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भारत और ओमान द्वारा एक नए आर्थिक गलियारे को गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और ओमान के बीच वाणिज्यिक रिश्ते सदियों से चलते आ रहे हैं। दोनों देशों का एक साझा इतिहास प्राचीन नावों के पाल पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा है और पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए कायम रहा है। भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) इस सभ्यतागत बंधन को और मजबूत करता है। एक ऐसे दौर में जब वैश्विक व्यापार भू-राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद से जूझ रहा है, यह समझौता भरोसेमंद साझेदारों के साथ आर्थिक जुड़ाव को गहरा करने के भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वर्ष 2022 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद, यह सीईपीए खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को मजबूती से स्थापित करता है। 

द्विपक्षीय व्यापार में लगातार विस्तार हुआ है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह 11.18 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि, सेवाओं का व्यापार 2024 में 863 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। आर्थिक रिश्तों का विविधीकरण हुआ है और इसमें परंपरागत वस्तुओं से परे इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का समावेश हुआ है। फिर भी, काफी अनछुई संभावनाएं अभी भी बाकी हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवर आवाजाही और नियामकीय सहयोग को शामिल करके, यह सीईपीए अधिक सुदृढ़, समन्वित और व्यापक आर्थिक साझेदारी का एक व्यापक ढांचा तैयार करता है।

भारतीय निर्यात के विकास का प्रवेश द्वार

इस सीईपीए के तहत ओमान की 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच हासिल है। इस समझौते से पहले, भारत के निर्यात का सिर्फ लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ही सर्वाधिक तरजीह वाले देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) की व्यवस्था के तहत ओमान में शुल्क-मुक्त प्रवेश करता था, जबकि शेष पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। इस सीईपीए के तहत, भारत के वर्तमान निर्यात की 99.38 प्रतिशत मात्रा अब शुल्क-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाएगी।

भारतीय निर्यातकों की दृष्टि से, ये लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं। ओमान के ‘विजन 2040’ के तहत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विविधीकरण में उसके द्वारा किए जा रहे निवेश से मांग में वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में 875.83 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात के 2030 तक बढ़कर 1.3 से 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच होने का अनुमान है। शून्य शुल्क की सुविधा के जरिए वस्त्र एवं परिधान सेक्टर को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। इससे तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और कोयंबटूर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी और साथ ही रोजगार भी सृजित होगा।

मौके व्यापक और विविध हैं। आयात पर निर्भर ओमान का दवा बाजार भारतीय कंपनियों के लिए मजबूत संभावनाएं पेश करता है। नियामकीय मंजूरियों में तेजी, गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की मान्यता और प्रमुख उत्पादों के शुल्क-मुक्त पहुंच से अनुपालन संबंधी लागत में कमी आएगी और बाजार में पैठ बढ़ेगी। चावल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और कन्फेक्शनरी सहित कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण आधारित निर्यात को भी लाभ होगा।

खुलते बाजार, हितों का संरक्षण

भारत के हालिया व्यापार समझौतों के अनुरूप, इस सीईपीए में एक संतुलित और सुविचारित दृष्टिकोण का समावेश है। जहां एक ओर भारत प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने एवं वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में शामिल होने के लिए बाजारों को खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहा है। दुग्ध तथा अनाज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के साथ-साथ रबर, वस्त्र और जूते जैसे उद्योग सुरक्षित बने हुए हैं। यह दृष्टिकोण बाहरी बाजारों तक पहुंच  और घरेलू कमजोरियों से बचाव को एक साथ जोड़ता है।

भारत ने ओमान से आयात होने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर लागू होने वाली अपनी 77 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों को उदार बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे ओमान के प्रमुख निर्यातों, खासकर मेथनॉल और निर्जल अमोनिया जैसे औद्योगिक इनपुट को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। ओमान को धातुओं और मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला में तरजीही बाजार पहुंच हासिल होगी। इससे हमारे दोनों देशों को कम उत्पादन लागत का लाभ उठाने में मदद मिलेगी।

जिन क्षेत्रों में भारत के रक्षात्मक हित हैं, उन क्षेत्रों में टैरिफ दर कोटा (टीआरक्यू) के जरिए  ओमान को पहुंच प्रदान की गई है। यह व्यवस्था निर्दिष्ट मात्रा की सीमा के भीतर खजूर, संगमरमर और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल जैसे उत्पादों के तरजीही निर्यात की अनुमति देती है। बेहद सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जुड़ाव का यह तरीका प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ-साथ संक्रमण काल ​​के दौरान कमजोर क्षेत्रों को सहायता भी प्रदान करता है।

व्यापार, प्रतिभा और विश्वास

यह सीईपीए भारतीय सेवा प्रदाताओं को उन सभी क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं प्रदान करता है, जहां भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत है। इनमें आईटी, पेशेवर सेवाएं और निर्माण क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने वाले प्रावधानों के साथ, भारतीय कंपनियों को ओमान में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने के अधिक मौके मिलेंगे।

प्रतिभाओं की दृष्टि से भी, यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। कंपनी के भीतर स्थानांतरित कर्मचारियों (इंट्रा-कॉरपोरेट ट्रांसफरी) की सीमा को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर, भारतीय कंपनियों को अब विशिष्टता प्राप्त कर्मचारियों को आसानी से तैनात करने तथा बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने की सुविधा मिल गई है। इसके अलावा, किसी भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में पहली बार, ओमान ने स्वतंत्र पेशेवरों के लिए एक समर्पित आवाजाही की व्यवस्था स्थापित की है। अब जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कारखानों में श्रमिकों की कमी हो रही है और आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर एआई एवं रोबोटिक्स के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में यह प्रावधान भारतीय प्रतिभाओं के लिए दुनिया भर में एक सशक्त मिसाल कायम करता है।

इस सीईपीए में समर्पित स्वास्थ्य सेवा का एक परिशिष्ट भी शामिल है, जो आयुर्वेद जैसी पारंपरिक प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में शामिल करने में सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, यह चिकित्सा पेशेवरों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित करता है। इसके अलावा, एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा समझौते से संबंधित बातचीत से भविष्य में भारतीय प्रवासी समुदाय को दोहरे योगदान के बोझ से बचाया जा सकेगा।

क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण

भारत-ओमान सीईपीए नियामकीय सहयोग, सामंजस्यपूर्ण मानकों और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करके टैरिफ से परे जाता है। यह भारत के आधुनिक व्यापार समझौतों से जुड़े उच्च मानकों को दर्शाता है और सीमा के भीतर मौजूद वाणिज्य में रुकावट डालने वाली विभिन्न बाधाओं को दूर करता है।

भारत एक बेहद ही एकीकृत क्षेत्रीय व्यापार संरचना की नींव रख रहा है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़े सभी साझेदार मिलकर अब वैश्विक जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत और वस्तुओं एवं सेवाओं के वैश्विक आयात का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हैं। खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के मिलन बिंदु पर स्थित, ओमान को एक अनूठी भौगोलिक हैसियत हासिल है। सोहार, दुक्म और सलालाह जैसे ओमान के लॉजिस्टिक्स व औद्योगिक केन्द्र भारत की मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी विशेषज्ञता एवं प्रतिभाओं को व्यापक मध्य पूर्व और अफ्रीका के साथ जोड़कर मूल्य श्रृंखलाओं को एकीकृत कर सकते हैं। इसका परिणाम क्षेत्रीय संपर्क और विकास के लिए निर्मित एक साझेदारी के रूप में सामने होगा।

व्यापार समझौते तभी सफल होते हैं जब वे भरोसा पैदा करते हैं, व्यवसायों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं और अर्थव्यवस्थाओं को स्थायी साझेदारी बनाने के लिए आगे बढ़ाते हैं। यह सीईपीए ठीक यही काम कर रहा है। यह सदियों पुराने रिश्ते को इक्कीसवीं सदी की हकीकतों के अनुरूप एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में परिवर्तित कर रहा है।  

KYC के 2025-26 अंतिम आंकड़े जारी, ‘वोकल फॉर लोकल’ से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र ने पिछले 12 सालो में विकास और परिवर्तन की असाधारण यात्रा तय की है। वित्त वर्ष 2025-26 में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1,87,105 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई जो अब तक सर्वाधिक है और ग्रामीण भारत की बढ़ती उद्यमशीलता, आत्मनिर्भरता तथा आर्थिक सशक्तिकरण का सशक्त प्रमाण है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों से प्रेरित होकर खादी अब केवल पारंपरिक उत्पाद नहीं रह गई है बल्कि यह ‘नए भारत’ की आत्मनिर्भरता, स्वदेशी गौरव और ग्रामीण समृद्धि का जीवंत प्रतीक बन गई है। खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र ने उत्पादन, विपणन और रोजगार सृजन में नए मानदंड स्थापित करते हुए देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार किया और उसे दिशा दी है।

केवीआईसी ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनंतिम आंकड़े जारी किए

नई दिल्ली में राजघाट के गांधी दर्शन पर स्थित केवीआईसी के कार्यालय में वित्त वर्ष 2025-26 के अनंतिम आंकड़े जारी करते हुए इसके अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि आयोग ने उत्पादन, बिक्री और रोजगार सृजन के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 की तुलना में विगत 12 वर्षों में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री में 501 प्रतिशत, उत्पादन में 380 प्रतिशत और रोजगार सृजन में 56 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने विगत वर्षों में हुई वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2024-25 में बिक्री में 447 प्रतिशत और उत्पादन में 347 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी प्रकार, वित्त वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2023-24 में बिक्री में 400 प्रतिशत और उत्पादन में 315 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.87 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई है

अध्यक्ष श्री मनोज कुमार ने कहा कि केवीआईसी का यह उल्लेखनीय प्रदर्शन न केवल ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प को गति प्रदान कर रहा है बल्कि भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान दिलाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रभावशाली मार्गदर्शन, महात्मा गांधी से मिली प्रेरणा और देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत लाखों कारीगरों की कड़ी मेहनत को इस उपलब्धि का श्रेय दिया। केवीआईसी के अध्यक्ष ने यह भी बताया कि जहां वित्त वर्ष 2013-14 में खादी और ग्राम उद्योग उत्पादों का उत्पादन 26,109 करोड़ रुपये का था, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में इसमें लगभग पांच गुना वृद्धि हुई जो 380 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 1,25,296 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। वित्त वर्ष 2013-14 में बिक्री जहां 31,154 करोड़ रुपये थी वहीं इसमें लगभग छह गुना वृद्धि दर्ज की गई जो 501 प्रतिशत की अभूतपूर्व बढ़ोतरी के साथ वित्त वर्ष 2025-26 में 1,87,105 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह अब तक बिक्री का उच्चतम आंकड़ा है।

खादी वस्त्रों के उत्पादन और बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि

खादी के वस्त्रों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। इनका उत्पादन वर्ष 2013-14 में 811 करोड़ रुपये का था जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 3,974 करोड़ रुपये हो गया। यह लगभग 390 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। साथ ही, खादी वस्त्रों की बिक्री 1,081 करोड़ रुपये से बढ़कर 7,869 करोड़ रुपये हो गई है जो इसमें लगभग 628 प्रतिशत की वृद्धि है। खादी के प्रति प्रधानमंत्री के निरंतर प्रोत्साहन और इसके प्रचार का सकारात्मक प्रभाव इस क्षेत्र की बढ़ती स्वीकार्यता और बाजार के विस्तार में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

ग्रामोद्योग क्षेत्र में उत्पादन और बिक्री के नए कीर्तिमान

ग्रामोद्योग क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। वर्ष 2013-14 में ग्रामोद्योग सामग्रियों का उत्पादन जहां 25,298 करोड़ रुपये था वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 1,21,322 करोड़ रुपये हो गया है जो इसमें लगभग 380 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इसी प्रकार, उनकी बिक्री 30,073 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,79,236 करोड़ रुपये हो गई जो लगभग 496 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। ग्रामोद्योग क्षेत्र ने रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्ष 2013-14 में जहां इस क्षेत्र में 1.19 करोड़ लोग कार्यरत थे वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 1.99 करोड़ हो गया जो ग्रामीण आजीविका सृजन में इस क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को उजागर करता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘घर-घर स्वदेशी’ जैसे अभियानों के प्रभाव से प्रेरित होकर ग्रामोद्योग उत्पादों की मांग में लगातार वृद्धि देखी गई है। परिणामस्वरूप, यह क्षेत्र ग्रामीण उद्योगों के विस्तार, बाजार को मजबूत करने और रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है।

रोजगार सृजन में केवीआईसी की ऐतिहासिक उपलब्धि

केवीआईसी ने रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त की है। खादी और ग्रामोद्योग से संबंधित गतिविधियों में वर्ष 2013-14 में क्रमिक रूप से वृद्धि के साथ रोजगार 1.30 करोड़ था जो इस क्षेत्र में 56 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 2.04 करोड़ हो गया। इससे ग्रामीण आजीविका सृजन में केवीआईसी की महत्वपूर्ण भूमिका उजागर होती है।

पीएमईजीपी ने स्वरोजगार और उद्यमिता को नई गति प्रदान की है

प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के अंतर्गत वित्त वर्ष 2025-26 में 66,494 नई इकाइयां स्थापित की गईं और इन इकाइयों के लिए 7,375 करोड़ रुपये के ऋण के बदले सरकारी खर्च पर 2,457 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी वित्तीय सहायता वितरित की गई। इन इकाइयों के माध्यम से 7,31,434 लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए गए। योजना की शुरूआत से अब तक कुल 10,84,679 इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं जिनके लिए 80,705 करोड़ रुपये के ऋण के बदले 29,623 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी वित्तीय सहायता वितरित की गई है। इस पहल के माध्यम से अब तक लगभग 97.95 लाख लोगों को रोजगार प्रदान किया गया है।

ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत टूल-किट के वितरण के माध्यम से कारीगरों का सशक्तीकरण

ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत अब तक 51,230 इलेक्ट्रिक पॉटरी व्हील, 2,46,099 मधुमक्खी पालन के लिए बक्से और मधुमक्खियों के छत्ते, 2,674 स्वचालित और पैडल से चलने वाली अगरबत्ती बनाने की मशीनें, 7,669 जूते बनाने और मरम्मत करने के टूल-किट, 836 पेपर प्लेट और दोना बनाने की मशीनें, एसी मरम्मत, मोबाइल मरम्मत, सिलाई, इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर के लिए 7,571 टूल-किट, काष्ठ शिल्प, बेकार लकड़ी से बने सामान और लकड़ी के खिलौने बनाने के लिए 5,138 मशीनें और ताड़ के गुड़, तेल घानी निकालने और इमली प्रसंस्करण के लिए 1,789 मशीनें वितरित की जा चुकी हैं। इस योजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 37,769 मशीनें, टूल-किट और उपकरण वितरित किए जा चुके हैं। विगत चार वर्षों की समीक्षा से संकेत मिलता है कि 2022-23 में 21,874, 2023-24 में 29,540, 2024-25 में 38,904 और 2025-26 में 37,769 मशीनें और उपकरण वितरित किए गए। इस प्रकार, ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत केवीआईसी ने अब तक कुल 3,23,006 मशीनें, टूल-किट और उपकरण वितरित किए हैं और इस प्रकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

केवीआईसी के प्रयासों के माध्यम से महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा

केवीआईसी ने महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान केवीआईसी के विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत 79,682 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। इनमें से 47,382 प्रशिक्षु महिलाएं थीं जो कुल संख्या का लगभग 59 प्रतिशत हैं। इसके अतिरिक्त, पीएमईजीपी योजना के अंतर्गत 2025-26 के दौरान 28,180 महिला उद्यमियों ने व्यावसायिक इकाइयां स्थापित कीं जिससे 3,09,980 महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हुए। यह आंकड़ा महिला उद्यमशीलता को बढ़ावा देने में इस योजना की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। खादी क्षेत्र में लगभग 5,00,000 कारीगरों में से 80 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के साथ यह क्षेत्र महिला नेतृत्व वाले आर्थिक सशक्तीकरण के लिए प्रभावी माध्यम के रूप में कार्य कर रहा है।

कारीगरों के पारिश्रमिक में 275% तक की वृद्धि

कारीगरों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2013-14 में 4 रुपये प्रति गट्ठर से बढ़कर वर्तमान में 15 रुपये प्रति गट्ठर हो गया है। यह पारिश्रमिक में लगभग 275 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

सरकारी खरीद, प्रदर्शनी में बिक्री और राष्ट्रीय ध्वजों की मांग में वृद्धि

इसके साथ ही, खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की सरकारी खरीद बढ़कर 92.08 करोड़ रुपये हो गई है जो इस क्षेत्र की बढ़ती स्वीकार्यता और संस्थागत मांग में वृद्धि को दर्शाती है। इसी प्रकार, खादी उत्पादों की प्रदर्शनियों और विपणन की पहलों के माध्यम से 30.83 करोड़ रुपये की बिक्री हुई जिससे बाजार विस्तार और उपभोक्ताओं की सहभागिता को मजबूती मिली है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय ध्वजों की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो 2013-14 में 0.87 करोड़ रुपये थी वह वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 2.35 करोड़ रुपये हो गई है। यह वृद्धि देश में ‘हर घर तिरंगा’ जैसे जन अभियानों के प्रभाव और खादी के उपयोग के प्रति जनता में बढ़ती लोकप्रियता को रेखांकित करती है।

एनएचएआई ‘परियोजना सक्षम’ के माध्यम से महिला-केंद्रित कौशल विकास को बढावा दे रहा है

दिल्ली /सत्ता संदेश

समावेशी विकास को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), वर्टिस फाउंडेशन के साथ साझेदारी में ‘परियोजना सक्षम’ के माध्यम से सार्थक सामाजिक प्रभाव पैदा कर रहा है। यह पहल स्थायी आजीविका के अवसरों के लिए संरचित कौशल विकास के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने पर केंद्रित है। कौशल प्रशिक्षण से परे इस पहल का उद्देश्य दीर्घकालिक वित्तीय आत्‍मनिर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए मार्ग तैयार करना भी है।

‘परियोजना सक्षम’ देशभर में फैले 12 प्रशिक्षण केंद्रों के नेटवर्क के माध्यम से संचालिता होता है, जो वंचित समुदायों को उद्योग-प्रासांगिक कौशल और औपचारिक कार्यबल में शामिल होने के अवसर प्रदान करता हैं। अब तक इस पहल ने 6,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से 4,000 से अधिक को विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक रोजगार मिला है। लाभार्थी औसतन 13,000 से 16,000 रुपये प्रतिमाह की आय अर्जित कर रहे हैं, जो कई राज्यों में प्रवेश स्तर के वेतन मानकों से अधिक है। गौर तलब है कि 80 प्रतिशत से अधिक लाभार्थी महिलाएं हैं, जो जेंडर-आधारित सशक्तिकरण पर कार्यक्रम के मजबूत जोर को रेखांकित करता है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के समावेशी बुनियादी ढांचा विकास के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप, ‘सक्षम परियोजना’ इस विश्वास पर आधारित है कि राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे बसे समुदायों, विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को, बुनियादी ढांचे के विस्तार से उत्पन्न आर्थिक अवसरों का सीधा लाभ मिलना चाहिए। यह पहल उन समुदायों के लिए कौशल, रोजगार और वित्तीय आत्‍मनिर्भरता तक पहुंच को सक्षम बनाकर इस अंतर को पाटने का प्रयास करती है, जो इससे जुड़े तो हैं, लेकिन अक्सर बुनियादी ढांचे के विस्तार के आसपास की आर्थिक गति से बाहर रह जाते हैं।

‘परियोजना सक्षम’ अपनी जमीनी सहभागिता मॉडल के कारण विशिष्‍ट पहचान रखता है। इसकी फील्ड टीमें ग्रामीण समुदायों के भीतर परिवारों के साथ निकटता से कार्य करती है, ताकि विश्‍वास कायम किया जा सकें, सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर किया जा सकें तथा महिलाओं को कौशल विकास और रोजगार के अवसरों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किेया जा सके-कई मामलों में यह उनके लिए पहली बार होता है। प्रतिभागियों को विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक कौशलों में प्रशिक्षित किया जाता है, जिनमें बिजली का काम, प्लंबिंग, उपकरण मरम्मत, सिलाई, जनरल ड्यूटी असिस्‍टेंट नर्सिंग और बहु-कुशल तकनीशियन प्रशिक्षण शामिल हैं।इन कार्यक्रमों को इस प्रकार तैयार किया गया है कि लाभार्थियों को व्यावहारिक, बाजार-उन्‍मुख क्षमताएं प्राप्‍त हों, जिससे उनकी रोजगार योग्‍यता बढे। अनेक प्रतिभागियों के लिए यह पहल एक परिवर्तनकारी यात्रा सिद्ध हुई है, जिसने उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने तथा अपने और अपने समुदायों के लिए नई आकांक्षाएं निर्धारित करने में सक्षम बनाया है।

यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि एनएचएआई अवसंरचना विकास को केवल बेहतर कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसके माध्‍यम से समावेशी विकास के अवसर भी सुनिश्चित करना चाहता है, जिससे देश भर में अधिक और सशक्‍त समुदायों के निर्माण में योगदान मिल सके।

खाद्य सुरक्षा से खाद्यान्नों के मामले में नेतृत्व की ओर: खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में पीएलआई योजना का परिवर्तनकारी प्रभाव
  • श्री अविनाश जोशी

खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की कहानी में एक निर्णायक मोड़

भारत आज अपने आर्थिक सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अब जबकि हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की दिशा में अग्रसर है, विकास को सिर्फ उत्पादन की मात्रा से ही नहीं, बल्कि हमारे द्वारा सृजित मूल्य के आधार पर भी मापना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की तुलना में बहुत कम क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां इस प्रकार का बदलाव बिल्कुल साफ नजर आता है।

भारत खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों, दूध और समुद्री उत्पादों के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। दशकों तक, हमारे कृषि संबंधी सामर्थ्य ने देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। फिर भी, इस उपज का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बेहद ही सीमित मूल्यवर्धन के साथ सीधे खेत से बाजार तक पहुंचता रहा।

आज भारत के कृषि उत्पादन का महज 12-13 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्करण से गुजरता है। उत्पादन और प्रसंस्करण के बीच का यही अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध सबसे बड़े अवसरों में से एक है।

इसलिए, खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की यात्रा का अगला चरण बिल्कुल स्पष्ट है: कृषि की प्रचुर संपदा को उच्च मूल्य वाले एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खाद्य उत्पादों में परिवर्तित करना।

पीएलआई योजना के पीछे की परिकल्पना

इस अवसर को पहचानते हुए, भारत सरकार ने मार्च 2021 में कुल 10,900 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की शुरुआत की।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) द्वारा इस योजना को 2021-22 से 2026-27 तक की छह साल की अवधि के लिए लागू किया जा रहा है।

इस योजना के पीछे का मूल विचार सरल लेकिन ठोस है: खाद्य प्रसंस्करण क्षमता, नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग के विस्तार में निवेश करने वाली कंपनियों को पुरस्कृत करना। कुल मिलाकर, यह योजना इन-स्टोर ब्रांडिंग, अंतरराष्ट्रीय खुदरा श्रृंखलाओं में शेल्फ स्पेस और वैश्विक विपणन अभियानों में निवेश करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करके भारत में खाद्य उत्पादन से जुड़ी वैश्विक स्तर की कई चैंपियन कंपनियां तैयार करती है।

रणनीतिक डिजाइन: एक आधुनिक खाद्य इकोसिस्टम का निर्माण

पीएलआईएसएफपीआई योजना की संरचना को सावधानीपूर्वक को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रखा गया है।

1. उच्च क्षमता वाले खाद्य क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना

पहला घटक पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) खाद्य पदार्थ, प्रसंस्कृत फल और सब्जियां, समुद्री उत्पाद जैसी प्रमुख खाद्य श्रेणियों में उत्पादन बढ़ाने पर केन्द्रित है।

ये श्रेणियां वैसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत घरेलू खपत और निर्यात क्षमता, दोनों में तेजी से विस्तार कर सकता है।

2. नवाचार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी को प्रोत्साहन देना

दूसरा घटक एमएसएमई द्वारा विकसित नवोन्मेषी और जैविक खाद्य उत्पादों को समर्थन प्रदान करता है। लघु एवं मध्यम उद्यम भारत के खाद्य क्षेत्र की रीढ़ हैं और समावेशी विकास हेतु  आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ उनका जुड़ाव बेहद जरूरी है।

पोषक अनाज (मिलेट) से संबंधित नवाचार: परंपरा को आधुनिक बाजारों से जोड़ना

वर्ष 2023 में, अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज (मिलेट्स) वर्ष के उपलक्ष्य में, मंत्रालय ने पीएलआई योजना के तहत एक विशेष पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पादों में मिलेट्स के उपयोग को प्रोत्साहित करना था।

मिलेट्स जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, अत्यधिक पौष्टिक और भारत की कृषि परंपराओं में गहराई से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलेट्स का समावेश करके, यह योजना पोषण संबंधी सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि को एक साथ बढ़ावा देती है।

बदलाव से जुड़े आंकड़े

पीएलआई योजना के तहत बहुत ही कम समय में हासिल की गई प्रगति उद्योग जगत की ओर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और इस नीति की प्रभावशीलता को दर्शाती है।

अब तक:

• इस योजना के तहत 165 कंपनियों को मंजूरी दी गई है।

• इनमें से 68 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) हैं, साथ ही बड़ी कंपनियों के 40 संविदा निर्माता भी शामिल हैं।

• कुल मिलाकर 9,207 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है।

• प्रति वर्ष लगभग 35 लाख मीट्रिक टन की नई प्रसंस्करण और संरक्षण संबंधी क्षमता सृजित की गई है।

• इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 3.29 लाख रोजगार सृजित हुए हैं।

ध्यान रखने लायक बात यह है कि इस योजना का मूल लक्ष्य 25 लाख रोजगार सृजित करना था। इस क्षेत्र ने पहले ही इस लक्ष्य का 131 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लिया है।

पीएलआई समर्थित कंपनियों द्वारा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों की बिक्री में भी 2019-20 से 13.23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।

(निर्यात में वृद्धि दर 2019-20 से 7.41 प्रतिशत की है)

विभिन्न पीएलआई योजनाओं के बीच एक चमकता सितारा

उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भारतीय अर्थव्यवस्था के 14 क्षेत्रों को कवर करती है। इनमें से, खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित पीएलआई सबसे प्रभावशाली योजनाओं में से एक बनकर उभरी है।

कुल पीएलआई सब्सिडी वितरण में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का हिस्सा मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही होने के बावजूद, इसने तमाम पीएलआई योजनाओं के तहत सृजित किए गए कुल रोजगारों में से लगभग 42 प्रतिशत रोजगार सृजित किए हैं।

अब तक, इस योजना के तहत कुल 2715 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी की जा चुकी है। यह कुल परिव्यय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है।

यह साबित करता है कि खाद्य प्रसंस्करण भारत के मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम में सबसे अधिक रोजगार सृजित करने वाले क्षेत्रों में से एक है।

उपभोक्ताओं की बदलती जीवनशैली के अनुरूप बदलाव

भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन का असर खाद्य उद्योग पर भी पड़ रहा है।

युवा और शहरीकरण की ओर अग्रसर आबादी की बढ़ती मांगें इस प्रकार हैं:

• खाद्य संबंधी सुविधाजनक उपाय

• स्वच्छ पैकेजिंग

• सुरक्षित और पौष्टिक खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पाद

बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर अक्सर पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) या खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) वैसे गुणवत्तापूर्ण भोजन की तलाश में रहते हैं जो उनकी तेज रफ्तार जीवनशैली के अनुरूप हो।

खाद्य सुरक्षा से खाद्य नेतृत्व की ओर

भारत की प्रचुर कृषि संपदा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हमारे सामने इस प्रचुर संपदा को सतत आर्थिक मूल्य में बदलने की चुनौती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से संबंधित उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना इस बदलाव को गति देने में सहायक साबित हो रही है और खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर खाद्यानों के मामले में नेतृत्व का सपना शीघ्र ही साकार होने वाला है।

(लेखक आईएएस अधिकारी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के सचिव हैं)

नारंगी अर्थव्यवस्था: जनजातीय कला, हस्तशिल्प और आजीविका

रंजना चोपड़ा

वर्शांग खैयर मणिपुर के उखरूल जिले के लॉन्गपी गाँव के निवासी हैं, जो अपने और अपने परिवार की रोजी-रोटी गाँव में उपलब्ध गारे और सर्पेंटीनाइट पत्थर से बर्तन बनाकर कमाते हैं। स्थानीय तांगखुल नागा जनजातियों के अनुसार, यह पारंपरिक शिल्प, देवी पंथोइबी की कृपा है और आज यह उनकी आय का मुख्य स्रोत है और इसने छोटे से गाँव को वैश्विक मानचित्र पर ला दिया है। इसी तरह, नॉर्थी कुट्टन, जो तमिलनाडु के उद्हगमंडलम जिले के पागलकोड मंड गाँव में रहते हैं, पारंपरिक कढ़ाई कला से अपनी आजीविका कमा रहे हैं। इस कढ़ाई कला का उपयोग नीलगिरी के हरे-भरे जंगलों में बसे टोडा जनजाति समूह द्वारा किया जाता है। जीआई टैग से युक्त यह शिल्प प्रकृति और सामुदायिक बंधन का जश्न मनाता है और इसे बहुत ही सुंदरता के साथ टेबल मैट, रनर, जैकेट आदि पर अंकित किया जाता है और समकालीन उपयोग में इसे लोकप्रियता भी मिली है। खैयर और कुट्टन दोनों अपने पारंपरिक जनजातीय कला रूपों के एक उन्नत रूप का अभ्यास करके सालाना लगभग 6-8 लाख रुपये कमाते हैं।

जनजातीय आजीविका लंबे समय से ज्ञान और पारंपरिक प्रथाओं पर आधारित रही है, जहां रचनात्मकता शिल्प, परंपरा, वस्त्र, संगीत, नृत्य, कथा-वाचन और भाषाओं में निहित है। ये केवल उत्पाद या सेवाएं नहीं हैं, बल्कि ज्ञान की जीवित विरासत हैं, जो पीढ़ियों के माध्यम से आगे बढ़ती हैं। जनजातीय समुदायों के पास मौजूद रचनात्मक संपत्तियों का महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य है, जिसे यदि परंपरा के प्रति संवेदनशील रहते हुए सतत तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह नारंगी अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) को गति दे सकता है और इस इकोसिस्टम के तहत आय उत्पन्न करने वाली गतिविधियों का सृजन कर सकता है।

रचनात्मक अर्थव्यवस्था को दर्शाने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली नारंगी अर्थव्यवस्था, यूएनसीटीएडी (संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन) के अनुमान के अनुसार 2 ट्रिलियन डॉलर से 2.25 ट्रिलियन डॉलर के बीच है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 3.1% है। भारत में, जहाँ हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए ठोस डेटा मौजूद है, वहीं जनजातीय शिल्प और आजीविका के लिए डेटा की कमी है। हालांकि, रणनीतिक निहितार्थ स्पष्ट है: जनजातीय कला और शिल्प कुछ ऐसी ग्रामीण आजीविकाएं हैं, जो वैश्विक रचनात्मक वस्तुएँ की मांग से सीधे जुड़ सकती हैं यदि प्रामाणिकता, लॉजिस्टिक्स और गुणवत्ता प्रणाली मौजूद हों।

अनुमान है कि भारत की अनुसूचित जनजाति की आबादी 104 मिलियन है और कुल आबादी में इसकी हिस्सेदारी लगभग 8.6% है। लगभग 700 अलग-अलग जनजातीय समुदाय विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों में निवास करते हैं: जंगल, पहाड़, मैदान और सीमा क्षेत्र। इस विविधता का प्रत्यक्ष आर्थिक संबंध है। यह पारिस्थितिकी के अनुसार शिल्प विशेषज्ञता को प्रतिबिंबित करता है, जैसे जंगल वाले क्षेत्रों में बांस और छड़ी, खनिज क्षेत्रों में धातु और मिट्टी, और बुनाई गलियारों में वस्त्र परंपराएँ। इसके परिणामस्वरूप, भारत के जनजातीय क्षेत्र; एकल जनजातीय शिल्प क्षेत्र के बजाय “विविध अर्थव्यवस्थाओं” से युक्त हैं। इसलिए, नीति निर्माण क्षेत्रीय रूप से भिन्न होना चाहिए और “सभी के लिए उपयुक्त एक ही शिल्प योजना” नहीं होनी चाहिए। नीतियों को कच्चे माल की सीमाओं, डिज़ाइन और गुणवत्ता संबंधी मुद्दों और बाजार संबंधों को ध्यान में रखना चाहिए।

वर्तमान में, जनजातीय कला/हस्तशिल्प आजीविका इकोसिस्टम, कई मंत्रालयों और संस्थानों के कार्यादेशों से बना है, जो विभिन्न स्तरों पर एक-जैसे हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय इस इकोसिस्टम का मुख्य स्तंभ है और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक अवसंरचना में सुधार करता है और ट्राइफेड (भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ लिमिटेड) के माध्यम से बाजार-जुड़ाव की सुविधा देता है। ट्राइफेड एक प्रमुख बाजार संचालक के रूप में कार्य करता है। ट्राइफेड वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) का समर्थन करता है, जो खरीद और मूल्य संवर्धन के लिए जमीनी स्तर की इकाइयाँ हैं। ट्राइफेड, ट्राइब्स इंडिया आउटलेट और आदि महोत्सव/हाट्स के माध्यम से खुदरा विपणन करता है ताकि उत्पादकों को खरीदारों और संस्थागत भागीदारों से जोड़ा जा सके। वस्त्र मंत्रालय राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (एनएचडीपी) के माध्यम से हस्तशिल्प को बढ़ावा देता है और समग्र हथकरघा/हस्तशिल्प क्लस्टर विकास योजनाओं (सीएचसीडीएस) के माध्यम से क्लस्टर अवसंरचना को प्रोत्साहन देता है और कारीगरों के डेटाबेस को अद्यतन करता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) पारंपरिक उद्योग पुनरुत्थान निधि योजना (स्फूर्ति) के माध्यम से क्लस्टर पुनरुत्थान और बिक्री-योग्यता का समर्थन करता है, स्पष्ट रूप से आपूर्ति-संचालित मॉडल के बदले बाज़ार-संचालित मॉडल का उपयोग करता है और ई-कॉमर्स को एक माध्यम के रूप में महत्व देता है।

अनुभव से पता चलता है कि ग्रामीण आजीविका मूल्य-श्रृंखला चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ये कमजोर हैं, कारीगर सीधे बाजार से जुड़े नहीं होते हैं और मध्यस्थों पर अधिक निर्भर रहते हैं। ये कारक लाभ कम कर देते हैं तथा खराब भंडारण और एकत्रीकरण की वजह से अर्थव्यवस्था के विस्तार को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि हम विश्लेषण को कारीगर परिवारों के स्तर तक और गहराई से देखें, तो जो पैटर्न दिखाई देता है वह मिश्रित अर्थव्यवस्था का है। कारीगर शिल्प कार्य को सहायक या अंशकालिक रोजगार के रूप में देखते हैं, विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में, जहां कृषि मौसम-आधारित है या परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। इस परिस्थिति में, खराब ऋण पात्रता और उद्यम विकास, बाजार से जुड़ाव की कमी और व्यापारियों पर निर्भरता से आय प्रवाह अनियमित हो जाता है।

हालांकि, शिल्प कम पूंजी में घर पर उत्पादित किए जा सकते हैं, जिनमें उच्च लाभ की संभावना भी हो सकती है। शिल्प हस्तक्षेप अक्सर महिलाओं के रोजगार, आय और सौदेबाजी की शक्ति से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। मोटे अनुमान बताते हैं कि 7 मिलियन से अधिक कारीगरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 56% से 70% से अधिक हैं और हथकरघा क्षेत्र के बुनकरों में 72.29% महिलाएं हैं। कौशल हस्तांतरण अनौपचारिक होता है और आमतौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है। जनजातीय कला रूपों के लिए, जहां तकनीक और आख्यान में सांस्कृतिक अर्थ निहित होता है, वहाँ हस्तांतरण दोनों तरह का होता है—आर्थिक (कौशल) और सांस्कृतिक (प्रामाणिकता)।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के अंतर्गत तीन मौजूदा मॉडल मजबूत जुड़ाव के उपाय प्रदान करते हैं: वीडीवीके जैसी उत्पादनकर्ता समितियाँ, जो साझा अवसंरचना और संग्रहण प्रदान करती हैं; ट्राइब्स इंडिया स्टोर जो खरीदार से जोड़ने में मदद करते हैं और राज्य स्तर पर क्लस्टर विकास और कौशल उन्नयन के लिए सहकारी संस्थाएँ। उदाहरण के लिए, ओडिशा में 150 वीडीवीके कार्यरत हैं जिनकी कुल बिक्री ₹2,459.91 लाख है और जिसमें लगभग 40,000 जनजातीय उत्पादकों को एकीकृत किया गया है। जनजातीय विकास सहकारी निगम एक उच्च स्तरीय सहकारी संस्था है, जो जनजातीय उत्पादकों द्वारा तैयार किये गये वन और गैर-वन आधारित वस्तुओं के विपणन और ब्रांडिंग का कार्य करती है।

यह भारत के लिए एक मुख्य रणनीतिक सिफारिश को रेखांकित करता है: नारंगी अर्थव्यवस्था में जनजातीय कला/हस्तशिल्प को बेहतर क्षेत्रीय लेखांकन, लागू करने योग्य प्रामाणिकता/नैतिक व्यापार संरचना, और उत्पादक-संचालित वितरण की आवश्यकता है, जो मध्यस्थों के प्रभाव को कम करता हो। लघु-अवधि के लिए भारत ट्राइब्स फेस्ट जैसे त्योहारों को खरीद संभावना तथा उत्पाद कैटलॉग के मानकीकरण और डिजिटलीकरण के रूप में देखा जाना चाहिए एवं राष्ट्रीय एसटी वित्त विकास निगम और पीएम विश्वकर्मा जैसी योजनाओं के माध्यम से ऋण समर्थन को खरीदार आदेशों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। हालांकि, दीर्घ-अवधि के लिए सरकार को एक जनजातीय रचनात्मक अर्थव्यवस्था उपग्रह विवरण बनाने, निर्यात स्तर की अनुपालन और ब्रांड संरचना स्थापित करने और जनजातीय कला के लिए भारत-उपयुक्त नैतिक व्यापार संहिता तैयार करने पर विचार करना होगा। इन उपायों के माध्यम से, जनजातीय नारंगी अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों से उभरकर विकसित भारत @2047 की यात्रा में शामिल हो जाएगी।