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भूमिगत संरचना की सटीक जानकारी से बदलेगा भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, ICAR की ‘मृदा आसूचना’ बनी नई ताकत

एम.एल. जाट और एन.जी. पाटिल

भारत अभूतपूर्व और ऐतिहासिक गति से अपने डिजिटल, फिजि़कल (भौतिक) और फिजिटल (फिजिकल+डिजिटल) भविष्य का निर्माण कर रहा है। देश हर वर्ष औसतन 4.5 लाख से अधिक रूट किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर केबल नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, जबकि साथ ही लगभग 11,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और 6,500 किलोमीटर रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण किया जा रहा है और हर वर्ष लगभग 5,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक जोड़े जा रहे हैं। इस व्यापक विस्तार का अर्थ है कि देशभर में डिजिटल कनेक्टिविटी के 22.8 लाख किलोमीटर के आश्चर्यजनक विस्तार वाले बहुवर्षीय राष्ट्रीय विस्तार के साथ-साथ, देश प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर राजमार्ग और 12 से 15 किलोमीटर नई रेल लाइनों का निर्माण कर रहा है। फिर भी, जैसे-जैसे ये विस्तृत परिवहन गलियारे, अल्ट्रा-मेगा सौर पार्क और विशाल डिजिटल नेटवर्क विस्तार पा रहे हैं, कृषि विज्ञान के नेतृत्व में एक शांत तकनीकी सहयोग भूमि की सतह के ठीक नीचे हो रहा है।

बड़े परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वालों को अक्सर पहले से मिट्टी की खुदाई की लागत का अनुमान तैयार करना पड़ता है, भले ही पहले से कोई भूवैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध न हो। चूंकि परियोजनाओं की निविदा प्रक्रिया की समय-सीमा बहुत कम होती है, इसलिए त्वरित और विश्वसनीय मृदा संबंधी आंकड़े इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं—विशेषकर तब, जब परियोजना भारत के बाहर स्थित हो और स्थानीय भू-भाग संबंधी आंकड़ों तक पहुंच कठिन हो। इसके अलावा, बोली जीतने के बाद, परियोजना क्रियान्वयन-कर्ताओं को बार-बार आने वाली करोड़ों रुपये की समस्या का सामना करना पड़ता है: नरम मिट्टी में आसानी से खुदाई करते हुए इंजीनियरिंग दल अचानक भूमिगत चट्टान की कठोर दीवार से टकरा जाता है, या भ्रामक काली कपास मिट्टी पर बनाई गई नई सड़क में दरारें पड़ने लगती हैं और वह उखड़ने लगती है। काम रुक जाता है, मशीनरी बेकार खड़ी रहती है और परियोजना की लागत आसमान छूने लगती है। इस महत्वपूर्ण सूचना अंतराल को पाटने के लिए, नागपुर स्थित आईसीएआर–राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी प्रतिमान विकसित किया है: मृदा आसूचना-आधारित पूर्वानुमानात्मक इंजीनियरिंग। दशकों से उपलब्ध मृदा विज्ञान संबंधी आंकड़ों को उन्नत मशीन लर्निंग के साथ जोड़कर, आईसीएआर बुनियादी ढांचा योजनाकारों को जमीन में पहली फावड़ी लगने से पहले ही पृथ्वी के बारे में “एक्स-रे दृष्टि” प्रदान कर रहा है—यह सिद्ध करते हुए कि कृषि अनुसंधान खेतों से कहीं आगे राष्ट्रीय विकास का एक आधारभूत चालक है।

गति और विस्तार की अनदेखी की गई चुनौतियां

भारत में वर्तमान अवसंरचना विस्तार की अत्यधिक तीव्र गति के कारण पारंपरिक नियोजन स्वयं एक बाधा बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल डिजिटल फुटप्रिंट लगभग 19.35 लाख रूट किलोमीटर से बढ़कर 42.36 लाख रूट किलोमीटर से अधिक हो गया है, जो कई वर्षों में हुए व्यापक विस्तार को दर्शाता है। इसी हालिया पांच-वर्षीय अवधि में, देश ने 57,125 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया है। इसी दौरान, भारतीय रेलवे ने 33,000 से अधिक रूट किलोमीटर का विद्युतीकरण किया है, जो औसतन लगभग 6,600 किलोमीटर प्रतिवर्ष है और ब्रॉड गेज नेटवर्क के विद्युतीकरण को लगभग 99.6% तक पहुंचाता है, जिसकी दर प्रतिदिन 15 से अधिक रूट किलोमीटर के विद्युतीकरण की है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में, भारत ने अपनी प्रमुख सौर योजना के तहत 54 से 56 बड़े पैमाने के सौर पार्कों को मंजूरी दी है, जिनकी स्वीकृत क्षमता लगभग 39.5 गीगावाट है, जिससे 100 से अधिक सार्वजनिक और निजी पार्कों में कुल ग्राउंड-माउंटेड सौर क्षमता 122 गीगावाट से अधिक हो गई है।

इन विशाल कार्यों में शामिल कई सरकारी और निजी एजेंसियां—चाहे वे भूमिगत संचार लाइनों को बिछाने, विद्युत पारेषण टावर खड़े करने या विशाल सौर संरचनाओं को आधार प्रदान करने का काम कर रही हों—सटीक भूमिगत आंकड़ों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं। फिर भी, पारंपरिक प्रारंभिक भू-तकनीकी सर्वेक्षण में काफी समय और लागत लगती है। चूँकि, परियोजनाएं इतनी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, ये महत्वपूर्ण मृदा जांच अक्सर छोड़ दी जाती हैं या सीमित कर दी जाती हैं। इसका परिणाम? अनिश्चित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), भ्रामक लागत अनुमान और बोलीदाताओं के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम।

कृषि-अवसंरचना संबंध

आईसीएआर-एनबीएसएस एवं एलयूपी ने इस सूचना-अंतराल को एक प्रमाणित, समय-परीक्षित प्रौद्योगिकी के माध्यम से दूर किया है, जो पूरे भारत और कई अन्य देशों में काम करती है। उपग्रह रिमोट सेंसिंग और मशीन लर्निंग का उपयोग करके, आईसीएआर स्थल-विशिष्ट भू-तकनीकी मृदा गुणों, जैसे मृदा की गहराई, अंतिम वहन क्षमता (सिविल इंजीनियरिंग संरचना को सहारा देने में निर्णायक कारक), स्‍थूल घनत्व आदि का पूर्वानुमान लगाता है, जिसके लिए भूमि की धीमी, महंगी और विघटनकारी ड्रिलिंग की आवश्यकता नहीं होती।

यह पद्धति पूरी तरह स्वचालित पाइपलाइन के अंतर्गत बहु-स्रोत भू-स्थानिक इनपुट पर मशीन-लर्निंग रिग्रेशन मॉडल का उपयोग करती है। उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन मॉडल, भू-भाग की ढलान संबंधी व्युत्पन्न आंकड़ों, लिथोलॉजी और भूजल स्तर को संसाधित करके, आईसीएआर का मृदा वर्गीकरण इंजन सटीक, स्थल-विशिष्ट पूर्वानुमान तैयार करता है। यह प्रणाली मृदा की गहराई (नरम, कठोर या मिश्रित परतों की गहराई) और अन्य मापदंडों का सटीक पूर्वानुमान लगाती है। इन मापदंडों का उपयोग इंजीनियरिंग एजेंसियों द्वारा प्रारंभिक भू-तकनीकी डिजाइन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और बोली-पूर्व लागत अनुमान के लिए सीधे किया जाता है।

पारंपरिक क्षेत्र सर्वेक्षणों की तुलना में, यह डिजिटल समाधान लागत और समय दोनों में 75% की कमी करता है। तीन सदस्यों की एक छोटी टीम प्रतिदिन लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे मार्ग को संसाधित कर सकती है, जिससे यह बड़े पैमाने पर, समयबद्ध राष्ट्रीय नियोजन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बन जाता है। भारतभर में 50,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में इस पूर्वानुमानात्मक दृष्टिकोण का सत्यापन करने के बाद, क्षेत्र में सत्यापित आंकड़ों के मुकाबले लगभग 80% की पूर्वानुमान सटीकता (R² मान लगातार 0.78 से अधिक) प्राप्त हुई है, यहां तक कि कम आंकड़ों वाले क्षेत्रों में भी। अब इन परिकलन विधियों (एल्गोरिदम) को मानकीकृत कर दिया गया है।

वैश्विक उपस्थिति और वाणिज्यिक विश्वसनीयता

इस प्रणाली का भारत के अत्यंत विविध भौगोलिक क्षेत्रों में कठोर क्षेत्र-परीक्षण किया गया है—उत्तराखंड और असम के हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर राजस्थान के थार मरुस्थल तथा दक्कन के पठार और सिंधु-गंगा के मैदानों तक। क्षेत्रीय आंकड़ों के आधार पर मानकीकृत की गई यह प्रौद्योगिकी अब राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है। प्रमुख सार्वजनिक और निजी अवसंरचना कंपनियां भारत और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में 2,00,000 से अधिक रूट-किलोमीटर का मानचित्रण करने के लिए इस प्रणाली को अपना चुकी हैं, जिससे आईसीएआर के अनुसंधान पारितंत्र के लिए संसाधन जुटाने के साथ-साथ बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत भी हो रही है और भारतीय कंपनियों को आगे बढ़ने तथा वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाया जा रहा है।

अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड, टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और केईसी इंटरनेशनल लिमिटेड सहित प्रमुख वैश्विक अवसंरचना कंपनियों ने इस समाधान को अपनाया है। केईसी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी, जो 100 से अधिक देशों में पारेषण लाइनों को डिजाइन और इनका निर्माण करती है, के लिए मृदा संबंधी आंकड़े वित्तीय अस्तित्व के लिए एक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। नींव संबंधी गतिविधियां और परियोजना जोखिम पूरी तरह से मृदा के प्रकार पर निर्भर करते हैं। ऐसे उद्योग में जहां 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व आधार पर मार्जिन में मामूली 0.1% की कमी भी 6 करोड़ रुपये के वार्षिक नुकसान में बदल जाती है, सटीक मृदा आसूचना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, नाइजर, रूस, केन्या, मोरक्को, मोल्दोवा, मैक्सिको, मलेशिया, अबू धाबी, नेपाल, बांग्लादेश और ट्यूनीशिया जैसे भौगोलिक रूप से जटिल देशों में पारेषण लाइन परियोजनाओं के लिए बोली लगाते समय, मृदा संबंधी आंकड़ों की कमी या वास्‍तविक स्थिति का निष्‍पक्ष/सही प्रतिनिधित्‍व न करने वाले आंकड़े लाभप्रदता को प्रभावित कर सकते हैं। आईसीएआर की प्रौद्योगिकी विश्वसनीय तृतीय-पक्ष सत्यापन प्रदान करती है, जो ग्राहकों या परियोजना प्रबंधकों द्वारा मृदा की स्थिति के संबंध में किए गए दावों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्यापनकर्ता के रूप में कार्य करती है, जिससे बोली लगाने में विश्वास बढ़ता है। छोटी लागत वाली निविदाओं के मामले में, जहां समय या वित्तीय सीमाओं के कारण भौतिक सर्वेक्षण संभव नहीं होते, यह पूर्वानुमानात्मक आंकड़ा इस कमी को पूरा करता है।

राष्ट्रीय प्रगति की प्रेरक

इस आंकड़े और विश्लेषण की सफलता ने अवसंरचना क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को आईसीएआर की प्रौद्योगिकी को विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों में व्यापक रूप से लागू करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे इसकी उपयोगिता विद्युत पारेषण लाइनों से आगे बढ़कर रेलवे, सौर ऊर्जा प्रतिष्ठानों और भूमिगत केबलिंग तक विस्तृत हो गई है।

उन्नत मृदा विज्ञान का उपयोग करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निर्माण गलियारों के जोखिम को कम करते हुए, कृषि अनुसंधान ने स्वयं को भारत की व्यापक आर्थिक वृद्धि के एक अपरिहार्य चालक के रूप में सिद्ध कर दिया है। यह प्रौद्योगिकी दर्शाती है कि मृदा विज्ञान में निवेश केवल देश का पेट नहीं भरता, बल्कि उसके वैश्विक भविष्य की आधारशिला भी तैयार करता है। इस सफलता के आधार पर, आईसीएआर के वैज्ञानिक अब 90 मीटर रिजॉल्यूशन वाले मृदा गहराई मानचित्र और हाल ही में इसी रिजॉल्यूशन वाले मृदा बनावट मानचित्र जैसे पूर्वानुमानात्मक डिजिटल मृदा मानचित्र भी आत्मविश्वास के साथ तैयार कर रहे हैं। ये मानचित्र निकट भविष्य में भारत को डिजिटल कृषि की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाएंगे, विशेष रूप से भारत के किसानों को भूखंड-विशिष्ट समाधान उपलब्ध कराने में।

(लेखक एम.एल. जाट कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक हैं, एन.जी. पाटिल आईसीएआर-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस एवं एलयूपी), नागपुर के निदेशक हैं)

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राष्ट्रीय पोषण माह 2026 शुरू, ‘हमारी आंगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी’ बना थीम

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी

2047 का विकसित भारत उन बच्चों के हाथों से बनेगा, जो अभी स्कूल की दहलीज तक भी नहीं पहुँचे हैं। स्वस्थ और सक्षम बनने की उनकी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण नींव जीवन के पहले एक हजार दिनों में ही रखी जाती है। करोड़ों भारतीय बच्चों और माताओं के लिए इस सफर का भरोसेमंद सहारा उनके आसपास ही मौजूद है—आँगनवाड़ी।

स्कूल जाने से बहुत पहले बच्चे का वजन और लंबाई आँगनवाड़ी में मापी जाती है। वहीं उसे गरम पका भोजन और घर के बाहर की दुनिया से जुड़ने का पहला अवसर मिलता है, और गर्भवती माँ को पोषण से जुड़ी पहली सलाह भी। देशभर के लगभग 14 लाख आँगनवाड़ी केंद्र 8.9 करोड़ से अधिक बच्चों, महिलाओं और किशोरियों तक पहुँच रहे हैं, और इन्हें चलाने वाली 25.2 लाख कार्यकर्ता व सहायिकाएँ उसी समाज से आती हैं, जिसकी वे सेवा करती हैं। आँगनवाड़ी हमारे समाज से अलग कोई व्यवस्था नहीं, हमारे अपने पड़ोस का हिस्सा है।

मार्च 2018 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पोषण अभियान की शुरुआत कर इसी परिचित व्यवस्था को देशव्यापी जनआंदोलन की मजबूत नींव बनाया। तब से हर सितंबर राष्ट्रीय पोषण माह और हर मार्च पोषण पखवाड़ा पोषण का संदेश देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का माध्यम बने हैं।

इस वर्ष 9वाँ राष्ट्रीय पोषण माह 9 सितंबर 2026 से “हमारी आँगनवाड़ी, हमारी ज़िम्मेदारी” थीम के साथ शुरू हो रहा है। गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है और इस दिशा में हमारा संकल्प मजबूत है। साथ ही, इन सेवाओं का प्रभाव तब और बढ़ता है, जब समुदाय आँगनवाड़ी को अपना मानता है। प्रधानमंत्री जी ने भी कहा है कि विकसित भारत का निर्माण सबके प्रयास से होगा।

लाभार्थी से भागीदार तक

इस वर्ष सामुदायिक भागीदारी को एक व्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आँगनवाड़ी प्रबंधन समितियाँ माता-पिता, पंचायत प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूहों को केंद्र के संचालन से जोड़ती हैं। वे देख सकते हैं कि बच्चों को क्या परोसा जा रहा है, हर हकदार बच्चे तक सेवाएँ पहुँच रही हैं या नहीं, और केंद्र को बेहतर बनाने के लिए किस सहयोग की आवश्यकता है। इसे प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है—सोशल ऑडिट, जो समुदाय को अपनी आँगनवाड़ी की समीक्षा करने और सामने आने वाली बातों के आधार पर सुधार की दिशा तय करने का अवसर देता है। जिस केंद्र से बच्चों और माताओं का जीवन जुड़ा है, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में उन्हीं परिवारों की भागीदारी सबसे स्वाभाविक है।

इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में माँ है, और उसके हाथ में पारदर्शिता का सरल माध्यम है—मेन्यू बोर्ड। हर केंद्र पर लगा यह बोर्ड गरम पके भोजन और टेक-होम राशन का दिन-वार विवरण परिवारों के सामने रखता है। जब एक माँ जानती है कि उसके बच्चे को क्या मिलना चाहिए और केंद्र के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करती है कि उसे तय मात्रा और गुणवत्ता के अनुसार भोजन मिले, तो पारदर्शिता रोजमर्रा की व्यवस्था बन जाती है।

पोषण माह 2026 इसी भागीदारी को जमीन पर उतारने का अवसर है। जहाँ प्रबंधन समितियाँ गठित नहीं हुई हैं, वहाँ उनका गठन किया जाएगा; जहाँ मौजूद हैं, वहाँ उनकी पहली बैठकें और सोशल ऑडिट होंगे। हर केंद्र पर मेन्यू बोर्ड लगेगा। तिथि भोज और स्वस्थ व्यंजनों के प्रदर्शन जैसे आयोजन परिवारों, पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों को आँगनवाड़ी के और करीब लाएँगे।

मेन्यू बोर्ड से आगे

आँगनवाड़ी सेवाओं की पहली कसौटी है—पौष्टिक भोजन, जो संतुलित और विविधतापूर्ण भी हो: अनाज और श्री अन्न, दालें, मेवे और बीज, दूध और दुग्ध उत्पाद, अंडा, मौसमी फल तथा हरी सब्जियाँ। इसी दिशा में जुलाई में जारी पूरक पोषण कार्यक्रम के व्यापक दिशानिर्देश, 2026 महत्वपूर्ण कदम हैं, जिनमें पहली बार गरम पके भोजन का स्वरूप स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के पोषक मानकों को और मजबूत किया गया है।

भोजन के साथ बच्चे के शुरुआती विकास और सीखने पर भी उतना ही ध्यान जरूरी है। बच्चा क्या खाता है और कैसे सीखता है—दोनों गहराई से जुड़े हैं। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले तीन वर्षों में विकास के 34 पड़ावों पर नजर रखती हैं, और नवचेतना तथा आधारशिला जैसे पाठ्यक्रम बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करते हैं।

यह यात्रा जन्म से भी पहले शुरू होती है—गर्भावस्था में माँ का पोषण बच्चे के जीवन की शुरुआत को भी प्रभावित करता है। इसी संदर्भ में इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके पीछे भावना यही रही है कि किसी महिला को गर्भावस्था के दौरान अपनी आजीविका और अपने स्वास्थ्य के बीच चुनाव न करना पड़े। इन दस वर्षों में 4.65 करोड़ लाभार्थियों तक ₹21,511 करोड़ सीधे उनके बैंक खातों में पहुँचे हैं। मिशन शक्ति के तहत यह योजना अब दूसरी संतान के रूप में बेटी के जन्म पर अतिरिक्त लाभ भी देती है।

सहायता का प्रभाव तब कई गुना बढ़ जाता है, जब वह अकेले नहीं, बल्कि निरंतर परामर्श और सहयोग के साथ पहुँचती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी इसी तथ्य को रेखांकित किया है कि नकद सहायता अपना पूर्ण उद्देश्य तभी सिद्ध करती है, जब उसके साथ ऐसा परामर्श भी जुड़ा हो, जो परिवार को सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाए। सर्वेक्षण में राजस्थान के “कैश प्लस” मॉडल का उल्लेख है, जिसमें नकद सहायता के साथ सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संवाद को योजना का अभिन्न अंग बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि सहायता राशि को भोजन पर व्यय करने वाली महिलाओं का अनुपात 30 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया, और जैसे-जैसे पति तथा परिवार के अन्य सदस्य इस संवाद से जुड़ते गए, मातृ पोषण से जुड़ी भ्रांतियाँ भी दूर होती गईं। शिशु का पोषण केवल माँ की जिम्मेदारी नहीं—इसमें परिवार, समुदाय और व्यवस्था, सभी की भूमिका है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का सम्मान

इस पूरे प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आँगनवाड़ी कार्यकर्ता है। सामुदायिक भागीदारी का उद्देश्य उसका दायित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे सहयोग और सम्मान देना है। स्थानीय परिवारों की जो समझ और भरोसा उन्होंने वर्षों में बनाया है, वह इस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। जब कार्यकर्ता के साथ समुदाय खड़ा होता है, तो आँगनवाड़ी की ताकत कई गुना बढ़ जाती है।

इस सितंबर, मैं हर नागरिक से अपील करती हूँ कि वह अपने क्षेत्र की कम से कम एक आँगनवाड़ी अवश्य जाए। कार्यकर्ता से बात कीजिए, मेन्यू बोर्ड पढ़िए, बच्चों को मिल रही सेवाओं के बारे में जानिए—और सबसे महत्वपूर्ण, पूछिए कि आप क्या सहयोग कर सकते हैं।

इस सितंबर जिन बच्चों का वजन आँगनवाड़ी केंद्रों में लिया जा रहा है, वे 2047 में लगभग बीस-पच्चीस वर्ष के होंगे। वे जिस स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और क्षमता के साथ देश के विकास में योगदान देंगे, उसकी नींव आज रखी जा रही है। जब हर समुदाय अपनी आँगनवाड़ी को अपनी ज़िम्मेदारी मानकर उसके साथ खड़ा होता है, तब हर बच्चे का भविष्य और मजबूत होता है।

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(लेखिका भारत सरकार में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं)

भारत की 7.8% विकास दर पर सवाल और जवाब: आर्थिक मजबूती के पीछे क्या है?

डॉ. सौरभ गर्ग और डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन

अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन और अरविंद सुब्रमण्यन ने यह पूछा है कि जिस तिमाही में ऊर्जा के क्षेत्र में जोरदार झटके लगे हों, उसमें भारत की विकास दर आखिर 7.8 प्रतिशत कैसे हो सकती है। बेशक, यह एक उचित सवाल है। इसका एक जवाब भी है और वह जवाब पिछले कुछ वर्षों से सबके सामने ही है। 

समय से ही शुरुआत करते हैं। इस तिमाही की अवधि अप्रैल से जून 2026 तक थी। इससे ठीक पहले ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इजराइल के बीच का संघर्ष चरम पर पहुंच गया था। तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और भारत ने इसका असर महसूस किया। हालांकि मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस जबरदस्त व्यवधान में कमी आई। मई आते-आते दबाव के बदल छंट गए। जून तक, मुश्किल दौर बीत चुका था। तीन महीने वाली तिमाही की शुरुआत के कुछ मुश्किल हफ्ते उस तिमाही के आंकड़ों को मनगढ़ंत नहीं बना देते।

उन महीनों के सबूत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। ऑटोमोबाइल की बिक्री में निरंतर बढ़ोतरी हुई। एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की मदद से बैंक ऋण और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। जीएसटी की दरों में कटौती के बावजूद, इसका संग्रह मजबूत बना रहा और हाल ही समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में इसमें 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2025-26 तक के तीन वर्षों में, जीएसटी के सकल संग्रह में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ‘नॉमिनल जीडीपी’ में 31.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये दोनों आंकड़े बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं और दोनों ही लगभग एक-दूसरे से मेल खाते हैं। जीएसटी रिटर्न कंपनियां दाखिल करती हैं। ऋण संबंधी आंकड़े बैंकों से आते हैं। व्यापार के आंकड़े  बंदरगाहों से आते हैं। इनमें से कोई भी आंकड़ा सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा तैयार नहीं किया जाता है।

अर्थव्यवस्था आखिर टिकी क्यों रही? क्योंकि कई सुधारों को एक साथ अपनाया गया। वर्ष 2022-23 के बाद से केन्द्र सरकार का पूंजीगत व्यय 65 प्रतिशत बढ़ा है और इस वर्ष इसमें 11.5 प्रतिशत और बढ़ोतरी का बजट रखा गया है। एक दशक में बनाई गई सड़कें, बंदरगाहें और बिजली संयंत्र तेल के महंगे होने पर ठप्प नहीं पड़े। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अनौपचारिक गतिविधियों के एक बड़े हिस्से को औपचारिक बनाया और उन्हें मापी जा सकने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल किया है। दिवाला संहिता ने डूबे हुए कर्ज (बैड डेट) से निपटने के बैंकों और कंपनियों के तौर-तरीकों को बदल दिया। रियल एस्टेट कानून ने उस सेक्टर को साफ-सुथरा बनाया, जो कभी अटकी हुई परियोजनाओं और पैसे के अपारदर्शी लेन-देन के लिए जाना जाता था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 2023 में उस सफाई अभियान का उल्लेख किया था। उसने नई दिल्ली पर कोई मेहरबानी नहीं की थी।

इसके बाद, तेल की कीमतों में अचानक आए उछाल से निपटने के लिए सरकार ने जो कुछ किया, वह भी सामने है। उसने कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ आम परिवारों और कंपनियों पर नहीं डाला। उसने इसकी लागत खुद वहन की। राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) का उद्देश्य ही यही है और भारत ने इसे तैयार किया है। इसका सबूत 2 सितंबर को मिला। जापान की क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग को बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया और इसके साथ ही स्थिर संभावना भी जताई। इसके अलावा, देश की रेटिंग सीमा (कंट्री सीलिंग) को भी ए कर दिया। भारत को तीन दशकों से अधिक समय से ‘ए’ रेटिंग नहीं मिली है। एजेंसी ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, जीएसटी, दिवाला संहिता और सकल गैर-निष्पादित ऋण अनुपात (ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग लोन रेश्यो) के 1.8 प्रतिशत तक कम होने का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार ने उच्च पूंजीगत व्यय को जारी रखते हुए भी अपने राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025 में जीडीपी  के 4.7 प्रतिशत से घटाकर वित्तीय 2026 में 4.4 प्रतिशत कर लिया। टोक्यो स्थित एक रेटिंग समिति के लिए दिल्ली में किसी को खुश करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने भी उन्हीं सुधारों को देखा और वही नतीजा निकाला।

अब आलोचना के मुख्य बिंदु पर आते हैं। लेखकगण पूछते हैं कि अगर आज ये संकेतक 7.8 प्रतिशत की विकास दर को सही ठहराते हैं, तो पूर्व के वर्षों में वैसी ही विकास दर कमजोर संकेतकों के साथ क्यों संभव हुई थी? यह मान लेना कि विकास हमेशा एक जैसी चीजों से ही संभव होती है, जरूरी नहीं है। निर्यात और औपचारिक ऋण से प्रेरित तिमाही, घरेलू खर्च या सरकारी निवेश से चलने वाले वर्ष जैसी नहीं होगी। पूर्व के वर्षों में विकास के अपने कारण थे, जो उस समय साफ दिख रहे थे। वर्ष 2024-25 तक, शेयर बाजार तेजी से चढ़ा और अधिक संख्या में भारतीयों ने निवेश करना शुरू किया। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के बीच परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। गैर-बैंक और तकनीक-आधारित ऋणदाता तेजी से बढ़े। वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल संसाधनों का प्रवाह तीन वर्षों में 72 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंकों की  हिस्सेदारी 96 प्रतिशत बढ़ी। ये असली कारण थे। बस, वे अलग थे।

मार्च 2023 से मार्च 2026 के बीच सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को दिए गए बकाया ऋण में 66.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 में भी यह बढ़ोतरी लगभग 25 प्रतिशत की दर से जारी थी। ऐसा कहा जाता है कि ऊर्जा की कीमतों में अचानक उछाल से छोटी कंपनियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। लेकिन उन्हें ऋण देने वाले इस बात से सहमत नहीं दिखते। ऋणदाता आम तौर पर उन कंपनियों को ऋण नहीं देते, जिनके असफल होने की आशंका होती है।

लेखकों के तर्क की तह में यह बात छिपी है कि सांख्यिकी मंत्रालय का काम सरकार की छवि को बेहतर दिखाना है। लेकिन आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते। वर्ष 2023-24 के लिए, मंत्रालय ने विकास दर के अनुमान को 9.2 प्रतिशत (पुरानी श्रृंखला के तहत) से घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया था। यानी, उन्होंने खुद ही लगभग दो प्रतिशत अंक कम कर दिए। अन्य आरोपों के मामले में भी गणित खिलाफ जाता है।

वर्ष 2024-25 में, नई श्रृंखला के तहत नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम रही – 9.8 प्रतिशत  के मुकाबले 9.4 प्रतिशत  – जबकि असल विकास बढ़ी। नॉमिनल जीडीपी  सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों का आधार होती है। सरकार सबसे ज़्यादा इसी आंकड़े को ऊंचा रखना चाहती है। अगर कोई मंत्रालय आंकड़ों में हेरफेर करता है, तो वह ऐसा अपनी कीमत पर नहीं करता। वर्ष 2024-25 और 2025-26 को मिलाकर देखें, तो नई श्रृंखला के तहत औसत असल विकास दर 7.0 प्रतिशत से बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो जाती है। यह आधा प्रतिशत अंक अधिक है। अगर तीन वर्षों – 2023-24 से 2025-26 – को लें, तो नई में औसत ग्रोथ पुरानी श्रृंखला के मुकाबले कम है – 7.7 प्रतिशत  के मुकाबले 7.4 प्रतिशत।

लेखकगण अपनी बात एक कहावत के साथ खत्म करते हैं। वे लिखते हैं कि जो नियम आज लागू होता है, वही नियम पहले भी लागू होना चाहिए। यह सिद्धांत सही है। हमारी बस यही मांग है कि इसे पूरी तरह से लागू किया जाए। पिछले सालों के आंकड़े भी मौजूद हैं: जैसे घरेलू बचत, क्रेडिट में बढ़ोतरी, संसाधनों का प्रवाह, करों से होने वाली कमाई और निवेशकों का बढ़ता दायरा। अगर आप कुछ ही संकेतकों को देखें, तो पिछला समय कमजोर लग सकता है। लेकिन अगर आप सभी संकेतकों पर गौर करें, तो ऐसा नहीं लगता।

भारत ने एक बड़े झटके का सामना किया और आगे बढ़ता रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि उसने एक दशक में अपनी क्षमता बढ़ाई थी और वित्तीय मजबूती हासिल की थी। यह एक ठोस नतीजा है, न कि कोई बनावटी बात।

(लेखक सौरभ गर्ग, सचिव, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार)

शिक्षक सिर्फ पढ़ाते नहीं, भविष्य गढ़ते हैं: शिक्षा में बदलती भूमिका और बढ़ती जिम्मेदारी

शिक्षक: शिक्षा के कलाकार : जयंत चौधरी

किसी को भी पहली बार पढ़ना सीखने का सटीक दिन याद नहीं होता। लेकिन लगभग हर व्यक्ति उन शिक्षकों को जरूर याद रखता है, जिन्होंने उसे पढ़ाया होता है। भूल जाने वाले पल और कभी न भुलाए जाने वाले व्यक्ति के बीच का यही अंतर हमें शिक्षण कार्य के बारे में कुछ बेहद जरूरी बातें बता जाता है। एक शिक्षक अपने पीछे ऐसी चीजें छोड़ जाता है, जिन्हें आसानी से आंक पाना संभव नहीं होता: कोशिश करने का आत्मविश्वास, डटे रहने का अनुशासन, सवाल पूछने की जिज्ञासा, या कभी-कभी मात्र यह भरोसा कि इंसान और भी बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए, शिक्षण को एक कला से कम कुछ भी नहीं माना जा सकता।

भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा हर वर्ष प्रदान किए जाने वाले ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ वास्तव में उन चुनिंदा लोगों के प्रति सम्मान होते हैं, जिनका योगदान दूसरों से कहीं बढ़कर रहा होता है। इन सबके अलावा, देश के हर कोने में – चाहे वह कक्षा हो या कौशल संबंधी प्रयोगशाला या पॉलिटेक्निक या खेल का मैदान या फिर संगीत कक्ष – विद्यार्थीगण धन्यवाद कहने का अपना-अपना तरीका ढूंढ ही लेते हैं। कभी हाथ से लिखी हुई एक टिप्पणी। कभी सुबह की सभा में आभार जताने का एक पल। कभी एक ऐसी खामोश सराहना जो दिन खत्म होने के काफी देर बाद तक शिक्षक के मन में बसी रहती है। ये कोई कमतर उत्सव नहीं हैं, बल्कि कई मायनों में ये सबसे सच्चे उत्सव हैं।

हालांकि, आंकड़े हमें एक और चिंताजनक कहानी बताते हैं। ओईसीडी का 2026 का ‘टीचर नॉलेज सर्वे’ किसी विषय की जानकारी होने और उसे पढ़ा पाने की क्षमता के बीच के अंतर की ओर इशारा करता है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि विषय का ज्ञान हमेशा कारगर शिक्षण-पद्धति में नहीं बदलता। बात बिल्कुल सरल, लेकिन बेहद जरूरी है: किसी चीज को गहराई से जानना और किसी दूसरे व्यक्ति को उसे सीखने में मदद करना – ये दोनों अलग-अलग कौशल  हैं। शिक्षण एक कला है और इसके लिए मानवीय रिश्तों एवं पढ़ाने के तरीकों की समझ के साथ-साथ कक्षा में थोड़ी नाटकीयता की भी जरूरत होती है।

यूनेस्को की ‘शिक्षकों से संबंधित वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में इस पेशे की उपेक्षा  करने की कीमत को आंकड़ों में दर्शाया गया है। दुनिया को 2030 तक 44 मिलियन अतिरिक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की जरूरत होगी। और, इनमें से आधे से अधिक की जरूरत केवल उन शिक्षकों की जगह लेने के लिए होगी जो नौकरी छोड़ रहे हैं। वहीं, मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीच्यूट का अनुमान है कि स्वचालन (ऑटोमेशन) के कारण 2030 तक दुनिया भर में 75 मिलियन से 375 मिलियन कामगारों को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में, योग्य शिक्षकों की अहमियत पहले से कहीं अधिक होगी।

भारत ने इस चुनौती को समय रहते भांप लिया है और इससे पूरी गंभीरता से निपटने की दिशा में कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत शुरू किए गए चार-वर्षीय ‘एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम’ में विषयगत   निपुणता तथा शिक्षण-पद्धति को एक ही स्नातक कि डिग्री में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे की ओर आकर्षित करना है। सेवा में कार्यरत शिक्षकों के बीच एक जैसे मानक सुनिश्चित करने हेतु, ‘शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय पेशेवर मानक (एनपीएसटी)’ के तहत करियर में तरक्की को मात्र वरिष्ठता के बजाय, पढ़ाने की असल गुणवत्ता से जोड़ा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का लाभ उठाने हेतु, ‘नेशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (एनएमएम)’ शिक्षकों को अलग-अलग क्षेत्रों के मार्गदर्शकों (मेंटर) से सीखने के लिए व्यवस्थित सहायता प्रदान करता है। मैंने भी इस मिशन के लिए एक मेंटर के तौर पर पंजीकरण कराया है। माननीय प्रधानमंत्री हर वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं से न केवल बधाई देने के लिए, बल्कि उनकी बातें सुनने, जमीनी स्तर की उनकी कहानियां जानने और उनसे एक ऐसा दृष्टिकोण साझा करने के लिए भी मिलते हैं जो केवल अनुभवी नेतृत्व से ही प्राप्त हो सकता है। शिक्षण एक रचनात्मक काम है और अलग-अलग क्षेत्रों से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया इस रचनात्मकता को नयापन प्रदान करती है।

भारत में ‘शिक्षक’ किसे माना जाए, इसका दायरा भी बढ़ाया जा रहा है और शायद यह सबसे अनूठा विचार है। ‘समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ (उल्लास)’ यानी ‘न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम’ इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर व्यक्ति को पढ़ा सकता है। इस वर्ष जब हम ‘अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मना रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के तहत नौ राज्यों एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों को पूरी तरह साक्षर घोषित किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के ‘विद्यांजलि’ पोर्टल में भी यही भावना दिखाई देती है। यह पोर्टल 8.75 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को ऐसे वॉलंटियरों से जोड़ता है जो एक उपहार के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं – चाहे वह नृत्य से संबंधित हो या गणित से या सार्वजनिक भाषण या फिर शिल्प से – को कक्षाओं में प्रदर्शित करते हैं। हर वॉलंटियर एक शिक्षक की भूमिका निभाता है। ये वॉलंटियर जो भी विषय पढ़ाते हैं, उसे बराबर का महत्व दिया जाता है। क्योंकि वास्तव में, शिक्षण कोई तकनीकी काम नहीं बल्कि एक कला है। हर अध्याय को पढ़ाने की योजना एक रचना जैसी होती है। हर व्याख्या एक प्रदर्शन सरीखी होती है। 

कोई भी कला किसी भी कलाकार में भेद नहीं करती। इसलिए हमारे मन में ऊंच-नीच की जो भी धारणा है, उसे परख कर खत्म करना जरूरी है। कभी-कभी संगीत  शिक्षक या शारीरिक शिक्षा के शिक्षक को पूरक और व्यावसायिक शिक्षा के  प्रशिक्षक को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता। यह वर्गीकरण न केवल  अनुचित है, बल्कि पूरी तरह गलत भी है। परीक्षा का दबाव बढ़ने पर संगीत या व्यायाम मन को शांत कर सकते हैं, जिससे तैयारी में मदद मिलती है। भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) के साथ, अनेक कला रूप विद्यार्थियों को आधुनिक दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक के लिए तैयार करेंगे। जैसे-जैसे खेल विश्वविद्यालय आकार ले रहे हैं और राष्ट्रीय खेल अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहे हैं, खेल प्रशिक्षक तथा शारीरिक शिक्षा के शिक्षक एक विश्वसनीय करियर के द्वार खोलेंगे। सटीक मैन्यूफैक्चरिंग सिखा रहे आईटीआई के प्रशिक्षक, ऐसे कौशल विकसित कर रहे हैं जो पुलों के निर्माण और अस्पतालों को सुदृढ़  बनाने में सहायक हैं। यही राष्ट्र निर्माण का एक दूसरा स्वरूप है।

आज के दौर में जब मशीनें लगभग हर उस काम को करने में सक्षम हो रही हैं जिसका पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, तब भी एक काम ऐसा है जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता – और वह है शिक्षक का काम: एक ऐसा शिक्षक जो एक विद्यार्थी में ऐसी क्षमता देख लेता है जिसे खुद विद्यार्थी अभी नहीं देख पा रहा होता है। इस काम का कोई एल्गोरिदम नहीं है। यह स्कूल की घंटी बजने पर खत्म नहीं होता। और यह देश भर के हर तरह के संस्थान में, हर विषय के हर शिक्षक से जुड़ा है। 

एक लैटिन कहावत इस तथ्य को सटीक ढंग से रेखांकित करती है: नॉन स्कोलाए सेड विताए डिस्सिमस (Non scholae sed vitae discimus)। हम स्कूल के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए सीखते हैं।

और इंसानी संभावनाओं का सच्चा कलाकार माना जाने वाला एक शिक्षक ही वही व्यक्ति है, जो इसे संभव बनाता है।

(लेखक केन्द्रीय शिक्षा तथा कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्यमंत्री हैं।)

भारतीय नवाचार का वास्तविक हृदयस्थल: अनुसंधान प्रयोगशालाओं से ‘विकसित भारत’ की कक्षाओं तक

– डॉ. सुकांत मजूमदार

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता की पहचान नहीं हैं; ये हमारे देश के भविष्य को आकार देने वाले प्रमुख शिल्पकारों का सम्मान करते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विज़न के मार्गदर्शन में तथा  ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में भारत की सामूहिक यात्रा में, नवाचार को अक्सर वैश्विक सूचकांक और वित्तीय खर्च जैसे तकनीकी नजरिए से देखा जाता है। फिर भी, नवाचार मूल रूप से एक मानवीय प्रयास है — यह छात्र की आँखों में जिज्ञासा की चमक और उस शिक्षक का अटूट समर्पण है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूट जाए।   

भारत में शिक्षा के मौजूदा विकास की सबसे खास बात यह है कि उच्च-स्तरीय प्रयोगशाला अनुसंधान और कक्षा की रोज़मर्रा की हकीकत के बीच सोच-समझकर एक पुल बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत, नवाचार की परिकल्पना सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले एक उत्प्रेरक के तौर पर की गयी है। यह विज़न इस बात पर ज़ोर देता है कि देश की वास्तविक प्रगति तभी हो सकती है, जब हमारे  सबसे बेहतरीन शोध का फ़ायदा आखिरी कतार में बैठे आखिरी बच्चे तक पहुँचे। 

इस बड़े बदलाव के पैमाने को समझने के लिए, सबसे पहले भारत के राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम में व्यापक स्तर पर हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों को देखना होगा।

व्यापक नवाचार क्रांति: वैश्विक ऊँचाइयों को छूना

इक्कीसवीं सदी में अपनी संप्रभुता और आर्थिक नेतृत्व को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे देश के लिए, एक मज़बूत अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) इकोसिस्टम बहुत जरूरी है। भारत में एक मौलिक बदलाव आया है; देश अब मुख्य रूप से वैश्विक तकनीक को अपनाने के बजाय, वैश्विक चुनौतियों के लिए समाधान विकसित करने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। यह बदलाव वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बढ़ती रैंकिंग में प्रतिबिंबित होता है, जहाँ देश 2014 के 76वें स्थान से ऊपर उठकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुँच गया है।

हालाँकि, असली कहानी भारत की कार्यक्षमता में छिपी है। नवाचार इनपुट के 52वें स्थान की तुलना में, भारत नवाचार आउटपुट में अब दुनिया भर में 32वें स्थान पर है। यह दिखाता है कि देश में नवाचार इनपुट को बड़े प्रभाव वाले नतीजों में बदलने की क्षमता, कई दूसरे देशों के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर है। इस संस्कृति को 6,000 से ज़्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में आर एंड डी प्रकोष्ठ बनाकर और 59,300 अनुसंधान सहयोग स्थापित करके संस्थागत रूप दिया गया है।

प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (पीएमआरएफ) द्वारा समर्थित भारत का प्रतिभा समूह भी अनुसंधान इकोसिस्टम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है। पीएमआरएफ ने 3,688 विद्वानों का समर्थन किया है, जिसके परिणामस्वरूप 10,300 शैक्षिक पत्रिका प्रकाशन, 7,966 सम्मेलन पत्र, 834 पेटेंट दाखिले और 221 पेटेंट स्वीकृत हुए हैं। पीएमआरएफ 2.0 10,000 फ़ेलोशिप का समर्थन करने के लिए तैयार है, और प्रधानमंत्री अनुसंधान प्रभाग (पीएमआरसी) को पहले ही 3,600 से अधिक फ़ेलोशिप आवेदन प्राप्त हो चुके हैं, इस प्रकार भारत की बौद्धिक अवसंरचना का विस्तार जारी है। इसे उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (एचईएफए) ने और बढ़ावा दिया है, जिसने 111 संस्थानों में 281 परियोजनाओं के लिए ₹47,000 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी है।

“भारत में एआई निर्माण” के विज़न को आगे बढ़ाने के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चार समर्पित उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें ₹1,490 करोड़ का संचयी निवेश किया जाएगा:

• स्वास्थ्य सेवा: आईआईएससी बेंगलुरु

• स्थायी शहर: आईआईटी कानपुर

• कृषि: आईआईटी रोपड़

• शिक्षा: आईआईटी मद्रास

जहां यह अवसंरचना भारत की प्रगति का आधार प्रदान करती है, वहीं ज्ञान का लोकतंत्रीकरण इसे जीवंत बनाता है।

ज्ञान को सबके लिए सुलभ बनाना: पहुँच और बौद्धिक संपदा

यह सुनिश्चित करने के लिए कि दूर-दराज़ के गाँव का कोई महत्वाकांक्षी शोधार्थी भी बड़े शहर के शोधार्थी जितने ही मौकों का फ़ायदा उठा सके, भारत ने अतीत में ज्ञान तक सीमित पहुँच वाली व्यवस्थाओं को खत्म करने की कोशिश की है। ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ (ओएनओएस) पहल शैक्षिक समानता के लिए एक अहम साधन है, जो 1.8 करोड़ छात्रों और संकाय सदस्यों को 13,000 अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक पत्रिकाओं तक पहुँच प्रदान करती है।

इसकी रफ़्तार भी उतनी ही अहम है। 2025 के 11.4 करोड़ संपूर्ण-पाठ डाउनलोड के बाद, 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही 6.26 करोड़ लेखों तक पहुँचा गया है। यह ज्ञान के प्रति उत्सुक देश की नब्ज़ को दर्शाता है।

ज्ञान तक पहुँच का यह विस्तार भारत के बौद्धिक संपदा इकोसिस्टम में आए बड़े बदलाव के साथ-साथ हुआ है। घरेलू पेटेंट दाखिला 2014–15 के 42,763 से बढ़कर 2024–25 में 1,10,375 हो गया है, जो 158% की भारी वृद्धि को रेखांकित करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2021–22 के बाद से इन दाखिलों में शिक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी तीन गुना बढ़ गई है, जो 11.15 प्रतिशत से बढ़कर 34.13 प्रतिशत हो गई है। कपिला कार्यक्रम जैसी पहल, जिसने 13,067 पेटेंट दाखिले में मदद की है, और 418 संस्थानों में आईडिया लैब नेटवर्क, आविष्कारकों की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में मदद कर रहे हैं।

यह भारत की बढ़ती बौद्धिक संप्रभुता का परिणाम है। उच्च शिक्षा संस्थान अब केवल सीखने की जगहें नहीं रह गए हैं; वे तेज़ी से नवाचार-आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन बन रहे हैं। भारत के लगभग 125 यूनिकॉर्न में से 86 उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले हैं, जिनमें से 62 खास तौर पर आईएआईटी और आईएआईएससी से जुड़े हैं।

फिर भी, समावेश के बिना नवाचार केवल तकनीकी प्रगति है; सहानुभूति के साथ नवाचार एक सभ्यतागत विजय है। इस विजय का सबसे महत्वपूर्ण स्थान समावेशी कक्षा है।  

प्रौद्योगिकी का मानवीय चेहरा: समावेश का ज़मीनी आधार 

एनईपी 2020 और सतत विकास लक्ष्य 4 के संयोजन में, प्रौद्योगिकी को शिक्षा में समानता लाने वाले एक अहम माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है। इसका मकसद सीखने में आने वाली हर तरह की भौतिक और डिजिटल रुकावटों को दूर करके उन्हें अवसरों में बदलना है।

प्रशस्त ऐप जैसे उपाय आरपीडब्लूडी अधिनियम, 2016 के तहत 21 तरह की दिव्यांगताओं की शुरुआती पहचान में मदद करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो पाता है कि हर बच्चे की खास ज़रूरतों की स्कूल स्तर पर ही पहचाना की जा सके और उनका समाधान किया जा सके। सहानुभूति बढ़ाने के लिए, ‘प्रिया – एक्सेसिबल वॉरियर’ कॉमिक बुक जैसे संसाधन बच्चों को यह सिखाते हैं कि सभी के लिए सुलभता सुनिश्चित करना सबकी मिली-जुली ज़िम्मेदारी है।

भारत का डिजिटल समावेशी इकोसिस्टम – जिसमें भारतीय सांकेतिक भाषा (आईएसएल) के लिए पीएम ई -विद्या चैनल 31 और सीआईईटी-एनसीईआरटी के रोज़ाना के समावेशी प्रसारण शामिल हैं – यह पक्का करने की कोशिश करता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर किसी का अधिकार बने।

सबसे अहम बदलावों में से एक है ‘किताब एक, पढ़ें अनेक’ (केईपीए) पहल। ‘शिक्षा-प्राप्ति के लिए सार्वभौमिक डिज़ाइन’ (यूडीएल) पर आधारित इन भौतिक-सह-डिजिटल किताबों में छूकर महसूस किए जा सकने वाले डॉट्स, प्रिंट-से-ऑडियो तकनीक और आईएसएल वीडियो से जुड़े क्यूआर कोड होते हैं। जब इस्तेमाल में आसान, मज़बूत और रिचार्ज-योग्य उपकरण के साथ इनका उपयोग किया जाता है, तो ये किताबें ज्ञान तक पहुँचने का एक बहु संवेदी ज़रिया बन जाती हैं। इससे यह साबित होता है कि तकनीक तब अपने शिखर पर होती है, जब वह समाज के सबसे कमज़ोर तबके की मदद करती है।

हमेशा नई सोच रखने वाले शिक्षक: पंचतंत्र से दीक्षा तक

चाहे कितना भी आधुनिक भौतिक-सह-डिजिटल टूल क्यों न हो, उसे सही दिशा देने के लिए मानवीय मदद की ज़रूरत होती है। भारतीय परंपरा में, शिक्षक हमेशा से ही नई सोच और नवाचार के मुख्य स्रोत रहे हैं। समावेशी शिक्षा का सिद्धांत भारत की प्राचीन शिक्षण-पद्धति की समझ में भी प्रतिध्वनित होता है। 

पंचतंत्र का उदाहरण लें। जब आचार्य विष्णु शर्मा को राजा अमरशक्ति के उन पुत्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जिन्हें पारंपरिक तरीकों से सीखने में मुश्किल होती थी, तो भी वे घबराए नहीं। उन्होंने नए तरीके अपनाए। उन्होंने कहानियों, बातचीत और व्यावहारिक उदाहरणों का इस्तेमाल करके उन्हें उनकी समझ के स्तर पर जाकर सिखाया। यह कालातीत विरासत हमें याद दिलाती है कि एक शिक्षक की असली काबिलियत इसी बात में है कि वह हर सीखने वाले की खास ज़रूरतों के हिसाब से अपने पढ़ाने के तरीके को अनुकूलित कर सके।

आज, दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए इस परंपरा को और मज़बूत किया जा रहा है; यह आधुनिक आचार्य के लिए एक डिजिटल साथी की तरह है। दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों पर हर महीने होने वाले पाँच दिन के मुफ़्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम के ज़रिए, शिक्षकों को ऐसी नई और समावेशी रणनीतियाँ सिखाई जा रही हैं जिनसे वे अपनी कक्षा को भविष्य के लिए तैयार कर सकें।

भविष्य के निर्माता

वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बेहतर होती रैंकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र से लेकर केईपीए की पाठ्यपुस्तकों के छूकर महसूस किये जाने वाले पन्नों तक का सफ़र एक ही मिशन को दिखाता है: भारतीय छात्र का सशक्तिकरण। भारत एक ऐसा देश बना रहा है, जहाँ अनुसंधान तो उच्च-स्तरीय हो, लेकिन उसका फ़ायदा ज़मीनी स्तर तक पहुँचे; जहाँ प्रौद्योगिकी तो सबसे आधुनिक हो, लेकिन उसका हृदयस्थल पूरी तरह मानवीय हो।

शिक्षक इस नवाचार की कहानी के वास्तविक हृदयस्थल हैं। वे ही कागज़ पर बनी नीति को बच्चों के लिए संभावनाओं में बदलते हैं। वे ही ‘विकसित भारत’ के निर्माता हैं। जब भी कोई शिक्षक किसी संघर्ष कर रहे छात्र तक पहुँचने का नया तरीका ढूँढते हैं, तो वह काम न सिर्फ़ उस छात्र के भविष्य को बेहतर बनाता है, बल्कि देश की बौद्धिक शक्ति और नैतिक चरित्र को भी मज़बूत करता है। साथ मिलकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य के भारत में कोई भी सपना बहुत बड़ा न हो और कोई भी बच्चा उसे पूरा करने के अवसर से दूर न रहे।

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(लेखक केंद्रीय शिक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री हैं)

टीचर्स डे: NEP 2020 में टीचर्स की भूमिका और एक विकसित भारत की यात्रा

भारतीय परंपरा में, शिक्षा को हमेशा एक ऐसे सफ़र के तौर पर देखा गया है जो एक व्यक्ति को बनाता है और समाज को बेहतर बनाता है। ज्ञान एक व्यक्ति को दुनिया को समझने में मदद करता है, जबकि एक शिक्षक का मार्गदर्शन सीखने की प्रक्रिया को मकसद, दिशा और मतलब देता है। पुराने भारत के गुरुकुलों से लेकर आज के क्लासरूम तक, शिक्षक और सीखने वाले के बीच का रिश्ता इस सफ़र के दिल में रहा है और टीचर्स डे हमें इस रिश्ते को सेलिब्रेट करने का मौका देता है।

हर साल 5 सितंबर को, हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की याद में टीचर्स डे मनाते हैं, जो एक जाने-माने विद्वान, दार्शनिक और शिक्षक थे, जिनका जीवन शिक्षा की महिमा और समाज में शिक्षकों के गहरे योगदान का प्रतीक था। इसलिए, यह दिन सिर्फ़ तारीफ़ के दिन से कहीं ज़्यादा है। यह हमें उन सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है जिन्होंने सीखने और शिक्षकों के बारे में भारत की समझ को बनाया है।

हमारी पुरानी परंपरा में, शिक्षक को एक गाइड के तौर पर सम्मान दिया जाता था जो सीखने वाले को ज्ञान और बेहतर समझ की ओर ले जाता था। “गुरु देवो भवः” की भावना टीचर के लिए गहरे सम्मान को दिखाती है, जिनकी भूमिका अनुशासन, चरित्र, मूल्यों और ज़िम्मेदारी की भावना पैदा करने तक फैली हुई है। शिक्षा को व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था। भारत के शिक्षा सिस्टम में गुरु-शिष्य परंपरा आज भी ज़िंदा है। एक टीचर का योगदान सिर्फ़ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं। टीचर छात्रों को गाइड करते हैं, उनकी खूबियों को पहचानते हैं, उन्हें अपनी पसंद को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनमें आत्मविश्वास जगाने में मदद करते हैं। उनके गाइडेंस का किसी व्यक्ति के जीवन पर लंबे समय तक चलने वाला असर हो सकता है।

और उन्हें सफल और ज़िम्मेदार इंसान बनने में मदद कर सकते हैं। इस तरह, टीचर और स्टूडेंट के बीच का रिश्ता युवाओं की ज़िंदगी को आकार देता रहता है।

यह समृद्ध एजुकेशनल विरासत भारत की शिक्षा की लंबी परंपरा में दिखती है। तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा जैसे हमारे पुराने शिक्षा केंद्रों ने भारत और विदेश के स्टूडेंट्स और स्कॉलर्स को आकर्षित किया है। ये केंद्र मैथ्स, एस्ट्रोनॉमी, मेडिसिन, फिलॉसफी, लिटरेचर, भाषाएं और बायोलॉजी जैसे विषयों पर स्कॉलरशिप, चर्चा और विचारों के लेन-देन के केंद्र बन गए।

इस परंपरा के मूल में इस बात की गहरी समझ थी कि इंसानी जीवन के लिए ज्ञान का क्या मतलब है। संस्कृत का मुहावरा “ज्ञानं मनुजस्य त्रितियं नेत्रियं नेत्रम्”, ज्ञान को इंसान की तीसरी आंख बताता है। ज्ञान हमें तुरंत से आगे देखने, गहराई से समझने और सोच-समझकर फैसले लेने में मदद करता है। इस प्रोसेस में टीचर की अहम भूमिका होती है, जो सीखने वाले को ज्ञान से समझ और समझ से समझ की ओर ले जाता है।

ये विचार ऐसे समय में और भी ज़रूरी हो जाते हैं जब भारत 21वीं सदी के मौकों के लिए अपने एजुकेशन सिस्टम को तैयार कर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, शिक्षा को भारत के एक विकसित और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनने के सफ़र के केंद्र में रखा गया है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 इस दिशा में एक अहम कदम है। यह पॉलिसी सीखने वाले को शिक्षा के केंद्र में रखती है और उसके पूरे विकास, बौद्धिक समझ, क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी, अनुभव से सीखने और स्किल्स को महत्व देती है। यह भारतीय भाषाओं पर भी फिर से ध्यान केंद्रित करती है और छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग, रोबोटिक्स और दूसरी नई टेक्नोलॉजी जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए तैयार करती है।

टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर जानकारी हासिल करने और सीखने के नए रास्ते खोल रही है। टीचर इस सीखने की प्रक्रिया को संदर्भ, दिशा और इंसानी जुड़ाव देते हैं। मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लैस एक क्लासरूम तब सच में सार्थक होता है जब टीचर छात्रों को सवाल पूछने, नई चीज़ें खोजने, जो उन्होंने सीखा है उसे समझने और लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। टीचर नए तरीके अपना रहे हैं, टेक्नोलॉजी को शामिल कर रहे हैं और छात्रों को उनकी रुचियों और क्षमताओं को खोजने में मदद कर रहे हैं, साथ ही शिक्षा में सुधार के नज़रिए को रोज़ाना के क्लासरूम के अनुभवों में भी बदल रहे हैं।

ज्ञान का बदलता स्वरूप भी टीचर की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। आज, स्टूडेंट्स के पास जानकारी के कई सोर्स हैं। टीचर उन्हें आइडिया को ध्यान से देखने, जानकारी और समझ में फर्क करने, काम के सवाल पूछने और ज्ञान का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करने में मदद करते हैं। इस तरह, एजुकेशन अच्छे फैसले लेने की काबिलियत, सेल्फ-कॉन्फिडेंस, कैरेक्टर और समाज में काम का योगदान देने की काबिलियत डेवलप करने का एक प्रोसेस बन जाती है।

प्रधानमंत्री ने हमेशा भविष्य के भारत को बनाने में टीचरों की अहमियत पर ज़ोर दिया है। डेवलप्ड इंडिया 2047 का उनका विज़न युवाओं को भारत की डेवलपमेंट जर्नी के सेंटर में रखता है, और उस भविष्य की नींव टीचरों के रोज़ाना के काम से रखी जा रही है। क्यूरियोसिटी को बढ़ावा देकर, कॉन्फिडेंस जगाकर, पोटेंशियल पहचानकर और टैलेंट को निखारने के मौके देकर, टीचर युवा भारतीयों को भविष्य की ज़िम्मेदारियों और मौकों के लिए तैयार करने में मदद कर रहे हैं।

गुरुकुल से डिजिटल क्लासरूम तक का सफ़र दिखाता है कि भारत में नई संभावनाओं को अपनाने और अपनी सभ्यता की समझ को आगे बढ़ाने की कितनी ज़बरदस्त क्षमता है। पढ़ाई के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन ज्ञान की खोज और टीचर की गाइड करने वाली भूमिका हमेशा हमारी पढ़ाई के सफ़र का सेंटर रही है।

इस टीचर्स डे पर, जब हम अपने टीचरों का सम्मान करते हैं, तो आइए हम उस भारतीय परंपरा का जश्न मनाएं जो ज्ञान को इंसान की ज़िंदगी के सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक मानती है और इसे देने वालों का बहुत सम्मान करती है। आइए हम इस समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाएं और एक ऐसा एजुकेशन सिस्टम बनाएं जो हर सीखने वाले को अपनी क्षमता खोजने, समाज में योगदान देने और एक विकसित और ज्ञान से भरपूर भविष्य की ओर भारत के सफ़र में पूरे आत्मविश्वास के साथ हिस्सा लेने में मदद करे।

(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री और केंद्रीय कंज्यूमर अफेयर्स, फ़ूड और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन मंत्री हैं।)

WTO में भारत की व्यापार नीति की समीक्षा: दुनिया भारत की प्रगति पर ध्यान दे रही है 

पारदर्शिता बनाए रखना, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का एक संस्थागत कार्य है और व्यापार नीति समीक्षा (टीपीआर) इसके विभिन्न तरीकों में से एक है। यह समय-समय पर होने वाली एक उत्कृष्ट सहकर्मी समीक्षा प्रक्रिया है, जिसमें सचिवालय किसी सदस्य देश की व्यापार नीतियों और प्रथाओं का विस्तार से अध्ययन करता है, जिसमें वृहद् आर्थिक स्थितियां भी शामिल होती हैं और सदस्य पूरी प्रक्रिया के दौरान सोच-समझकर, सटीक और अक्सर आलोचनात्मक सवाल उठाते हैं। जुलाई 2026 के अंत में, भारत ने डब्ल्यूटीओ में अपनी आठवें टीपीआर का समापन किया, यह एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिसके लिए कई महीनों की तैयारी की गयी थी। इन तैयारियों में सचिवालय कर्मचारियों का दौरा, प्रतिनिधिमंडलों द्वारा 1,100 से अधिक सवाल पूछना, विचारों का आदान-प्रदान आदि शामिल थे। भारत ने अंतर-विभागीय और बहु-हितधारक संवाद के माध्यम से इन सवालों और स्पष्टीकरणों का जवाब दिया। यह भारत के लिए एक मौका था कि वह सदस्य देशों के सामने अपने आर्थिक और विकास विज़न की व्याख्या कर सके और यह बता सके कि भारत वैश्विक धन और समृद्धि में कैसे योगदान दे सकता है। 

भारत की पिछली व्यापार नीति की समीक्षा कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में 2021 में हुई थी। हालांकि, स्वास्थ्य संकट को नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन आर्थिक कमजोरियां और ऊर्जा स्रोतों सहित आवश्यक आपूर्ति की गंभीर कमी जैसी समस्याएं हाल के दिनों में बढ़ गई हैं। दुनिया महामारी संकट से उबर गई है, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों से नई चुनौतियां सामने आईं हैं। ऐसे माहौल में, आठवीं समीक्षा ने एक बहुत ही सकारात्मक तस्वीर पेश की: भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है, इसने वैश्विक व्यापार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और इसे तेज़ी से एक अहम व्यापारिक साझेदार के तौर पर देखा जा रहा है। डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने विकसित भारत@ 2047 की दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना की और स्वीकार किया कि भारत की मजबूत और निरंतर आर्थिक वृद्धि, दुनिया के साथ गहरे होते संबंध और तेजी से हुआ डिजिटल परिवर्तन एक साथ मिलकर 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने विज़न की दिशा में इसकी निरंतर प्रगति को रेखांकित करते हैं।

इस साल की समीक्षा की गंभीरता ही बहुत कुछ बताने वाली है। इस समीक्षा में डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने सभी क्षेत्रों के बारे में असाधारण रूप से व्यापक और निरंतर संवाद किया, जो भारत के व्यापार, नियामक और वृहद् आर्थिक नीतियों के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है। सदस्यों ने मोटे तौर पर भारत की आर्थिक मजबूती और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के साथ रचनात्मक साझेदारी की सराहना की, साथ ही डिजिटल नवाचार, सीमा-शुल्क व व्यापार सुविधा, स्टार्ट-अप्स और मुक्त व्यापार समझौतों जैसी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। इसलिए, इसमें शामिल होने वालों की संख्या सिर्फ़ बारीकी से जांच-परख का पैमाना नहीं है; यह इस बात का भी संकेत है कि भारत के आर्थिक बदलाव में अब कितनी दिलचस्पी ली जा रही है। 

यह बदलाव आंकड़ों में साफ़ दिखता है। 2021-22 और 2025-26 के बीच, भारत की अर्थव्यवस्था की सालाना औसत विकास दर लगभग 8 प्रतिशत रही। 2025-26 में कुल निर्यात रिकॉर्ड 863 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें 441.8 बिलियन डॉलर का वस्तु निर्यात और 421.3 बिलियन डॉलर का सेवा निर्यात शामिल है। कई सदस्यों ने भारत में डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाओं के क्षेत्र में हुई शानदार प्रगति पर ज़ोर दिया। सातवें टीपीआर के बाद की अवधि में भारत के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुदृढ़ता स्थापित करने की स्पष्ट दिशा प्रतिबिंबित होती है, साथ ही देश ने व्यापारिक साझेदारों को भारत की विकास गाथा का हिस्सा बनने का अभूतपूर्व अवसर भी दिया। समीक्षा अवधि के दौरान, भारत ने अपनी गति फिर से हासिल की और वैश्विक बाजारों के लिए वस्तुओं और सेवाओं का एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत किया। 

शायद यह बदलाव साफ़ तौर पर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा दिखाई देता है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) ने भारत को बड़ी आबादी के स्तर पर डिजिटल प्रणाली बनाने में मदद की है; अकेले एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) का भारत के डिजिटल भुगतान लेन-देन में 85 प्रतिशत और 2025 में दुनिया भर के वास्तविक समय पर हुए कुल भुगतान में लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा है। डब्ल्यूटीओ में सदस्यों ने खास तौर पर डीपीआई में भारत की उपलब्धियों का ज़िक्र किया। भारत के डिजिटल और विकास-उन्मुख सुधारों को विकासशील और सबसे कम विकसित देशों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है, जो अपने यहाँ डिजिटल बदलाव की कोशिश कर रहे हैं। यह भारत की उभरती हुई व्यापार गाथा का एक अहम पहलू है: खुलेपन को घरेलू क्षमताओं का भी समर्थन मिल रहा है, जिससे लेन-देन की लागत कम होती है और यह छोटे उद्यमों समेत सभी तरह के व्यवसायों को औपचारिक और डिजिटल अर्थव्यवस्था में शामिल होने में सक्षम बनाती है। 

भारत की व्यापार नीति बाहरी दुनिया पर अब ज़्यादा केंद्रित हो गई है, और विकसित तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का दायरा बढ़ रहा है— या तो लागू हो चुके हैं या इन पर बातचीत चल रही है। यह विस्तार साझेदारी में विविधता लाने और भारतीय सामान व सेवाओं के लिए बाज़ार तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने की कोशिशों को दिखाता है। साथ ही, जैसा टीआरपी चर्चाओं में रेखांकित किया गया था, भारत की एफटीए में भागीदारी, डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति उसकी लगातार और स्पष्ट प्रतिबद्धता के साथ-साथ जारी रहती है। 

टीपीआर यह भी दिखाता है कि अधिक खुलापन अपनाने का मतलब भारत के वैध सार्वजनिक नीतिगत हितों को छोड़ देना नहीं है। भारत ने सदस्यों को आश्वस्त किया कि वैश्विक बाजारों के साथ एकीकृत होने का उसका दृष्टिकोण, अपनी विशिष्ट विकास वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों के साथ संतुलित रहेगा। यह विशेष रूप से कृषि में साफ दिखाई देता है, जहां भारत ने किसानों की आजीविका की सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों और तकनीकी विनियमों से संबंधित मुद्दों पर, भारत ने पारदर्शिता, हितधारक परामर्श और डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुपालन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और इस संबंध में सदस्यों को स्पष्ट जानकारी दी।

यह आत्मनिर्भर भारत का एक सूक्ष्म अर्थ है। आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया की अर्थव्यवस्था से खुद को अलग-थलग करना नहीं है। भारत के लिए, इसका मतलब घरेलू क्षमताओं, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी क्षमता को विकसित करना है, ताकि देश वैश्विक व्यापार में अधिक ताकत के साथ हिस्सा ले सके। पिछले पांच सालों का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि भारत यही संतुलन बना रहा है: जहां यह अवसर निर्मित करता है, वहां अधिक खुलापन रखना और साथ ही वैध घरेलू हितों की रक्षा करने की क्षमता बनाए रखना।

यह दृष्टिकोण ऐसे समय में विशेष महत्व रखता है, जब एकतरफा कदमों, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों और भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक व्यापार प्रणाली में भरोसे को कमजोर कर दिया है। इसलिए, डब्ल्यूटीओ को केंद्र में रखते हुए एक पूर्वानुमानित, नियम-आधारित और विकास-उन्मुख बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का विशेष महत्त्व है, जो इसके व्यापारिक हितों से कहीं ज़्यादा मायने रखती है। जैसा कि भारत की व्यापार नीति समीक्षा की अध्यक्ष ने अपने समापन भाषण में उल्लेख किया, भारत के प्रतिनिधिमंडल ने उस महत्व को प्रदर्शित किया है, जो देश टीपीआर व्यवस्था और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को देता है। इस तरह, आठवां टीपीआर एक व्यापक संदेश देता है: भारत दुनिया से मुंह मोड़ने वाला सदस्य नहीं है। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जो प्रगति को अपनाने और वैश्विक व्यापार प्रणाली के साथ गहराई से एकीकृत होने का प्रयास कर रही है, साथ ही यह सुनिश्चित कर रही है कि यह एकीकरण उसकी विकास प्राथमिकताओं, घरेलू क्षमताओं और राष्ट्रीय हितों के अनुकूल बना रहे।

(लेखक वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार, के वाणिज्य विभाग में सचिव हैं।)

प्राकृतिक खेती – सतत कृषि और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

भारत ने पिछले दशक में कृषि क्षेत्र में तेज प्रगति की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, पिछले 5 सालों में विकास दर 4% से अधिक रही है। खाद्यान्न, बागवानी और तेलहन फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। यह किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने और सिंचाई वाले क्षेत्र का विस्तार, बेहतर जल उपयोग दक्षता और समय पर व पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्धता जैसी सरकार की ठोस नीतियों के समर्थन का परिणाम है। बागवानी फसलों की हिस्सेदारी भी काफ़ी बढ़ रही है और इसकी विकास दर अपेक्षाकृत अधिक है।      

हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में स्थिरता आ रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) में धीरे-धीरे आई कमी के कारण एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है, जिसमें किसान रासायनिक खादों की मात्रा तो लगातार बढ़ा रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में बहुत मामूली बढ़ोतरी ही हो रही है।    

सरकार की मृदा स्वाथ्य और उर्वरक योजना के तहत 26 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्डों का वितरण किया गया है। इससे प्राप्त डेटा के अखिल-इंडिया विश्लेषण से चिंताजनक बात सामने आई है कि मिट्टी में जैविक कार्बन (एसओसी)  और अन्य जरूरी सूक्ष्म-पोषक तत्वों की भारी कमी है। स्वस्थ मिट्टी में एसओसी 1% से अधिक होना चाहिए, लेकिन यह औसतन 0.5% के आसपास है और कुछ क्षेत्रों में यह 0.3% तक के यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

कम मात्रा में एसओसी से मिट्टी की सरंध्रता कम हो जाती है, जिसका दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है: पानी का जमीन में रिसाव और जल धारण क्षमता, दोनों में कमी आती है। परिणामस्वरूप, वर्षा और सिंचाई का पानी बह जाता है, जो ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाता है और न तो यह जमीन के नीचे जाकर भूजल स्तर बढ़ा पाता है और न ही पौधों की वृद्धि के लिए आसानी से उपलब्ध रहता है।

कम एसओसी का एक और नकारात्मक प्रभाव यह है कि ऐसे मिट्टी पर उगाए जाने वाले पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता कम हो जाती है। समान उत्पादकता स्तर तक पहुँचने के लिए अधिक से अधिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ी हुई खुराक उर्वरक उपयोग दक्षता को और कम कर देती है, जिससे मृदा-स्वास्थ्य का नुकसान होता है और देश रासायनिक उर्वरकों या उनके घरेलू उत्पादन के कच्चे माल को आयात करने में अपनी कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करता है।  

अत्यधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग ने उन लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कीड़ों को भी कम कर दिया है, जो मिट्टी की सरंध्रता को बेहतर बनाने और गहरी मिट्टी से पोषक तत्वों को ऊपरी मिट्टी तक स्थानांतरित करने में मदद करते हैं, ताकि पौधे उन्हें अवशोषित कर सकें।

एक अन्य चिंताजनक प्रभाव उपज की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि रसायन खाने-पीने और पशु चारे की श्रृंखला में पहुँच जायेंगे और आखिरकार मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करेंगे। ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें फलों, सब्जियों, अनाज और अन्य वाणिज्यिक फसलों में कीटनाशकों का न्यूनतम अवशेष स्तर तय सीमा को पार कर गया है, जिसके चलते निर्यात की खेपें रद्द होती हैं और वैश्विक बाजार में ब्रांड इंडिया की छवि पर बुरा पड़ता है।

हालांकि ये चिंताएँ कुछ समय से व्यक्त की जा रही हैं, लेकिन सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत की, जिसका मुख्य उद्देश्य सतत कृषि के लिए पशुधन या गाय आधारित रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना है, ताकि मिट्टी की सेहत खासकर एसओसी में सुधार हो सके, पौष्टिक तत्वों के अवशोषण की क्षमता बढ़ सके और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर देश की निर्भरता कम हो सके। 

प्राकृतिक खेती, जिसे इसके समर्थकों द्वारा आमतौर पर ‘जीरो बजट खेती’ कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक पर आधारित है, जिसे किसानों ने कई सालों तक आज़माया और परखा है तथा इसे मान्यता दी है। इसके परिणाम भी बहुत उत्साहजनक रहे हैं। यह एक समग्र तकनीकी समाधान पर आधारित है, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है, जैसे स्थानीय नस्ल की गाय का गोबर और गोमूत्र, जिनकी लागत किसान के लिए लगभग शून्य होती है। 

बीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाला बीजामृत सूत्र बेहतर अंकुरण और मजबूत पौधों में मदद करता है, जबकि  जीवामृत, घन-जीवामृत और सप्तयांकुर का उपचार मित्र सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी और मृदा-उत्पादकता को काफी बढ़ा देता है। पौधों के स्वास्थ्य की रक्षा सौंठास्त्र और खट्टी लस्सी के इस्तेमाल से की जाती है, जो बैक्टीरिया और फफूंद संक्रमण को रोकते हैं, जबकि विभिन्न प्रकार के कीड़ों और कीट को नियंत्रित करने के लिए ‘नीमास्त्र’, ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘अग्निअस्त्र’ और ‘दशपर्णी अर्क’ का प्रयोग किया जाता है।

उपरोक्त सभी उपचारों की सावधानीपूर्वक तैयारी और उचित मात्रा में उपयोग से मिट्टी की सेहत के बेहतर परिणाम मिले हैं और उत्पादकता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है, जबकि उपज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। 

मिशन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से प्रगति कर रहा है, जिसका लक्षित क्षेत्र 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक है और यह 18 लाख से अधिक किसानों को कम से कम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में कवर करता है। कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की टीम, जिसे किसान प्रशिक्षक और कृषि सखी संसाधन व्यक्ति के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं, किसानो को जागरूक कर रही है, प्रशिक्षण दे रही है और इस खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

जिन किसानों के पास स्थानीय नस्ल की गायें हैं, उन्हें खेत पर ही इन उपचारों को तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, बड़ी संख्या में जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी मुख्य रूप से स्थानीय डेयरियों या पशु आश्रय गृहों के निकट स्थापित किए गए हैं, ताकि ये उपचार किसानों को मामूली कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।

यह मिशन विज्ञान-आधारित रणनीति के माध्यम से लागू किया जा रहा है, ताकि किसान इन प्रथाओं को बिना किसी संदेह या हिचकिचाहट के अपना सकें। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने क्षेत्र और फ़सल-विशिष्ट क्षमता मानचित्र विकसित किए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खेती कहाँ प्रभावी होगी। आईसीएआर के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में इस देसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए इसकी प्रभावशीलता को वैज्ञानिक रूप से मान्यता देने के लिए ठोस प्रयास किये जा रहे हैं। आईसीएआर संस्थानों की निगरानी में किए गए कई प्रयोगों ने कई फसलों के लिए बहुत सकारात्मक परिणाम दिए हैं और अब मिशन के ज़रिए इनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।

प्राकृतिक उत्पादों का विपणन एक और महत्वपूर्ण रणनीति है, जो किसानों की आय में वृद्धि करेगी और उन्हें इन प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रेरित करेगी। राष्ट्रीय जैविक और प्राकृतिक कृषि केंद्र (एनसीओएनएफ) ने प्राकृतिक खेती के लिए प्रमाणीकरण नियम बनाये हैं। बड़ी संख्या में किसानों ने पहले ही सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिए हैं, जिससे वे अपने प्रमाणित विशिष्ट उत्पाद को ऊंची कीमतों पर बेच सकते हैं।

एक तरफ जहां इस मिशन के तहत प्रमाणन, विपणन और ब्रांडिंग के साथ शुद्ध प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक हाइब्रिड मॉडल को प्रोत्साहन देने की रणनीति में यह दिखाया गया है कि प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने और रासायनिक उर्वरकों की खुराक को कम करने से भी लंबे समय तक उत्पादकता बनी रह सकती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। इस मॉडल को व्यापक स्वीकार्यता मिल सकती है। इसे अपनाने वाले किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हाइब्रिड मॉडल में प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर धीरे-धीरे निर्भरता कम होती है। यहाँ तक कि कुछ समय बाद, किसान कई फसलों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर सकते हैं और फिर भी उतनी ही पैदावार और आमदनी बनाए रख सकते हैं। 

मध्य पूर्व में चल रहे मौजूदा संकट से पैदा हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने देश के नागरिकों से सात सूत्रीय अपील की है, जिनमें रासायनिक खाद का समझदारी से इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को अपनाना शामिल हैं।

एक ओर जहाँ प्राकृतिक खेती को अपनाने से खेती में स्थायित्व आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने में भी मदद मिल रही है, जिनका आम तौर पर दूध देने की उम्र खत्म होने के बाद परित्याग कर दिया जाता है। इसका एक और फ़ायदा यह है कि घरेलु उपभोग और निर्यात के लिए सुरक्षित भोजन मिलता है, साथ ही देश की कीमती विदेशी मुद्रा की भी बचत होती है।             

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(लेखक भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)

एमएसएमई को मजबूत करने के लिए सुधारों का अगला चरण

संसद के दोनों सदन में हाल ही में पारित किया गया सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास संसोधन विधेयक, 2026 एक बहुत ही महत्वपूर्ण बदलाव है। एमएसएमई राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, एमएसएमई क्षेत्र ने विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। आज ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ पर 9 करोड़ से अधिक एमएसएमई पंजीकृत हैं, जो 40 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। एमएसएमई हमारी आर्थिकी में 31% तथा निर्यात में 50% योगदान देते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में एमएसएमई क्षेत्र की प्रमुख भागीदारी है। एमएसएमई भारत के विकास के सूत्रधार हैं। हाल के वर्षों में एमएसएमई क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है जो ‘उद्यम’ पर पंजीकृत उद्यमों की संख्या से ही स्पष्ट दिखती है, जो 1 अप्रैल 2023 को 1 करोड़ 65 लाख से बढ़कर 9 करोड़ से अधिक हो गए हैं।

वर्ष 2020 में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के वर्गीकरण को, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के बीच के अंतर को समाप्त करके, अधिक व्यापक और समावेशी बनाया गया था। इसके तहत टर्नओवर और निवेश दोनों पर आधारित एक समग्र मानदंड विकसित किया गया।  इसके पश्चात वर्ष 2025 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की निवेश सीमा ढ़ाई गुना बढ़ाकर क्रमश: ढ़ाई करोड़, पच्चीस करोड़ और एक सौ पच्चीस करोड़ की गई है एवं टर्नओवर को दो गुना बढ़ाकर क्रमश: दस करोड़, सौ करोड़ और पांच सौ करोड़ किया गया, जिसने इन उद्यमों को पूंजी निवेश बढ़ाने, विकास और तकनीकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। 

वित्त की उपलब्धता एमएसएमई क्षेत्र के विकास का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। मंत्रालय एमएसएमई क्षेत्र के लिए बैंक ऋण की उपलब्धता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत रहा है और इसके उल्लेखनीय परिणाम दिख रहे हैं। एमएसएमई को प्रदान किया गया बकाया ऋण, वर्ष 2014-15 में 10 लाख करोड़ रुपये था, जो कि अब बढ़कर 38 लाख 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (सीजीटीएमएसई), सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को दिए जाने वाले ऋण पर गारंटी उपलब्ध कराता है। इसके ज़रिए वर्ष 2000 से 2022 के बीच, सूक्ष्म और लघु उद्यमों को दी गई क्रेडिट गारंटी 3 लाख 14 हजार करोड़ रुपये थी, जो पिछले चार वर्षों में अर्थात् 2022-23 से 2025-26 तक बढ़कर 10 लाख 43 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गई। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत, वित्त वर्ष 2014-15 से अब तक लगभग 8 लाख 34 हजार सूक्ष्म उद्यमों को 24 हजार 903 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी सब्सिडी दी गई है, जिससे अनुमानित 75 लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। 

एमएसएमई मंत्रालय की सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए सार्वजनिक खरीद नीति 2012 के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रालय/विभाग/केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (सीपीएसई) के लिए सूक्ष्म और लघु उद्यमों से सालाना 25% खरीद करना अनिवार्य है; इसमें महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाली सूक्ष्म और लघु उद्यमों से 3% और एससी/एसटी उद्यमियों के स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से 4% खरीद शामिल है। विगत वर्षों में सूक्ष्म और लघु उद्यमों से खरीद में लगातार वृद्धि हुई है। वित्तीय-वर्ष 2020-21 में, सूक्ष्म और लघु उद्यमों से सार्वजनिक खरीद का मूल्य 40,717 करोड़ रुपये था जो कि वित्तीय-वर्ष 2025-26 में बढ़कर 1,15,801 करोड़ रुपये हो गया है, जो सीपीएसई द्वारा खरीद के लिए लक्षित 25 प्रतिशत की तुलना में 49 प्रतिशत से अधिक है। इसमें एससी/एसटी उद्यमियों के स्वामित्व वाले उद्यमों से 3,984 करोड़ रुपये की खरीद हुई और महिला उद्यमियों के स्वामित्व वाली उद्यमों से 9,059 करोड़ रुपये की खरीद हुई है। 

एमएसएमई को उनका भुगतान समय पर दिलाने हेतु मंत्रालय ने कई सार्थक प्रयास किए हैं, ट्रेड्स इनमें से एक है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा विनियमित एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म है, जिसे भारत में एमएसएमई की लिक्विडिटी (नकदी) संबंधी चुनौतियों तथा कार्यशील पूंजी की आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में शुरु किया गया था। ट्रेड्स प्लेटफ़ॉर्म ने एमएसएमई क्षेत्र को मार्च 2026 तक 8,71,000 करोड़ रुपये की इनवॉइस डिसकाउंटिंग के माध्यम से समय पर भुगतान दिलवाया है। ट्रेड्स प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े एमएसएमई की संख्या अप्रैल 2022 में 34,430 थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 2,55,000 से अधिक हो गई है। वहीं, एमएसएमई की इनवॉइस डिसकाउंटिंग की राशि वर्ष 2021-22 में 40,000 करोड़ रुपये से बढ़कर, वित्त वर्ष 2025-26 में 3,47,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। ट्रेड्स पर इनवॉइस डिसकाउंटिंग का बढ़ता चलन, भारत सरकार के एमएसएमई के समयबद्ध भुगतान के प्रति संकल्प को दर्शाता है। 

इसी दिशा में विलंबित भुगतान और उससे जुड़े विवादों के निपटारे हेतु पूरे देश में 161 सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) स्थापित किए गए हैं। संशोधन में राज्यों को एमएसईएफसी की संरचना तय करने के लिए सक्षम बनाने के लिये प्रावधान लाए गए हैं जिससे आवश्यकतानुसार एमएसईएफसी का गठन किया जा सके। संबंधित पक्षों में समझौते के साथ विवाद सामाधान के पर्याप्त उपाय किए गए हैं। यह संशोधन विधेयक ऑनलाइन विवाद समाधान (ओडीआर) को सक्षम एवं सशक्त बनाता है, ताकि संबंधित पक्षों द्वारा अपने विवादों का समयबद्ध और किफायती तरीके से हल सुनिश्चित किया जा सके।

एमएसएमई मंत्रालय महिला उद्यमियों के विकास को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। मंत्रालय की अनेक योजनाओं में महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान है। आज उद्यम पोर्टल पर 39% से अधिक एमएसएमई महिलाओं के स्वामित्व में हैं, यानि 3.38 करोड़ के लगभग  एमएसएमई महिला स्वामित्व में हैं और जिनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।  क्रेडिट गारंटी योजना के तहत, महिलाओं के लिए 90% तक गारंटी कवरेज है और सालाना गारंटी फीस में 10% तक की छूट प्रदान की जाती है। खरीद और विपणन सहायता योजना के तहत ट्रेड फेयर में महिला उद्यमियों की भागीदारी पर 100% सब्सिडी दी जाती है, जबकि दूसरे उद्यमियों के लिए यह 80% है।  पीएमईजीपी में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को 35 प्रतिशत व शहरी क्षेत्र की महिलाओं को 25 प्रतिशत की सब्सिडी देने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति का विकास, मंत्रालय की प्राथमिकता है। आज उद्यम पर 1.24 करोड़  से अधिक एमएसएमई, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति  के उद्यमी के स्वामित्व में हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति हब योजना, एमएसएमई मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसे 2016 में माननीय प्रधानमंत्री ने शुरू किया था। इस योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति  के उद्यमियों की क्षमता बढ़ाना और उनके बीच “उद्यमिता संस्कृति” को बढ़ावा देना है। 

मंत्रालय की इन निरंतर पहलों और प्रयासों को और सशक्त बनाने के लिए एमएसएमई विकास संशोधन विधेयक, 2026 पास किया गया है। इसका उद्देश्य है—एमएसएमई क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों का समाधान करना, प्रशासनिक ढांचे में सुधार करना, व्यापार करने में सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) और नियमों का अनुपालन करने को बढ़ावा देना। इसके मुख्य घटक हैं:

  1. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमो के निःशुल्क एवं स्वैच्छिक रजिस्ट्रेशन के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को अधिसूचित करने की व्यवस्था करना। टर्नओवर और निवेश आधारित एमएसएमई वर्गीकरण को वैधानिक रूप देना।
  2. एमएसएमई की लिक्विडिटी (नकदी) से जुड़ी समस्याओं को हल करना। सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे एमएसएमई से खरीद के लिए इनवॉइस का निपटान ट्रेड्स के ज़रिए करें। साथ ही, राज्य सरकारों को भी अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए इसी प्रकार के प्रावधान अपनाने हेतु सशक्त किया गया है;
  3. राज्य सरकारों को सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) की संरचना को युक्तिसंगत बनाकर और अधिक एमएसईएफसी की स्थापना करने की सुविधा प्रदान करना;
  4. सूक्ष्म और लघु उद्यमो के पेमेंट में देरी से जुड़े विवादों के तेज़ी से निपटारे के लिए समय-सीमा तय करना;
  5. मध्यस्थता से हुए समझौते या आरबिट्रल अवॉर्ड की वसूली ‘भूमि राजस्व के बकाया’  के रूप में वसूलने की व्यवस्था करना;
  6. अगर डिक्री, अवॉर्ड या आदेश को रद्द करने का आवेदन छह महीने से अधिक समय से लंबित है, तो अदालतों को यह आदेश देने का अधिकार देना कि सूक्ष्म और लघु उद्यम सप्लायर्स को अवॉर्ड की गई राशि का कम से कम पचास प्रतिशत भुगतान किया जाए;
  7. कुछ प्रावधानों के उल्लंघन को अपराध की श्रेणी से हटाना (डिक्रिमिनलाइज़ करना) और दोषसिद्धि-आधारित जुर्माने की जगह अलग-अलग स्तर के दंड लागू करना, जिसमें पहली बार उल्लंघन पर चेतावनी देना भी शामिल है।

यह संशोधन हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श और संबंधित मुद्दों की सावधानीपूर्वक जांच के बाद किया गया है। समावेशी, टिकाऊ और रोज़गार-प्रधान आर्थिक विकास हासिल करने के लिए एक मज़बूत एमएसएमई सेक्टर ज़रूरी है। ये संशोधन ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप हैं। इस से उद्यमों के औपचारिकीकरण को बढ़ावा मिलेगा, उनके विस्तार का मार्ग प्रशस्त होगा और वे विकास के ‘चैंपियन’ बन सकेंगे।

(लेखिका केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।)

स्टीलफ्रेम का पुनर्निर्माण : शासन करने से लेकर सेवातक, समयबद्ध सुधारों का सिलसिला

आर्टिकल /

जब अंग्रेज 1947 में भारत छोड़कर वापस ब्रिटेन जाने लगे, तो वे एक मुहावरा अपने पीछे छोड़ गए : “स्टील फ्रेम”। इसे वे भारतीय सिविल सेवा कहते थे, वह प्रशासनिक ढांचा जिसके जरिए ब्रिटिश राज अपनी हुकूमत चलाता था। स्टील आसानी से नहीं झुकता, और यही वास्‍तविक बात थी। यह ढांचा एक साम्राज्य को स्थिर बनाए रखने के लिए बनाया गया था, न कि उन लोगों की बात सुनने के लिए जिन पर उसने शासन किया था। आजादी के बाद दशकों तक हमें वो फ्रेम विरासत में मिला। हमने उसे नया नाम दिया, उसे खादी का आवरण पहनाया और खुद को बताया कि अब यह हमारा अपना है। लेकिन नियंत्रण के लिए बनाया गया फ्रेम स्‍वभाविक रूप से सेवा के लिए बनाया गया ढांचा नहीं है। और हमारे गणतंत्र के पहले कई दशकों तक, भारत अपने उपनिवेशक देश के ढांचे के अंदर ही बना रहा। एक ही फॉर्म को तीन प्रतियों में दाखिल करता रहा, उन्हीं ऊंची कुर्सियों के सामने कतारों में खड़ा होता रहा और अपने भाग्य के फैसले के लिए किसी “साहब” की प्रतीक्षा करता रहा।

मैंने अपने कामकाजी जीवन का अधिकांश समय इस ढांचे के अंदर बिताया है। पहले एक नागरिक के रूप में और एक प्रोफेशनल के रूप में, फिर भारत सरकार में कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन का प्रभार सौंपे गए मंत्री के रूप में, जिस विभाग का काम ही स्टील फ्रेम की जांच करना और यह पूछना है कि क्या फिर से तैयार करने की आवश्यकता है। इसलिए जब मुझसे पूछा जाता है कि क्या भारत ने अपनी नौकरशाही में सुधार किया है, तो मेरे उत्‍तर में न तो किसी संस्थान की रक्षा करने वाले व्यक्ति का ढाल बनना है, न ही किसी ऐसे व्यक्ति की निंदा है जिसने इसे छोड़ दिया है। यह एक ऐसे व्यक्ति का उत्तर है, जिसने एक ऐसी प्रणाली के बारह वर्षों के शांत लेकिन दृढ़ पुनर्निर्माण को अंदर से देखा है, जिसे स्वतंत्रता के बाद से सार्थक रूप से नहीं छुआ गया था। अगर श्री नरेन्द्र मोदी, जो अपनी पथ-प्रदर्शक सोच के लिए जाने जाते हैं, भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में पदभार नहीं संभालते तो शायद अब भी अछूता रह गया होता।

विचार करें कि हमने कहां से शुरुआत की। 2014 में, केंद्र सरकार से एक नागरिक की शिकायत को अगर हल कर लिया गया, तो इसे करने में औसतन 157 दिन लगे। अगर शिकायत दर्ज कर भी ली गई, तो इसका मतलब देश भर में फैले मुश्किल से दस हजार शिकायत अधिकारियों के साथ एक प्रणाली की खोज करना था, जिनमें से अधिकांश तक पहुंच नहीं थी और वे सभी किसी भी वास्तविक समय सीमा के प्रति कोई जवाबदेह नहीं थे। नौकरी के लिए सरकारी कार्यालय के बाहर कतार में खड़ा एक युवक, अपने पति की पेंशन फ़ाइल का पता लगा रही एक विधवा, यह जानने की कोशिश में लगा एक किसान कि उसके फसल बीमा दावे की फाइल किसी मंत्रालय की अलमारी में से क्यों गायब हो गई, इन सबके सामने एक ही स्थिति थी। उनका सामना नागरिकों को प्रतीक्षा कराने के लिए डिज़ाइन की गई एक सिस्‍टम से और ऐसे अधिकारियों से था, जिनका किसी भी परिणाम के प्रति कोई उत्‍तरदायित्‍व नहीं था। यह केवल अक्षमता नहीं थी। यह उस प्रशासन का अंतिम जीवित अवशेष था जिसका निर्माण समाधान उपलब्‍ध कराने के बजाय डराने के लिए किया गया था।

आज के साथ इसकी तुलना राय का विषय नहीं है; यह संख्याओं में वर्णित है। शिकायत निपटान का समय 157 दिन घटकर 15 दिन रह गया है। आज का हमारा सिस्‍टम नौ गुना अधिक सालाना लगभग 3 लाख से बढ़कर 27 लाख शिकायतों का निवारण करता है। इन शिकायतों का निवारण करने वाले अधिकारियों की संख्‍या दस गुना से अधिक बढ़कर एक लाख तक पहुंच गई है। इस वर्ष मार्च में ही, केंद्रीय सचिवालय ने लगातार पैंतालीसवें महीने में एक लाख शिकायतों के निवारण के आंकड़े को पार कर लिया है। हमने केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (सीपीजीआरएएमएस) का एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म में निर्माण किया है जो अब 22 भाषाओं में बोलता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके एक नागरिक की शिकायत को सही डेस्क पर ले जाता है। यहां तक कि एक दूरस्‍थ गांव में एक किसान की आवाज में, उसकी अपनी भाषा में, एक चैटबॉट के माध्यम से शिकायत दर्ज करने में सक्षम बनाता है। काफी जानबूझकर, हमने इसका नाम समाधान दीदी अर्थात् ‘समाधान करने वाली बहन’ रखा था। जिस ग्रामीण को अपने काम के लिए कभी जिला कार्यालय की यात्रा करने की आवश्यकता होती थी और उम्‍मीद करनी होती थी कि उसका काम सरलता से हो जाए, वह अब अपनी पंचायत में एक सामान्य सेवा केंद्र से यह काम कर सकता है। हर महीने की बीस तारीख को सीएससी-सीपीजीआरएएमएस दिवस के रूप में निर्धारित किया जाता है ताकि यह वादा अंतिम मील तक पहुंच सके।

लेकिन वह गहरा परिवर्तन, जिसे मैं स्टील फ्रेम का सच्चा सुधार मानता हूं, वह डिजिटल प्लंबिंग नहीं है। यह इस दर्शन में बदलाव है कि हम अपने प्रशासनिक अधिकारियों का निर्माण कैसे करते हैं। 70 वर्षों तक, सरकार “नियम-आधारित” संस्कृति पर चलती रही: एक अधिकारी को इस बात से आंका जाता था कि क्या उसने सही प्रक्रिया का पालन किया था, न कि इस बात से कि उसने नागरिक की समस्या को हल किया है या नहीं। 2020 में, हमने मिशन कर्मयोगी लॉन्च किया, जो प्रशासनिक सेवा क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम है। हमने इस कार्यक्रम को इसी “भूमिका-आधारित” संस्कृति में परिवर्तित करने के लिए लॉन्‍च किया था,  जहां एक अधिकारी को इस आधार पर प्रशिक्षित और मूल्यांकन किया जाता है कि उसकी नौकरी वास्तव में उससे क्या मांग करती है, न कि औपनिवेशिक युग की नियम पुस्तिका में क्‍या वर्णन किया गया है। आज एक ग्राम-स्तरीय क्लर्क से लेकर भारत सरकार के सचिव तक 1.65 करोड़ से अधिक सरकारी कर्मचारी, आईजीओटी कर्मयोगी नामक एक सामान्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सीखते हैं, जो अब हिंदी और सत्रह अन्य भारतीय भाषाओं में पांच हजार से अधिक पाठ्यक्रम संचालित करता है। पहली बार, हमने औपचारिक रूप से इस सीखने को एक अधिकारी की पदोन्‍नति के लिए आवश्‍यक वार्षिक मूल्‍यांकन अर्थात्  निष्‍पादन मूल्यांकन रिपोर्ट से जोड़ा है। अब निरंतर सीखना एक गुण नहीं रह गया, जिसका कोई अच्‍छा अधिकारी अभ्यास करता है, बल्कि इसे सीधे उसके करियर से जुड़ा हुआ एक मापतंत्र (मेट्रिक) बना दिया गया है। यह निष्‍पादन जवाबदेही है, एक नारे के रूप में नहीं बल्कि एक तंत्र के रूप में।

हमने अधिकारियों की भर्ती और प्रशिक्षण के तरीके से औपनिवेशिक अवशेषों को हटाने के लिए चुपचाप लेकिन लगातार काम किया है। 2016 के बाद से, निचले और मध्यम स्तर की सरकारी नौकरियों, ग्रुप सी और अराजपत्रित ग्रुप बी पदों के लिए साक्षात्कार, जिन पदों पर पारंपरिक रूप से एक साक्षात्कार का मतलब पक्षपात होता था और अक्सर रिश्वत दी जाती थी, को केंद्र सरकार के कार्यालयों में समाप्त कर दिया गया है। 24 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों ने भी इसका अनुसरण किया है। हमने पुरानी आवश्यकता को खत्‍म कर दिया कि एक उम्मीदवार को एक सरकारी फॉर्म भरने के लिए भरोसा करने से पहले एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित और पुष्टि की जाए। यह एक औपनिवेशिक युग की प्रथा थी जो हर नागरिक को जालसाजी का दोषी मानती थी जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए। हम नौकरशाही औपचारिकता के लिए महीनों इंतजार करवाने के बजाय सफल उम्मीदवारों को पुलिस सत्यापन होने तक अस्थायी रूप से अपनी नई नौकरियों में शामिल होने देते हैं। हमने 1600 से अधिक अप्रचलित कानूनों को निरस्त कर दिया है, जिनका उद्देश्य केवल हमें यह याद दिलाना था कि हम पर पहले किसने शासन किया था। आज जब मैं युवा अधिकारियों से मिलता हूं, तो मैं उन्हें स्पष्ट रूप से बताता हूं कि मैंने इस साल की शुरुआत में उनसे क्‍या कहा था: कि अभी भी दिमाग में सबसे बड़ा सुधार करने की आवश्‍यकता यह है कि अपनी “औपनिवेशिक मानसिकता” को दूर किया जाए। जब प्रधानमंत्री ने हमारे मंत्रालय को नॉर्थ ब्लॉक, जिसका हर पत्‍थर किसी साम्राज्‍य पर शासन के लिए बिछाया गया था, से बाहर कर्तव्‍य भवन में स्‍थानांतरित किया, तो यह केवल पते में बदलाव नहीं था। यह एक वक्‍तव्‍य था कि भारत का कामकाजी शब्‍द कर्तव्य होना चाहिए, न कि नियंत्रण। 

इस सब के साथ-साथ एक शांत सुधार चल रहा है, जिसका उद्देश्य कार्यालय के बाहर के नागरिक के लिए नहीं बल्कि उन महिलाओं पर है जो कार्यालय को भीतर से चलाती हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास के अधिकांश समय में, सरकारी सेवारत महिलाओं को जन्म के समय अपने एक बच्चे को खो देने पर शोक मनाने के लिए कोई औपचारिक छुट्टी नहीं थी; आज वह साठ दिनों के विशेष मातृत्व अवकाश की हकदार है। यह एक ऐसी पात्रता है, जिसे हमने 2022 में प्रदान किया था। इसे मैं केवल करुणा की एक अतिदेय भावना कह सकता हूं, जिसे हमने तब से उन सभी माताओं को उपलब्‍ध कराया है जो सरोगेसी के माध्यम से भी अपने परिवार की देखरेख करती हैं। हम चाइल्ड केयर लीव की सुविधा का लाभ महिलाओं की हर पोस्टिंग तक उपलब्‍ध कराते हैं। यहां तक कि सरकार उसे विदेश यात्रा के लिए भी इसका उपयोग करने की अनुमति देती है। एक सिंगल मदर को एक कैलेंडर वर्ष में इसके छह अवसर देते हैं, जबकि दूसरों को केवल तीन की ही अनुमति दी जाती है। जो महिला जो अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने का साहस करती है, वह अब नब्बे दिनों की छुट्टी की हकदार है, जबकि उसकी शिकायत की जांच अपना काम करती है, यह छुट्टी उसके अपने खाते से नहीं काटी जाती है। दिव्‍यांग महिला अधिकारियों को नवजात शिशु की परवरिश में मदद करने के लिए मासिक भत्ता मिलता है। सरकारी कर्मचारी के दिव्यांग बच्चे के लिए शिक्षा भत्ता दोगुना कर दिया गया है। इनमें से कुछ भी जीडीपी चार्ट में दिखाई नहीं देगा, लेकिन यह इस बात में दिखाई देता है कि क्या एक महिला अब सरकारी सेवा में बने रहने का विकल्प चुनती है जिससे वे एक लंबे समय तक चुपचाप बाहर रही थी। यह भी कि सिविल सेवा ईमानदारी से कह सकती है कि वह जेंडर समानता का वास्‍तव में अनुपालन करती है, न कि केवल साल में एक बार बैनर पर प्रदशित करती है।

बेशक, इनमें से कोई भी मायने नहीं रखता है, जब तक कि एक आम नागरिक के जीवन में कुछ न बदले, और ऐसा न हो। पिछले कुछ वर्षों में रोजगार मेलों के माध्यम से 12 लाख से अधिक नियुक्ति पत्र दिए गए हैं, जो संपर्क और प्रभाव के पुरान‍े रिवाज के बिना वितरित किए गए हैं। मसूरी में एक कॉमन फाउंडेशन कोर्स है, जहां एक आईएएस अधिकारी और एक आईपीएस अधिकारी अपने अलग-अलग संवादहीनता को बनाए रखने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर प्रशिक्षण लेते हैं, ताकि जब वे वर्षों बाद किसी नागरिक से मिलें, तो वे तीन प्रतिस्पर्धी विभागों के बजाय एक सरकार के रूप में कार्य करें। यह सुविधा अब एक पेंशनभोगी के पास है, जो अब बैंक की कतार में खड़े होने के बजाय अपने घर से डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र बना सकती है। एक युवा आकांक्षी छात्र के पास जो हर परीक्षा के लिए एक ही फॉर्म भरने के बजाय यूपीएससी पोर्टल पर एक बार पंजीकरण करता है। सरकारी सेवा में ओबीसी प्रतिनिधित्व 2014 से 19 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गया है। अंग्रेजों ने हमें जो स्टील फ्रेम छोड़ा था, वह कभी भी रातोंरात नष्ट नहीं होने वाला था, और न ही होना चाहिए; संस्थाएं स्मृति को संजोती हैं और स्मृति के अपने उपयोग होते हैं। इन 12 वर्षों में हमने इसका पुनर्निर्माण करने की कोशिश की है, चुपचाप, अलग-अलग सेवाओं के माध्‍यम से, अलग-अलग नियमों के माध्‍यम से, ताकि जिस ढांचे ने कभी एक साम्राज्य को संभाला था, वही अब उस व्यवस्था को सहारा दे सके, जिसका वादा हमारे संविधान ने वास्तव में अपने लोगों से किया था: ऐसी सरकार जो शासन करने के बजाय सेवा करे और केवल प्रशासन करने के बजाय जनता के प्रति उत्‍तरदायी हो।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री हैं)

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पीके/केसी/एसकेजे/जीआरएस