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आंकड़ों से आपूर्ति तक: आईसीएमआर बेहतर भविष्य के लिए भारत के स्वास्थ्य अनुसंधान को नए सिरे से आकार दे रहा है

“प्रभाव अकेले किसी व्यक्ति से नहीं – बल्कि प्रणालियों के तालमेल से संभव होता है। साथ मिलकर, हम आंकड़ों से… निर्णय … और फिर प्रभाव छोड़ने तक की यात्रा पूरी करेंगे।”


अब जबकि देश ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमारे सामने सवाल सिर्फ बीमारियों का इलाज करने के तरीकों का नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगा लेने वाली एक ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण का भी है जो सबके लिए न्यायसंगत और नई सोच पर आधारित हो। इस बदलाव के केन्द्र में स्वास्थ्य अनुसंधान का एक ऐसा नया दृष्टिकोण है, जो आंकड़ों (डेटा) को निर्णयों से और फिर निर्णयों को प्रभाव से जोड़ता है।


कोविड-19 महामारी से मिले कठोर अनुभवों से सीख लेते हुए, जैव-चिकित्सा अनुसंधान (बायोमेडिकल रिसर्च) की देश की शीर्ष संस्था, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए हैं। इन सुधारों में संस्थागत ढांचे को नए सिरे से तैयार करने से लेकर अनुसंधान के लिए फंड देने और उसे असरदार नतीजों में बदलने के तरीकों को ठोस बनाना शामिल है। जो प्रणाली कभी बिखरी हुई और जांचकर्ताओं की पूछताछ पर टिकी थी, वह अब तकनीक द्वारा संचालित और लक्ष्यों पर केन्द्रित एक इकोसिस्टम में बदल रही है। यह बदलाव महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है। यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप, संस्थान-आधारित समन्वित अनुसंधान की दिशा में एक ऐसी सोची-समझी पहल को दर्शाता है, जहां विज्ञान का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान का सृजन करना नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों का समाधान करना भी है।


इस बदलाव का एक मुख्य आधार आईसीएमआर के संस्थागत ढांचे का पुनर्गठन है। हालिया सुधारों ने कई संस्थानों के दायित्वों को बढ़ाया है और उन्हें सीमित दायरे वाली इकाइयों के बजाय अंतर-विषयक केन्द्रों के रूप में नई पहचान दी है। डिजिटल हेल्थ एवं डेटा साइंस, बच्चों की सेहत, महिलाओं की सेहत, और खून व प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियों जैसे क्षेत्रों की ओर संस्थानों का झुकाव, भारत में बीमारियों के बदलते स्वरूप और तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है। देश भर में – पूर्वोत्तर के डिब्रूगढ़ से लेकर पश्चिम के जोधपुर तक – क्षेत्रीय ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च’ के नेटवर्क का निर्माण एक और अहम कदम है। ये संस्थान राज्य और जिला स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर संक्रियात्मक अनुसंधान (ऑपरेशनल रिसर्च) करेंगे, ताकि जरूरी अनुसंधान और उसके नतीजों का जमीनी स्तर पर सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके। ये कोई मामूली बदलाव नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार विज्ञान की दिशा में एक ऐसे रणनीतिक बदलाव का संकेत हैं जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स और रियल-टाइम डेटा सिस्टम सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं।


अलग-थलग रहकर काम करने के तरीके से हटकर एक आपस में जुड़े हुए राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम की दिशा में बढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब संस्थानों को ऐसे रिसोर्स सेंटरों के तौर पर देखा जा रहा है जो एक साझा राष्ट्रीय मिशन में योगदान दें और किसी एक स्थान पर मिले साक्ष्यों का उपयोग पूरे देश में कार्रवाई के लिए किया जाना सुनिश्चित करें। प्रणालीगत-स्तर की यह सोच एक ऐसे दौर में बेहद जरूरी है जब स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां – चाहे वे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) या महामारी या फिर गैर-संचारी रोगों से जुड़ी हों – जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। संस्थागत सुधारों के साथ-साथ, अनुसंधान से संबंधित फंडिंग इकोसिस्टम को बुनियादी तौर पर फिर से तैयार करना भी जरूरी है। फंडिंग के तरीके की दृष्टि से, आंतरिक (इंट्रा-म्यूरल) और बाह्य (एक्स्ट्रा-म्यूरल) अनुसंधान के बीच का विभाजन बिल्कुल साफ है। लेकिन साथ ही, उन्हें एक अपेक्षाकृत अधिक एकजुट और नतीजे पर केन्द्रित ढांचे के जरिए जोड़ा जाता है। आंतरिक अनुसंधान (इंट्राम्यूरल रिसर्च) अब मुख्य रूप से संस्थान की पहल पर की जाती है। यह स्पष्ट रूप से तय लक्ष्यों के अनुरूप होती है और अनुसंधान के नतीजों को असल इस्तेमाल में लाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे एक तय समय-सीमा के भीतर व्यवस्थित किया जाता है। दूसरी ओर, बाह्य अनुसंधान (एक्स्ट्रा- म्यूरल रिसर्च) को चार चरणों वाले नवाचार चक्र – विवरण, खोज, विकास और आपूर्ति – में फिर से व्यवस्थित किया गया है। इससे अच्छे विचारों को व्यवस्थित तरीके से ऐसे समाधानों में बदला जाना सुनिश्चित होता है, जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।


प्रयोगशाला में की गई खोज से लेकर आम लोगों तक सेवा पहुंचाने तक की यह समन्वित प्रक्रिया, परियोजनाओं को फंड देने के बजाय समाधान तैयार करने की दिशा में एक अहम बदलाव है। इसे ‘नेशनल हेल्थ रिसर्च प्रोग्राम’ (एनएचआरपी) से और मजबूती मिलती है। इस कार्यक्रम ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) एवं क्षय रोग से लेकर मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) जैसे तेरह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की है। मिशन-मोड वाले ये कार्यक्रम वैसे विविध संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, जिन्हें बड़े निवेश और असल नतीजों पर साफ फोकस का समर्थन हासिल है।


तकनीक भी परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही है। डायग्नोस्टिक्स, निगरानी और कार्यक्रम को लागू करने की प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने से शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बीच लंबे समय से चली आ रही खाई को पाटने में मदद मिल रही है। जहां क्षय रोग (टीबी) और डायबिटिक रेटिनोपैथी की जांच में एआई-आधारित उपकरण पहले से ही अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मदद कर रहे हैं, वहीं एआई-संचालित पोषण संबंधी निगरानी (न्यूट्रिशनल मॉनिटरिंग) जैसे रचनात्मक कदम बड़े पैमाने पर कार्यक्रम के कार्यान्वयन को बेहतर बना रहे हैं। टीके (वैक्सीन) पहुंचाने से शुरू हुई और अब कॉर्निया जैसी जरूरी चिकित्सीय आपूर्ति सुनिश्चित करने की विस्तारित भूमिका निभाने वाली ‘आई-ड्रोन’ पहल, इस बात को दर्शाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक भौगोलिक बाधाओं को पार करके समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा सकती है। विज्ञान के मोर्चे पर, चिकित्सा तकनीक (मेडटेक) के दायरे में हो रही प्रगति – जिसमें चिकित्सीय उपकरणों एवं डायग्नोस्टिक्स से लेकर अगली पीढ़ी के टीके और इलाज के तरीके शामिल हैं – मरीजों पर केन्द्रित और अधिक सटीक इलाज को संभव बना रही है। इसके साथ ही, नए एवं साक्ष्यों पर आधारित मॉडलों के जरिए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने की प्रक्रिया को दुनिया भर में पहचान मिल रही है। स्थानीय स्तर पर रचनात्मकता को बढ़ावा देने के कदमों से इन प्रयासों को और मजबूती मिल रही है। फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज जैसी योजनाओं के साथ-साथ मेडटेक-मित्र; और;मेडिकल इनोवेशन-पेटेंट मित्र; जैसे प्लेटफॉर्म, अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक की यात्रा को गति दे रहे हैं। इससे सरकारी फंडिंग से होने वाली वैज्ञानिक प्रगति का लोगों के लिए सस्ती एवं आसानी से उपलब्ध होने वाली तकनीक में बदल जाना सुनिश्चित हो रहा है।


हालांकि, इन सुधारों की असली परख जन-स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव से होती है। ‘इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव’ जैसी पहलों ने यह दिखाया है कि साक्ष्यों पर आधारित रणनीतियां कैसे बड़े पैमाने पर पुरानी बीमारियों के प्रबंधन में बदलाव ला सकती हैं। आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) के क्षेत्र में मिशन-मोड प्रोग्राम, जिनमें मोबाइल स्ट्रोक यूनिट और तेजी से काम करने वाले कार्डियक रिस्पॉन्स सिस्टम शामिल हैं, जानलेवा स्थितियों में इलाज के नतीजों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। डायग्नोस्टिक नेटवर्क का विस्तार और स्वदेशी तकनीकें, कैंसर से लेकर संक्रामक बीमारियों के प्रकोप तक की विभिन्न बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उनके इलाज की प्रक्रिया को बेहतर बना रही हैं। ये कोशिशें ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ के अनुरूप हैं, जो बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने और अच्छी गुणवत्ता वाली देखभाल पर जोर देती हैं। ये समानता के प्रति एक व्यापक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती हैं ताकि वैज्ञानिक प्रगति का लाभ इलाके या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बंधनों से परे हर नागरिक तक पहुंचे। भविष्य की ओर देखते हुए, हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। आईसीएमआर एक उत्प्रेरक के तौर पर काम करना जारी रखेगा और एक मजबूत व तेजी से सक्रिय होना वाला स्वास्थ्य इकोसिस्टम बनाने हेतु अनुसंधानकर्ताओं, डॉक्टरों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत को एक मंच पर लाएगा। वर्ष 2047 का रोडमैप डिजिटल हेल्थ, बायो-मैन्यूफैक्चरिंग और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के क्षेत्र में हुई प्रगति से तय होगा, जिसमें क्षमता विकास और वैश्विक सहयोग पर खास जोर दिया जाएगा।


यह समझना जरूरी है कि स्वास्थ्य अनुसंधान कोई अलग-थलग रहकर किया जाने वाला काम नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास है। आईसीएमआर में हो रहा बदलाव सभी हितधारकों को इस यात्रा में शामिल होने, मिलकर समाधान तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का एक न्योता है कि विज्ञान सबसे सार्थक तरीके से समाज की सेवा करे। स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणाली में सुधार अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ, अधिक न्यायसंगत और अधिक सुदृढ़ भारत का निर्माण होगा – एक ऐसा भारत जहां हर खोज का लाभ लोगों तक पहुंचेगा और हर नए कदम का प्रभाव वास्तव में दिखाई देगा।


(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक हैं)

भारत दुनिया निवेशकों के लिए अवसर की भूमि: पीयूष गोयल

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सिटी इंडिया कॉन्फ्रेंस 2026 में कहा कि भारत आज दुनिया का सबसे भरोसेमंद निवेश गंतव्य बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि भारत न केवल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, बल्कि आने वाले वर्षों में भी यह विकास की गति बनाए रखेगा।

वर्चुअल माध्यम से सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों और भू-राजनीतिक बदलावों के बावजूद भारत ने हर संकट को अवसर में बदला है। व्यापार, विनिर्माण, तकनीक और निवेश के क्षेत्र में देश लगातार मजबूत हो रहा है।

भारत पर बढ़ रहा वैश्विक भरोसा

गोयल ने बताया कि हाल ही में कनाडा और अमेरिका के निवेशकों व उद्योगपतियों के साथ हुई बैठकों में भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। उन्होंने कहा कि भारत को आज एक भरोसेमंद साझेदार, मजबूत लोकतंत्र और विशाल उपभोक्ता बाजार के रूप में देखा जा रहा है।

उनके अनुसार, वैश्विक निवेशकों के लिए अब सवाल यह नहीं है कि भारत में निवेश करना है या नहीं, बल्कि यह है कि वे भारत की विकास यात्रा में कितनी जल्दी शामिल होते हैं।

भारत में निवेश से कंपनियों को मिला बड़ा फायदा

मंत्री ने हुंडई और जेसीबी जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में लंबे समय तक निवेश करने वाली कंपनियों को बड़ा लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि आज जेसीबी भारत में बने उत्पादों का निर्यात 130 से अधिक देशों में कर रही है।

मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेगा कारोबार

पीयूष गोयल ने बताया कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में भारत ने 38 विकसित देशों के साथ 9 मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं। इससे भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौता 1 जून 2026 से लागू हो चुका है और अगले छह महीनों में दो से तीन अन्य महत्वपूर्ण व्यापार समझौते भी लागू होने की संभावना है।

100 नए औद्योगिक पार्क होंगे विकसित

सरकार देशभर में लगभग 3.5 अरब डॉलर की लागत से 100 आधुनिक औद्योगिक पार्क विकसित करेगी। इन पार्कों में तैयार फैक्ट्रियां, श्रमिक आवास, जल एवं बिजली सुविधाएं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय मंजूरियों जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

बुनियादी ढांचे पर बड़ा निवेश

गोयल ने बताया कि भारत बंदरगाहों, सड़कों, राजमार्गों, हवाई अड्डों और ग्रामीण संपर्क परियोजनाओं पर लगभग 130 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। पिछले एक दशक में देश की बंदरगाह और हवाई अड्डा क्षमता दोगुनी हो चुकी है।

सेमीकंडक्टर और AI पर फोकस

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य उभरती तकनीकों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि टाटा और एएसएमएल मिलकर भारत में पहला सेमीकंडक्टर उपकरण निर्माण संयंत्र स्थापित कर रहे हैं।

2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य

पीयूष गोयल ने कहा कि भारत 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने निवेशकों से भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनने का आह्वान करते हुए कहा कि देश में निवेश, नवाचार और विनिर्माण के लिए अपार अवसर मौजूद हैं।

उन्होंने विश्वास जताया कि भारत 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक विकास गाथा बनकर उभरेगा और वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक बाजार बना रहेगा।

भारत-दक्षिण अफ्रीका ने एआई, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण में सहयोग बढ़ाने पर जताई सहमति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और दक्षिण अफ्रीका ने भविष्य की प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को नई गति देने पर सहमति व्यक्त की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अवसंरचना, उन्नत विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी और नवाचार आधारित साझेदारी दोनों देशों के संबंधों के अगले चरण की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरकर सामने आई हैं।

यह सहमति केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और दक्षिण अफ्रीका की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार उपमंत्री डॉ. नोमालुंगेलो जीना के बीच नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में आयोजित उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक के दौरान बनी। बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ वैज्ञानिक, नीति निर्माता और अधिकारियों ने भाग लिया।

नवाचार आधारित साझेदारी पर जोर

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के संबंधों को पारंपरिक अनुसंधान सहयोग से आगे बढ़ाकर नवाचार-संचालित साझेदारी में बदलने की आवश्यकता है, जो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक प्रभाव पैदा कर सके।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास पूरक क्षमताएं हैं, जिनका उपयोग कर विकासशील देशों के लिए किफायती, समावेशी और विस्तार योग्य तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स, नवाचार एजेंसियों और उद्योग जगत के बीच गहन सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।

एआई, क्वांटम तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर फोकस

बैठक के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, साइबर-भौतिक प्रणालियां, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्टार्टअप आधारित नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे नवाचार पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल है और राष्ट्रीय स्तर पर चल रही विभिन्न तकनीकी पहलों के कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर पैदा हुए हैं।

उन्होंने कहा कि विज्ञान का उद्देश्य केवल शोध तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे ऐसे समाधानों में परिवर्तित किया जाना चाहिए जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाएं, रोजगार सृजित करें और अर्थव्यवस्था को मजबूती दें।

स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी और वैक्सीन अनुसंधान में नए अवसर

दोनों देशों ने जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स, टीका विकास, स्वास्थ्य तकनीकों और महामारी तैयारी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कोविड-19 महामारी के अनुभव ने मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियों और वैज्ञानिक साझेदारियों की आवश्यकता को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन निर्माण, किफायती स्वास्थ्य तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी में भारत की विशेषज्ञता दक्षिण अफ्रीका के साथ सहयोग के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

उन्नत विनिर्माण और डिजिटल तकनीकों में साझेदारी

बैठक में उन्नत सामग्री, विनिर्माण, भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी और डिजिटल अवसंरचना को भारत-दक्षिण अफ्रीका संयुक्त समिति के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया। दोनों पक्षों ने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच संवाद बढ़ाकर इन क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं विकसित करने पर सहमति व्यक्त की।

दक्षिण अफ्रीका ने नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, स्वास्थ्य विज्ञान, डिजिटल तकनीक, कौशल विकास और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग को और मजबूत करने की इच्छा जताई।

खगोल विज्ञान में सहयोग की समीक्षा

बैठक के दौरान दोनों देशों ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में चल रहे सहयोग की भी समीक्षा की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्क्वायर किलोमीटर ऐरे (SKA) परियोजना को 21वीं सदी की सबसे महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक पहलों में से एक बताते हुए कहा कि यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि इस परियोजना से वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, तकनीकी नवाचार और मानव संसाधन विकास को बढ़ावा मिलेगा।

ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण की भूमिका

डॉ. जितेंद्र सिंह ने दक्षिण अफ्रीका को अगस्त 2026 में चेन्नई में आयोजित होने वाली ब्रिक्स विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार मंत्रिस्तरीय बैठक में सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स सहयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग, जल संसाधन प्रबंधन और सटीक कृषि जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान एवं नवाचार के नए अवसर प्रदान कर रहा है।

वहीं, दक्षिण अफ्रीका ने भारत को साइंस फोरम साउथ अफ्रीका-2026 में भाग लेने का निमंत्रण दिया, जो अफ्रीका के प्रमुख वैज्ञानिक संवाद मंचों में से एक माना जाता है।

30 वर्षों से मजबूत वैज्ञानिक साझेदारी

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग की नींव वर्ष 1995 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समझौते से पड़ी थी। तब से दोनों देश खगोल विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, भूविज्ञान और उन्नत सामग्रियों सहित कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं।

दोनों देशों ने अब तक लगभग 150 सह-वित्तपोषित अनुसंधान परियोजनाओं को समर्थन दिया है और भविष्य में इस सहयोग को और व्यापक बनाने पर सहमति जताई है।

बैठक का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि भारत और दक्षिण अफ्रीका अनुसंधान उत्कृष्टता, प्रौद्योगिकी विकास, स्टार्टअप सहयोग और वैज्ञानिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक मजबूत एवं भविष्य उन्मुख नवाचार साझेदारी का निर्माण करेंगे, जो दोनों देशों के विकास के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को भी नई दिशा देगी।