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PM मोदी PGIMER में 1200 करोड़ की स्वास्थ्य परियोजनाओं का करेंगे उद्घाटन

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

  • एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर, एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर एवं क्रिटिकल केयर ब्लॉक उत्तर भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को देंगे नई दिशा
  • “जनता का बढ़ता विश्वास हमारी जिम्मेदारी को बढ़ाता है; इसका समाधान मरीजों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि अवसंरचना का विस्तार करना है।” – प्रो. विवेक लाल, निदेशक, PGIMER

पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER ), चंडीगढ़ अपनी स्वास्थ्य सेवाओं की यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि का साक्षी बनने जा रहा है। भारत के माननीय प्रधानमंत्री 17 जुलाई 2026 को दो अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं—एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर (एएनसी) और एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर (AMCC)—का उद्घाटन करेंगे तथा क्रिटिकल केयर ब्लॉक (सीसीबी) की आधारशिला रखेंगे। लगभग ₹1,200 करोड़ की लागत वाली ये परियोजनाएँ संस्थान के इतिहास में स्वास्थ्य अवसंरचना के सबसे बड़े विस्तारों में से एक हैं।

इन नई सुविधाओं से न केवल चंडीगढ़ बल्कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड तथा अन्य पड़ोसी राज्यों के उन लाखों मरीजों को लाभ मिलेगा, जो उन्नत चिकित्सा सेवाओं के लिए पीजीआईएमईआर पर निर्भर हैं।

उद्घाटन से पूर्व अपने विचार व्यक्त करते हुए पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने कहा,
“ये परियोजनाएँ भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ी छलांग हैं। पीजीआईएमईआर सदैव प्रत्येक मरीज को उसकी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। इन सुविधाओं के शुरू होने से विश्वस्तरीय उपचार प्रदान करने की हमारी क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, साथ ही आयुष्मान भारत योजना के तहत किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना भी जारी रहेगा।”

एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर

एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर को देश की सबसे उन्नत न्यूरोलॉजिकल देखभाल सुविधाओं में से एक के रूप में विकसित किया गया है। इसमें अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीक, मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, उन्नत गहन चिकित्सा इकाइयाँ तथा आपातकालीन सेवाएँ उपलब्ध होंगी, जिससे तंत्रिका संबंधी रोगों के उपचार की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

इसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रो. विवेक लाल

“पीजीआई में न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी की शुरुआत वर्ष 1967 में मात्र 50 बिस्तरों के साथ हुई थी। एडवांस्ड न्यूरोसाइंसेज़ सेंटर के साथ यह संख्या बढ़कर 400 से अधिक बिस्तरों तक पहुँच रही है, जिनमें समर्पित आईसीयू और आपातकालीन सुविधाएँ शामिल हैं। यह एक परिवर्तनकारी कदम है, जिससे स्ट्रोक, मस्तिष्क ट्यूमर, रीढ़ की बीमारियों, मिर्गी, ट्रॉमा और अन्य जटिल न्यूरोलॉजिकल रोगों से पीड़ित मरीजों को सीधा लाभ मिलेगा।”

एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर

एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर में माताओं, नवजात शिशुओं और बच्चों के लिए समग्र स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी। इसमें समर्पित आईसीयू, आधुनिक लेबर सुइट, विशेष नवजात सेवाएँ और उन्नत डायग्नोस्टिक सुविधाएँ होंगी।

प्रो. विवेक लाल ने कहा,
“पीजीआईएमईआर ने भारत में कई नवजात सेवाओं की शुरुआत की है। एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर विशेष आईसीयू, उन्नत तकनीक और समर्पित स्वास्थ्य टीमों के माध्यम से माताओं और नवजात शिशुओं को सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता को और मजबूत करेगा।”

क्रिटिकल केयर ब्लॉक
नए क्रिटिकल केयर ब्लॉक की आधारशिला कोविड-19 महामारी से मिली सीख के बाद देश की आपातकालीन स्वास्थ्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रो. लाल ने कहा,
“महामारी ने हमें यह सिखाया कि क्रिटिकल केयर अवसंरचना कोई विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है। यह नया क्रिटिकल केयर ब्लॉक सुनिश्चित करेगा कि गहन चिकित्सा और वेंटिलेटर सहायता की आवश्यकता वाले मरीजों को बिना अनावश्यक विलंब के समय पर उपचार मिल सके। यह भविष्य की स्वास्थ्य आपदाओं से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निवेश है।”

वर्तमान में पीजीआईएमईआर में प्रतिवर्ष लगभग 30 लाख मरीजों का पंजीकरण होता है तथा प्रतिदिन 10,000 से 15,000 ओपीडी परामर्श प्रदान किए जाते हैं। संस्थान बढ़ती मरीज संख्या को बोझ नहीं, बल्कि जनता के बढ़ते विश्वास का प्रतीक मानता है।

इस संदर्भ में निदेशक ने कहा, “अक्सर कहा जाता है कि पीजीआई पर मरीजों का दबाव बढ़ रहा है। मेरा मानना है कि हमारी जिम्मेदारी बढ़ रही है। पीजीआई लाखों लोगों के लिए आशा और विश्वास का केंद्र है। समाधान मरीजों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि बढ़ती मांग के अनुरूप अपनी अवसंरचना और सेवाओं का लगातार विस्तार करना है।”

निदेशक ने बताया कि पीजीआईएमईआर आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के तहत अत्यधिक विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएँ न्यूनतम या बिना किसी लागत के उपलब्ध कराता है।

संस्थान में अब तक 5,500 से अधिक किडनी प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं। इसके अलावा लिवर, हृदय, फेफड़े और कॉर्निया प्रत्यारोपण सेवाएँ भी उपलब्ध हैं, जिनमें से कई अब आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत निःशुल्क प्रदान की जा रही हैं। सेवाओं के विस्तार के कारण पात्र किडनी प्रत्यारोपण मरीजों की प्रतीक्षा अवधि में भी उल्लेखनीय कमी आई है।

पीजीआईएमईआर डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं में भी राष्ट्रीय अग्रणी संस्थान बनकर उभरा है। संस्थान अब तक 40 लाख से अधिक टेलीमेडिसिन परामर्श प्रदान कर चुका है तथा देशभर के 250 से अधिक चिकित्सा संस्थानों, जिनमें सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय (एएफएमसी) और अन्य तृतीयक स्वास्थ्य संस्थान शामिल हैं, को शैक्षणिक कार्यक्रमों का प्रसारण करता है।

निदेशक ने संस्थान की अभिनव ‘सारथी’ पहल का भी उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को मरीज सेवा में स्वयंसेवा के लिए प्रेरित करना है। यह कार्यक्रम एक छोटे स्वयंसेवी प्रयास से विकसित होकर हजारों युवाओं का जनआंदोलन बन चुका है, जो संस्थान में मरीजों की सहायता कर रहे हैं।

प्रो. लाल ने कहा, “स्वास्थ्य सेवा केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि करुणा और संवेदनशीलता का भी नाम है। ‘सारथी’ के माध्यम से युवा स्वयंसेवक सहानुभूति और सामुदायिक सेवा की भावना सीखते हैं तथा देश के सबसे व्यस्त अस्पतालों में से एक में मरीजों की सहायता करते हैं। संवेदनशील नागरिकों का निर्माण करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना आधुनिक अस्पतालों का निर्माण करना।”

इन ऐतिहासिक परियोजनाओं के शुरू होने के साथ पीजीआईएमईआर उन्नत, किफायती और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को और अधिक व्यापक बनाने की दिशा में अग्रसर होगा तथा चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में देश के अग्रणी संस्थानों में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा। यह उद्घाटन भारत सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने और उत्तर भारत के लाखों लोगों को उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के सतत प्रयासों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के होते हुए भी चिकित्सा शिक्षा में मजबूत नैदानिक ​​आधार की आवश्यकता पर बल दिया

दिल्ली / सत्ता संदेश

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बच्चों में उभरते हुए गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और यकृत संबंधी विकारों के बारे में बताने वाली अद्यतन चिकित्सा पाठ्यपुस्तक का विमोचन किया

बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी पाठ्यपुस्तक का विस्तारित संस्करण चिकित्सा विज्ञान में तीव्र प्रगति को दर्शाता है

डॉ. जितेंद्र सिंह ने ज्ञान के तीव्र विस्तार के युग में चिकित्सा में अवधारणा-आधारित शिक्षण पर बल दिय

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, जो चिकित्सा विज्ञान और मधुमेह के प्रख्यात प्राध्यापक भी हैं, ने आज स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए प्रोफेसर अनुपम सिबल और डॉ. सरथ गोपालन के संपादन में तैयार जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर कैथलीन बी. श्वार्ट्ज की ओर से लिखित प्रस्तावना वाली “बाल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी और पोषण” पाठ्यपुस्तक के द्वितीय संस्करण का विमोचन करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और इसकी बढ़ती भूमिका के बावजूद चिकित्सा शिक्षा में मजबूत नैदानिक ​​आधार की आवश्यकता पर बल दिया।

मंत्री महोदय ने कहा कि एक बार ठोस नैदानिक ​​आधार स्थापित हो जाने पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता मूल्यवान सहायक, सहयोगी और सुविधा प्रदाता के रूप में कार्य कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई चिकित्सा अवधारणाओं के मूल तत्व को समझे बिना एआई का सहारा लेता है तो उसके समक्ष किसी भी उपकरण, गैजेट, जांच या यहां तक ​​कि दवाओं के न होने की स्थिति में भी समाज की सेवा करने में सक्षम चिकित्सक बनने के लिए आवश्यक बुनियादी शिक्षण प्रक्रिया से वंचित रहने का जोखिम होता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने चिकित्सा संबंधी ज्ञान के तीव्र विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि शोध और प्रकाशन की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिसके कारण चिकित्सा शिक्षा के लिए वैचारिक स्पष्टता और मूलभूत नैदानिक ​​प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा कि यद्यपि नई तकनीकों ने सूचना तक पहुंच को आसान बना दिया है फिर भी सीखने की प्रक्रिया मूलभूत समझ और व्यावहारिक नैदानिक ​​अनुभव पर आधारित होनी चाहिए।

मंत्री महोदय ने प्रौद्योगिकी के एकीकरण और बीमारियों की बढ़ती जटिलता सहित उभरती चुनौतियों के अनुरूप चिकित्सा शिक्षा प्रणालियों को लगातार अद्यतन करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि चिकित्सा जगत के युवा पेशेवरों को मजबूत बुनियादी ज्ञान विकसित करने और धीरे-धीरे चुने हुए क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी और पोषण की पाठ्यपुस्तक के दूसरे संस्करण में इस क्षेत्र में हुई नवीनतम प्रगति को शामिल किया गया है और 45 अध्यायों में इसका विस्तार किया गया है जिसमें कई नए विषय भी हैं। यह पुस्तक सूजन आंत्र रोग, न्यूरो-गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, सीलिएक रोग और गाय के दूध के प्रोटीन से एलर्जी जैसे प्रमुख क्षेत्रों के साथ-साथ गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और यकृत संबंधी रोगों में आनुवंशिकी की भूमिका, एंडोस्कोपी और यकृत प्रत्यारोपण जैसे उभरते क्षेत्रों के बारे में विस्तृत विवरण प्रदान करती है।

यह भी पाया गया है कि बाल रोग विशेषज्ञों के पास आने वाले लगभग 30 प्रतिशत बच्चे पाचन और यकृत संबंधी विकारों से पीड़ित होते हैं जो इस क्षेत्र में अद्यतन ज्ञान और विशेष प्रशिक्षण के महत्व पर बल देता है। यह पाठ्यपुस्तक बाल रोग, बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के प्रशिक्षुओं और कार्यरत बाल रोग विशेषज्ञों के लिए व्यापक संसाधन के रूप में तैयार की गई है।

इसका संपादन अपोलो हॉस्पिटल्स समूह के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर अनुपम सिबल और दिल्ली के मधुकर रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ डॉ. सरथ गोपालन ने किया है। श्रीनगर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर और बाल रोग विशेषज्ञ एवं यकृत रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद इशाक मलिक इसके सह-संपादक हैं।

इस पुस्तक की प्रस्तावना जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर कैथलीन बी. श्वार्ट्ज ने लिखी है। पाठ्यपुस्तक का पहला संस्करण 2016 में प्रकाशित हुआ था और तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने इसका विमोचन किया था। वर्तमान संस्करण को उसी के आधार पर तैयार किया गया है और उसमें इस क्षेत्र में नवीनतम वैज्ञानिक विकास और नैदानिक ​​पद्धतियों को शामिल किया गया है।