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रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित सैनिकों के अनुभवों की स्मारक पुस्तक का विमोचन किया

दिल्ली / सत्ता संदेश

क्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 29 मई को ऑपरेशन सिंदूर पर स्मारक पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक ऑपरेशन सिंदूर में भाग लेने वाले 100 अधिकारियों, नौसैनिकों, वायुसैनिकों और अन्य सैनिकों के व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन है। रक्षा मंत्री ने एक पोस्ट में इस प्रकाशन को ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देने वालों को श्रद्धांजलि बताते हुए सैनिकों के समर्पण और साहस से जुड़ाव का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “लोगों को इस पुस्तक से प्रेरणा लेकर राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने और संप्रभुता बनाए रखने के लिए किए गए बलिदान को समझना चाहिए।”

राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को अभूतपूर्व सफलता बताया, जिसमें भारत ने पाकिस्तान को चार दिनों के भीतर युद्धविराम के लिए बाध्य कर दिया। उन्होंने कहा कि यह भारत द्वारा अब तक लड़े गए सभी युद्धों से अलग था, और यह स्मारक प्रकाशन ऐतिहासिक विवरण से परे बहादुर सैनिकों के व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन है। उन्होंने कहा कि यह आधुनिक युद्ध के मानवीय पहलू की भी जानकारी देता है, जहां नेतृत्व, साहस, दबाव में निर्णय लेने की क्षमता और प्रतिबद्धता ने रणनीति को सफलता में बदल दिया।

यह पुस्तक आधिकारिक सैन्य इतिहास लेखन परंपराओं से हटकर लिखी गई है। युद्ध के अधिकांश वृत्तांत मुख्यालय और ऑपरेशन रूम के दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हैं, जहां कमांडरों के निर्णयों को दर्ज किया जाता है, उनका विश्लेषण किया जाता है और उन पर बहस की जाती है। फिर भी, युद्ध का वास्तविक स्वरूप, जैसा कि नियंत्रण रेखा पर दुश्मन के बंकरों को निशाना बनाते सैनिक, हवाई रक्षा संचालक जो आने वाले ड्रोनों का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय कर रहा था, हथियार से मार करने के समय कॉकपिट में बैठा पायलट और बेड़े के उच्चतर स्थिति में आने पर कार्रवाई स्टेशनों पर तैनात नौसैनिक के अनुभव लगभग अकथ्य रह जाते हैं। यह पुस्तक उसी स्वरूप को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है।

इसमें तीनों सेनाओं के साथ-साथ मुख्यालय, एकीकृत रक्षा स्टाफ के वृत्तांत, युद्धक विमान चालक, नौसेना के चौकसकर्मी, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल के दल, विशेष बल के संचालक, सिग्नलर, लॉजिस्टिक्स कर्मी, चिकित्सा अधिकारी और संयुक्त एवं एकीकृत संगठनों के कर्मी सम्मिलित हैं जो इस अभियान में एक साथ शामिल रहे हैं।

इस प्रकाशन का विमोचन नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह के दौरान किया गया। इस अवसर पर प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान, नौ सेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, सेना अध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी और वायु सेना अध्यक्ष एयर मार्शल एपी सिंह उपस्थित रहे।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया

दिल्ली /सत्ता संदेश

‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक ऑपरेशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक मारक क्षमता की याद दिलाता रहेगा

सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, एजेंसियों की खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति सीमा पार मौजूद आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिए एकसाथ उठ खड़े हुए

यह दिन हमारे दुश्मनों को यह याद दिलाता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, बच नहीं सकते

वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष पूरे होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया और कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक प्रहार क्षमता की याद दिलाता रहेगा।

ऑपरेशन सिंदूर भारत का एक युगांतरकारी मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमारी सशस्त्र सेनाओं की अचूक प्रहार क्षमता की याद हमेशा दिलाता रहेगा। इतिहास इसे एक ऐसे दिन के तौर पर याद रखेगा जब हमारे सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, हमारी एजेंसियों की पैनी खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति—ये तीनों एक होकर सीमा पार मौजूद आतंकवाद के हर उस ठिकाने को नेस्तनाबूद करने के लिए उठ खड़े हुए, जिसने पहलगाम में हमारे नागरिकों पर अपना बुरा साया डालने की हिमाकत की थी। यह दिन हमारे दुश्मनों के लिए यह खौफनाक संदेश लेकर आता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, वे बच नहीं सकते। वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं। इस अवसर पर, मैं हमारी सेनाओं के अद्वितीय शौर्य को नमन करता हूँ।”

स्पष्ट राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नियंत्रित शक्ति का प्रयोग: ऑपरेशन सिंदूर दुनिया के लिए एक मिसाल

— लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप पांडे (सेवानिवृत्त)

संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और रूस के बदलते राजनीतिक-सैन्य उद्देश्यों के बीच युद्ध छेड़ने के प्रयोगों ने दिखाया है कि 21वीं सदी के युद्ध और संघर्ष अक्सर लंबे और अस्पष्ट अभियानों में बदल गए हैं। इनके परिणाम संबंधित क्षेत्रों के लिए विनाशकारी रहे हैं और अंततः आरंभ करने वाले को कोई ठोस लाभ नहीं मिला। तालिबान, इराक, यूक्रेन, गाज़ा और अब ईरान से जुड़े संघर्ष यह दर्शाते हैं कि सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य अनिश्चितकाल तक दबाव बनाए रखना नहीं होना चाहिए, बल्कि निर्णायक रणनीतिक परिणाम हासिल कर उपयुक्त शर्तों पर पीछे हटना होना चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से भारत की प्रतिक्रिया ने विश्व की सैन्य शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, के सामने एक ठोस विकल्प प्रस्तुत किया। अमेरिका के राष्ट्रपति ने बार-बार युद्धविराम का श्रेय लिया है, लेकिन ईरान को सैन्य और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बावजूद वे अपने घोषित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं रहे। इसके विपरीत, ऑपरेशन सिंदूर एक योजनाबद्ध और नियंत्रित शक्ति के उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें स्पष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के बाद अनुशासित संयम दिखाया गया।

पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था द्वारा की गई एक क्रूर उकसावे वाली कार्रवाई के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया गया। आतंकियों ने धर्म के आधार पर पुरुषों की उनके परिवारों के सामने हत्या कर दी। इसके बावजूद भारत ने न तो जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दी और न ही अंधाधुंध बदला लिया। बल्कि एक सुविचारित, चरणबद्ध और तेज़ कार्रवाई की गई। हर कदम सटीक, दंडात्मक और लक्ष्य-केंद्रित था। साथ ही तनाव कम करने की गुंजाइश भी बनाए रखी गई—यह कमजोरी नहीं बल्कि नियंत्रण का संकेत था।

भारत की रणनीति की सबसे बड़ी विशेषता उसके राजनीतिक-सैन्य उद्देश्यों की स्पष्टता थी। लक्ष्य था—सीमा पार आतंकवाद के ढांचे को निर्णायक झटका देना और प्रतिरोधक क्षमता को पुनः स्थापित करना। यह सब अंतरराष्ट्रीय कानून और परमाणु संतुलन को ध्यान में रखते हुए किया गया। प्रमुख ठिकानों को नष्ट करने और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करने के बाद भारत ने संघर्ष को यहीं रोक दिया।

केवल 88 घंटों के भीतर भारतीय सशस्त्र बलों ने अपने लक्ष्य पूरे कर लिए और नियंत्रण राजनीतिक नेतृत्व को सौंप दिया। पाकिस्तान, जो पहले बिना परिणाम भुगते उकसावे की कार्रवाई करता रहा, इस बार युद्धविराम की मांग करने को मजबूर हुआ। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने यह स्पष्ट किया कि उसकी रणनीति तेज़ और सटीक हमलों का सामना करने में सक्षम नहीं है।

भारत का रणनीतिक समुदाय यह समझता है कि पाकिस्तान की मूल सोच को बदलना संभव नहीं है, क्योंकि उसकी नीति विचारधारा और संस्थागत संरचना पर आधारित है। इसलिए भारत का उद्देश्य समस्या का स्थायी समाधान नहीं, बल्कि नियंत्रित और दोहराने योग्य कार्रवाई के माध्यम से उसके व्यवहार को प्रभावित करना था।

अमेरिकी सैन्य अभियानों के विपरीत, भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट और सीमित था। अमेरिका ने कई बार अपनी सैन्य श्रेष्ठता दिखाई, लेकिन रणनीतिक परिणाम हासिल करने में कठिनाई झेली है। लंबे अभियानों से संसाधनों की बर्बादी, थकान और विश्वसनीयता में कमी आती है—जैसा कि इराक, अफगानिस्तान और ईरान के मामलों में देखा गया।

यदि ऑपरेशन सिंदूर के मॉडल को ईरान के संदर्भ में लागू किया जाता, तो सीमित और सटीक हमलों के बाद मिशन को सफल घोषित कर कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ा जा सकता था। इसके बजाय लंबे अभियानों ने जटिल परिणाम पैदा किए और अमेरिका की स्थिति को कमजोर किया।

भारत का दृष्टिकोण यह भी दिखाता है कि आधुनिक युद्ध केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि धारणा प्रबंधन का भी खेल है। संतुलित प्रतिक्रिया देकर भारत ने दृढ़ता और संयम दोनों का परिचय दिया।

हालांकि कई विश्लेषकों ने संघर्ष बढ़ाने की वकालत की, भारत ने अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों—आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक भूमिका—पर ध्यान बनाए रखा। 2047 के लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत ने यह सुनिश्चित किया कि वह लंबे युद्ध में उलझकर अपनी प्रगति को बाधित न करे।

ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि कूटनीतिक सीख भी है। यह दिखाता है कि शक्ति का उपयोग एक सटीक नीति उपकरण के रूप में किया जा सकता है। यह सिद्ध करता है कि संयम कमजोरी नहीं, बल्कि विश्वसनीयता को बढ़ाता है। और यह भी कि सही समय पर सैन्य कार्रवाई को समाप्त करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसे शुरू करना।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए संदेश स्पष्ट है—सफलता संघर्ष की अवधि से नहीं, बल्कि उद्देश्यों और परिणामों के सामंजस्य से तय होती है। भारत ने दिखाया कि निर्णायक प्रहार, विरोधी को बाध्य करना और अपनी शर्तों पर पीछे हटना संभव है।

ऑपरेशन सिंदूर का पूरा ढांचा केवल एक प्रभावी रणनीति नहीं, बल्कि अनुशासित “स्मार्ट पावर” का उत्कृष्ट उदाहरण है।

ऑपरेशन सिंदूर: वह अवधारणा जिसने भारत की रणनीतिक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया

— लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल याद रखने की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच में एक मजबूत और निर्णायक बदलाव पर विचार करने का अवसर है। 7 मई 2026 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं—इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को रेखांकित किया। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर को जटिल, बहु-क्षेत्रीय परिदृश्य में भारत के भविष्य के संघर्ष संचालन के रूप में याद किया जाएगा।

इस सफलता के केंद्र में अटूट राजनीतिक स्पष्टता थी। दशकों तक, सीमा पार उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम तक सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम को त्यागने के बजाय उसे परिष्कृत किया—इसने भारत की संवेदनशीलता के साथ शक्ति के प्रयोग की क्षमता को प्रदर्शित किया, सटीक रणनीतिक संदेश दिया और आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक रूप से स्थिति के विस्तार की क्षमता को बनाए रखा। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल निर्णायक कार्रवाई के इरादे का प्रदर्शन किया, बल्कि सैन्य कमांडरों को संचालन में लचीलापन देने का आत्मविश्वास भी दिखाया। उद्देश्य की यह स्पष्टता गति, सटीकता और समन्वय में परिवर्तित हुई—ये तीन विशेषताएं आधुनिक सफल सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं।

भारत की बहु-क्षेत्रीय क्षमताओं का निर्बाध एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण था। आधुनिक युद्ध अब केवल भूमि, समुद्र और वायु तक सीमित नहीं रहा; यह साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर ने इन क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करने की भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। सटीक हमलों में साइबर अभियानों ने पूरक भूमिका निभाई, जिससे विरोधी के संचार और लॉजिस्टिक तंत्र बाधित हुए। विशेष रूप से हमले के बाद नुकसान के आकलन में अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों ने वास्तविक समय की निगरानी और लक्ष्य निर्धारण सुनिश्चित किया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं ने दुश्मन की जवाबी कार्रवाई को कमजोर किया। यह अभियान संयुक्त संचालन क्षमता में परिपक्वता का प्रतीक था—सिर्फ तालमेल से आगे बढ़कर वास्तविक एकीकरण तक।

नागरिक-सैन्य एकीकरण की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; यह पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थानों और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ समन्वय में कार्य किया। स्वदेशी तकनीकों—निगरानी प्रणालियों से लेकर सटीक हथियारों तक—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भरता में निरंतर निवेश के लाभों को दर्शाती हैं। इस अभियान ने भारत की निर्णय-निर्माण संरचना की दक्षता को भी प्रदर्शित किया, जहां अंतर-एजेंसी समन्वय नौकरशाही बाधाओं से प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि साझा उद्देश्य की भावना से प्रेरित रहा।

अभियान से पहले और उसके दौरान भारत की पहलों में रणनीतिक दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई दी। कूटनीतिक संचार ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाइयों को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए—सटीक, आवश्यक और संतुलित।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया एक अनुमानित पैटर्न पर चली। सैन्य दृष्टि से, वह प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करता रहा, जो क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व दोनों से सीमित था। कूटनीतिक रूप से उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया, लेकिन सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था, जहां वास्तविक स्थिति को छिपाने के लिए गलत जानकारी का प्रसार किया गया। फिर भी, विश्वसनीयता और निरंतरता की कमी के कारण ऐसे प्रयास जल्द ही उजागर हो गए।

इस भ्रामक प्रचार का स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामना करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर आक्रामकता का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्पष्ट उकसावे के प्रति संतुलित प्रतिक्रिया थी। इसके उद्देश्य सटीक थे, लक्ष्य वैध थे और क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने अनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया—जो संयम के मूल तत्व हैं। पारदर्शिता और विश्वसनीय संचार के माध्यम से भारत ने गलत कथाओं को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया।

ऑपरेशन सिंदूर से कई महत्वपूर्ण सबक सामने आए हैं। पहला, राजनीतिक इच्छाशक्ति की केंद्रीय भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता—रणनीतिक अस्पष्टता विरोधियों को प्रोत्साहित करती है, जबकि स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास निरंतर जारी रहना चाहिए, विशेषकर साइबर, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश के माध्यम से। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय शक्ति का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।

सूचना युद्ध का क्षेत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। धारणा की लड़ाई निरंतर चलती रहती है। भारत को गलत सूचना की पहचान, उसका मुकाबला और पूर्व-नियोजन की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना होगा। त्वरित और विश्वसनीय संचार के लिए तकनीकी और संस्थागत दोनों प्रकार के साधनों की आवश्यकता है।

यह अभियान रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी रेखांकित करता है। स्वदेशी प्रणालियों ने अपनी प्रभावशीलता सिद्ध की, जिससे बाहरी निर्भरता कम हुई और संचालन की स्वतंत्रता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश आवश्यक है, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा।

साथ ही, यह अभियान अस्थिर सुरक्षा वातावरण में निरंतर तैयार रहने की आवश्यकता को भी उजागर करता है। निरोधक क्षमता स्थिर नहीं होती; इसे प्रदर्शित क्षमता और दृढ़ संकल्प से बनाए रखना पड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर ने एक मानक स्थापित किया है, जिसे बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और सिद्धांत विकास में निरंतर निवेश जरूरी है।

जब भारत इस अभियान की वर्षगांठ पर विचार करता है, तो संदेश स्पष्ट है—यह एक रणनीतिक प्रभाव वाला अभियान था। इसने दिखाया कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों हैं। इसने यह भी सिद्ध किया कि संयम एक विकल्प है—मजबूरी नहीं।

आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहु-क्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के एक उदाहरण के रूप में किया जाएगा, जिसमें मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता की भूमिका स्पष्ट है। इसने अपेक्षाओं को पुनर्परिभाषित किया है—देश के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत किया है: जब राष्ट्रीय संकल्प और क्षमता का संगम होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की विरासत इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास में निहित है जो इसने उत्पन्न किया, उन सबकों में है जो इससे सीखे गए हैं, और उस दिशा में है जो इसने भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए निर्धारित की है। आने वाले समय में विभिन्न रूपों में चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन जब तक देश की राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत शक्तियां एकजुट होकर स्पष्ट उद्देश्य के साथ कार्य करती रहेंगी, तब तक संतुलन भारत के पक्ष में रहेगा।

हमला, घेराबंदी, विजय: ऑपरेशन सिंदूर और वह सिद्धांत जिसे भारत ने 88 घंटों में गढ़ा

एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त)

6–7 मई 2025 की रात, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया—यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, के जवाब में चलाया गया एक योजनाबद्ध और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत के एक नए और पूरी तरह विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। यह सिद्धांत स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता से परिभाषित होता है।

ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से परिभाषित किया और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पहली बार भारत ने ऐसे दुश्मन का सामना किया—और उसे परास्त किया—जो वस्तुतः एक ही मोर्चे पर दो देशों की संयुक्त शक्ति के रूप में सामने आया। चीन ने औपचारिक रूप से दूरी बनाए रखी, लेकिन उसने पाकिस्तान को सैटेलाइट खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समर्थन, साइबर सहायता और PL-15 जैसी ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज’ (BVR) मिसाइलों सहित अग्रिम सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए। इसके बावजूद भारत ने इस संयुक्त चुनौती को हराया।

नियंत्रित युद्ध का सिद्धांत

आधुनिक संघर्षों की सबसे बड़ी विफलता—चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया के संघर्ष—यह रही है कि उनमें कोई स्पष्ट ‘एग्जिट स्ट्रेटेजी’ नहीं होती। लंबे खिंचने वाले युद्ध अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करते हैं, जन-मन को थका देते हैं और न तो स्पष्ट जीत दिलाते हैं और न ही स्थायी शांति। इसके विपरीत, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस जाल से खुद को बचाया और वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएं कर पाती हैं—पहली मिसाइल दागने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय करना।

भारत के उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट थे: आतंकी ढांचे और उन्हें संरक्षण देने वालों को नष्ट करना, दुश्मन को अधिकतम नुकसान पहुंचाना और अपनी शर्तों पर अभियान समाप्त करना—साथ ही नागरिकों को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाना। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने खुफिया जानकारी के आधार पर नौ लक्ष्यों की पहचान की, जो लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नेटवर्क से जुड़े थे। पहला हमला मात्र 23 मिनट में पूरा हुआ और पूरा अभियान 88 घंटों में समाप्त कर दिया गया। इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर किया।

यह सिद्धांत—स्पष्ट उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्रवाई करना और बिना अनावश्यक विस्तार के बाहर निकलना—नियंत्रित युद्ध की एक दुर्लभ शैली है, जिसका अध्ययन आने वाले वर्षों में सैन्य संस्थानों में किया जाएगा।

दुश्मन के गढ़ में गहरी चोट

ऑपरेशन सिंदूर का भौगोलिक दायरा अभूतपूर्व था। भारत ने अपने हमले केवल पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रखे, बल्कि पाकिस्तान के मुख्य भूभाग—विशेषकर पंजाब—के भीतर गहराई तक प्रहार किए। सियालकोट और बहावलपुर जैसे ठिकानों पर सटीक हमले किए गए, जो भारतीय सीमा से 140 किमी से भी अधिक दूर हैं।

बाद में रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और सरगोधा जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी भारत की मारक क्षमता के दायरे में लाया गया। संदेश स्पष्ट था: कोई भी ठिकाना पहुंच से बाहर नहीं है।

100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें IC-814 अपहरण से जुड़ा यूसुफ अजहर, अब्दुल मलिक रऊफ और पुलवामा हमले से जुड़ा मुदस्सिर अहमद शामिल थे। जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के परिवार के 10 सदस्य भी मारे गए। इन हमलों ने आतंकी संगठनों की कमांड संरचना को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।

सबसे अहम बात यह रही कि इस अभियान ने ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की अवधारणा को तोड़ दिया। दशकों से पाकिस्तान परमाणु छत्रछाया का उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करता रहा था, इस धारणा के साथ कि भारत प्रतिक्रिया नहीं देगा। भारत ने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

सीमापार अधिकतम क्षति, देश के भीतर न्यूनतम प्रभाव

जहां अधिकांश युद्धों का प्रभाव सीमाओं से बाहर फैलता है, वहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। भारत ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि अपने देश में इसका प्रभाव लगभग शून्य रहा।

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की चीनी मूल की वायु रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय कर दिया। राफेल जेट, स्कैल्प क्रूज मिसाइल और हैमर प्रिसिजन बमों का इस्तेमाल करते हुए शुरुआती हमले 23 मिनट में पूरे किए गए।

9–10 मई को पाकिस्तान द्वारा जवाबी हमले के बाद भारत ने एक ही समय में 11 एयरबेस पर हमला किया—यह इतिहास में पहली बार था। इसमें पाकिस्तान की वायुसेना की लगभग 20% क्षमता नष्ट हो गई।

भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली—जिसमें S-400, आकाश और MRSAM शामिल हैं—ने पाकिस्तान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को लगभग 100% सफलता के साथ नष्ट कर दिया। यहां तक कि 314 किमी दूर एक पाकिस्तानी AEW&C विमान को मार गिराया गया।

समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण

इस अभियान की सफलता ‘JAI’—संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण—पर आधारित थी। तीनों सेनाओं ने मिलकर बेहतरीन तालमेल के साथ काम किया। नौसेना ने अरब सागर में दबदबा बनाए रखा, वायुसेना ने सटीक हमले किए और थलसेना ने रक्षा को मजबूत किया।

भारत का रक्षा उत्पादन 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹1.54 लाख करोड़ हो गया, जिसमें 65% से अधिक उपकरण देश में ही बन रहे हैं। ब्रह्मोस, आकाश और अन्य स्वदेशी प्रणालियों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका

सैन्य शक्ति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी ली और सेना को स्पष्ट निर्देश दिए: आतंकियों को निशाना बनाओ, लेकिन नागरिकों को नुकसान नहीं होना चाहिए।

सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अन्य रणनीतिक फैसले इस व्यापक नीति का हिस्सा थे, जिससे पाकिस्तान पर दीर्घकालिक दबाव बना।

एकजुट राष्ट्र: ‘Whole-of-Nation’ दृष्टिकोण

यह अभियान केवल सैन्य नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र का संयुक्त प्रयास था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने उपग्रह निगरानी प्रदान की, जबकि अन्य एजेंसियों ने खुफिया समर्थन दिया।

नागरिक प्रशासन, उद्योग और स्टार्टअप्स ने भी योगदान दिया। सूचना युद्ध में भी भारत ने बढ़त बनाई और गलत सूचनाओं को तुरंत खारिज किया।

निष्कर्ष: एक नया मानक

‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक परिपक्व रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। इसने दिखाया कि आत्मनिर्भरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्णायक जीत हासिल कर सकता है।

हालांकि, आगे की चुनौतियां बनी हुई हैं—फाइटर स्क्वाड्रन बढ़ाना, ड्रोन क्षमता मजबूत करना और रक्षा बजट को बढ़ाना आवश्यक होगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने एक नया मानक स्थापित किया है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त बनी रहे—क्योंकि विरोधी भी सीख रहे हैं और स्थिर नहीं रहेंगे।

भारत का ऑपरेशन सिंदूर: रणनीतिक जीत का एक वर्ष
  • मेजर जनरल रवि मुरुगन (सेवानिवृत्त)

आज से एक साल पहले, 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसने केवल नीति की घोषणा से आगे बढ़कर उसे निर्णायक कार्रवाई में बदल दिया। यह भारत की धरती पर दशकों से जारी पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ जवाब देने के तरीके में एक बड़ा बदलाव था। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर भारत के उस लंबे संघर्ष में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया, जिसमें पाकिस्तान द्वारा गैर-राज्य तत्वों को प्रॉक्सी हिंसा के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का जवाब दिया गया।

इस अभियान के पीछे भारत का राजनीतिक इरादा पूरी तरह स्पष्ट और दृढ़ था। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पाकिस्तान-प्रशिक्षित आतंकवादियों के बर्बर हमले में 26 निर्दोष लोगों की मौत के बाद भारत की प्रतिक्रिया केवल प्रतीकात्मक या सीमित नहीं थी। यह पूरी तरह योजनाबद्ध, समयबद्ध और स्पष्ट उद्देश्य वाली कार्रवाई थी। 88 घंटे तक चले इस अभियान ने साफ दिखाया कि भारत ने तय लक्ष्यों के साथ संगठित जवाबी रणनीति अपनाई और अपने उद्देश्यों को पूरा करने के बाद अपनी शर्तों पर इसे समाप्त किया।

राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से इस अभियान की दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहली, हमलों का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक था। लक्ष्य केवल नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब के अंदरूनी क्षेत्रों तक भी पहुंचे। यह एक सोची-समझी रणनीतिक पहल थी, जिसने पाकिस्तान की कथित परमाणु सीमाओं और उसकी प्रतिरोधक नीति को सीधे चुनौती दी।

दूसरा, इस अभियान ने दिखाया कि आज के सूचना युग के युद्धों में तकनीक कितनी केंद्रीय भूमिका निभाती है। क्रूज़ मिसाइलों, लोइटरिंग हथियारों, नेटवर्क-आधारित प्रणालियों और बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा प्रणाली के उपयोग ने स्पष्ट किया कि अब युद्ध सटीकता, गति और बेहतर समन्वय तथा युद्धक्षेत्र की समझ पर आधारित हैं। ऑपरेशन सिंदूर केवल जवाबी कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह भारत की उस नई युद्ध रणनीति का प्रदर्शन भी था, जिसमें दूर से मार करने की क्षमता, तेज निर्णय प्रक्रिया और कई मोर्चों पर एकीकृत कार्रवाई प्रमुख है।

7 मई 2025 को शुरू हुआ यह अभियान पाकिस्तान के भीतर मौजूद आतंकी ढांचे पर तेज, सटीक और योजनाबद्ध कार्रवाई था। यह भारत की समन्वित सैन्य क्षमता का नियंत्रित लेकिन अत्यंत प्रभावशाली प्रदर्शन था, जिसका उद्देश्य दुश्मन पर कीमत थोपना था, बिना संघर्ष को अनावश्यक रूप से बढ़ाए। एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर भारत की बढ़ती रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण माना जाता है—अर्थात, परमाणु शक्ति से लैस दुश्मन को जवाबदेह बनाने की क्षमता, वह भी स्पष्ट उद्देश्य, दृढ़ संकल्प और संतुलित रणनीति के साथ।

आज के कई युद्ध जहां लंबे और अनिर्णायक बन जाते हैं, वहीं ऑपरेशन सिंदूर स्पष्ट लक्ष्यों और ठोस कार्रवाई के कारण अलग दिखाई देता है। इसका राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट था—आतंकवाद के ढांचे और उसे समर्थन देने वालों पर सीधा और प्रभावी प्रहार करना। लक्ष्य प्राप्त होते ही अभियान को सीमित रखा गया। टारगेट चयन में भी संयम और दृढ़ता दोनों दिखाई दिए। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों से जुड़े महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया, ताकि उनकी क्षमता कमजोर हो, लेकिन आम नागरिकों को नुकसान और सहायक क्षति न्यूनतम रहे।

सैन्य संचालन के स्तर पर यह अभियान भारत की दूर से सटीक प्रहार करने की युद्ध क्षमता के परिपक्व होने का संकेत था। लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों और प्रिसीजन हथियारों से लैस राफेल, साथ ही ब्रह्मोस प्रणाली से जुड़े सुखोई SU-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म ने व्यापक दायरे में गहराई तक समन्वित हमले संभव बनाए। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से आगे बढ़कर पाकिस्तान के पंजाब के भीतर तक कार्रवाई का विस्तार इस बात का संकेत था कि भारत ने अपनी पुरानी स्व-निर्धारित सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए कथित सुरक्षित ठिकानों को भी चुनौती दी।

इस अभियान की रक्षा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। एकीकृत वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियों ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए किसी भी जवाबी हमले को प्रभावी ढंग से विफल कर दिया। आक्रामक क्षमता और मजबूत रक्षात्मक सुरक्षा के इस संयोजन ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि आधुनिक युद्ध में नेटवर्क-आधारित समन्वय और बहु-स्तरीय सुरक्षा कितनी आवश्यक हो चुकी है।

रणनीतिक सिद्धांत के स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर ने एक साथ तीन महत्वपूर्ण सीमाएं पार कीं—जिम्मेदार लक्ष्य चयन, संतुलित सैन्य शक्ति का उपयोग और स्पष्ट दबावकारी संदेश। इसने दिखाया कि जब कार्रवाई स्पष्ट राजनीतिक इरादे, सटीक सैन्य लक्ष्यों और मजबूत प्रतिरोधक क्षमताओं के साथ की जाए, तो दुश्मन को दंडित किया जा सकता है बिना स्थिति को अनियंत्रित युद्ध में बदले। भारत ने युद्ध के दायरे को पूरी तरह बढ़ाने के बजाय उसे सीमित लेकिन प्रभावशाली ढंग से बढ़ाया, जिससे पूर्ण युद्ध से बचते हुए भी दुश्मन पर ठोस कीमत थोपी गई।

इस अभियान की एक और बड़ी विशेषता थी—तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और पूरे रक्षा तंत्र का एकीकृत संचालन। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की स्थापना के बाद विकसित नए रक्षा ढांचे का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। समुद्री मोर्चा, हवाई शक्ति और जमीनी लक्ष्य—ये अलग-अलग अभियान नहीं थे, बल्कि एक ही संयुक्त रणनीति के हिस्से थे।

इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बढ़ती ताकत ने और मजबूत बनाया। स्वदेशी प्लेटफॉर्म, प्रिसीजन हथियार प्रणालियां, काउंटर-ड्रोन तकनीक और ISR (इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस) जैसी घरेलू क्षमताओं की बढ़ती भूमिका ने दिखाया कि भारत धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से रक्षा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। इस तरह, ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारत की औद्योगिक और तकनीकी गहराई का भी प्रमाण था। अब मजबूत रक्षा तैयारी सीधे तौर पर देश की औद्योगिक क्षमता से जुड़ चुकी है।

कूटनीतिक स्तर पर भी यह अभियान बेहद सोच-समझकर चलाया गया। भारत ने अपनी कार्रवाइयों को आतंकवाद के खिलाफ जवाब और आत्मरक्षा के दायरे में प्रस्तुत किया, जिससे ऑपरेशन सिंदूर के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नैतिक और रणनीतिक आधार तैयार हुआ। सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक संदेशों के बीच यह तालमेल भारत के लिए रणनीतिक स्पेस बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

अंततः, ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी विशेषता उसका सही समय पर और स्पष्ट तरीके से समापन था। अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद भारत ने तय समय-सीमा के भीतर अभियान रोक दिया, जिससे वह उन लंबे और दिशाहीन संघर्षों से बचा रहा जो आज कई आधुनिक युद्धों की पहचान बन चुके हैं। इसकी शुरुआत, संचालन और समाप्ति—तीनों में दिखाई गई स्पष्टता और सटीकता ही इस अभियान की सबसे बड़ी पहचान रही।

एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर की वास्तविक विरासत केवल दुश्मन को हुए नुकसान में नहीं, बल्कि उस नई मिसाल में है जो इसने स्थापित की। इसने दिखाया कि संतुलित, तकनीक-सक्षम और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा निर्देशित सैन्य कार्रवाई दुश्मन पर भारी कीमत थोप सकती है, उसकी रणनीति बदल सकती है और फिर भी नियंत्रण के दायरे में रह सकती है। यह परमाणु जोखिम के बीच सीमित युद्ध के लिए भारत के उभरते मॉडल को दर्शाता है—इरादों में मजबूत, कार्रवाई में सटीक और संयम में अनुशासित।

नॉर्थ टेक सिम्पोजियम 2026: ऑपरेशन सिंदूर में दिखी स्वदेशी रक्षा शक्ति की झलक

दिल्ली/सत्ता संदेश

रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ ने कहा है कि “भारत की सैन्य शक्ति हमारे रक्षा उद्योगों के कारखानों में विकसित की गई है।” उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर  की सफलता का श्रेय रक्षा बलों के अद्वितीय साहस और दृढ़ संकल्प को दिया जिसे स्वदेशी रूप से विकसित प्रभावशाली अत्याधुनिक हथियारों और प्रणालियों ने और भी मजबूत बनाया। उन्होंने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित नॉर्थ टेक सिम्पोजियम को संबोधित करते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ और स्टार्टअप्स को देश का ब्रांड एंबेसडर बताया। उन्होंने कहा कि “हमारे स्टार्टअप्स और एमएसएमई भविष्य में होने वाले विकास की प्रेरक शक्ति हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के  निर्माण के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

राज्यमंत्री महोदय ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आतंकवादियों के छिपने के अड्डों को नष्ट करके भारत के शत्रुओं की कुटिल योजनाओं को नाकाम करने के लिए रक्षा बलों की सराहना की । उन्होंने कहा कि भारत में निर्मित उपकरणों का प्रभावशाली उपयोग पूरे देश में सरकार, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों और निजी क्षेत्र विशेष रूप से नवप्रवर्तकों, स्टार्टअप और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की ओर से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के संकल्प का प्रमाण है।

राज्यमंत्री ने रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन और रक्षा संबधी निर्यात के आंकड़े पर जोर देते हुए कहा कि उस नए भारत के उदय का प्रमाण हैं जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनी क्षमताओं को मजबूत करने में विश्वास रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि “यह नया भारत किसी पर बुरी नजर नहीं रखता और न ही किसी के द्वारा अपनी संप्रभुता को खतरा पहुंचाने का प्रयास करने पर आंखें फेर लेता है।”

भारतीय सेना की उत्तरी और मध्य कमान तथा एसआईडीएम की ओर से रक्षा त्रिवेणी संगम प्रौद्योगिकीउद्योग और सैन्य कौशल का संगम विषय पर तीन दिवसीय नॉर्थ टेक सिम्पोजियम 2026 का आयोजन किया गया है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 4 मई को इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसमें निजी क्षेत्र के रक्षा निर्माताओं के 284 स्टॉल हैं जहां अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी), ड्रोन, काउंटर यूएवी (ऑल टेरेन व्हीकल), निगरानी उपकरण और अन्य रक्षा उत्पादों का प्रदर्शन भी किया जा रहा है।