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भूमि शासन एवं वाटरशेड प्रबंधन में सहयोग को लेकर भूमि संसाधन विभाग और एडीबी के बीच चर्चा


नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भूमि संसाधन विभाग के सचिव ने एडीबी के साथ बैठक में भूमि शासन सुधारों और डिजिटल पहलों पर प्रकाश डाला

नई दिल्ली, 21 मई: ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के सचिव श्री नरेन्द्र भूषण ने आज एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की कंट्री डायरेक्टर सुश्री मियो ओका के नेतृत्व में एडीबी प्रतिनिधिमंडल के साथ एक परिचयात्मक बैठक की। बैठक के दौरान, श्री नरेन्द्र भूषण ने 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के सरकार के विजन के अनुरूप भूमि प्रशासन, भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण और जलसंभर विकास के क्षेत्रों में भूमि संसाधन विभाग द्वारा की जा रही प्रमुख पहलों पर प्रकाश डाला।

सचिव ने कहा कि भूमि संसाधन विभाग को देश में भूमि अभिलेख प्रबंधन और भूमि प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि कुशल भूमि प्रशासन और भूमि संसाधनों का अधिकतम उपयोग आर्थिक विकास को गति देने, भूमि संपत्तियों के मूल्य को उजागर करने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

भूमि प्रशासन में प्रौद्योगिकी की परिवर्तनकारी भूमिका पर बल देते हुए, श्री भूषण ने प्रतिनिधिमंडल को सूचित किया कि डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) के तहत महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की गई है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रिकॉर्ड्स ऑफ राइट्स का डिजिटलीकरण लगभग पूर्ण हो चुका है, जबकि देश भर में लिखित भूमि अभिलेखों को जमाबंदी नक्शों से जोड़ने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं।

उन्होंने बताया कि विभाग कार्यक्रम के अगले चरण, डीआईएलआरएमपी 3.0 लागू करने की प्रक्रिया में है, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी उपाय, भूमि अभिलेखों के गतिशील अद्यतन और भूमि संबंधी डेटाबेस के बेहतर एकीकरण के माध्यम से भूमि शासन प्रणालियों को और सुदृढ़ करना है। सचिव ने देश भर में भूमि पार्सलों को विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (यूएलपीआईएन), जिसे “भू-आधार” भी कहा जाता है, के आवंटन में हुई प्रगति को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 66 प्रतिशत कृषि भूमि पार्सलों के लिए यूएलपीआईएन जारी किए जा चुके हैं।

श्री भूषण ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) की अगली परत के रूप में एक व्यापक “लैंड स्टैक” विकसित करने के विभाग के विजन को साझा किया, जिसमें भूमि अभिलेख, पंजीकरण, म्यूटेशन, भूमि उपयोग और अन्य संबंधित सेवाओं को अंतरसंचालनीय डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से एकीकृत करके बेहतर शासन और सेवा वितरण सुनिश्चित किया जाएगा। उन्होंने शहरी क्षेत्रों में आधुनिक भूमि शासन पद्धतियों के विस्तार के लिए विभाग की चल रही पहलों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें मानचित्रण और प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान शामिल हैं।

जलसंभर विकास के विषय पर, सचिव ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के लिए जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ भूमि एवं जल प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने देश भर में जलसंभर विकास पहलों को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए नवीन वित्तपोषण मॉडल, प्रौद्योगिकी उपाय और संयोजन-आधारित दृष्टिकोणों की आवश्यकता पर बल दिया।

बैठक में भूमि प्रशासन, जलसंभर विकास, डिजिटल शासन और सतत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर भी विचार-विमर्श किया गया। शासन के परिणामों में सुधार के लिए भू-स्थानिक प्रणालियों, डिजिटल प्लेटफार्मों, रिमोट सेंसिंग और डेटा-आधारित योजना सहित उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग पर चर्चा हुई।

सुश्री मियो ओका ने सचिव को भारत में विभिन्न क्षेत्रों में एशियाई विकास बैंक द्वारा समर्थित विभिन्न पहलों और परियोजनाओं तथा राज्य सरकारों के साथ जारी सहयोग के बारे में जानकारी दी। उन्होंने डिजिटल कृषि, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, जलसंभर प्रबंधन और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में एडीबी के कार्यों पर प्रकाश डाला और आपसी हित के क्षेत्रों में भूमि संसाधन विभाग के साथ सहयोग करने में एडीबी की गहरी रुचि व्यक्त की।


दोनों पक्षों ने देश में सतत भूमि और जलसंभर प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करने के लिए तकनीकी सहायता, नीतिगत समर्थन, क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण सहित भविष्य में सहयोग के अवसरों पर चर्चा की।

इस बैठक में अपर सचिव श्री आर आनंद; संयुक्त सचिव श्री पी. नरहरि; संयुक्त सचिव श्री नितिन खाडे; आर्थिक सलाहकार श्री पी.के. अब्दुल करीम; और मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

भुवनेश्वर में पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी ने किया उद्घाटन

ओडिशा / सत्ता संदेश

ओडिशा में क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में पूर्वी भारत की खेती को नई दिशा देने के लिए साझा रोडमैप पर गहन मंथन

श्री शिवराज सिंह चौहान बोले- पूर्वी भारत बन सकता है देश के कृषि विकास का ग्रोथ इंजन

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग, दलहन-तिलहन और टिकाऊ खेती पर दिया जोर

खेत बचाओ, माटी बचाओ, किसान बचाओ के संदेश के साथ केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह का संतुलित उर्वरक उपयोग पर बल

फार्मर आईडी, वैज्ञानिक अनुसंधान और खरीद व्यवस्था को श्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया बदलाव की कुंजी

नकली खाद व कीटनाशक और घटिया बीज किसानों के खिलाफ बड़ा अपराध, ऐसे तत्वों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया जाएगा- श्री शिवराज सिंह

मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी ने बताई क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन, मिलेट्स, ऑर्गेनिक खेती और किसान-हितैषी पहल

द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण व ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने आज भुवनेश्वर के मेफेयर कन्वेंशन में ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी के साथ पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का उद्घाटन किया। केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने पूर्वी भारत की कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ, वैज्ञानिक और लाभकारी बनाने का सशक्त आह्वान किया। ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल से जुड़े इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में दलहन-तिलहन उत्पादन, छोटी जोत वाले किसानों के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग, प्राकृतिक खेती, किसान रजिस्ट्री, बागवानी, कृषि ऋण, विपणन, नकली कृषि आदानों पर नियंत्रण और किसान आय वृद्धि जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा का खाका रखा गया।

पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह आयोजन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की कृषि, किसानों की आजीविका और क्षेत्रीय कृषि रणनीति को नई दिशा देने के लिए गंभीर विचार-विमर्श का मंच है। श्री चौहान ने कहा कि महाप्रभु जगन्नाथ की पावन धरती पर एकत्र हुई यह “टीम एग्रीकल्चर” पूर्वी भारत की खेती की हालत को बेहतर बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के संकल्प के साथ बैठी है। उन्होंने पूर्वी भारत की उर्वरा भूमि, जल उपलब्धता, विविध जलवायु और किसानों की मेहनत को इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि थोड़े से सही प्रयासों से यही क्षेत्र भारत के कृषि विकास का ग्रोथ इंजन बन सकता है।

केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने किसानों को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि जीवनदाता बताते हुए कहा कि किसानों की सेवा ही भगवान की पूजा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश विकसित, आत्मनिर्भर, समृद्ध और शक्तिशाली भारत की ओर बढ़ रहा है और इस यात्रा की रीढ़ कृषि है। उन्होंने कृषि के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य रखे- 140 करोड़ देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, पोषणयुक्त आहार उपलब्ध कराना और किसानों की बेहतर आजीविका व आय वृद्धि सुनिश्चित करना।

श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उत्पादन बढ़ाना, लागत घटाना, उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना, नुकसान होने पर भरपाई करना और कृषि का विविधीकरण करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि केवल धान और गेहूं से काम नहीं चलेगा, बल्कि दलहन, तिलहन, फल, सब्जियां और अन्य उच्च मूल्य फसलों की ओर भी आगे बढ़ना होगा, क्योंकि पूर्वी भारत में इन सभी क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं।

उन्होंने कहा कि पूर्वी राज्यों में छोटी जोत एक बड़ी वास्तविकता है, इसलिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग को केवल नारा नहीं, बल्कि जमीन पर उतरा हुआ मॉडल बनाना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अनाज के साथ फल, सब्जियां, मछली पालन, पशुपालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी जैसी गतिविधियों को जोड़कर छोटे किसान की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। उन्होंने आईसीएआर, कृषि मंत्रियों और अधिकारियों से आग्रह किया कि इंटीग्रेटेड फार्मिंग के मॉडल किसानों तक प्रेरक और व्यवहारिक रूप में पहुंचें।

केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह ने टिकाऊ कृषि की दिशा में मृदा स्वास्थ्य की रक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि बिना मृदा परीक्षण के अंधाधुंध खाद का प्रयोग खर्च भी बढ़ाता है और धरती की सेहत भी बिगाड़ता है, इसलिए किसानों को आवश्यकतानुसार ही उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित करना होगा। उन्होंने प्राकृतिक खेती को भी प्रधानमंत्री के फोकस का क्षेत्र बताते हुए किसानों से अपनी जमीन के एक हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाने का आग्रह किया।

श्री चौहान ने बताया कि 1 जून से “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया जाएगा, जिसके माध्यम से संतुलित खाद उपयोग, मिट्टी की सेहत, आधुनिक तकनीक, योजनाओं की जानकारी और किसान जागरूकता पर विशेष बल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि उर्वरकों के डायवर्जन पर रोक लगानी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि सब्सिडी वाला खाद केवल किसान और खेती के काम में ही उपयोग हो। उन्होंने नकली खाद, घटिया बीज और नकली कीटनाशकों को किसानों के खिलाफ बड़ा अपराध बताते हुए कहा कि ऐसे तत्वों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कड़े कानून की आवश्यकता है और राज्यों को इस दिशा में सख्ती से कार्रवाई करनी होगी, ताकि किसानों की लागत न बढ़े और उन्हें गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान मिल सके।

श्री शिवराज सिंह चौहान ने दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर विशेष बल देते हुए कहा कि पूर्वी क्षेत्र देश को इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने की मजबूत क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि दाल और तिलहन की खेती को बढ़ावा तभी मिलेगा जब किसान को यह भरोसा होगा कि उसकी उपज की खरीद सुनिश्चित है, इसलिए पीएम-आशा, खरीद प्रणाली, नैफेड, एनसीसीएफ और राज्य एजेंसियों की भूमिका को और प्रभावी बनाना होगा।

केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने वैज्ञानिक शोध और तकनीक को खेत तक पहुंचाने पर जोर देते हुए कहा कि आईसीएआर, कृषि विज्ञान केंद्रों और वैज्ञानिक संस्थानों का ज्ञान सीधे किसानों तक पहुंचे, यह समय की मांग है। उन्होंने राज्यों से आग्रह किया कि वे अपनी परिस्थितियों के अनुरूप विशेष अभियान चलाएं, ताकि रिसर्च, अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और योजनाओं की जानकारी समयबद्ध तरीके से किसानों तक पहुंचे।

उन्होंने फार्मर आईडी को किसान तक सुविधाएं सरल, पारदर्शी और तेज तरीके से पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बताया। उनके अनुसार फार्मर आईडी से किसान की जमीन, परिवार और अन्य विवरण एक जगह उपलब्ध होने से ऋण, उर्वरक वितरण और योजना लाभ में अनावश्यक देरी तथा परेशानी कम होगी, इसलिए इसे तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

श्री चौहान ने बागवानी, आम जैसी उच्च मूल्य फसलों, निर्यात क्षमता, स्वच्छ पौध सामग्री, नर्सरी व्यवस्था और बाजारोन्मुख कृषि पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि पूर्वी भारत के कई राज्यों में फल, सब्जियां और विशिष्ट फसलें न केवल देश के भीतर बल्कि निर्यात के स्तर पर भी किसानों को अधिक मूल्य दिलाने की क्षमता रखती हैं।

ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी ने कहा कि पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन पूर्वी राज्यों के लिए कृषि भविष्य का साझा रोडमैप तैयार करने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मेलन पूर्वोदय की परिकल्पना को बल देगा और पूर्वी भारत की कृषि उत्पादकता, जलवायु-अनुकूल खेती और समावेशी कृषि विकास को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

मुख्यमंत्री श्री मांझी ने कहा कि ओडिशा मूल रूप से कृषि प्रधान राज्य है और कृषि यहां की आजीविका, खाद्य सुरक्षा तथा सामाजिक-आर्थिक विकास का मुख्य आधार है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कृषि को अधिक समावेशी, जलवायु अनुकूल और किसान-केंद्रित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तथा इसी दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।

उन्होंने बताया कि दाल उत्पादन, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता, क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन और खेती के विस्तार पर राज्य विशेष रूप से काम कर रहा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि धान उत्पादन और खरीद बढ़ने के साथ भंडारण, निकासी और विपणन की चुनौतियां भी सामने आई हैं, इसलिए अधिक उत्पादन के साथ बेहतर प्रबंधन, मूल्य संवर्धन और बाजार व्यवस्था पर समानांतर रूप से कार्य करना आवश्यक है।

श्री मांझी ने राज्य की किसान-हितैषी पहलों का उल्लेख करते हुए धान खरीद, इनपुट सहायता, पीएम-किसान के साथ सीएम-किसान सहायता, फसल बीमा, कृषि यंत्रीकरण, एफपीओ सशक्तीकरण, कोल्ड स्टोरेज विस्तार और कृषि उद्योग प्रोत्साहन की चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसानों को टिकाऊ और लाभकारी खेती से जोड़ने के लिए नीति समर्थन, बुनियादी ढांचा, संगठित विपणन और उद्यमिता आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है।

मुख्यमंत्री ने मिलेट्स को सुपर फूड बताते हुए कहा कि यह कम पानी और कम खाद में उगने वाली महत्वपूर्ण फसल है, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों के लिए इसकी बड़ी उपयोगिता है। उन्होंने ऑर्गेनिक खेती, पारंपरिक खाद्यान्न प्रजातियों के संरक्षण, जैव विविधता के पुनर्जीवन और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा इन क्षेत्रों में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

उन्होंने एफपीओ, कोल्ड स्टोरेज, कृषि उद्यमिता, कॉफी उत्पादन और स्थानीय कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन को ओडिशा की प्राथमिकताओं में बताया। उनके अनुसार पूर्वी भारत के राज्यों के बीच श्रेष्ठ प्रथाओं, नवाचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान इस सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि बनेगा और यहां से निकले निष्कर्ष कृषि आत्मनिर्भरता तथा किसान समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होंगे।

इस अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी एवं श्री रामनाथ ठाकुर, ओडिशा के उपमुख्यमंत्री एवं कृषि मंत्री श्री कनक वर्धन सिंह देव, बिहार के कृषि मंत्री श्री विजय कुमार सिन्हा, छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री श्री रामविचार नेताम, पश्चिम बंगाल सरकार के प्रतिनिधि-मंत्री श्री अशोक कीर्तनिया, केंद्रीय कृषि सचिव श्री अतीश चंद्रा, आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट तथा केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, किसान प्रतिनिधि, केवीके, एफपीओ, स्टार्टअप्स, नाबार्ड और बैंकों से जुड़े प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

केंद्रीय कृषि मंत्री की अध्यक्षता में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमेटी पर हुई उच्च-स्तरीय बैठक


भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कार्यों की केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने की विस्तृत समीक्षा

इंटीग्रेटेड और सस्टेनेबल फार्मिंग को बढ़ावा देकर किसानों की आय भी बढ़ाएंगे और धरती माँ को भी बचाएंगे- केंद्रीय मंत्री

भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, कम लागत वाली तथा लाभकारी पेशा बनाने के लिए करेंगे हरसंभव प्रयास- श्री शिवराज सिंह चौहान

कृषि देश की बड़ी आबादी की जीविका का प्रमुख साधन और भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार स्तंभ- केंद्रीय कृषि मंत्

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमेटी (EFC) से संबंधित एक उच्च स्तरीय बैठक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज 12, सफदरजंग रोड स्थित उनके कैंप कार्यालय में आयोजित की गई।

बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। इस अवसर पर आईसीएआर के महानिदेशक तथा डेयर सचिव डॉ एम एल जाट ने केंद्रीय कृषि मंत्री को देशभर में आईसीएआर के अंतर्गत संचालित विभिन्न कार्यक्रमों एवं गतिविधियों की जानकारी विस्तार से दी। उन्होंने भविष्य की कार्ययोजना से भी केंद्रीय मंत्री को अवगत कराया तथा बताया कि भारतीय कृषि एवं किसान बहनों-भाइयों को अधिकतम लाभ पहुंचाने के लिए परिषद किस प्रकार कार्य कर रही है।

बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि कृषि देश की बड़ी आबादी की जीविका का प्रमुख साधन है और भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि हमारी सम्पूर्ण कोशिश और ऊर्जा इस दिशा में केंद्रित होनी चाहिए कि भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, कम लागत वाली तथा लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सके।

केंद्रीय मंत्री ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग के व्यापक प्रचार-प्रसार पर विशेष बल देते हुए कहा कि किसान बहन-भाइयों को इसे व्यावहारिक रूप से अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने कहा कि इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी तथा सतत कृषि (सस्टेनेबल फार्मिंग) को मजबूती मिलेगी।

श्री चौहान ने कहा कि वैज्ञानिक कृषि आज समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत सहित विश्वभर में जलवायु परिवर्तन की समस्या अब प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगी है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि राज्यों की कृषि-जलवायु (एग्रो-क्लाइमेटिक) परिस्थितियों के अनुरूप राज्यवार कृषि रोडमैप तैयार करने की दिशा में राज्यों की सहमति से तेजी से कार्य किया जाए।

अधिकारियों ने केंद्रीय मंत्री को अवगत कराया कि आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम एवं राजस्थान जैसे राज्यों के अनुरोध पर इस दिशा में कार्य प्रगति पर है तथा शीघ्र ही इन राज्यों का स्वतंत्र कृषि रोडमैप तैयार किया जाएगा।

आईसीएआर की कार्ययोजना पर संतोष प्रकट करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री ने और अधिक ऊर्जा और उत्साह से अधिकारियों को कार्य करने के निर्देश दिए जिससे समयपूर्व लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में भूमि संसाधन विभाग के सचिव श्री नरेंद्र भूषण ने वाटरशेड विकास परियोजनाओं की समीक्षा की

छत्तीसगढ़/ / सत्ता संदेश


प्रतिनिधिमंडल ने सुरक्षात्मक सिंचाई, आजीविका संवर्धन और मृदा एवं जल संरक्षण संबंधी पहलों की समीक्षा की

भारत सरकार के भूमि संसाधन विभाग के सचिव श्री नरेंद्र भूषण के नेतृत्व में ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले के मगरलोद ब्लॉक में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0) के वाटरशेड विकास घटक के अंतर्गत वाटरशेड विकास परियोजनाओं का व्यापक क्षेत्र दौरा किया।

प्रतिनिधिमंडल ने सुरक्षात्मक सिंचाई, आजीविका संवर्धन और मृदा एवं जल संरक्षण पर केंद्रित विभिन्न पहलों की समीक्षा की। इस प्रतिनिधिमंडल में संयुक्त सचिव (वाटरशेड प्रबंधन) श्री नितिन खाडे और जिला अधिकारी श्री अबिनाश मिश्रा शामिल थे।

सांकरा गांव के दौरे के दौरान, सचिव ने वाटरशेड विकास घटक (डब्ल्यूडीसी) और मनरेगा के संयुक्त प्रयासों से निर्मित 40.34 लाख रुपये की लागत से बने एक स्टॉप डैम का निरीक्षण किया। इस डैम से लगभग 80-85 एकड़ भूमि सिंचित हो गई है और 50 से अधिक किसानों को लाभ मिल रहा है। बेलाउदी गांव में, प्रतिनिधिमंडल ने 20.20 लाख रुपये की लागत से विकसित 430 मीटर लंबी सिंचाई नहर की समीक्षा की, जो वर्तमान में लगभग 150 एकड़ भूमि को सिंचित कर रही है और मृदा अपरदन को काफी हद तक कम करने में सहायक है।

प्रतिनिधिमंडल ने सौंगा गांव में पांच एकड़ के वृक्षारोपण स्थल का भी दौरा किया, जहां एक नदी द्वीप पर 1,050 अमरूद और नींबू के पेड़ लगाए गए हैं। जल संकट की समस्या से निपटने के लिए, अधिकारियों ने क्षेत्र में छोटे तालाब बनाने की सलाह दी।

प्रतिनिधिमंडल ने भूजल पुनर्भरण और सामुदायिक जल उपलब्धता में योगदान के लिए बोदरा और गदाडीह गांवों में “अमृत सरोवर” परियोजनाओं की समीक्षा भी की।

इस यात्रा का एक प्रमुख आकर्षण गदाडीह में लिफ्ट सिंचाई परियोजना थी, जो महानदी नदी के जल का उपयोग करके 85 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई करती है, जिससे लगभग 250 किसानों को लाभ होता है। श्री नरेंद्र भूषण ने इस पहल को एक “सफल मॉडल” बताया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे भविष्य की वाटरशेड विकास परियोजनाओं के लिए राज्य-स्तरीय आदर्श के रूप में ऐसी उपलब्धियों का दस्तावेजीकरण करें।

यह दौरा बेलाउदी गांव में एक सब्जी की खेती वाले खेत के निरीक्षण के साथ समाप्त हुआ, जहां किसानों द्वारा अपनी आय बढ़ाने के लिए अपनाई गई बागवानी पद्धतियों की सराहना की गई।

पंजाब सरकार की बड़ी पहल: 16 जिलों में खरीफ मक्का विविधीकरण योजना, किसानों को 17,500 प्रति हेक्टेयर सहायता

अमृतसर/सत्ता संदेश

संवाददाता-विक्रमजीत सिंह/ कैमरामैन- तरजिंदर सिंह

पानी की अधिक खपत करने वाली धान की फसल से किसानों को बाहर निकालकर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने वर्ष 2026–27 के लिए खरीफ मक्का विविधीकरण योजना को 6 जिलों से बढ़ाकर 16 जिलों तक लागू करने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति हेक्टेयर 17,500 की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

यह निर्णय वर्ष 2025–26 के खरीफ सीजन के दौरान छह जिलों में लागू किए गए पायलट प्रोजेक्ट को किसानों से मिले भारी समर्थन के बाद लिया गया है। यह कदम किसानों को धान से मक्का की खेती की ओर प्रेरित कर राज्य में गिरते भूजल स्तर को रोकने की दिशा में एक “निर्णायक कदम” माना जा रहा है।

इस संबंध में जानकारी देते हुए जिला योजना समिति, अमृतसर के चेयरमैन गुरप्रीत सिंह संधू ने बताया कि इस योजना के तहत अमृतसर, बठिंडा, फतेहगढ़ साहिब, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, कपूरथला, लुधियाना, मोगा, पटियाला, पठानकोट, रूपनगर, संगरूर, एसएएस नगर, एसबीएस नगर और तरनतारन जिलों में 20,000 हेक्टेयर (50,000 एकड़) क्षेत्र को खरीफ मक्का के अधीन लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी किसानों को प्रति हेक्टेयर 17,500 की सब्सिडी दी जाएगी।

कुल राशि में से 4,500 इनपुट बिल ब्लॉक कृषि कार्यालय में जमा कराने पर जारी किए जाएंगे, जबकि शेष 13,000 अनिवार्य जियो-टैग्ड फसल सत्यापन के बाद दो किस्तों में दिए जाएंगे।

राज्य के बहुमूल्य भूजल संसाधनों के संरक्षण के लिए किसानों से खरीफ मक्का की बुवाई करने की अपील करते हुए चेयरमैन संधू ने कहा कि इच्छुक किसान सरकारी वेबसाइट https://agrimachinerypb.com पर पंजीकरण कर सकते हैं। इसके लिए अनिवार्य रूप से जे-फॉर्म और खेत की जियो-टैगिंग आवश्यक होगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसान ने पिछले वर्ष धान की खेती की थी और इस वर्ष मक्का की ओर रुख कर रहा है।

उन्होंने आगे बताया कि उन्नत किसान पोर्टल के माध्यम से सत्यापन दो चरणों में किया जाएगा — पहला 15 जुलाई से 25 जुलाई तक तथा दूसरा चरण 5 अगस्त से 15 अगस्त 2026 तक होगा। प्रत्येक सत्यापन के बाद जिला मुख्य कृषि अधिकारी द्वारा 9,500 और 7,500 प्रति हेक्टेयर जारी किए जाएंगे।

उन्होंने जोर देकर कहा कि पंजीकरण से लेकर सत्यापन तक की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके और पात्र किसानों को समय पर सब्सिडी मिल सके।

उन्होंने कहा कि धान-गेहूं का पारंपरिक फसली चक्र अब टिकाऊ नहीं रहा। यह योजना केवल फसल बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि पंजाब के जल संसाधनों को सुरक्षित रखने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

खाद्य सुरक्षा से खाद्यान्नों के मामले में नेतृत्व की ओर: खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में पीएलआई योजना का परिवर्तनकारी प्रभाव
  • श्री अविनाश जोशी

खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की कहानी में एक निर्णायक मोड़

भारत आज अपने आर्थिक सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अब जबकि हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की दिशा में अग्रसर है, विकास को सिर्फ उत्पादन की मात्रा से ही नहीं, बल्कि हमारे द्वारा सृजित मूल्य के आधार पर भी मापना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की तुलना में बहुत कम क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां इस प्रकार का बदलाव बिल्कुल साफ नजर आता है।

भारत खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों, दूध और समुद्री उत्पादों के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। दशकों तक, हमारे कृषि संबंधी सामर्थ्य ने देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। फिर भी, इस उपज का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बेहद ही सीमित मूल्यवर्धन के साथ सीधे खेत से बाजार तक पहुंचता रहा।

आज भारत के कृषि उत्पादन का महज 12-13 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्करण से गुजरता है। उत्पादन और प्रसंस्करण के बीच का यही अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध सबसे बड़े अवसरों में से एक है।

इसलिए, खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की यात्रा का अगला चरण बिल्कुल स्पष्ट है: कृषि की प्रचुर संपदा को उच्च मूल्य वाले एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खाद्य उत्पादों में परिवर्तित करना।

पीएलआई योजना के पीछे की परिकल्पना

इस अवसर को पहचानते हुए, भारत सरकार ने मार्च 2021 में कुल 10,900 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की शुरुआत की।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) द्वारा इस योजना को 2021-22 से 2026-27 तक की छह साल की अवधि के लिए लागू किया जा रहा है।

इस योजना के पीछे का मूल विचार सरल लेकिन ठोस है: खाद्य प्रसंस्करण क्षमता, नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग के विस्तार में निवेश करने वाली कंपनियों को पुरस्कृत करना। कुल मिलाकर, यह योजना इन-स्टोर ब्रांडिंग, अंतरराष्ट्रीय खुदरा श्रृंखलाओं में शेल्फ स्पेस और वैश्विक विपणन अभियानों में निवेश करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करके भारत में खाद्य उत्पादन से जुड़ी वैश्विक स्तर की कई चैंपियन कंपनियां तैयार करती है।

रणनीतिक डिजाइन: एक आधुनिक खाद्य इकोसिस्टम का निर्माण

पीएलआईएसएफपीआई योजना की संरचना को सावधानीपूर्वक को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रखा गया है।

1. उच्च क्षमता वाले खाद्य क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना

पहला घटक पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) खाद्य पदार्थ, प्रसंस्कृत फल और सब्जियां, समुद्री उत्पाद जैसी प्रमुख खाद्य श्रेणियों में उत्पादन बढ़ाने पर केन्द्रित है।

ये श्रेणियां वैसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत घरेलू खपत और निर्यात क्षमता, दोनों में तेजी से विस्तार कर सकता है।

2. नवाचार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी को प्रोत्साहन देना

दूसरा घटक एमएसएमई द्वारा विकसित नवोन्मेषी और जैविक खाद्य उत्पादों को समर्थन प्रदान करता है। लघु एवं मध्यम उद्यम भारत के खाद्य क्षेत्र की रीढ़ हैं और समावेशी विकास हेतु  आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ उनका जुड़ाव बेहद जरूरी है।

पोषक अनाज (मिलेट) से संबंधित नवाचार: परंपरा को आधुनिक बाजारों से जोड़ना

वर्ष 2023 में, अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज (मिलेट्स) वर्ष के उपलक्ष्य में, मंत्रालय ने पीएलआई योजना के तहत एक विशेष पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पादों में मिलेट्स के उपयोग को प्रोत्साहित करना था।

मिलेट्स जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, अत्यधिक पौष्टिक और भारत की कृषि परंपराओं में गहराई से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलेट्स का समावेश करके, यह योजना पोषण संबंधी सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि को एक साथ बढ़ावा देती है।

बदलाव से जुड़े आंकड़े

पीएलआई योजना के तहत बहुत ही कम समय में हासिल की गई प्रगति उद्योग जगत की ओर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और इस नीति की प्रभावशीलता को दर्शाती है।

अब तक:

• इस योजना के तहत 165 कंपनियों को मंजूरी दी गई है।

• इनमें से 68 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) हैं, साथ ही बड़ी कंपनियों के 40 संविदा निर्माता भी शामिल हैं।

• कुल मिलाकर 9,207 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है।

• प्रति वर्ष लगभग 35 लाख मीट्रिक टन की नई प्रसंस्करण और संरक्षण संबंधी क्षमता सृजित की गई है।

• इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 3.29 लाख रोजगार सृजित हुए हैं।

ध्यान रखने लायक बात यह है कि इस योजना का मूल लक्ष्य 25 लाख रोजगार सृजित करना था। इस क्षेत्र ने पहले ही इस लक्ष्य का 131 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लिया है।

पीएलआई समर्थित कंपनियों द्वारा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों की बिक्री में भी 2019-20 से 13.23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।

(निर्यात में वृद्धि दर 2019-20 से 7.41 प्रतिशत की है)

विभिन्न पीएलआई योजनाओं के बीच एक चमकता सितारा

उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भारतीय अर्थव्यवस्था के 14 क्षेत्रों को कवर करती है। इनमें से, खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित पीएलआई सबसे प्रभावशाली योजनाओं में से एक बनकर उभरी है।

कुल पीएलआई सब्सिडी वितरण में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का हिस्सा मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही होने के बावजूद, इसने तमाम पीएलआई योजनाओं के तहत सृजित किए गए कुल रोजगारों में से लगभग 42 प्रतिशत रोजगार सृजित किए हैं।

अब तक, इस योजना के तहत कुल 2715 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी की जा चुकी है। यह कुल परिव्यय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है।

यह साबित करता है कि खाद्य प्रसंस्करण भारत के मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम में सबसे अधिक रोजगार सृजित करने वाले क्षेत्रों में से एक है।

उपभोक्ताओं की बदलती जीवनशैली के अनुरूप बदलाव

भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन का असर खाद्य उद्योग पर भी पड़ रहा है।

युवा और शहरीकरण की ओर अग्रसर आबादी की बढ़ती मांगें इस प्रकार हैं:

• खाद्य संबंधी सुविधाजनक उपाय

• स्वच्छ पैकेजिंग

• सुरक्षित और पौष्टिक खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पाद

बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर अक्सर पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) या खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) वैसे गुणवत्तापूर्ण भोजन की तलाश में रहते हैं जो उनकी तेज रफ्तार जीवनशैली के अनुरूप हो।

खाद्य सुरक्षा से खाद्य नेतृत्व की ओर

भारत की प्रचुर कृषि संपदा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हमारे सामने इस प्रचुर संपदा को सतत आर्थिक मूल्य में बदलने की चुनौती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से संबंधित उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना इस बदलाव को गति देने में सहायक साबित हो रही है और खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर खाद्यानों के मामले में नेतृत्व का सपना शीघ्र ही साकार होने वाला है।

(लेखक आईएएस अधिकारी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के सचिव हैं)

उपायुक्त ने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर और बैंक के डीसीओ को सम्मानित किया, कृषि अवसंरचना निधि के तहत लुधियाना ने भारत में शीर्ष स्थान प्राप्त किया

लुधियाना/सत्ता संदेश

उपायुक्त हिमांशु जैन ने शुक्रवार को कृषि अवसंरचना निधि (एआईएफ) के तहत भारत में नंबर 1 रैंक हासिल करने में असाधारण योगदान के लिए लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर गुरदीप सिंह कांग और आठ प्रमुख बैंकों के जिला समन्वय अधिकारियों (डीसीओ) को सम्मानित किया।

सम्मानित डीसीओ में रानी पवार (बैंक ऑफ इंडिया), संदीप सिंह (पंजाब एंड सिंध बैंक), वरिंदर कुमार (पंजाब नेशनल बैंक), जतिंदर (यूनियन बैंक ऑफ इंडिया), हरदीप कौर (यूको बैंक), रविंदर कौर (एचडीएफसी बैंक), सुमित (केनरा बैंक) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एक प्रतिनिधि शामिल थे।

इस अवसर पर उपायुक्त हिमांशु जैन ने गुरदीप सिंह कांग और जिला समन्वय अधिकारियों की पूरी टीम के अथक प्रयासों और समर्पण की सराहना की, जिन्होंने इस उल्लेखनीय राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर गुरदीप सिंह कांग ने जिले के प्रभावशाली समग्र बैंकिंग प्रदर्शन पर प्रकाश डाला। 31 दिसंबर, 2025 तक, लुधियाना ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए अपने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण लक्ष्यों का 99.73% और वार्षिक ऋण योजना (एसीपी) लक्ष्य का 95.66% हासिल कर लिया था। क्षेत्रवार, जिले ने कृषि क्षेत्र में 89.30% और लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र में उल्लेखनीय 102.44% उपलब्धि दर्ज की। विशेष रूप से, जिले का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात 90% रहा, जो राष्ट्रीय मानक 60% से काफी अधिक है।