रेट और लोम्बोक स्‍ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। वास्तविक सामरिक दृष्टि से देखें तो यह भारत की पूर्वी समुद्री चौकी है।

इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। कल्पना कीजिए उन जहाजों की, जो अदन की खाड़ी से मलक्का स्‍ट्रेट की ओर बढ़ रहे हैं, ऊर्जा से भरे मालवाहक जहाज, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जा रहे हैं, एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला कंटेनर यातायात तथा नौसैनिक संसाधन, निगरानी मंच और लॉजिस्टिक श्रृंखलाएँ, जो इन जलमार्गों से होकर गुजर रही हैं।

हिंद महासागर अब शांत समुद्र नहीं रहा। यह तेजी से एक भीड़भाड़ वाले सामरिक क्षेत्र में बदल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, कंटेनर यातायात, नौसैनिक तैनाती, द्वीपीय सुविधाएं, समुद्र के नीचे बिछी केबलें और समुद्री निगरानी अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं। यह शायद मुख्य भूमि पर बैठे कई लोगों को दिखाई न दे, परन्‍तु देशों के भविष्य के लिए यह बेहद निर्णायक है।

हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो नव-डिज़ाइन किए गए गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी — एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुम्फोन में। इसके साथ दोहरी ट्रैक्‍स वाली उच्च गति रेल, बहु-लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक मिलकर इंडो-पैसिफिक व्यापार मार्गों को पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

मलक्का स्‍ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोकपॉइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों (तेल और एलएनजी) तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है, जो मलक्का स्‍ट्रेट को अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्‍ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स के निकट स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। 

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अनेक शक्तिशाली देश बंदरगाहों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं, समुद्री पहुँच सुविधाओं, नौसैनिक संसाधनों, निगरानी प्रणालियों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से निरंतर अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं।

भारत का उत्तर संकोचपूर्ण नहीं हो सकता। उसका उत्तर सामरिक सुदृढ़ीकरण होना चाहिए। संप्रभुता केवल मानचित्र पर सीमाएँ खींच देने से सुदृढ़ नहीं होती। वह तब सशक्त होती है जब कोई भूभाग जुड़ा हुआ, आबाद, सुविधायुक्त, उत्पादक और सामरिक रूप से उपयोगी बनता है। अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और विद्युत संयंत्र अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं हैं। ये सभी मिलकर उस पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का निर्माण करते हैं, जिसकी सहायता से भारत एक निर्णायक सामुद्रिक स्थान पर विश्वसनीय, सतत और बहुआयामी उपस्थिति बनाए रख सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सिंगापुर केवल इसलिए एक महान सामुद्रिक केंद्र नहीं बना क्योंकि उसका भौगोलिक स्थान अनुकूल था। उसने उस स्थान के आस-पास आवश्यक क्षमताओं का निर्माण किया। भौगोलिक स्थिति ने उसे अवसर दिया, और उसके अवसंरचनात्मक विकास ने उस अवसर को प्रभाव में परिवर्तित किया। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कोई दूरस्थ द्वीप भी, यदि उसे लॉजिस्टिक और परिचालन अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, तो असाधारण सामरिक महत्व प्राप्त कर सकता है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती; वह भूगोल का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है।

ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित और विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है, साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुँच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इससे सप्लाई चेन सुदृढ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और भारत को अपने सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण और निश्चितता प्राप्त होगी।

निस्संदेह, ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिक सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और वास्तविक शमन उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता। लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। वास्तविक चुनौती पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चयन करने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाया जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सामरिक द्वीप का उत्तरदायित्‍व पूर्वक विकास करना चाहता है, अथवा फिर ऐसे समय में जब पूरा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पुनर्गठित हो रहा है, वह इस द्वीप को अविकसित और अपर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ छोड़ देगा।

भारत एक कॉन्टिनेंटल और सामुद्रिक — दोनों प्रकार की शक्ति है। लंबे समय तक स्थलीय सोच ने सामुद्रिक दृष्टिकोण पर हावी रहा है। अत: ग्रेट निकोबार परियोजना कोई विलासिता नहीं, बल्कि सामरिक दूरदृष्टि का प्रतीक है। किसी राष्ट्र की नियति केवल उन खतरों से निर्धारित नहीं होती जिनका वह सामना करता है, बल्कि उन अवसरों से भी तय होती है जिन्हें वह समय रहते पहचान लेता है। ग्रेट निकोबार ऐसा ही एक अवसर है। इसकी उपेक्षा करना भूगोल की उस सामरिक शक्ति को अनुपयोगी छोड़ देना होगा, जिसे बाद में अन्य शक्तियाँ अपने अनुसार आकार दे सकती हैं। वहीं, इसका विवेकपूर्ण विकास भूगोल को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

भारत को सामरिक दृष्टि से सोचने के लिए किसी से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल  उत्तरदायित्‍व पूर्वक, निर्णायक रूप से और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। इंडो-पैसिफिक की इस शताब्दी में, ग्रेट निकोबार भारत का अंतिम छोर नहीं है, यह भविष्य के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत का वॉचटावर है।

(लेखक वर्तमान में अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल तथा द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष हैं। वे भारतीय नौसेना के पूर्व नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) रह चुके हैं और वर्ष 2009-10 के दौरान अंडमान तथा निकोबार कमान (A&N Command) के कमांडर-इन-चीफ भी रहे हैं।)