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PGIMER में फहराया गया 110 फीट ऊंचा स्मारकीय राष्ट्रीय ध्वज, राज्यपाल ने बताया राष्ट्रसेवा का प्रतीक

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER), चंडीगढ़ ने अपनी विकास यात्रा में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज करते हुए संस्थान परिसर में 110 फीट ऊंचे स्मारकीय राष्ट्रीय ध्वज का ध्वजारोहण किया। इस अवसर पर पंजाब के राज्यपाल एवं केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासक श्री गुलाब चंद कटारिया मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

राष्ट्रगान की गरिमामयी धुन के बीच विशाल तिरंगे का अनावरण हुआ, जिसके साथ पूरा परिसर देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव के रंग में रंग गया। समारोह में यूटी चंडीगढ़ के गृह सचिव मंदीप बराड़, PGIMER के निदेशक प्रो. विवेक लाल, डीन (अकादमिक) प्रो. संजय जैन, डीन (अनुसंधान) प्रो. संजीव हांडा, उपनिदेशक (प्रशासन) पंकज राय सहित संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी, चिकित्सक, कर्मचारी और छात्र मौजूद रहे।

“PGIMER भारत की चिकित्सा उत्कृष्टता का प्रतीक”

अपने संबोधन में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि PGIMER भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में अत्यंत सम्मानित संस्थान है। उन्होंने कहा कि 110 फीट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज की स्थापना केवल संस्थान की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के गौरव का प्रतीक है।

उन्होंने निदेशक प्रो. विवेक लाल और पूरे PGIMER परिवार को इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए कहा कि संस्थान की दशकों की निस्वार्थ सेवा, समर्पण और उत्कृष्ट कार्यों ने उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई है।

देश-विदेश से इलाज के लिए आते हैं मरीज

राज्यपाल ने कहा कि आज उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि देश और विदेश से भी लाखों मरीज इलाज के लिए PGIMER आते हैं। यह संस्थान की उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं, विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का सबसे बड़ा प्रमाण है।

अंगदान, अनुसंधान और नवाचार में अग्रणी PGIMER

उन्होंने अंगदान, प्रत्यारोपण और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में PGIMER की उपलब्धियों की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि ROTTO North को लगातार मिल रही राष्ट्रीय पहचान संस्थान की उत्कृष्ट कार्यशैली को दर्शाती है। साथ ही चिकित्सा अनुसंधान में PGIMER का योगदान भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है।

तिरंगे के तीन रंगों से जोड़ा PGIMER की कार्यसंस्कृति

राज्यपाल ने कहा कि जिस प्रकार तिरंगे का केसरिया त्याग, श्वेत शांति और हरा रंग प्रगति का प्रतीक है, उसी प्रकार PGIMER के डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मचारी निस्वार्थ सेवा के माध्यम से इन मूल्यों को प्रतिदिन साकार करते हैं।

उन्होंने कहा कि अशोक चक्र की तरह संस्थान भी अनुसंधान, नवाचार और उत्कृष्ट रोगी सेवा के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ रहा है।

नई स्वास्थ्य परियोजनाओं की भी सराहना

राज्यपाल ने संस्थान में संचालित एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज सेंटर, शीघ्र शुरू होने वाले एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर तथा प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज की सराहना करते हुए कहा कि ये परियोजनाएं देश की तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देंगी।

SARATHI पहल बनी प्रेरणा

उन्होंने PGIMER की SARATHI (सारथी) पहल को जनभागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कहा कि हजारों स्वयंसेवकों को मरीजों की सहायता से जोड़कर संस्थान ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसे देशभर के कई अस्पताल अपना रहे हैं।

प्रो. विवेक लाल बोले- नवाचार और करुणा हमारी पहचान

PGIMER के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने कहा कि 110 फीट ऊंचा स्मारकीय राष्ट्रीय ध्वज भारत की एकता, त्याग और राष्ट्र निर्माण के संकल्प का स्थायी प्रतीक रहेगा।

उन्होंने बताया कि एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज सेंटर पूरी तरह संचालित हो चुका है, जबकि एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर भी जल्द ही पूरी क्षमता के साथ कार्य शुरू करेगा।

उन्होंने कहा कि PGIMER का उद्देश्य देशवासियों को अत्याधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है। संस्थान नवाचार, अनुसंधान और करुणामयी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से देश के विश्वास पर लगातार खरा उतरने का प्रयास करता रहेगा।

समारोह का समापन डीन (अकादमिक) प्रो. संजय जैन के धन्यवाद प्रस्ताव और राष्ट्रगान के साथ हुआ।

प्रथम आईसीएमआर वार्षिक क्लिनिकल ट्रायल बैठक 2026 में एकीकृत चिकित्सा अनुसंधान में भारत के उभरते नेतृत्व को उजागर किया गया


दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत में प्रथम-मानव चरण 1 नैदानिक ​​परीक्षणों को सुदृढ़ करने के लिए आईसीएमआर ने रिपोर्ट जारी की

बहुकेंद्रीय अनुसंधान की एकल नैतिक समीक्षा के लिए प्रचालनगत दिशानिर्देश जारी

विशेषज्ञों ने भारत के नैदानिक ​​अनुसंधान और नियामक इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने पर विचार-विमर्श किया

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने 20 मई, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय नैदानिक ​​परीक्षण दिवस: एकीकृत चिकित्सा नैदानिक ​​परीक्षणों पर फोकस” थीम के तहत “प्रथम आईसीएमआर वार्षिक नैदानिक ​​परीक्षण सम्मेलन 2026″ का सफलतापूर्वक आयोजन किया। राष्ट्रीय स्तर के इस कार्यक्रम ने भारत के नैदानिक ​​परीक्षण इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने और देश में साक्ष्य-आधारित एकीकृत चिकित्सा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

इस बैठक में नीति निर्माता, वैज्ञानिक, चिकित्सक, शोधकर्ता, नियामक प्राधिकरण और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ एकत्रित हुए और नैदानिक ​​अनुसंधान में उभरते अवसरों, नैतिक ढांचों, नियामक प्रक्रियाओं और नवाचारों पर चर्चा की।

इस कार्यक्रम में प्रो. (डॉ.) वी.के. पॉल, डॉ. राजीव बहल और वैद्य राजेश कोटेचा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवा और वैज्ञानिक समुदाय के प्रख्यात विशेषज्ञ और हितधारक उपस्थित थे।

बैठक को संबोधित करते हुए गणमान्य व्यक्तियों ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने और देश में स्वास्थ्य सेवा वितरण तंत्र को मजबूत करने के लिए मजबूत नैदानिक ​​अनुसंधान प्रणालियों, नैतिक शासन और एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल कार्यप्रणालियों के वैज्ञानिक सत्यापन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

इस कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षणों में से एक आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया पर आईसीएमआर-सीसीआरएएस के बहुकेंद्रीय चरण तृतीय रेंडोमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (आरसीटी) के निष्कर्षों की प्रस्तुति थी। इस अध्ययन में एनीमिया के प्रबंधन के लिए एकीकृत दृष्टिकोणों का मूल्यांकन किया गया, जो भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है।

इस नैदानिक ​​परीक्षण में पुनर्नवादि मंडुरा की प्रभावशीलता की तुलना अकेले और द्राक्षवलेहा के साथ संयोजन में मानक आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण के साथ की गई। मध्यम एनीमिया से पीड़ित 18-49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 4,000 गैर-गर्भवती महिलाओं पर किए गए इस अध्ययन में 90 दिनों की अवधि में हीमोग्लोबिन के स्तर और नैदानिक ​​परिणामों का आकलन किया गया। निष्कर्षों से पता चला कि दोनों आयुर्वेदिक औषधियां चिकित्सीय रूप से मानक आयरन-फोलिक एसिड चिकित्सा के समकक्ष थीं।

इस कार्यक्रम में “भारत में प्रथम चरण के नैदानिक ​​परीक्षणों को आगे बढ़ाना: नियामक प्रक्रियाओं और अवसरों पर एक डेल्फी अध्ययन” शीर्षक वाली रिपोर्ट का भी विमोचन किया गया। यह रिपोर्ट फार्मास्युटिकल उद्योग, संविदा अनुसंधान संगठनों (सीआरओ), शिक्षा जगत और राष्ट्रीय नियामक एजेंसियों के 37 विशेषज्ञों के साथ दो चरणों के परामर्श के माध्यम से तैयार की गई थी।

इस अध्ययन में भारत में प्रारंभिक चरण के नैदानिक ​​परीक्षणों की प्रगति को प्रभावित करने वाली प्रमुख बाधाओं की पहचान की गई और देश में नवाचार-संचालित नैदानिक ​​अनुसंधान का समर्थन करने के लिए नियामक क्षमता को मजबूत करने, अनुमोदन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने सहित उपायों की अनुशंसा की गई।

इस आयोजन के दौरान एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि “भारत में बहुकेंद्रीय अनुसंधान की एकल नैतिक समीक्षा के लिए परिचालन दिशानिर्देश” का विमोचन था , जिसका उद्देश्य देश भर में बहुकेंद्रीय अनुसंधान अध्ययनों के लिए नैतिक समीक्षा तंत्र को मजबूत और सुसंगत बनाना है।

कार्यक्रम के दौरान एकीकृत अनुसंधान साक्ष्य की नीतिगत स्वीकृति” विषय पर एक पैनल चर्चा का भी आयोजन किया गया। इस चर्चा ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और स्वास्थ्य सेवा व्यवहार में रूपांतरित करने पर सार्थक विचार-विमर्श को सुगम बनाया।

वार्षिक क्लिनिकल ट्रायल बैठक ने भारत के क्लिनिकल रिसर्च इकोसिस्टम में सहयोग को बढ़ावा देने, नैतिक और नियामक ढांचे को सुदृढ़ करने और नवाचार एवं वैज्ञानिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के प्रति आईसीएमआर की प्रतिबद्धता की पुष्टि की।