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5659 करोड़ का कपास उत्पादकता मिशन, क्षेत्र के पुनरुद्धार की बड़ी पहल : शिवराज सिंह चौहान

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

पीएम नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कपास उत्पादकता मिशन को मंझूरी मिल गई है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसकी स्वकृति दी जाना तथा एससीओ सदस्य देशों के साथ कृषि उत्पादों के सुरक्षित व्यापार, प्लांट क्वारंटीन और फाइटोसैनिटरी से जुड़े पौधों को स्वीकृति मिलना किसानों कृषि अर्थव्यव्स्था और खाद्य सुरक्षा के लिए जरुरी निर्णय है।उन्होंने बताया कि भारत वैश्विक कपास उत्पादन में 21 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखता है और 114.47 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होने से यह क्षेत्र लाखों किसानों की आजीविका और वस्त्र उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

शिवराज सिंह ने बताया कि यह मिशन वस्त्र क्षेत्र के लिए एकीकृत 5F दृष्टिकोण- फार्म, फाइबर, फैक्ट्री, फैशन और फॉरेन के अनुरूप देश को खेती से उद्योग तक एक मजबूत और टिकाऊ मूल्य श्रृंखला प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि मिशन के लिए 5659.22 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत पहला प्रमुख घटक अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों सहित रणनीतिक उपायों के माध्यम से कपास की उत्पादकता और उत्पादन को बढ़ावा देना है, जिसे कृषि मंत्रालय के अंतर्गत किसान कल्याण विभाग तथा कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग द्वारा कार्य किया जाएगा।

केंद्रीय कृषि ने कहा कि कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के तहत 3804.17 करोड़ की लागत से नवीनतम फसल उत्पादन प्रौद्योगिकियों का व्यापक विस्तार किया जाएगा। इसके अंतर्गत उच्च घनत्व रोपण प्रणाली, कम अंतराल रोपण प्रणाली, एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल किस्मों का प्रोत्साहन तथा एकीकृत फसल प्रबंधन जैसे उपायों को प्रदर्शनों के माध्यम से खेत स्तर तक पहुंचाया जाएगा।

उन्होंने ने बताया कि मिशन के प्रारंभिक चरण में 14 कपास उत्पादक राज्यों के 140 जिलों में लगभग 24 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा और लगभग 32 लाख किसानों को इसका लाभ मिलेगा। राज्य सरकारों और आईसीएआर के माध्यम से इसका क्रियान्वयन यह सुनिश्चित करेगा कि नई तकनीक, बेहतर पद्धतियां और वैज्ञानिक सलाह सीधे किसानों तक पहुंचे। श्री चौहान ने कहा कि इस मिशन का लक्ष्य वर्तमान लगभग 440 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर उत्पादकता को बढ़ाकर वर्ष 2031 तक 755 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर करना तथा वर्तमान 297 लाख गांठों से बढ़ाकर 2031 तक 498 लाख गांठों का लक्ष्य प्राप्त करना है। यह लक्ष्य न केवल कपास उत्पादन को नई ऊंचाई देगा, बल्कि देश के वस्त्र उद्योग को गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की स्थिर उपलब्धता भी सुनिश्चित करेगा।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा SCO सदस्य देशों के साथ हुए समझौते को स्वीकृति मिलना भी कृषि क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। इस समझौते का उद्देश्य सदस्य देशों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादों के सुरक्षित व्यापार को सुगम बनाना तथा कृषि व्यापार में संभावित कीट प्रकोप को कम करने हेतु प्लांट क्वारंटीन और फाइटोसैनिटरी उपायों को मजबूत करना है।

खाद्य सुरक्षा से खाद्यान्नों के मामले में नेतृत्व की ओर: खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में पीएलआई योजना का परिवर्तनकारी प्रभाव
  • श्री अविनाश जोशी

खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की कहानी में एक निर्णायक मोड़

भारत आज अपने आर्थिक सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अब जबकि हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की दिशा में अग्रसर है, विकास को सिर्फ उत्पादन की मात्रा से ही नहीं, बल्कि हमारे द्वारा सृजित मूल्य के आधार पर भी मापना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की तुलना में बहुत कम क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां इस प्रकार का बदलाव बिल्कुल साफ नजर आता है।

भारत खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों, दूध और समुद्री उत्पादों के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। दशकों तक, हमारे कृषि संबंधी सामर्थ्य ने देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। फिर भी, इस उपज का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बेहद ही सीमित मूल्यवर्धन के साथ सीधे खेत से बाजार तक पहुंचता रहा।

आज भारत के कृषि उत्पादन का महज 12-13 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्करण से गुजरता है। उत्पादन और प्रसंस्करण के बीच का यही अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध सबसे बड़े अवसरों में से एक है।

इसलिए, खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की यात्रा का अगला चरण बिल्कुल स्पष्ट है: कृषि की प्रचुर संपदा को उच्च मूल्य वाले एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खाद्य उत्पादों में परिवर्तित करना।

पीएलआई योजना के पीछे की परिकल्पना

इस अवसर को पहचानते हुए, भारत सरकार ने मार्च 2021 में कुल 10,900 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की शुरुआत की।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) द्वारा इस योजना को 2021-22 से 2026-27 तक की छह साल की अवधि के लिए लागू किया जा रहा है।

इस योजना के पीछे का मूल विचार सरल लेकिन ठोस है: खाद्य प्रसंस्करण क्षमता, नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग के विस्तार में निवेश करने वाली कंपनियों को पुरस्कृत करना। कुल मिलाकर, यह योजना इन-स्टोर ब्रांडिंग, अंतरराष्ट्रीय खुदरा श्रृंखलाओं में शेल्फ स्पेस और वैश्विक विपणन अभियानों में निवेश करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करके भारत में खाद्य उत्पादन से जुड़ी वैश्विक स्तर की कई चैंपियन कंपनियां तैयार करती है।

रणनीतिक डिजाइन: एक आधुनिक खाद्य इकोसिस्टम का निर्माण

पीएलआईएसएफपीआई योजना की संरचना को सावधानीपूर्वक को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रखा गया है।

1. उच्च क्षमता वाले खाद्य क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना

पहला घटक पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) खाद्य पदार्थ, प्रसंस्कृत फल और सब्जियां, समुद्री उत्पाद जैसी प्रमुख खाद्य श्रेणियों में उत्पादन बढ़ाने पर केन्द्रित है।

ये श्रेणियां वैसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत घरेलू खपत और निर्यात क्षमता, दोनों में तेजी से विस्तार कर सकता है।

2. नवाचार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी को प्रोत्साहन देना

दूसरा घटक एमएसएमई द्वारा विकसित नवोन्मेषी और जैविक खाद्य उत्पादों को समर्थन प्रदान करता है। लघु एवं मध्यम उद्यम भारत के खाद्य क्षेत्र की रीढ़ हैं और समावेशी विकास हेतु  आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ उनका जुड़ाव बेहद जरूरी है।

पोषक अनाज (मिलेट) से संबंधित नवाचार: परंपरा को आधुनिक बाजारों से जोड़ना

वर्ष 2023 में, अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज (मिलेट्स) वर्ष के उपलक्ष्य में, मंत्रालय ने पीएलआई योजना के तहत एक विशेष पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पादों में मिलेट्स के उपयोग को प्रोत्साहित करना था।

मिलेट्स जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, अत्यधिक पौष्टिक और भारत की कृषि परंपराओं में गहराई से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलेट्स का समावेश करके, यह योजना पोषण संबंधी सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि को एक साथ बढ़ावा देती है।

बदलाव से जुड़े आंकड़े

पीएलआई योजना के तहत बहुत ही कम समय में हासिल की गई प्रगति उद्योग जगत की ओर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और इस नीति की प्रभावशीलता को दर्शाती है।

अब तक:

• इस योजना के तहत 165 कंपनियों को मंजूरी दी गई है।

• इनमें से 68 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) हैं, साथ ही बड़ी कंपनियों के 40 संविदा निर्माता भी शामिल हैं।

• कुल मिलाकर 9,207 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है।

• प्रति वर्ष लगभग 35 लाख मीट्रिक टन की नई प्रसंस्करण और संरक्षण संबंधी क्षमता सृजित की गई है।

• इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 3.29 लाख रोजगार सृजित हुए हैं।

ध्यान रखने लायक बात यह है कि इस योजना का मूल लक्ष्य 25 लाख रोजगार सृजित करना था। इस क्षेत्र ने पहले ही इस लक्ष्य का 131 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लिया है।

पीएलआई समर्थित कंपनियों द्वारा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों की बिक्री में भी 2019-20 से 13.23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।

(निर्यात में वृद्धि दर 2019-20 से 7.41 प्रतिशत की है)

विभिन्न पीएलआई योजनाओं के बीच एक चमकता सितारा

उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भारतीय अर्थव्यवस्था के 14 क्षेत्रों को कवर करती है। इनमें से, खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित पीएलआई सबसे प्रभावशाली योजनाओं में से एक बनकर उभरी है।

कुल पीएलआई सब्सिडी वितरण में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का हिस्सा मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही होने के बावजूद, इसने तमाम पीएलआई योजनाओं के तहत सृजित किए गए कुल रोजगारों में से लगभग 42 प्रतिशत रोजगार सृजित किए हैं।

अब तक, इस योजना के तहत कुल 2715 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी की जा चुकी है। यह कुल परिव्यय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है।

यह साबित करता है कि खाद्य प्रसंस्करण भारत के मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम में सबसे अधिक रोजगार सृजित करने वाले क्षेत्रों में से एक है।

उपभोक्ताओं की बदलती जीवनशैली के अनुरूप बदलाव

भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन का असर खाद्य उद्योग पर भी पड़ रहा है।

युवा और शहरीकरण की ओर अग्रसर आबादी की बढ़ती मांगें इस प्रकार हैं:

• खाद्य संबंधी सुविधाजनक उपाय

• स्वच्छ पैकेजिंग

• सुरक्षित और पौष्टिक खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पाद

बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर अक्सर पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) या खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) वैसे गुणवत्तापूर्ण भोजन की तलाश में रहते हैं जो उनकी तेज रफ्तार जीवनशैली के अनुरूप हो।

खाद्य सुरक्षा से खाद्य नेतृत्व की ओर

भारत की प्रचुर कृषि संपदा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हमारे सामने इस प्रचुर संपदा को सतत आर्थिक मूल्य में बदलने की चुनौती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से संबंधित उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना इस बदलाव को गति देने में सहायक साबित हो रही है और खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर खाद्यानों के मामले में नेतृत्व का सपना शीघ्र ही साकार होने वाला है।

(लेखक आईएएस अधिकारी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के सचिव हैं)

NIFTEM तंजावुर में दो दिवसीय ‘फूड बिजनेस स्टार्टअप प्रोत्साहन कार्यक्रम 2.0’ आयोजन

दिल्ली/सत्ता संदेश

खाद्य व्यवसाय प्रबंधन विभाग ने तंजावुर स्थित राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (एनआईएफटीईएम) में 16 और 17 अप्रैल 2026 को दो दिवसीय खाद्य व्यवसाय स्टार्टअप प्रोत्साहन कार्यक्रम 2.0 का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य उद्यम संबंधी क्षमताओं को मजबूत करना और इच्छुक खाद्य उद्यमियों, छात्रों और प्रारंभिक चरण के स्टार्टअप संस्थापकों को संरचित मार्गदर्शन प्रदान करना था।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों के ज्ञान को बढ़ाना और खाद्य व्यवसाय उद्यमिता में उनकी क्षमता का विकास करना था। इसका लक्ष्य आज के प्रतिस्पर्धी और नवाचार-प्रधान बाजार परिवेश में खाद्य उद्यम शुरू करने, प्रबंधित करने और उसका विस्तार करने से जुड़ी प्रक्रियाओं का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना था। इस पहल का उद्देश्य देश में खाद्य स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध संस्थागत सहायता प्रणालियों, नियामक आवश्यकताओं और वित्तीय सहायता के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।

देश भर से कुल 82 प्रतिभागियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। इनमें महत्वाकांक्षी उद्यमी, खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में उद्यम स्थापित करने में रुचि रखने वाले व्यक्ति और छात्र शामिल थे। कार्यक्रम ने ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक संवादात्मक मंच प्रदान किया, जिससे प्रतिभागियों को खाद्य व्यवसाय इकोसिस्टम की बदलती गतिशीलता को समझने और उभरते अवसरों का पता लगाने में मदद मिली।

कार्यक्रम के दौरान आयोजित सत्र में खाद्य व्यवसाय, अनुसंधान और उद्योग प्रथाओं में अनुभव रखने वाले विषय विशेषज्ञों और पेशेवरों ने व्याख्यान दिए। कार्यक्रम में खाद्य व्यवसाय विकास के लिए आवश्यक विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल थी, जिसमें पैकेजिंग तकनीक, कॉर्पोरेट कानून, शासन और कराधान, ब्रांडिंग और विपणन रणनीतियां, मूल्य निर्धारण तकनीक तथा निर्यात के अवसर शामिल थे। प्रतिभागियों को उद्यमियों के लिए उपलब्ध संस्थागत सहायता प्रणालियों, इनक्यूबेशन सुविधाओं और प्रौद्योगिकियों से भी अवगत कराया गया।

सत्रों में आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, इन्वेंट्री नियंत्रण, खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों और मशीनरी का चयन जैसे परिचालन और रणनीतिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, ग्राहक जुड़ाव, व्यावसायिक विचार सत्यापन और नए उत्पाद विकास पर भी जोर दिया गया। खाद्य सुरक्षा विनियम, गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली, सार्वजनिक नीतियां और खाद्य स्टार्टअप को समर्थन देने वाली अनुदान योजनाओं जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की गई।

इस कार्यक्रम ने सफल खाद्य व्यवसाय उद्यमों के विकास और उन्हें बनाए रखने के लिए आवश्यक तकनीकी, प्रबंधकीय और नियामक पहलुओं पर व्यापक जानकारी प्रदान की, जिससे प्रतिभागियों को तेजी से बढ़ते खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में उद्यमशीलता के अवसरों का लाभ उठाने के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला।