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नाबार्ड ने मनाया गया 45वां स्थापना दिवस, हरियाणा में ग्रामीण विकास के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

नाबार्ड हरियाणा क्षेत्रीय कार्यालय ने 21 जुलाई को हरियाणा सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक, सहकारी संस्थाओं, कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीओ), स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) तथा विकास भागीदार संगठनों के वरिष्ठ अधिकारियों की सहभागिता के साथ नाबार्ड का 45वां स्थापना दिवस मनाया।

इस कार्यक्रम में हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने अपनी उपस्थिति से समारोह की शोभा बढ़ाई। उन्होंने नाबार्ड को राष्ट्र की 44 वर्षों की समर्पित सेवा पूर्ण करने पर बधाई दी और कृषि विकास, वित्तीय समावेशन, संस्था निर्माण तथा सतत आजीविका संवर्धन के माध्यम से ग्रामीण भारत के कायाकल्प में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की। उन्होंने नाबार्ड को हरियाणा के एक विश्वसनीय विकास भागीदार बताया और ग्रामीण अवसंरचना, कृषक संस्थाओं, सहकारी समितियों तथा समुदाय-आधारित विकास पहलों को सुदृढ़ करने की दिशा में इसके निरंतर सहयोग की सराहना की।

मुख्य सचिव ने इस बात पर बल दिया कि ग्रामीण हरियाणा के कायाकल्प के लिए सरकारी एजेंसियों, वित्तीय संस्थाओं तथा जमीनी स्तर के संगठनों को शामिल करते हुए एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने विकसित भारत @ 2047 की परिकल्पना के अनुरूप सतत कृषि को बढ़ावा देने, आजीविका के अवसर बढ़ाने, ग्रामीण युवाओं तथा महिलाओं को सशक्त बनाने और लचीले ग्रामीण समुदायों के निर्माण के महत्व को रेखांकित किया।

वर्ष 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किए जाने का उल्लेख करते हुए, उन्होंने संस्थागत वित्त, प्रौद्योगिकी, कौशल विकास, बाजारों तथा नेतृत्व के अवसरों तक अधिक पहुंच सुनिश्चित कर कृषि में महिलाओं के योगदान को पहचानने और सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नाबार्ड राज्य में महिला-नेतृत्व विकास को आगे बढ़ाने तथा समावेशी एवं सतत ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाना जारी रखेगा।

इस अवसर पर बोलते हुए, श्रीमती निवेदिता तिवारी, मुख्य महाप्रबंधक, नाबार्ड हरियाणा क्षेत्रीय कार्यालय ने हरियाणा में ग्रामीण विकास क्षेत्र के साथ नाबार्ड की गहन सहभागिता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि (आरआईडीएफ) के अंतर्गत, नाबार्ड ने हरियाणा के लिए लगभग ₹15,056 करोड़ स्वीकृत किए हैं और 6,175 अवसंरचना परियोजनाओं को सहयोग प्रदान किया है, जिससे ग्रामीण संपर्क, सिंचाई, पेयजल सुविधाओं तथा समग्र आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिला है।

उन्होंने आगे बताया कि नाबार्ड ने 710 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण तथा राज्यभर में 131 कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के संवर्धन के माध्यम से ग्रामीण संस्थाओं को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन एफपीओ ने 63,369 से अधिक किसानों को संगठित किया है, जिनमें 14,017 महिला सदस्य शामिल हैं, जिससे किसानों को बाजारों, प्रौद्योगिकी तथा मूल्य श्रृंखलाओं तक पहुंच बेहतर बनाने में सहायता मिली है।

मुख्य महाप्रबंधक ने कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नाबार्ड के प्रयासों को रेखांकित किया, जिनसे 2022-23 से अब तक 5,010 से अधिक महिलाओं को लाभ पहुंचा है। उन्होंने बताया कि इन कार्यक्रमों ने डेयरी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, मशरूम की खेती, हस्तशिल्प, सिलाई तथा अन्य ग्रामीण उद्यमों में सतत आजीविका के अवसर सृजित किए हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि 28 एफपीओ को कुल ₹11.12 करोड़ की ऋण सहायता के साथ ऋण से जोड़ा गया है, जबकि नौ एफपीओ को ₹60.38 लाख की इक्विटी अनुदान सहायता प्रदान की गई है। नाबार्ड ने वाटरशेड विकास, भूजल प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई, धान की सीधी बुवाई (डीएसआर), सब्जी क्लस्टर संवर्धन तथा किसानों की आय एवं सततता बढ़ाने के उद्देश्य से अन्य नवीन हस्तक्षेपों के माध्यम से जलवायु-अनुकूल कृषि को भी बढ़ावा दिया है।

मुख्य महाप्रबंधक ने हरियाणा में नवाचार को बढ़ावा देने, ग्रामीण संस्थाओं को सुदृढ़ करने, महिला-नेतृत्व विकास को प्रोत्साहित करने तथा सतत एवं समावेशी विकास का समर्थन करने के प्रति नाबार्ड की प्रतिबद्धता को दोहराया।

समारोह के दौरान, राज्य में नाबार्ड द्वारा समर्थित विभिन्न हस्तक्षेपों की प्रमुख विकासात्मक पहलों, उपलब्धियों तथा प्रभाव को दर्शाने वाली एक कॉफी टेबल बुक का विमोचन किया गया। कृषि तथा संबद्ध गतिविधियों के ऋण नियोजन, परियोजना मूल्यांकन तथा वित्तपोषण में बैंकों एवं अन्य हितधारकों हेतु संदर्भ के रूप में कार्य करने के लिए एक यूनिट कॉस्ट बुक भी जारी की गई।

ग्रामीण विकास तथा संस्था निर्माण में उनके उत्कृष्ट योगदान के सम्मान में, कार्यक्रम के दौरान चयनित प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स), जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी), कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीओ), शिल्पकारों तथा महिला किसानों उद्यमियों को सम्मानित किया गया।

इस कार्यक्रम में शिल्पकारों, एफपीओ तथा ओएफपीओ द्वारा एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया, जिसमें कृषि उपज, प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद, हस्तशिल्प तथा अन्य मूल्य वर्धित उत्पादों को प्रदर्शित किया गया, जो ग्रामीण उत्पादक समूहों की बढ़ती उद्यमशीलता क्षमताओं को दर्शाता है। कार्यक्रम में अंतर्राष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026 के महत्व को भी रेखांकित किया गया, जिसमें कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों में महिलाओं के नेतृत्व, उद्यमिता तथा भागीदारी को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया।

MSME दिवस 2026 पर विशेष: कैसे डिजिटल पोर्टल भारत के 8 करोड़ MSME के कामकाज के तरीके में चुपचाप बड़ा बदलाव ला रहे हैं

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

एक दशक पहले किसी भी सरकारी जिला कार्यालय में जाइए। वहां कागजों की फाइलों का ढेर, काम के बोझ से परेशान कर्मचारी और पंजीकरण प्रमाणपत्र या भुगतान विवाद के निपटारे के लिए कई दिनों, कभी-कभी कई हफ्तों तक इंतजार करते उद्यमी आम दृश्य हुआ करते थे। आज देश के किसी भी कोने में बैठा एक कारीगर अपने मोबाइल से कुछ ही मिनटों में अपना उद्यम पंजीकृत कर सकता है, अपने उत्पादों को राष्ट्रीय ऑनलाइन बाजार में बेचने के लिए सूचीबद्ध कर सकता है और अपनी कार्यशाला से बाहर निकले बिना बकाया भुगतान की शिकायत भी दर्ज करा सकता है। यह केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि व्यवस्था में आया एक बड़ा बदलाव है।

भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) देश की अर्थव्यवस्था का छोटा हिस्सा नहीं हैं। वर्ष 2026 के एमएसएमई दिवस पर यह समझना जरूरी है कि इनका योगदान कितना बड़ा है। ये देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 31.1 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में 35 प्रतिशत से अधिक और कुल निर्यात में लगभग 48.58 प्रतिशत का योगदान देते हैं। साथ ही, ये लगभग 38 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं, जो दुनिया के अधिकांश देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। इसके बावजूद, कई दशकों तक ये उद्यम औपचारिक व्यवस्था से दूर रहे। इन्हें संस्थागत ऋण आसानी से नहीं मिला, बड़े सरकारी और निजी खरीद बाजारों तक पहुंच सीमित रही और जटिल नियम-कायदों का सामना करना पड़ा, जिनका लाभ अक्सर बड़े उद्योगों को मिलता था।

अब स्थिति तेजी से बदल रही है। एमएसएमई के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए कई डिजिटल पोर्टल शुरू किए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक उनकी किसी खास समस्या का समाधान करता है। इन पहलों ने सरकार और छोटे उद्यमियों के बीच संबंधों को पूरी तरह बदलना शुरू कर दिया है।

अंगुलियों पर औपचारिक पहचान

सबसे बड़ी और बुनियादी समस्या यह थी कि बिना औपचारिक पंजीकरण के कोई भी उद्यम सरकारी योजनाओं, बैंक ऋण या सरकारी ठेकों का लाभ नहीं ले सकता था। उद्यम पोर्टल पर कागज रहित, आधार आधारित सत्यापन और स्व-घोषणा की व्यवस्था ने पहले की लंबी और जटिल प्रक्रिया को कुछ ही मिनटों की ऑनलाइन प्रक्रिया में बदल दिया। आज 8.7 करोड़ उद्यम इस पोर्टल के माध्यम से औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इतिहास में इतने बड़े स्तर पर औपचारिक पंजीकरण का यह एक दुर्लभ उदाहरण है।

लेकिन केवल औपचारिक पंजीकरण ही पर्याप्त नहीं है। यदि सबसे छोटे और कमजोर उद्यम इससे बाहर रह जाएं, तो इसका पूरा लाभ नहीं मिल सकता। इसी उद्देश्य से उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म शुरू किया गया। यह उन सूक्ष्म और अनौपचारिक उद्यमों के लिए बनाया गया है, जिनके पास सामान्य पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, इस मंच पर अब तक 3.28 करोड़ ऐसे उद्यम जुड़ चुके हैं। इससे पहली बार लाखों छोटे कारोबार सरकारी सहायता और योजनाओं की पहुंच में आए हैं, जो पहले किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे।

सरकारी खरीद में समान अवसर

पहले छोटे उद्यमों के लिए ग्राहकों तक पहुंच बनाना आसान नहीं था। यह अक्सर भौगोलिक दूरी, सीमित संपर्कों और सरकारी खरीद की जटिल प्रक्रियाओं पर निर्भर करता था। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जेम) ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। यह एक पारदर्शी ऑनलाइन मंच है, जहां कोई भी पंजीकृत एमएसएमई सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को सीधे सामान और सेवाएं बेच सकता है। इससे सरकारी खरीद प्रणाली अधिक खुली और सभी के लिए समान अवसर वाली बन गई है।

आज जेम पर 11.14 लाख से अधिक एमएसएमई विक्रेता पंजीकृत हैं। इनमें 2.03 लाख महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाले और 61 हजार अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले उद्यम शामिल हैं। जेम के माध्यम से अब तक 18.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी खरीद हो चुकी है। यह केवल कारोबार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, छोटे उद्यमों की मजबूती और आपूर्ति श्रृंखला के विस्तार का भी प्रमाण है।

नकदी की उपलब्धता आसान बनाना

यदि पंजीकरण और बाजार तक पहुंच एमएसएमई सुधारों की मजबूत नींव हैं, तो समय पर धन उपलब्ध होना उसकी सबसे बड़ी ताकत है। लंबे समय तक सबसे बड़ी समस्या यह रही कि बड़े खरीदार छोटे उद्यमों के भुगतान 60, 90 या कभी-कभी 180 दिनों तक रोककर रखते थे। इससे छोटे कारोबारियों को महंगे अनौपचारिक कर्ज का सहारा लेना पड़ता था। इस समस्या के समाधान के लिए व्यापार प्राप्तियों के छूटकरण प्रणाली (टीआरईडीएस) शुरू की गई। अब एमएसएमई अपने बिल इस डिजिटल मंच पर अपलोड कर सकते हैं, जहां बैंक और वित्तीय संस्थान उन बिलों के बदले तुरंत धन उपलब्ध कराते हैं। इससे कारोबार के लिए आवश्यक कार्यशील पूंजी समय पर मिल जाती है।

वर्ष 2021 से 2026 के बीच टीआरईडीएस के माध्यम से 8.35 लाख करोड़ रुपये के बिलों का भुगतान कराया जा चुका है। इसका अर्थ है कि हजारों छोटे उद्यम अपने कर्मचारियों का वेतन समय पर दे सके, उन्हें साहूकारों से महंगा कर्ज नहीं लेना पड़ा और केवल भुगतान में देरी के कारण उनका कारोबार बंद नहीं हुआ।

शिकायतों का समाधान और न्याय तक आसान पहुंच

सबसे अच्छी व्यवस्था में भी कभी-कभी समस्याएं आती हैं। इन्हें दूर करने के लिए एमएसएमई चैंपियंस पोर्टल बनाया गया है। यह एक डिजिटल मंच है, जहां उद्यमी सलाह ले सकते हैं, अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 24 जून 2026 तक इस पोर्टल पर प्राप्त कुल शिकायतों में से 1,85,253 शिकायतों यानी 99.66 प्रतिशत का समाधान किया जा चुका है।

एमएसएमई समाधान पोर्टल विशेष रूप से छोटे उद्यमों के बकाया भुगतान की समस्या को दूर करने के लिए बनाया गया है। इसके साथ ही एमएसएमई ऑनलाइन विवाद समाधान (ओडीआर) पोर्टल न्याय तक पहुंच को और आसान बनाता है। इस पोर्टल के माध्यम से छोटे उद्यम अपने व्यावसायिक विवादों का समाधान ऑनलाइन सुलह और मध्यस्थता के जरिए कर सकते हैं। इससे देश के सबसे छोटे कारोबारियों के लिए न्याय प्राप्त करना पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल और सुलभ हो गया है।

नई पीढ़ी के डिजिटल मंच

इस वर्ष का एमएसएमई दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि डिजिटल बदलाव के एक नए दौर की शुरुआत भी है। भारत अब अपनी डिजिटल व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पीएमईजीपी 2.0 पोर्टल आवेदन से लेकर अनुदान मिलने तक की पूरी प्रक्रिया को और सरल बनाएगा। एमएसएमई समाधान 2.0 बकाया भुगतान के मामलों का और तेज़ी से निपटारा करेगा। वहीं, एमएसएमई ग्लोबल मार्ट 2.0 एक सरकारी सहयोग वाला ऑनलाइन बाजार होगा, जो ओएनडीसी व्यवस्था से जुड़ा रहेगा। इसके माध्यम से छोटे उद्यम एक-दूसरे के साथ और सीधे ग्राहकों को भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे, साथ ही वैश्विक बाजार तक पहुंच बना सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के इस दौर में सरकार का संकल्प स्पष्ट है कि इस परिवर्तन की यात्रा में कोई भी उद्यमी पीछे न छूटे।

बड़ी तस्वीर

ये सभी डिजिटल मंच अलग-अलग काम नहीं करते, बल्कि मिलकर एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था बनाते हैं, जो नियमों का पालन आसान करती है, विभिन्न सरकारी आंकड़ों को आपस में जोड़ती है और सरकार तथा उद्यमों के बीच तुरंत सूचना का आदान-प्रदान संभव बनाती है। इनसे केवल सुविधा ही नहीं बढ़ी है, बल्कि उन पुराने लाभों को भी खत्म किया गया है, जो पहले केवल बड़े, शहरी और प्रभावशाली कारोबारों को मिलते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के संकल्प में एमएसएमई क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। “सबका साथ, सबका विकास” केवल एक नारा नहीं, बल्कि सरकार की कार्यशैली का आधार है। 1 अप्रैल 2014 को एमएसएमई क्षेत्र को दिया गया बैंक ऋण 10.40 लाख करोड़ रुपये था, जो 31 दिसंबर 2025 तक बढ़कर 36.79 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी 12 वर्षों में इसमें 268 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो बड़े उद्योगों की तुलना में अधिक तेज रही। इस दृष्टि से एमएसएमई के लिए तैयार की गई डिजिटल व्यवस्था, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने का मजबूत आधार बन चुकी है।

देश में भविष्य के अधिकांश नए रोजगार एमएसएमई क्षेत्र से ही आएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विस्तार भी इसी क्षेत्र के माध्यम से होगा और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से औपचारिक व्यवस्था की ओर बदलाव भी इसी के जरिए पूरा होगा। इसलिए एमएसएमई के लिए तैयार की जा रही डिजिटल व्यवस्था विकसित भारत की मजबूत नींव है। हर नया पंजीकरण, हर समय पर मिला भुगतान और हर ऑनलाइन सुलझा विवाद वर्ष 2047 के विकसित भारत की दिशा में उठाया गया एक स्थायी कदम है।

आज लाखों छोटे उद्यमों को बाजार, वित्त और सरकारी सेवाओं से जोड़ने वाले ये डिजिटल मंच केवल तकनीकी सुविधा नहीं हैं। वे एक ऐसे भारत की मजबूत आधारशिला हैं, जहां हर छोटे उद्यमी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले और कोई भी पीछे न रह जाए।

(लेखक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं।)

भारत-नेपाल के बीच सीमा पार धन प्रेषण सेवा शुरू, UPI और नेपाल के भुगतान नेटवर्क का सीधा एकीकरण

दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और नेपाल ने डिजिटल वित्तीय सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए सीमा पार व्यक्ति-से-व्यक्ति धन प्रेषण तंत्र की शुरुआत कर दी है। 6 जून को लॉन्च की गई इस नई व्यवस्था के तहत भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस और नेपाल के नेशनल पेमेंट इंटरफेस को सीधे जोड़ा गया है।

इस एकीकरण के माध्यम से दोनों देशों के नागरिक अब मोबाइल बैंकिंग ऐप और डिजिटल वॉलेट की मदद से वास्तविक समय में सुरक्षित, तेज और निर्बाध तरीके से धन हस्तांतरित कर सकेंगे। यह कदम भारत और नेपाल के बीच वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ डिजिटल और आर्थिक एकीकरण को भी मजबूत करेगा।

यह तकनीकी साझेदारी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड और नेपाल क्लियरिंग हाउस लिमिटेड के सहयोग से लागू की गई है। इसका उद्देश्य सीमा पार भुगतान को अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफायती बनाना है।

नई व्यवस्था से दोनों देशों के यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब उन्हें मुद्रा विनिमय की जटिलताओं, अधिक नकदी साथ रखने और अतिरिक्त विदेशी मुद्रा शुल्क जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। वहीं नेपाल के स्थानीय व्यापारियों और व्यवसायों को भारतीय पर्यटकों और ग्राहकों तक सीधी पहुंच मिलने से व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि होने की संभावना है।

इसके अलावा डिजिटल भुगतान प्रणाली से नकदी प्रबंधन की लागत कम होगी, भुगतान का निपटान वास्तविक समय में होगा और सीमा पार नकदी ले जाने की आवश्यकता भी घटेगी। इससे व्यापारिक लेनदेन अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनेंगे।

गौरतलब है कि वर्तमान में यूपीआई दुनिया के नौ देशों—सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका और कंबोडिया—में स्वीकार किया जाता है। इन देशों में भारतीय यात्री अपने परिचित यूपीआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-नेपाल के बीच शुरू हुई यह नई भुगतान व्यवस्था दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय डिजिटल भुगतान सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगी।