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ई-जागृति: डिजिटल भारत में उपभोक्ता न्याय के लिए नई परिकल्पना  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

न्याय में देरी, लंबे समय से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ी निराशाओं में से एक रही है। चाहे वह खराब उत्पाद हो, ऑनलाइन खरीदी गई वस्तु का न मिल पाना हो, या अनुचित सेवा अनुबंध हो, शिकायत दर्ज करने से लेकर राहत पाने तक की प्रक्रिया अक्सर धीमी, बोझिल और डराने वाली रही है। हालांकि, भारत की उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था समय के साथ लगातार विकसित हुई है, लेकिन इसे समर्थन देने वाली प्रणाली तेज़ी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के साथ कदम मिलाते हुए आगे नहीं बढ़ पायी।          

आज, उपभोक्ता ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल भुगतान प्रणाली और ऑनलाइन बाज़ार में बड़े पैमाने पर लेन-देन करते हैं। उपभोक्ता न्याय की पारंपरिक व्यवस्था—जो भौतिक रूप से दाखिल करने, व्यक्ति द्वारा एक-एक कर जांच करने, अलग-अलग सॉफ़्टवेयर प्लेटफार्म का उपुओग करने और आमने-सामने की सुनवाई के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी—धीरे-धीरे अपर्याप्त सिद्ध होने लगी। डिजिटल युग में उपभोक्ता अधिकार सुनिश्चित करने के लिए केवल कानूनी सुधार ही पर्याप्त नहीं थे; इसके लिए न्याय देने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव करने की जरूरत थी।

यहीं पर ई-जागृति एक महत्वपूर्ण बदलाव लाती है। यह सिर्फ़ एक तकनीक प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था के केंद्र में पहुंच, पारदर्शिता और दक्षता को रखकर उपभोक्ता विवाद समाधान के तरीके की नए सिरे से परिकल्पना करने का प्रयास है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में एक आधुनिक फ्रेमवर्क की परिकल्पना की गयी थी, जो बाज़ार की उभरती वास्तविकताओं के अनुरूप काम करने में सक्षम हो। हालाँकि, कानून की भावना को प्रभावी सार्वजनिक सेवा में बदलने के लिए कई अलग-अलग पुरानी प्रणालियों को हटाकर एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम को अपनाने की जरूरत थी। पुराने प्लेटफॉर्म में एकरूपता की कमी, पुरानी संरचना, एक-दूसरे से जुड़कर काम करने की सीमित सुविधा और भौतिक प्रक्रियाओं पर अधिक निर्भरता जैसी समस्याएँ थीं। कई उपभोक्ताओं के लिए—विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन और अनिवासी भारतीय —न्याय पाने की प्रक्रिया की लागत अक्सर एक बड़ी बाधा बन जाती थी।

ई- जागृति उपभोक्ता शिकायत की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर इन संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करती है। ओटीपी आधारित पंजीकरण और ऑनलाइन दाखिल करने से लेकर डिजिटल जाँच, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, वर्चुअल सुनवाई, बहुभाषी आदेश और वास्तविक समय में मामले की निगरानी तक, यह प्लेटफ़ॉर्म नागरिकों को किसी भौगोलिक या प्रक्रियात्मक जटिलता की बाधा के बिना न्याय पाने में मदद करता है।

ऐसे बदलाव का महत्व केवल सुविधा तक ही सीमित नहीं है। यह नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों के बीच रिश्ते को मौलिक रूप से बदल देता है। डिजिटल वर्कफ़्लो कागजी काम को कम करते हैं, अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में प्रक्रियाओं को एक जैसा बनाते हैं, विवेकाधीन देरी को कम करते हैं और पारदर्शिता बढ़ाते हैं। मामलों की स्वचालित सूची, ऑनलाइन डैशबोर्ड और तुरंत सूचना सुनिश्चित करती है कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान शिकायतकर्ता को हर जानकारी मिलती रहे, जिससे प्रणाली में जनता का भरोसा मजबूत होता है।

इस प्लेटफ़ॉर्म ने न्याय को और अधिक समावेशी बनाने के लिए उभरती तकनीकों को भी अपनाया है। एआई-सहायता प्राप्त मामला विश्लेषण, वॉइस-टू-टेक्स्ट कार्यप्रणाली, टेक्स्ट-टू-स्पीच सुविधा, बहुभाषी इंटरफेस, उन्नत सर्च क्षमता और पहुँच प्राप्त करने के उपकरण जैसी विशेषताओं के जरिए समाज के विभिन्न हिस्सों से अधिक लोगों की भागीदारी संभव हुई है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और राज्य उपभोक्ता आयोगों में हाइब्रिड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का देश भर में लागू होना भी उतना ही अहम रहा है, जिससे वर्चुअल सुनवाई उपभोक्ता न्याय दिलाने की प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा बन गई है। दूरदराज के जिलों या विदेशों में रहने वाले नागरिकों के लिए, इससे कानूनी लड़ाई की वित्तीय और लॉजिस्टिक लागत दोनों काफी हद तक कम हो गई हैं।

फिर भी, इस स्तर के तकनीकी बदलाव में चुनौतियाँ हमेशा मौजूद रहती हैं। डिजिटल सुधार अक्सर संस्थानों को स्थापित प्रथाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर करते हैं और उपयोगकर्ताओं को अपरिचित प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ई-जागृति की शुरुआत के दौरान, डेटा स्थानान्तरण, भुगतान गेटवे एकीकरण, इंटरफेस की उपयोगिता और लंबे समय से चल रहे मैनुअल प्रक्रियाओं में बदलाव को लेकर चिंताएँ उभरीं। कानूनी पेशेवरों और अन्य हितधारकों के कुछ हिस्सों ने नई डिजिटल व्यवस्था को अपनाते समय कुछ चिंताएं जाहिर कीं।

इन चिंताओं को बाधा मानने की बजाय, कार्यान्वयन प्रक्रिया ने उन्हें निरंतर सुधार के मौकों के तौर पर देखा। उपभोक्ता आयोगों, कानूनी पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श से इस प्लेटफ़ॉर्म को बेहतर बनाने में मदद मिली। नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रम, क्षेत्रीय कार्यशालाएं, वर्चुअल प्रशिक्षण सत्र, साप्ताहिक शिकायत निवारण संवाद और लगातार तकनीकी समर्थन से हितधारकों का नई प्रणाली में धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा। इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण सबक मिला: डिजिटल परिवर्तन केवल इसलिए सफल नहीं होता कि तकनीक लागू की गई है, बल्कि इसलिए सफल होता है, क्योंकि संस्थाएं उपयोगकर्ता की प्रतिक्रिया के प्रति संवेदनशील रहती हैं और निरंतर सुधार के लिए प्रतिबद्ध रहती हैं।

शुरुआती परिणाम उत्साहवर्धक हैं। थोड़े ही समय में, ई-जागृति ने लाखों उपभोक्ताओं को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला दिया है, दो लाख से अधिक मामलों के दाखिले की सुविधा दी है, उच्च समाधान दर हासिल की है और साठ से अधिक देशों के उपभोक्ताओं को भारत के उपभोक्ता विवाद निवारण व्यवस्था तक पहुंचने में सक्षम बनाया है। मानकीकृत डिजिटल वर्कफ़्लो ने दक्षता में सुधार किया है और उन प्रक्रियात्मक अड़चनों को कम किया है, जो पहले की प्रणाली की विशेषता थी।   

राष्ट्रीय ई-शासन पुरस्कार 2026 में रजत पुरस्कार के माध्यम से मान्यता, न केवल एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में, बल्कि सरकारी प्रक्रिया की सफल पुनः डिज़ाइन की स्वीकृति के रूप में महत्वपूर्ण है। यह पुरस्कार इस बात को मान्यता देता है कि सार्थक डिजिटल शासन केवल मौजूदा प्रक्रियाओं को कंप्यूटरीकृत करने के बारे में नहीं है; यह उन्हें सरल, तेज़ और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए फिर से डिज़ाइन करने के बारे में है।

भारत की व्यापक डिजिटल इंडिया यात्रा ने दिखाया है कि जब मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता हो, तो तकनीक सार्वजनिक सेवा अदायगी को बदल सकती है। डिजिटल पहचान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से लेकर ऑनलाइन कराधान और स्वास्थ्य देखभाल प्लेटफार्मों तक, देश ने शासन में तकनीक की भूमिका का लगातार विस्तार किया है। अब उपभोक्ता न्याय भी उन क्षेत्रों की सूची में शामिल हो गया है, जिसमें संरचनात्मक डिजिटल सुधार हो रहे हैं। 

‘ई-जागृति’ की सफलता भविष्य के शासन सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक देती है। डिजिटल प्लेटफार्मों को संस्थाओं के बजाय नागरिकों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। पहुंच को बाद में सोची जाने वाली बात के बजाय एक मूल सिद्धांत के रूप में लिया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को निष्पक्षता से समझौता किए बिना पारदर्शिता और कुशलता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर, तकनीक को न्याय को सरल बनाना चाहिए, न कि उसमें जटिलता की नई परतें जोड़नी चाहिए।

जैसे-जैसे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ती जा रही है, उपभोक्ता का विश्वास उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर अधिक निर्भर करेगा, जो उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करती हैं। प्रभावी विवाद समाधान अब केवल एक प्रशासनिक उद्देश्य नहीं रहा; यह एक आर्थिक आवश्यकता बन गया है, जो बाजारों में भरोसे को मजबूत करता है और जिम्मेदार व्यावसायिक प्रथाओं को बढ़ावा देता है।

ई-जागृति प्लेटफार्म दिखाता है कि सोच-समझकर किया गया डिजिटल बदलाव कानूनी इरादे और नागरिक अनुभव के अंतर को कम कर सकता है। उपभोक्ता न्याय को तेज़, अधिक पारदर्शी और अधिक समावेशी बनाकर, यह एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत करता है—कि डिजिटल लोकतंत्र में, न्याय तक पहुंच भी सेवा तक पहुंच जितनी ही सहज होनी चाहिए। यही शायद इक्कीसवीं सदी में “ग्राहक देवो भव” का सबसे सार्थक रूप है।  

(लेखक केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा तथा उपभोक्ता कार्य, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री हैं)

सीसीपीए ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा परिणामों से संबंधित भ्रामक दावों के लिए कोचिंग संस्‍थान पर सात लाख रुपये का जुर्माना लगाया


नई दिल्ली / सत्ता संदेश

संस्थान ने सफल उम्मीदवारों द्वारा लिए गए पाठ्यक्रमों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई

सीसीपीए ने दोहराया है कि कोचिंग सेवाओं का चयन करने से पहले उपभोक्ताओं को उचित जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने वाजीराम एंड रवि आईएएस स्टडी सेंटर एलएलपी के खिलाफ अंतिम आदेश पारित किया है जिसमें उस पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का उल्लंघन करते हुए जानबूझकर महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर भ्रामक विज्ञापन देने के लिए 7,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के उल्लंघन में किसी भी वस्तु या सेवा के संबंध में कोई झूठा या भ्रामक विज्ञापन न दिया जाए।

मुख्य आयुक्त श्रीमती निधि खरे और आयुक्त श्री अनुपम मिश्रा की अध्यक्षता वाली केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने वाजीराम एंड रवि आईएएस स्टडी सेंटर एलएलपी के खिलाफ यह आदेश पारित किया है। प्राधिकरण ने पाया कि कोचिंग संस्थान ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई) 2023 में सफल हुए उम्मीदवारों के नाम, फोटो और उपलब्धियों का प्रमुखता से इस्तेमाल करते हुए बड़े-बड़े दावे किए और इन उम्मीदवारों द्वारा चुने गए विशिष्ट पाठ्यक्रमों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई।

यूपीएससी सीएसई 2023 के परिणाम घोषित होने के बाद संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट (www.vajiramandravi.com) पर निम्नलिखित दावे प्रकाशित किए गए:

  • शीर्ष 10 में से रैंक धारक वाजीराम एंड रवि से हैं।
  • शीर्ष 50 में रैंक हासिल करने वाले 37 उम्‍मीदवार वाजीराम एंड रवि से हैं।
  • तथ्य: हर सालयूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से चयनित होने वाले 30 प्रतिशत से अधिक अधिकारी वाजीराम एंड रवि के छात्र होते हैं।”
  • विस्तृत जांच के बाद सीसीपीए ने निम्नलिखित बातें पाईं:
क्रम संख्यासंस्थान का दावासीसीपीए के निष्कर्ष
 शीर्ष 10 में से 8 रैंक धारक वाजीराम एंड रवि से हैं।8 में से 7 उम्मीदवारों ने केवल निःशुल्क साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में ही नामांकन कराया था।
 शीर्ष 50 में 37 रैंक धारक37 उम्मीदवारों में से 29 ने केवल निःशुल्क साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में ही नामांकन कराया था।
 “तथ्य: हर साल, यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से चयनित होने वाले 30 प्रतिशत से अधिक अधिकारी वजिराम एंड रवि के छात्र होते हैं।” 2021 में सफल उम्मीदवारों में से 86.36 प्रतिशत ने साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में नामांकन कराया।2022 में सफल उम्मीदवारों में से 78.31 प्रतिशत ने साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में नामांकन कराया।2023 में, सफल उम्मीदवारों में से 97.56 प्रतिशत ने साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में नामांकन कराया।2024 में सफल उम्मीदवारों में से 71.69 प्रतिशत ने साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में नामांकन कराया।

उपर्युक्त महत्वपूर्ण जानकारी इन वर्षों में से किसी भी वर्ष संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित नहीं की गई थी।

सीसीपीए ने यह भी पाया कि आईजीपी एक ऐसा कार्यक्रम है जो तभी शुरू होता है जब कोई उम्मीदवार यूपीएससी सीएसई की प्रारंभिक और मुख्य दोनों परीक्षाएं स्वतंत्र रूप से उत्तीर्ण कर लेता है। ये दोनों ही बेहद कठिन प्रतियोगी परीक्षाएं हैं जिनमें संस्थान का कोई शैक्षणिक योगदान नहीं होता। संस्थान ने व्यापक सशुल्क कोचिंग कार्यक्रमों के विज्ञापनों के साथ ऐसे उम्मीदवारों को प्रमुखता से प्रदर्शित करके, चुने गए विशिष्ट पाठ्यक्रम का खुलासा किए बिना, यह भ्रामक धारणा बनाई कि ये उम्मीदवार उसके पूर्ण-स्तरीय कोचिंग कार्यक्रमों के छात्र हैं।

सीसीपीए ने पाया कि सफल उम्मीदवारों द्वारा चुने गए विशिष्ट पाठ्यक्रमों का खुलासा न करना, जिसमें यह जानकारी भी शामिल है कि क्या उम्मीदवारों ने पूर्ण-अवधि के कक्षा कार्यक्रम, वैकल्पिक विषय कोचिंग, परीक्षा श्रृंखला या अल्प अवधि के निःशुल्क साक्षात्कार मार्गदर्शन कार्यक्रम में भाग लिया था, अधिनियम के तहत भ्रामक विज्ञापन माना जाता है, क्योंकि यह संभावित उपभोक्ताओं को सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता से वंचित करता है। सीसीपीए ने माना कि विवादित विज्ञापन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28)(iv) के तहत “भ्रामक विज्ञापन” की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं, जो महत्वपूर्ण जानकारी को जानबूझकर छिपाने पर रोक लगाती है। यह आचरण अधिनियम की धारा 2(9) का भी उल्लंघन पाया गया, जो उपभोक्ताओं को सूचित होने का अधिकार प्रदान करती है।

अब तक, सीसीपीए ने छात्रों के हितों की रक्षा और कोचिंग क्षेत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं के लिए कोचिंग संस्थानों को 60 से अधिक नोटिस जारी किए हैं। सीसीपीए ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई), आईआईटी-जेईई, नीट, आरबीआई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग देने वाले कोचिंग संस्थानों पर 1.46 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया है।

(अंतिम आदेश निम्नलिखित लिंक के माध्यम से देखे जा सकते हैं: https://jagograhakjago.gov.in/CCPA_Orders/index.html )।

सीसीपीए ने भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं के लिए कोचिंग संस्थानों पर जुर्माना लगाया

सीसीपीए ने कोचिंग क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी कार्रवाई की; कोचिंग संस्थानों को 60 से अधिक नोटिस जारी किए गए और उन पर 1.39 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने भ्रामक विज्ञापनों, अनुचित व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन में लिप्त पाए जाने पर मोशन एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ 10 लाख रुपये का जुर्माना और सीकर स्थित करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी) के खिलाफ 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए अंतिम आदेश पारित किया है।

यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के उल्लंघन में किसी भी वस्तु या सेवा के संबंध में कोई झूठा या भ्रामक विज्ञापन न दिया जाए।

मुख्य आयुक्त श्रीमती निधि खरे और आयुक्त श्री अनुपम मिश्र की अध्यक्षता वाले केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने मोशन एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड और करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी), सीकर के खिलाफ आदेश पारित किए हैं। प्राधिकरण ने पाया कि कोचिंग संस्थानों ने आईआईटी-जेईई और नीईटी परीक्षाओं में सफल उम्मीदवारों के नाम, फोटो और उपलब्धियों का प्रमुखता से उपयोग करते हुए बड़े-बड़े दावे किए और इन उम्मीदवारों द्वारा चुने गए विशिष्ट पाठ्यक्रमों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई।

मोशन एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड का मामला : निम्नलिखित दावे किए गए थे –

  1. जेईई एडवांस्ड परिणाम 2025: मोशन के अनुसार जेईई एडवांस्ड में उत्तीर्ण छात्रों का प्रतिशत 3231/6332 = 51.02 प्रतिशत
  2. जेईई (मुख्य परीक्षा) 65.8 प्रतिशत 6930/10532”
  3. ” मोशन है तो सिलेक्शन है “
  4. नीट परिणाम 2025: उत्तीर्ण छात्रों का प्रतिशत 6972/7645 = 91.2 प्रतिशत
  5. नीट परिणाम 2025- शीर्ष 500 अखिल भारतीय रैंक (सामान्य और ओबीसी) में 19 छात्र और हमारे छात्रों ने 100 से कम में अखिल भारतीय रैंक प्राप्त की है।”

सीसीपीए ने संस्थान द्वारा अपनी आधिकारिक वेबसाइट, यूट्यूब चैनल, इंस्टाग्राम अकाउंट और समाचार पत्रों में प्रकाशित भ्रामक विज्ञापनों का स्वतः संज्ञान लिया। सीसीपीए ने पाया कि संस्थान ने सफल उम्मीदवारों के नाम और तस्वीरें प्रमुखता से प्रदर्शित कीं, साथ ही साथ “पूर्णकालिक कक्षा कार्यक्रम”, “आवासीय कार्यक्रम”, “नर्चर बैच”, “एन्थ्यूज बैच” और “ड्रॉपर/लीडर बैच” जैसे अपने सशुल्क कार्यक्रमों का विज्ञापन किया, जबकि सफल उम्मीदवारों द्वारा किए गए वास्तविक पाठ्यक्रमों का खुलासा नहीं किया।

जांच महानिदेशक द्वारा की गई जांच में पता चला कि विज्ञापनों में दिखाए गए अधिकांश छात्र “आई-एकलव्य (ऑनलाइन)” पाठ्यक्रमों में नामांकित थे। सीसीपीए ने पाया कि “आई-एकलव्य” पाठ्यक्रम जेईई और नीट उम्मीदवारों के लिए एक प्रमुख रैंकर्स बैच है, जो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्रारूपों में उपलब्ध है और चयनित छात्रों को परीक्षा और साक्षात्कार प्रक्रिया के माध्यम से निःशुल्क प्रदान किया जाता है। हालांकि, विज्ञापनों में यह महत्वपूर्ण जानकारी, यानी सफल उम्मीदवारों द्वारा चुने गए पाठ्यक्रम का खुलासा नहीं किया गया था।

जांच में यह भी पाया गया कि संस्थान ने परीक्षा संपन्न होने के बाद दाखिला लेने वाले कुछ छात्रों के नाम और तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया था, जिससे प्रचार के उद्देश्य से उनकी सफलता का झूठा श्रेय संस्थान को दिया गया था। जांच में यह भी पाया गया कि छात्रों या उनके माता-पिता/अभिभावकों की उचित सहमति प्राप्त किए बिना छात्रों के नाम और तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया था।

सीसीपीए ने पाया कि बार-बार अवसर दिए जाने और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद संस्थान विज्ञापनों में किए गए कई दावों को साबित करने में विफल रहा। प्राधिकरण ने माना कि सफल उम्मीदवारों द्वारा लिए गए पाठ्यक्रमों की प्रकृति के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28) के अंतर्गत भ्रामक विज्ञापन और धारा 2(47) के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार के अंतर्गत आता है।

सीकर स्थित करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी) का मामला : निम्नलिखित आरोप लगाए गए थे –

  1. एमबीबीएसआईआईटी और अन्य संस्थानों में 1650 से अधिक सीएलसी छात्र
  2. नीट में ऑल इंडिया रैंक-100 में सीएलसी छात्र
  3. “3 सीएलसी छात्र दिल्ली के एम्स में
  4. “6 सीएलसी छात्रों ने 720 में से 710 से अधिक अंक प्राप्त किए
  5. ऑल इंडिया रैंक-1000 में परिणामों में गुना वृद्धि
  6. ” सीकर में पिछले वर्ष में सर्वश्रेष्ठ सीएलसी एआईआर-1000 में सर्वाधिक 7 गुना वृद्धि “

सीसीपीए ने सीकर स्थित करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी) द्वारा अपनी आधिकारिक वेबसाइट और समाचार पत्रों में प्रकाशित भ्रामक विज्ञापनों का स्वतः संज्ञान लिया। सीसीपीए ने पाया कि संस्थान ने सफल उम्मीदवारों की तस्वीरें प्रमुखता से प्रदर्शित कीं और साथ ही विभिन्न कक्षा कार्यक्रमों का प्रचार किया, जबकि उम्मीदवारों द्वारा चुने गए वास्तविक पाठ्यक्रमों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई।

जांच महानिदेशक द्वारा की गई जांच में पता चला कि संस्थान ने बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद अपने दावों को साबित करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए। जांच में यह भी पाया गया कि कई छात्र जिनके नाम और तस्वीरें विज्ञापनों में इस्तेमाल की गई थीं, वे केवल परीक्षा श्रृंखला पाठ्यक्रमों में नामांकित थे, जिसे विज्ञापनों में जानबूझकर छिपाया गया था।

सीसीपीए ने आगे पाया कि संस्थान ने “एमबीबीएस, आईआईटी और अन्य संस्थानों में 1650 से अधिक सीएलसी छात्रों” के अपने दावे के संबंध में विरोधाभासी रुख अपनाया। अपने लिखित बयान में संस्थान ने कहा कि यह आंकड़ा 1996 से संचयी चयन का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि सुनवाई के दौरान उसने दावा किया कि यह आंकड़ा केवल वर्ष 2024 से संबंधित है। प्राधिकरण ने माना कि इस तरह के विरोधाभासी बयानों ने दावे को निराधार और भ्रामक बना दिया है।

प्राधिकरण ने यह भी पाया कि दोनों संस्थान परिणाम घोषित होने के बाद सफल उम्मीदवारों से लिखित सहमति प्राप्त करने का दस्तावेजी साक्ष्य प्रदान करने में विफल रहे, जैसा कि कोचिंग क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापन की रोकथाम के लिए दिशानिर्देश, 2024 के अंतर्गत अनिवार्य है।

सीसीपीए ने दोनों कोचिंग संस्थानों को तत्काल प्रभाव से भ्रामक विज्ञापन बंद करनेभविष्य में भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित न करने और भविष्य के विज्ञापनों में सत्य और पूर्ण जानकारी देने का निर्देश दिया था। हालांकि, दोनों संस्थानों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के समक्ष अपील दायर करके सीसीपीए के आदेशों को चुनौती दी है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 उपभोक्ताओं को सूचित होने का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें सत्य और सटीक जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल हैजिससे वे सोच-समझकर निर्णय ले सकें । भ्रामक विज्ञापन इस अधिकार को कमजोर करते हैं और उपभोक्ता हितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं, विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में जहां इच्छुक छात्र अपना काफी समय, प्रयास और वित्तीय संसाधन निवेश करते हैं।

सीसीपीए ने पाया कि सफल उम्मीदवारों द्वारा चुने गए विशिष्ट पाठ्यक्रमों के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाना , जिसमें यह जानकारी भी शामिल है कि क्या ऐसे उम्मीदवारों ने पूर्णकालिक कक्षा कार्यक्रमों, ऑनलाइन पाठ्यक्रमों, फाउंडेशन बैचों, क्रैश पाठ्यक्रमों या केवल परीक्षा श्रृंखलाओं में भाग लिया था, अधिनियम के तहत भ्रामक विज्ञापन के बराबर है।

छात्रों के हितों की रक्षा और कोचिंग क्षेत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, सीसीपीए ने अब तक भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं के लिए कोचिंग संस्थानों को 60 से अधिक नोटिस जारी किए हैं। विस्तृत जांच के बाद, सीसीपीए ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई), आईआईटी-जेईई, नीट, आरबीआई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग देने वाले 31 कोचिंग संस्थानों पर 1.39 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया है