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होर्मुज खुलवाए बिना युद्ध खत्म करने के इच्छुक हैं ट्रंप: वॉल स्ट्रीट जर्नल

वाशिंगटन, 31 मार्च (भाषा) अमेरिकी समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने प्रशासनिक अधिकारियों का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने करीबी सहयोगियों से कहा है कि वह होर्मुज जलडमरुमध्य मोटे तौर पर बंद रहने की सूरत में भी ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान खत्म करने के लिए तैयार हैं, जो बाद में किसी और समय फिर से शुरू किया जा सकता है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल की खबर के अनुसार हालिया दिनों में ट्रंप और उनके सहयोगियों द्वारा यह अनुमान लगाया है कि जलडमरुमध्य को जबरन खुलवाने के लिए एक अभियान चलाने से संघर्ष ट्रंप की निर्धारित समयसीमा, यानी चार-छह सप्ताह से आगे बढ़ जाएगा।

खबर के अनुसार ट्रंप ने फैसला किया है कि अमेरिका को ईरान की नौसेना को कमजोर करने और उसके मिसाइल भंडार को नुकसान पहुंचाने जैसे अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल करने के बाद मौजूदा सैन्य संघर्ष को धीरे-धीरे समाप्त करना चाहिए, और साथ ही तेहरान पर कूटनीतिक दबाव डालकर व्यापार के मुक्त प्रवाह को फिर से शुरू करने के लिए मजबूर करना चाहिए।

खबर में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि अगर यह प्रयास विफल रहता है, तो अमेरिका यूरोप और खाड़ी क्षेत्र में अपने सहयोगियों पर दबाव डालेगा कि वे जलडमरूमध्य को फिर खुलवाने के लिए आगे आएं।

सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति और पेंटागन प्रमुख ने हमेशा सैन्य अभियान के लिए चार से छह सप्ताह की अनुमानित समयसीमा बताई है।

उन्होंने कहा, “आज 30 दिन हो गए हैं।”

लेविट ने यह संकेत भी दिया कि अरब देशों से भी ईरान में जारी सैन्य अभियान का बोझ साझा करने के लिए कहा जा सकता है।

जब यह पूछा गया कि क्या कुवैत, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों को ईरान में जारी सैन्य अभियान का खर्च उठाना चाहिए तो उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह ऐसा मुद्दा है जिसमें राष्ट्रपति काफी रुचि ले सकते हैं। मैं इस पर उनसे पहले कुछ नहीं कहूंगी, लेकिन निश्चित रूप से यह एक विचार है और मुझे लगता है कि वह इस बारे में आपको ज्यादा जानकारी दे पाएंगे।”

अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया था, जिसके बाद ईरान ने पलटवार किया और पूरे खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष फैल गया। होर्मुज जलडमरुमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्ग है।

होर्मुज जलडमरुमध्य फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो फिलहाल काफी हद तक बंद है। इसके कारण रोजाना गुजरने वाले सैकड़ों जहाजों की आवाजाही लगभग बंद हो गई है।

तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता देने के बाद उपजा सीमा विवाद : सीडीएस चौहान

देहरादून, 14 फरवरी (भाषा) देश के प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि चीन के साथ सीमा विवाद तब पैदा हुआ जब तिब्बत पर बीजिंग के कब्जे के बाद भारत ने 1954 में उसे चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दे दी।

जनरल चौहान ने यहां लोकभवन में शुक्रवार को ‘भारत हिमालयन इंटरनेशनल स्ट्रेटेजिक मंच’ विचारक संस्था के तहत ‘फ्रंटियर्स, बॉर्डर्स एंड एलएसी: द मिडल सेक्टर’ नामक विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा, “वर्ष 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता दी, दोनों देशों ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए और इसके साथ ही भारत ने मान लिया कि उसने अपनी उत्तरी सीमा का निपटारा कर लिया है। यही एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जिसके बारे में हमने माना था कि इसका निपटारा किसी औपचारिक संधि के माध्यम से नहीं हुआ था।”

सीडीएस ने कहा कि भारत के लिए इस सीमा की वैधता पंचशील समझौते पर आधारित थी, जिसके बारे में उसका मानना था कि इसे छह दर्रों- शिपकी ला, माना, नीति, कुंगरी बिंगरी और दरमा और लिपुलेख, की पहचान करके सीमांकित किया गया था और इनके माध्यम से व्यापार और तीर्थयात्रा होगी।

उन्होंने कहा, “हालांकि, चीन का मानना था कि यह समझौता केवल व्यापार के लिए किया गया था और इसमें कहीं भी किसी विशेष सीमा विवाद पर चीन का रुख नहीं झलकता था। इसलिए यह एक सीमा विवाद बन गया।”

जनरल चौहान ने कहा, “(तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल) नेहरू शायद जानते थे कि पूर्व में हमारी मैकमोहन लाइन जैसी कोई सीमा रेखा थी, और लद्दाख क्षेत्र में हमारा कुछ दावा था, लेकिन यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं था। इसीलिए संभवत: वह पंचशील समझौते के लिए आगे बढ़ना चाहते थे।”

प्रमुख रक्षा अध्यक्ष ने हिमालयी सीमाओं के बढ़ते रणनीतिक महत्व और सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास पर सरकार के केंद्रित प्रयासों को रेखांकित करते हुए विवाद के मद्देनजर एकीकृत और दूरदर्शी रणनीतिक योजना की आवश्यकता पर बल दिया।

जनरल चौहान ने कहा कि गंगा और यमुना के पवित्र उद्गम स्थल, केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थस्थलों और इस क्षेत्र की गहरी आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं ने उत्तराखंड को असाधारण महत्व प्रदान किया है।

उत्तराखंड को मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि संस्कृति, चेतना और सभ्यतागत विरासत का जीवंत केंद्र बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश रणनीतिक विचार-मंथन के लिए एक आदर्श स्थान है।

सीडीएस ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जल सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, सैन्य आधुनिकीकरण और आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान के लिए हिमालयी परिप्रेक्ष्य को समग्र रूप से देखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मंच से उभरने वाले विचार क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय नीति को ठीक वैसे ही प्रभावित कर सकते हैं जैसे हिमालय से निकलने वाली गंगा नदी जीवन और प्रगति को बनाए रखते हुए पूरे देश में बहती है।