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वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा: आर्थिक गतिविधियों में नरमी की आशंका, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण मजबूत

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

Ministry of Finance ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा है कि आने वाले महीनों में सामान्य से कम मानसून और कुछ क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों की संभावित सुस्ती के कारण उपभोग मांग पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निकट भविष्य का परिदृश्य सतर्क आशावाद के साथ मजबूत बना हुआ है।

वित्त मंत्रालय की समीक्षा के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आय और उपभोग का स्तर काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो कृषि उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और उपभोक्ता मांग प्रभावित हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्यों और ग्रामीण बाजारों पर देखने को मिल सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर भी आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव, ऊर्जा कीमतों में बदलाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की धीमी वृद्धि जैसी परिस्थितियां वैश्विक आर्थिक वातावरण को प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई दे रहा है।

समीक्षा में यह भी उल्लेख किया गया कि देश में बुनियादी ढांचा निवेश, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार, सेवा क्षेत्र की मजबूती और सरकारी पूंजीगत व्यय आर्थिक वृद्धि को समर्थन प्रदान कर रहे हैं। सार्वजनिक निवेश के साथ-साथ निजी निवेश में भी धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार और बढ़ती उपभोक्ता मांग है। हालांकि यदि मानसून कमजोर रहता है, तो ग्रामीण खपत पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में विकास की गति प्रभावित हो सकती है।

वित्त मंत्रालय ने संकेत दिया कि मुद्रास्फीति पर भी लगातार नजर रखी जा रही है। खाद्य पदार्थों की कीमतें, मौसम की स्थिति और वैश्विक कमोडिटी बाजार आने वाले महीनों में महंगाई के रुख को प्रभावित कर सकते हैं। सरकार और नीति निर्माता मूल्य स्थिरता बनाए रखने तथा विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, वित्तीय समावेशन, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं और तकनीकी क्षेत्र में निवेश जैसे कारक भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता को मजबूत बना रहे हैं। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, हरित ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निवेश से भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को और गति मिलने की उम्मीद है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कुछ अल्पकालिक चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन व्यापक आर्थिक संकेतक अभी भी सकारात्मक बने हुए हैं। मजबूत बैंकिंग प्रणाली, बढ़ता निवेश और सरकारी सुधार कार्यक्रम विकास को सहारा दे सकते हैं।

कुल मिलाकर वित्त मंत्रालय का आकलन यह दर्शाता है कि मानसून और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े जोखिमों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है और निकट भविष्य में वृद्धि की संभावनाएं बरकरार हैं, हालांकि नीति निर्माताओं को सतर्कता बनाए रखने की आवश्यकता होगी।

आरबीआई का बही-खाता 20.6 प्रतिशत बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, सोना और निवेश बने प्रमुख कारण

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India का बही-खाता (बैलेंस शीट) वित्त वर्ष 2025-26 में 20.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि के साथ 91.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। केंद्रीय बैंक की शुक्रवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के बही-खाते का आकार 31 मार्च 2025 को 76,25,421.93 करोड़ रुपये था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 91,97,121.08 करोड़ रुपये हो गया। इस प्रकार एक वर्ष में इसमें 15,71,699.15 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

केंद्रीय बैंक ने बताया कि इस वृद्धि के पीछे घरेलू निवेश, सोने के भंडार और विदेशी निवेश में हुई बढ़ोतरी प्रमुख कारण रहे। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच सोने में निवेश और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्य में बढ़ोतरी ने आरबीआई की कुल संपत्ति को मजबूत किया।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट उसकी वित्तीय क्षमता, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक स्थिरता का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। आरबीआई की बैलेंस शीट में यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि भारत की वित्तीय प्रणाली और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में हैं।

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि केंद्रीय बैंक ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए विभिन्न नीतिगत कदम जारी रखे। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सोने के भंडार में वृद्धि केंद्रीय बैंकों की वैश्विक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है, क्योंकि इसे आर्थिक अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। भारत सहित कई देशों के केंद्रीय बैंक हाल के वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार को लगातार बढ़ा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि विदेशी निवेश और घरेलू परिसंपत्तियों के मूल्य में सुधार से आरबीआई की आय और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, आरबीआई की मजबूत बैलेंस शीट देश की बैंकिंग और मौद्रिक प्रणाली के लिए भरोसे का संकेत है। इससे वित्तीय बाजारों में स्थिरता और निवेशकों का विश्वास बनाए रखने में मदद मिलती है।

फिलहाल आर्थिक जगत की नजर इस बात पर भी है कि आने वाले समय में वैश्विक बाजारों की स्थिति, तेल कीमतें और ब्याज दरों का आरबीआई की नीतियों और बैलेंस शीट पर क्या प्रभाव पड़ता है।

मुकेश अंबानी ने लगातार छठे साल नहीं लिया वेतन, लाभांश बना आय का प्रमुख स्रोत

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

एशिया के सबसे अमीर उद्योगपति Mukesh Ambani ने एक बार फिर अपनी वेतन नीति को लेकर सुर्खियां बटोरी हैं। जानकारी के अनुसार, उन्होंने लगातार छठे वर्ष अपनी कंपनी Reliance Industries Limited से कोई वेतन नहीं लिया है। इसके बावजूद उनकी आय का प्रमुख स्रोत कंपनी द्वारा दिया जाने वाला लाभांश (डिविडेंड) बना हुआ है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के शीर्ष नेतृत्व में लंबे समय से सक्रिय मुकेश अंबानी ने पिछले कई वर्षों से अपना वेतन शून्य रखा है। कंपनी के कॉर्पोरेट गवर्नेंस ढांचे के तहत निदेशक मंडल द्वारा तय पारिश्रमिक नीति के अनुसार उनका वेतन निर्धारित होता है, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से इसे नहीं लेने का निर्णय जारी रखा है।

कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड के अनुसार, मुकेश अंबानी की कुल आय का बड़ा हिस्सा उनकी शेयरधारिता और उससे मिलने वाले लाभांश से आता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज में उनकी और परिवार की हिस्सेदारी उन्हें देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट डिविडेंड प्राप्तकर्ताओं में शामिल करती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की नीति कॉर्पोरेट जगत में एक अलग संदेश देती है, जहां प्रमोटर-चेयरमैन का वेतन नहीं लेना कंपनी की दीर्घकालिक छवि और निवेशकों के विश्वास से जोड़ा जाता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की कंपनियों में से एक है, जिसका कारोबार ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल्स, टेलीकॉम और रिटेल जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ है।

हालांकि वेतन नहीं लेने के बावजूद कंपनी के प्रदर्शन और शेयरहोल्डिंग के कारण अंबानी की संपत्ति पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। उनकी संपत्ति का बड़ा हिस्सा कंपनी के शेयर मूल्य और बाजार प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है।

कॉर्पोरेट विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम पिछले कई वर्षों से जारी एक स्थिर नीति का हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि कंपनी का नेतृत्व वेतन से अधिक लंबे समय के निवेश मूल्य और शेयरधारक लाभ पर केंद्रित है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के भीतर यह भी माना जाता है कि शीर्ष नेतृत्व द्वारा वेतन न लेना एक प्रतीकात्मक निर्णय है, जो कंपनी की वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक रणनीति को दर्शाता है।

इस बीच, भारतीय कॉर्पोरेट जगत में अंबानी की यह नीति एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है, क्योंकि यह बड़े कॉरपोरेट घरानों के पारिश्रमिक मॉडल से अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत में बड़ा उछाल, 5.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश


देश में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 150 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाली केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाओं की कुल लागत में सामूहिक रूप से 5.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।

यह जानकारी अप्रैल महीने की एक आधिकारिक रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें देशभर में चल रही प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की स्थिति का आकलन किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, लागत में यह वृद्धि विभिन्न कारणों से हुई है, जिनमें परियोजनाओं में देरी, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भूमि अधिग्रहण में बाधाएं और तकनीकी कारण प्रमुख हैं। इससे इन परियोजनाओं की समयसीमा और बजट दोनों पर दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत वृद्धि से सरकारी वित्तीय योजना पर असर पड़ सकता है और परियोजनाओं के समय पर पूरा होने की चुनौती और बढ़ सकती है।

यह रिपोर्ट भारत सरकार (Government of India) द्वारा बुनियादी ढांचा विकास की निगरानी के तहत तैयार की गई है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों की परियोजनाओं का विस्तृत विश्लेषण शामिल है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में लागत नियंत्रण और परियोजना प्रबंधन में सुधार करना बेहद जरूरी होगा, ताकि देश की विकास गति प्रभावित न हो।

आरबीआई देगा सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश, बढ़ेगी वित्तीय मजबूती

मुंबई / सत्ता संदेश

Reserve Bank of India ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का लाभांश देने की घोषणा की है। माना जा रहा है कि यह राशि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार को बड़ी वित्तीय राहत प्रदान करेगी।

यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश हस्तांतरण है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में आरबीआई ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का लाभांश दिया था, जो 2023-24 की तुलना में 27.4 प्रतिशत अधिक था। वहीं, 2023-24 में यह राशि 2.1 लाख करोड़ रुपये और 2022-23 में 87,416 करोड़ रुपये रही थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई से मिलने वाला यह बड़ा लाभांश सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश आय और केंद्रीय बैंक की बेहतर वित्तीय स्थिति के कारण इस बार रिकॉर्ड लाभांश संभव हो पाया है।