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कांगो-युगांडा में इबोला का कहर, 900 से ज्यादा मामले, 200 मौतें, इबोल से लड़ने के लिए WHO सहित भारत ने उठाए बड़े कदम,

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

अफ्रीका में इबोला वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक, अब तक 900 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। जबकि 223 लोगों की मौत की आशंका जताई जा रही है। कांगों में इबोला से 112 संक्रमित और 11 मरीजों की मौत हुई है जबकि युगांडा में एक की मौत और 8 मरीजों को संक्रमित पाया गया है। डब्ल्यूएचओ चीफ टेड रोस ने कहा है कि हेल्थ एजेंसियां तेजी से काम कर रही हैं, लेकिन तेज संक्रमण की वजह से हालात चुनौतीपूर्ण हैं।

कहां से शुरू हुआ संक्रमण?

यह संक्रमण मई 2026 में कांगो के इटुरी प्रांत में पहली बार सामने आया था। यह इलाका लंबे समय से हिंसा और संघर्ष से प्रभावित है। यहां बड़ी संख्या में विस्थापित लोग और सोने की खदानों में काम करने वाले मजदूर रहते हैं। WHO का कहना है कि लोगों की लगातार आवाजाही की वजह से वायरस तेजी से फैल रहा है। अब यह संक्रमण नॉर्थ किवु और साउथ किवु प्रांत तक पहुंच चुका है। साउथ किवु के कुछ हिस्सों पर M23 विद्रोही संगठन का कब्जा है।

कांगो में अस्पतालों से भागे मरीज

इबोला से लड़ाई के बीच कांगो में अस्पतालों और हेल्थ सेंटर्स पर हमले भी हो रहे हैं। पिछले हफ्ते इटुरी प्रांत के मोंगबवालु जनरल रेफरल अस्पताल पर लगातार दो दिन हमला हुआ। हमलावरों ने इलाज के लिए लगाए गए टेंट में आग लगा दी, जिसके बाद 18 इबोला मरीज अस्पताल से भाग गए। जांच में पता चला कि इन मरीजों में एक व्यक्ति इबोला पॉजिटिव था और वह अब भी लोगों के बीच घूम रहा है। पूर्वी कांगो में सशस्त्र संघर्ष की वजह से हेल्थ टीमें नहीं पहुंच पा रहीं हैं।

अगले दिन फिर हमला हुआ और 7 और मरीज भी भाग निकले। एक गंभीर मरीज भागने की कोशिश के दौरान मर गया। बताया गया कि कुछ लोग अपने रिश्तेदारों के शव दफनाने के लिए अस्पताल से ले जाना चाहते थे। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि इबोला से मरने वाले लोगों के शव बेहद संक्रामक होते हैं, बिना सुरक्षा के अंतिम संस्कार करने से संक्रमण तेजी से फैल सकता है।

भारत में क्या कदम उठाए गए?

भारत ने कांगो और युगांडा से आने वाली उड़ानों पर कोविड जैसे प्रोटोकॉल लागू किए हैं, जिनमें एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग और विमान में संदिग्ध यात्रियों को अलग बैठाने जैसे नियम शामिल हैं। यात्रियों को हेल्थ को लेकर सेल्फ-डिक्लेरेशन देना होगा। भारत सरकार ने 24 मई को एक एडवाइजरी जारी की, जिसमें नागरिकों को अगली सूचना तक डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान की यात्रा से बचने की सलाह दी गई है। वहीं केरल सरकार ने प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों के लिए 21 दिन क्वारंटाइन में रहना अनिवार्य कर दिया है।

युगांडा से 23 मई को बेंगलुरु लौटी एक महिला को हल्का शरीर दर्द होने पर एहतियातन सरकारी एपिडेमिक डिजीज हॉस्पिटल में आइसोलेशन में रखा गया। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, महिला में शरीर दर्द के अलावा कोई गंभीर लक्षण नहीं थे। उसका सैंपल जांच के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी भेजा गया था, जांच रिपोर्ट में महिला इबोला निगेटिव पाई गई, जिसके बाद राहत मिली।

दुनिया भर में क्या कदम उठाए गए?

WHO ने 17 मई को कांगो में फैले बुंडीबुग्यो स्ट्रेन वाले इबोला को इंटरनेशनल हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया। WHO के मुताबिक, यह संक्रमण सीमाओं के पार फैलने का खतरा पैदा कर रहा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलकर कार्रवाई जरूरी है। अफ्रीका की सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने 9 देशों को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा है। इनमें अंगोला, बुरुंडी, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, इथियोपिया, केन्या, रवांडा, दक्षिण सूडान, तंजानिया और जाम्बिया शामिल हैं। EU ने इबोला और ऐसे वायरस को ट्रैकर करने के लिए अफ्रीका CDC को करीब 22 करोड़ की फंडिंग दी है।

यूरोपीय देशों ने अफ्रीका से आने वाले रूटों पर स्पेशल पैसेंजर ट्रैकिंग सिस्टम एक्टिवेट किया है। 25 मई को इटली में इबोला के दो संदिग्ध मिले, हालांकि इनकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। अमेरिका ने कांगो, युगांडा और साउथ सूडान की यात्रा से बचने की सलाह दी है। इन देशों से आने वाले यात्रियों की विशेष जांच की जा रही है। कनाडा ने भी इन देशों के नागरिकों की यात्रा और इमिग्रेशन प्रक्रिया 90 दिनों के लिए रोक दी है। युगांडा ने कांगो से आने-जाने पर रोक लगा दी है और उड़ानें भी अस्थायी रूप से बंद कर दी हैं। वहीं कई अफ्रीकी देशों ने जांच, आइसोलेशन वॉर्ड और हेल्थ मॉनिटरिंग बढ़ा दी है।

इबोला कैसे फैलता है?

यह वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था। इबोला संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर के तरल पदार्थ, कपड़े, बिस्तर और मेडिकल उपकरणों के संपर्क से फैलता है. शुरुआत में बुखार, कमजोरी और शरीर दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. बाद में उल्टी, दस्त और खून बहने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती लक्षण मलेरिया जैसी दूसरी बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। इसी वजह से शुरुआती पहचान मुश्किल हो जाती है और संक्रमण तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है।