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भारत ने कैसे किया होर्मुज संकट का मुकाबला : हरदीप सिंह पुरी  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब फरवरी के अंत में होर्मुज की खाड़ी बंद हुई, तो भारत सरकार ने एक प्राथमिकता का चयन किया – हमारे देश के नागरिकों, विशेष रूप से सबसे कमजोर समुदायों, को अभूतपूर्व आपूर्ति और मूल्य व्यवधानों से सुरक्षित रखना। इस प्राथमिकता के आस-पास ही अन्य प्रयास किये जाने थे। यह भावना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थी और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा व्यवधान के लगभग चार महीनों तक बनी रही। 

तथ्यों के पता चलने से पहले ही भारत को लेकर निर्णय किये जा रहे थे: तर्क यह था कि एक ऐसा देश, जो अपने  कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, होर्मुज के बंद होने से संभल नहीं पायेगा, जिससे होकर दुनिया का 20-30% से अधिक हाइड्रोकार्बन गुजरता है। पेट्रोल पंप में कुछ ही दिनों में तेल ख़त्म हो जाएगा, कीमतें आसमान छुएंगी (जैसे कि कई अन्य देशों में हुआ) और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आज स्टॉक भरे हुए हैं, पंप खुले हैं, और भारतीय उपभोक्ता ने इस संकट के दौरान ऊर्जा के लिए दुनिया के किसी भी अन्य उपभोक्ता की तुलना में कम भुगतान किया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे कैसे किया गया और इससे गलत आख्यानों को जवाब भी मिल जाएगा।

28 फरवरी को ईरान पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर सबसे महत्वपूर्ण मार्ग-खंड बंद हो गया और एलपीजी आपूर्ति ने भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश की, क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका और मध्य पूर्व ही प्रमुख एलपीजी निर्यातक हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी पहले मध्य पूर्व से आती थी और यह आपूर्ति तुरंत लगभग शून्य हो गई। फिर आपूर्ति और मांग, दोनों को लेकर एक युद्धकक्ष ऑपरेशन शुरू हुआ, हर कार्गो, हर रिफाइनरी, हर बॉटलिंग प्लांट की निगरानी की गयी, ताकि पूरे देश के सभी रसोईघरों में खाना पकाने के लिए आग जलती रहे।

आपूर्ति के संबंध में, 8 मार्च को एलपीजी नियंत्रण आदेश पारित किया गया, जिसके तहत सभी रिफाइनरियों को अपना एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए सभी सी3-सी4 कार्बन स्ट्रीम को बदलने का निर्देश दिया गया। जो रिफाइनरी कभी कुकिंग गैस नहीं बनाती थीं, बदलाव किया गया और उत्पादन 35  टीएमटी प्रति दिन से बढ़कर 54 टीएमटी प्रति दिन हो गया। युद्ध की सर्वाधिक विभीषिका के दौरान, जब होर्मुज से कोई भी जहाज बाहर नहीं निकल रहा था, तब 12 से अधिक भारतीय एलपीजी जहाजें चुपचाप होर्मुज से बिना कोई टोल दिए निकाल दी गईं – किसी भी देश के लिए यह सबसे बड़ी संख्या थी। कार्गो सुरक्षित किए गए तथा यानबू और फुजैरा बंदरगाहों से लाल सागर रास्ते के जरिए कार्गो जहाज-से-जहाज स्थानांतरित किये गये। अमेरिका से कार्गो को सुरक्षित करने की स्थिति में भी खाली जहाज भेजे गए, नए माल लेने के लिए जहाज हॉर्मुज के अंदर भेजे गए तथा अल्जीरिया, जापान और कनाडा जैसे कई देशों के साथ नई आपूर्ति व्यवस्था शुरू की गयी। मैंने हर उस देश के ऊर्जा मंत्री से कई बार बात की, जो एलपीजी निर्यात कर सकता था। मैं यह बात कहना चाहता हूँ कि खाड़ी क्षेत्र के अंदर या बाहर का हर उत्पादक, जिसके साथ हमने व्यापार किया, हमारे साथ खड़ा रहा। 

हालांकि, आपूर्ति प्रयास का केवल आधा हिस्सा था, क्योंकि मांग को भी प्राथमिकता देना जरूरी था। घरों में जाने वाला रसोई गैस पूरा सुरक्षित रखा गया और इस कीमती आपूर्ति को काले बाज़ारियों से बचाने के लिए डिजिटल सत्यापन कोड अनिवार्य किया गया। हर नागरिक को उनके ज़रूरत के समय सिलेंडर मिलें, लेकिन कोई भी सिलेंडर जमा न कर सके, इसके लिए 25 दिन और 45 दिन की सीमा लगाई गई। चूँकि, वाणिज्यिक सिलेंडरों को नियंत्रित नहीं किया जाता और कोई भी खरीदार उपलब्ध पूरी आपूर्ति एक साथ खरीद सकता था, इसलिए इन्हें उद्योग संघों और राज्य नागरिक आपूर्ति विभागों के माध्यम से भेजा गया, ताकि हर किसी को पर्याप्त मिले और कोई भी जमा न कर सके। उद्योग को पाइप प्राकृतिक गैस अपनाने के लिए कहा गया, बड़े रसोईघरों और प्रतिष्ठानों को अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जहाँ संभव था और घरेलू पाइप गैस और सीएनजी को बिना कटौती वाले वर्ग में रखा गया। सरकार के सभी विभागों ने मिलकर नगर निगम की शीघ्र मंज़ूरी के ज़रिए पाइप गैस कनेक्शनों की ओर बदलाव को संभव बनाया। कई उपभोक्ता, जिनमें प्रवासी भी शामिल थे, एजेंट से सिलेंडर खरीदते थे, जो अब डीएसी की शर्तों के कारण सिलेंडर नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पूरे देश में 5 किलो का मुफ्त व्यापार सिलेंडर उपलब्ध कराया गया, जब तक इसका इस्तेमाल लगभग दोगुना नहीं हो गया। लोगों में भय पैदा करने वाले और खराब स्थिति बताने वाले झूठी अफवाहें फैलाने लगे और झूठे वीडियो शेयर करने लगे ताकि कमी, घबराहट और अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके, जबकि सरकार हर दिन युद्धकक्ष मोड में कई क्रांतिकारी कदम उठा रही थी, ताकि देश में किसी भी जगह आपूर्ति में बाधा न आये।

इस सब के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का दृढ़ संकल्प था – भारतीय नागरिक को सुरक्षा दी जायेगी चाहे खजाने पर कितना भी बोझ क्यों न पड़े —रूस-यूक्रेन संघर्ष और जीवन को संकट में डालने वाली कोविड चुनौती से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौरान यही ‘भारत की राह’ रही है। फरवरी और जून के बीच, रसोई गैस के अंतरराष्ट्रीय मानक, सऊदी सी पी, में लगभग 50% की वृद्धि हुई, और फिर भी, उस आयात दर पर ₹1,600 से अधिक की कीमत वाला सिलेन्डर उज्ज्वला घर तक ₹642 में पहुँचा। मोदी सरकार हर उज्ज्वला सिलेंडर पर लगभग ₹900 का और हर अन्य घर के लिए जाने वाले सिलेंडर पर करीब ₹600 का नुकसान उठाती है, आज सभी भारतीय परिवार अपने रसोई गैस के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन या फ्रांस के घरों की तुलना में बहुत कम भुगतान कर रहे हैं।

मार्च में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती का साहसिक निर्णय लिया गया, जिससे कीमत-वृद्धि में कमी आयी, जबकि कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी हो गयी थी और सरकारी तेल कंपनियों ने इस तिमाही में हर दिन 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाया। इसी अवधि में, अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 40% से अधिक और ब्रिटेन में करीब 20% बढ़ी, जबकि यूरोप के बड़े हिस्से में भी दहाई अंक की वृद्धि हुई, लेकिन भारत में कीमत में लगभग 7% की ही वृद्धि हुई।

एक और कहानी यह थी कि पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, विदेशी भंडार ख़त्म हो जाएंगे और हमारी आर्थिक संभावनाएँ धुंधली हो जाएंगी। भंडार खुद जवाब देते हैं, जो लगभग 690 बिलियन डॉलर के करीब है। यह संघर्ष शुरू होने के सप्ताह में रिकॉर्ड किये गये उच्चतम दर से केवल थोडा कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है।

यह कहा गया कि भारत के पास केवल 8 या 9 दिन का भंडार है और उसके पास ज्यादा भंडार रखने की वास्तविक क्षमता नहीं है, यह दावा 1.5 बिलियन लोगों वाली बड़ी ऊर्जा अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को गलत रूप में समझता है। आप किसी देश को कुछ गुफाओं से नहीं चला सकते, क्योंकि जमीन के भीतर रखी गई ऊर्जा से कुछ भी कमाई नहीं होती और उसे रखने में बहुत ज़्यादा खर्च भी आता है। इसके बजाय आप इसे इम्पोर्ट टर्मिनल, डिपो, पाइपलाइन, रिफाइनरी और पूरे देश में फैले स्टोरेज के सिस्टम के जरिए चलाते हैं, और आज भारत के पास 24 रिफाइनरी हैं, 47,000 किलोमीटर से ज्यादा तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, और 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं जो प्रतिदिन करीब 8 करोड़ लोगों की सेवा करते हैं।

उस प्रणाली की वास्तविकता की जांच, महाप्रलय का भय दिखाने वाले किसी भविष्यवक्ता की स्लाइड पर दिखाए गए आंकड़े से नहीं होती। असली जांच है – आधुनिक समय के सबसे बड़े ऊर्जा संकट के लगभग चार महीने गुजर जाने के बाद, क्या देश को अपने लोगों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी, क्या ईंधन सिर्फ सम-विषम नंबर प्लेट्स के हिसाब से देना पड़ा, क्या घर में ऑफिस बनाना पड़ा या क्या हर दिन 5 बजे अपने पंप बंद करने पड़े। भारत को इनमें से कोई काम नहीं करना पड़ा। यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पिछले कई सालों में इसकी तैयारी की गई थी। हमारे कच्चे तेल के बास्केट को 27 देशों से बढ़ाकर 41 करना, हमारे आयात टर्मिनल को दुगना करना, और प्रधानमंत्री मोदी के तहत एक दशक में बनाए गए पाइपलाइन और भंडार, होर्मुज के बंद होने पर ये सभी चीजें उपयोगी साबित हुईं; यही वजह थी कि रोशनी जलती रही।

इस स्तर का संकट एक देश को उसकी असली क्षमता दिखाता है। भारत ने होर्मुज के बंद होने की बाधा पार की और देश में कहीं भी बिना किसी कमी के आपूर्ति जारी रही। इस अनुभव से सीख लेकर, हम अपनी ऊर्जा सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त क्षमताओं का निर्माण करेंगे, लेकिन जब इस संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक पंक्ति मौजूद रहनी चाहिए: मानव स्मृति का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट हमारे तटों तक पहुंचा, लेकिन 150 करोड़ भारतीय नागरिक सुरक्षित रहे।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)  

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*मध्य पूर्व में बदलती स्थिति के बीच भारत पूरी तरह तैयार – ऊर्जा आपूर्ति मजबूत*

*कच्चे तेल और पेट्रोलियम की विविधीकृत खरीद; 24×7 नियंत्रण कक्ष द्वारा आपूर्ति स्थिति की निगरानी*

नई दिल्ली, 3 मार्च 2026: मध्य पूर्व में उथल-पुथल की स्थिति और वैश्विक ऊर्जा स्थिति में हो रहे बदलावों को ध्यान में रखते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी ने मौजूदा परिस्थितियों में देश की तैयारियों के बारे में मीडिया को अवगत कराया।

जानकारी के अनुसार-भारत वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों का तीसरा सबसे बड़ा आयातक, चौथा सबसे बड़ा शोधक और पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है। देश में कच्चे तेल और पेट्रोल, डीजल और एटीएफ सहित प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार है, जिससे मध्य पूर्व से उत्पन्न होने वाली अल्पकालिक समस्याओं का निदान किया जा सके।

यह भी बताया गया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाकर अपनी आबादी के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और सामर्थ्य सुनिश्चित की है। भारतीय ऊर्जा कंपनियों के पास अब ऐसे ऊर्जा स्रोतों तक पहुंच है जो होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर नहीं गुजरते। ऐसे कार्गो उपलब्ध रहेंगे और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के दौरान आपूर्ति में अस्थायी रूप से होने वाली रुकावटों को दूर करने में मदद करेंगे।

देश भर में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति और स्टॉक की स्थिति पर लगातार नज़र रखने के लिए मंत्रालय ने 24×7 नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है। वर्तमान में, सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक है। भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। लगातार निगरानी के आधार पर, सरकार को उम्मीद है कि यदि आवश्यक हुआ तो स्थिति को और सुधारने के लिए चरणबद्ध तरीके अपनाए जा सकते हैं।