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रक्षा मंत्री ने फील्ड कमांडरों की वित्तीय सीमा दोगुनी की, परिचालन दक्षता को मिलेगा बढ़ावा

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बृहस्पतिवार को नई दिल्ली में चिकित्सा एवं निर्माण परियोजनाओं सहित रक्षा सेवाओं के लिए वित्तीय शक्तियों के संशोधित प्रत्यायोजन को जारी किया। वित्तीय शक्तियों में 100 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है, और कुछ मामलों में तो यह वृद्धि दोगुने से भी अधिक है। इससे फील्ड कमांडरों की परिचालन क्षमता और मजबूत होगी। इससे अनुबंधों को शीघ्रता से संपन्न करने तथा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी।

रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटित वित्तीय शक्तियों को दोगुना कर दिया गया है ताकि विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं पर निर्भरता कम करके आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके। वित्तीय शक्तियों के संशोधित प्रत्यायोजन से चालू वर्ष के बजटीय आवंटन के अनुसार राजस्व मार्ग से 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक की खरीद में मदद मिलेगी।

सेना/वायुसेना/नौसेना कमांडरों को सौंपी गई विशेष वित्तीय शक्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है, साथ ही तत्काल परिचालन जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रदान की गई कुल सीमा में 100 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। वित्तीय शक्तियों में वृद्धि के अतिरिक्त, सामान्य खरीद की तुलना में उच्चतर अधिकार क्षेत्र के साथ अग्रणी सेवा द्वारा संयुक्त सेवा खरीद को बढ़ावा देने के लिए नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। वस्तुओं और सेवाओं की खरीद को विकेंद्रीकृत करने के लिए कई नए सक्षम वित्तीय प्राधिकरणों की स्थापना की गई है।

वित्तीय शक्तियों को अंतिम बार 2021 में अधिसूचित किया गया था। सैन्य बलों की संख्या में विस्तार और बजट आवंटन में वृद्धि के मुकाबले परिचालन एवं रखरखाव पर बढ़ते व्यय को पूरा करने के लिए संशोधन आवश्यक हो गया था। वित्तीय शक्तियों में यह संशोधित प्रत्यायोजन, अक्टूबर 2025 में अधिसूचित संशोधित रक्षा खरीद नियमावली के साथ मिलकर, त्वरित निर्णय लेने के साथ रक्षा खरीद को गति प्रदान करेगा। इससे रक्षा बलों की आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित होगी।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी, चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन, रक्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह, सचिव (रक्षा उत्पादन) श्री संजीव कुमार, सचिव (पूर्व सैनिक कल्याण) श्रीमती सुकृति लिखी, सचिव (रक्षा वित्त) श्री विश्वजीत सहाय, वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल नागेश कपूर, कंट्रोलर जनरल ऑफ डिफेंस अकाउंट्स श्री अनुग्रह नारायण दास और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

KYC के 2025-26 अंतिम आंकड़े जारी, ‘वोकल फॉर लोकल’ से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र ने पिछले 12 सालो में विकास और परिवर्तन की असाधारण यात्रा तय की है। वित्त वर्ष 2025-26 में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1,87,105 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई जो अब तक सर्वाधिक है और ग्रामीण भारत की बढ़ती उद्यमशीलता, आत्मनिर्भरता तथा आर्थिक सशक्तिकरण का सशक्त प्रमाण है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों से प्रेरित होकर खादी अब केवल पारंपरिक उत्पाद नहीं रह गई है बल्कि यह ‘नए भारत’ की आत्मनिर्भरता, स्वदेशी गौरव और ग्रामीण समृद्धि का जीवंत प्रतीक बन गई है। खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र ने उत्पादन, विपणन और रोजगार सृजन में नए मानदंड स्थापित करते हुए देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार किया और उसे दिशा दी है।

केवीआईसी ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनंतिम आंकड़े जारी किए

नई दिल्ली में राजघाट के गांधी दर्शन पर स्थित केवीआईसी के कार्यालय में वित्त वर्ष 2025-26 के अनंतिम आंकड़े जारी करते हुए इसके अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि आयोग ने उत्पादन, बिक्री और रोजगार सृजन के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 की तुलना में विगत 12 वर्षों में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री में 501 प्रतिशत, उत्पादन में 380 प्रतिशत और रोजगार सृजन में 56 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने विगत वर्षों में हुई वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2024-25 में बिक्री में 447 प्रतिशत और उत्पादन में 347 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी प्रकार, वित्त वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2023-24 में बिक्री में 400 प्रतिशत और उत्पादन में 315 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.87 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई है

अध्यक्ष श्री मनोज कुमार ने कहा कि केवीआईसी का यह उल्लेखनीय प्रदर्शन न केवल ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प को गति प्रदान कर रहा है बल्कि भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान दिलाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रभावशाली मार्गदर्शन, महात्मा गांधी से मिली प्रेरणा और देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत लाखों कारीगरों की कड़ी मेहनत को इस उपलब्धि का श्रेय दिया। केवीआईसी के अध्यक्ष ने यह भी बताया कि जहां वित्त वर्ष 2013-14 में खादी और ग्राम उद्योग उत्पादों का उत्पादन 26,109 करोड़ रुपये का था, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में इसमें लगभग पांच गुना वृद्धि हुई जो 380 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 1,25,296 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। वित्त वर्ष 2013-14 में बिक्री जहां 31,154 करोड़ रुपये थी वहीं इसमें लगभग छह गुना वृद्धि दर्ज की गई जो 501 प्रतिशत की अभूतपूर्व बढ़ोतरी के साथ वित्त वर्ष 2025-26 में 1,87,105 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह अब तक बिक्री का उच्चतम आंकड़ा है।

खादी वस्त्रों के उत्पादन और बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि

खादी के वस्त्रों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। इनका उत्पादन वर्ष 2013-14 में 811 करोड़ रुपये का था जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 3,974 करोड़ रुपये हो गया। यह लगभग 390 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। साथ ही, खादी वस्त्रों की बिक्री 1,081 करोड़ रुपये से बढ़कर 7,869 करोड़ रुपये हो गई है जो इसमें लगभग 628 प्रतिशत की वृद्धि है। खादी के प्रति प्रधानमंत्री के निरंतर प्रोत्साहन और इसके प्रचार का सकारात्मक प्रभाव इस क्षेत्र की बढ़ती स्वीकार्यता और बाजार के विस्तार में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

ग्रामोद्योग क्षेत्र में उत्पादन और बिक्री के नए कीर्तिमान

ग्रामोद्योग क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। वर्ष 2013-14 में ग्रामोद्योग सामग्रियों का उत्पादन जहां 25,298 करोड़ रुपये था वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 1,21,322 करोड़ रुपये हो गया है जो इसमें लगभग 380 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इसी प्रकार, उनकी बिक्री 30,073 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,79,236 करोड़ रुपये हो गई जो लगभग 496 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। ग्रामोद्योग क्षेत्र ने रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्ष 2013-14 में जहां इस क्षेत्र में 1.19 करोड़ लोग कार्यरत थे वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 1.99 करोड़ हो गया जो ग्रामीण आजीविका सृजन में इस क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को उजागर करता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘घर-घर स्वदेशी’ जैसे अभियानों के प्रभाव से प्रेरित होकर ग्रामोद्योग उत्पादों की मांग में लगातार वृद्धि देखी गई है। परिणामस्वरूप, यह क्षेत्र ग्रामीण उद्योगों के विस्तार, बाजार को मजबूत करने और रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है।

रोजगार सृजन में केवीआईसी की ऐतिहासिक उपलब्धि

केवीआईसी ने रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त की है। खादी और ग्रामोद्योग से संबंधित गतिविधियों में वर्ष 2013-14 में क्रमिक रूप से वृद्धि के साथ रोजगार 1.30 करोड़ था जो इस क्षेत्र में 56 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 2.04 करोड़ हो गया। इससे ग्रामीण आजीविका सृजन में केवीआईसी की महत्वपूर्ण भूमिका उजागर होती है।

पीएमईजीपी ने स्वरोजगार और उद्यमिता को नई गति प्रदान की है

प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के अंतर्गत वित्त वर्ष 2025-26 में 66,494 नई इकाइयां स्थापित की गईं और इन इकाइयों के लिए 7,375 करोड़ रुपये के ऋण के बदले सरकारी खर्च पर 2,457 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी वित्तीय सहायता वितरित की गई। इन इकाइयों के माध्यम से 7,31,434 लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए गए। योजना की शुरूआत से अब तक कुल 10,84,679 इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं जिनके लिए 80,705 करोड़ रुपये के ऋण के बदले 29,623 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी वित्तीय सहायता वितरित की गई है। इस पहल के माध्यम से अब तक लगभग 97.95 लाख लोगों को रोजगार प्रदान किया गया है।

ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत टूल-किट के वितरण के माध्यम से कारीगरों का सशक्तीकरण

ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत अब तक 51,230 इलेक्ट्रिक पॉटरी व्हील, 2,46,099 मधुमक्खी पालन के लिए बक्से और मधुमक्खियों के छत्ते, 2,674 स्वचालित और पैडल से चलने वाली अगरबत्ती बनाने की मशीनें, 7,669 जूते बनाने और मरम्मत करने के टूल-किट, 836 पेपर प्लेट और दोना बनाने की मशीनें, एसी मरम्मत, मोबाइल मरम्मत, सिलाई, इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर के लिए 7,571 टूल-किट, काष्ठ शिल्प, बेकार लकड़ी से बने सामान और लकड़ी के खिलौने बनाने के लिए 5,138 मशीनें और ताड़ के गुड़, तेल घानी निकालने और इमली प्रसंस्करण के लिए 1,789 मशीनें वितरित की जा चुकी हैं। इस योजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 37,769 मशीनें, टूल-किट और उपकरण वितरित किए जा चुके हैं। विगत चार वर्षों की समीक्षा से संकेत मिलता है कि 2022-23 में 21,874, 2023-24 में 29,540, 2024-25 में 38,904 और 2025-26 में 37,769 मशीनें और उपकरण वितरित किए गए। इस प्रकार, ग्रामोद्योग विकास योजना के अंतर्गत केवीआईसी ने अब तक कुल 3,23,006 मशीनें, टूल-किट और उपकरण वितरित किए हैं और इस प्रकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

केवीआईसी के प्रयासों के माध्यम से महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा

केवीआईसी ने महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान केवीआईसी के विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत 79,682 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। इनमें से 47,382 प्रशिक्षु महिलाएं थीं जो कुल संख्या का लगभग 59 प्रतिशत हैं। इसके अतिरिक्त, पीएमईजीपी योजना के अंतर्गत 2025-26 के दौरान 28,180 महिला उद्यमियों ने व्यावसायिक इकाइयां स्थापित कीं जिससे 3,09,980 महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हुए। यह आंकड़ा महिला उद्यमशीलता को बढ़ावा देने में इस योजना की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। खादी क्षेत्र में लगभग 5,00,000 कारीगरों में से 80 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के साथ यह क्षेत्र महिला नेतृत्व वाले आर्थिक सशक्तीकरण के लिए प्रभावी माध्यम के रूप में कार्य कर रहा है।

कारीगरों के पारिश्रमिक में 275% तक की वृद्धि

कारीगरों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2013-14 में 4 रुपये प्रति गट्ठर से बढ़कर वर्तमान में 15 रुपये प्रति गट्ठर हो गया है। यह पारिश्रमिक में लगभग 275 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

सरकारी खरीद, प्रदर्शनी में बिक्री और राष्ट्रीय ध्वजों की मांग में वृद्धि

इसके साथ ही, खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की सरकारी खरीद बढ़कर 92.08 करोड़ रुपये हो गई है जो इस क्षेत्र की बढ़ती स्वीकार्यता और संस्थागत मांग में वृद्धि को दर्शाती है। इसी प्रकार, खादी उत्पादों की प्रदर्शनियों और विपणन की पहलों के माध्यम से 30.83 करोड़ रुपये की बिक्री हुई जिससे बाजार विस्तार और उपभोक्ताओं की सहभागिता को मजबूती मिली है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय ध्वजों की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो 2013-14 में 0.87 करोड़ रुपये थी वह वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 2.35 करोड़ रुपये हो गई है। यह वृद्धि देश में ‘हर घर तिरंगा’ जैसे जन अभियानों के प्रभाव और खादी के उपयोग के प्रति जनता में बढ़ती लोकप्रियता को रेखांकित करती है।

गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस (जेम)  ने निगमन दिवस 2026 मनाया; भारत में डिजिटल सार्वजनिक खरीद प्रणाली को अपना सहयोग जारी रखा

दिल्ली /सत्ता संदेश

गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस (जेम) अपना निगमन दिवस 2026 मना रहा है। यह पारदर्शिता, दक्षता और प्रौद्योगिकी-संचालित शासन के माध्यम से भारत में सार्वजनिक खरीद के सहयोग में इसकी निरंतर भूमिका को दर्शाता है।

वाणिज्य मंत्रालय के अधीन धारा 8 के अंतर्गत गैर-लाभकारी संस्था, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस स्पेशल पर्पस व्हीकल (जेम एसपीवी) को जेम प्लेटफॉर्म के विकास, प्रबंधन और रखरखाव के लिए कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत 17 मई 2017 को स्थापित किया गया था। वर्षों से, जेम एक प्रमुख डिजिटल सार्वजनिक खरीद मंच के रूप में उभरा है, जो देश भर के विक्रेताओं के लिए व्यापार में सुगमता और व्यापक बाजार पहुंच को बढ़ावा देता है।

गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस (जेम) आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल और विकसित भारत 2047 की परिकल्‍पना के अनुरूप स्थानीय क्षमताओं को सरकारी खरीद के अवसरों से जोड़कर घरेलू उद्यमों को लगातार बढ़ावा दे रहा है। इस प्लेटफॉर्म पर फार्मास्यूटिकल्स, परिवहन, निर्माण उपकरण, फर्नीचर, वस्त्र और चिकित्सा वस्‍तुओं जैसे विभिन्न क्षेत्रों के प्रथम श्रेणी के स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं की भागीदारी देखी गई है।  

आज, इस प्लेटफॉर्म पर 1.36 लाख से अधिक सरकारी खरीदार और लगभग 25 लाख विक्रेता एवं सेवा प्रदाता मौजूद हैं, जिनमें से लगभग 72% सक्रिय विक्रेता सूक्ष्म एवं लघु उद्यम से हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, जेम पर मौजूद 11 लाख से अधिक एमएसई को 2.36 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 51 लाख से अधिक ऑर्डर प्राप्त हुए। महिला नेतृत्व वाले एमएसई को 28,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के खरीद ऑर्डर मिले, जबकि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उद्यमियों को 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर प्राप्त हुए। प्लेटफॉर्म पर मौजूद स्टार्टअप्स को 19,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के ऑर्डर मिले, जो उद्यमिता को बढ़ावा देने और सरकारी खरीद तक ​​पहुंच बढ़ाने में जेम की भूमिका को दर्शाता है।

जेम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री मिहिर कुमार ने कहा, “जेम की स्थापना सरकार और उसकी एजेंसियों के लिए एक पारदर्शी, कुशल और समावेशी डिजिटल खरीद मंच बनाने की परिकल्पना के  साथ की गई थी। आज, जेम घरेलू उद्यमों को खरीद के अवसरों से जोड़कर आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल अभियान को निरंतर बढ़ावा दे रहा है।”

जेम निगमन दिवस समारोह के उपलक्ष्य में हितधारकों के साथ जुड़ाव और ज्ञान साझा करने संबंधी कई पहल आयोजित कर रहा है। समारोह का शुभारंभ 15 मई 2026 को जेम विक्रेता मूल्यांकन कार्यशाला के साथ हुआ, जिसका उद्देश्य संभावित ओईएम के लिए विक्रेता मूल्यांकन प्रक्रिया और दस्तावेज़ीकरण आवश्यकताओं के बारे में स्पष्टता बढ़ाना था।

इसके अलावा, जेम 21 मई 2026 को “जेम को समृद्ध बनाना” विषय के तहत “जेम मंथन” का आयोजन करेगा, जिसका उद्देश्य जेम तंत्र को मजबूत करने पर चर्चा को प्रोत्साहित करना है। जेम 22 मई 2026 को रक्षा सेवाओं के प्रतिनिधियों के साथ एक विचार-विमर्श सत्र का भी आयोजन करेगा जिसमें रक्षा खरीद और परिचालन आवश्यकताओं के साथ तालमेल को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रक्रिया सुधार और तकनीकी उपायों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की 200 मेगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण लाइन राष्ट्र को समर्पित की

दिल्ली/ सत्ता संदेश

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा प्रधानमंत्री मोदी द्वारा निर्धारित वर्ष 2070 तक भारत के नेट-जीरो लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी

सीईएल की 200 मेगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण लाइन का राष्ट्र को समर्पण विकसित भारत 2047 की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम: डॉ. जितेंद्र सिंह

भारत के स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक प्रौद्योगिकी क्षेत्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा स्वदेशी नवाचार से प्रेरित परिवर्तनकारी दौर में प्रवेश कर रहे हैं: डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत के रणनीतिक प्रौद्योगिकी क्षेत्र अभूतपूर्व स्तर पर खुल रहे हैं: डॉ. जितेंद्र सिंह

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (सीईएल) की 200 मेगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण लाइन राष्ट्र को समर्पित की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विकास यात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किया है और भारत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा तथा महासागर-आधारित ऊर्जा प्रणालियों सहित विभिन्न गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं का तेजी से विस्तार कर रहा है।

इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि प्रत्येक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत की अपनी उपयोगिता और महत्ता है तथा भारत स्वच्छ ऊर्जा विस्तार और सतत विकास के लिए एकीकृत दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रहा है।

इस अवसर पर वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) की सचिव तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी, सीईएल के सीएमडी श्री चेतन जैन, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सीएसआईआर प्रयोगशालाओं के निदेशक, सीईएल के अधिकारी तथा अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में नवीकरणीय ऊर्जा और स्वदेशी प्रणालियों के विकास से जुड़े क्षेत्रों में सीएसआईआर प्रयोगशालाओं और सीईएल के बीच महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी सहयोग पहलों की भी शुरुआत हुई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने 200 मेगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण लाइन के संचालन को भारत के स्वच्छ ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया और कहा कि यह सुविधा स्वदेशी विनिर्माण तथा नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के प्रति देश के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है।

भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा में सीईएल के ऐतिहासिक योगदान को याद करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत का पहला सौर सेल वर्ष 1977 में सीईएल द्वारा निर्मित किया गया था तथा देश का पहला सौर संयंत्र भी वर्ष 1979 में इसी संगठन द्वारा स्थापित किया गया था। उन्होंने कहा कि इतनी अग्रणी उपलब्धियों के बावजूद उस समय सीईएल के योगदान को वह पहचान नहीं मिल सकी जिसकी वह हकदार थी, लेकिन अब यह संस्था पुनः राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रासंगिकता प्राप्त कर रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विनिवेश के कगार पर पहुंच चुकी संस्था से लाभ अर्जित करने वाली और राजस्व उत्पन्न करने वाली मिनी रत्न कंपनी के रूप में सीईएल का परिवर्तन संस्थागत पुनरुत्थान का उल्लेखनीय उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव दृढ़ नेतृत्व, नीतिगत समर्थन, संचालन अनुशासन तथा संगठन से जुड़े वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और कर्मचारियों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।

मंत्री ने नई निर्माण लाइन की स्थापना की गति की सराहना की। उन्होंने बताया कि परियोजना के लिए निविदा आमंत्रण 24 अप्रैल 2025 को जारी किया गया था, एक माह के भीतर सफल बोलीदाता का चयन कर लिया गया और एक वर्ष से भी कम समय में विनिर्माण सुविधा का संचालन प्रारंभ हो गया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सीईएल अब वर्टिकल एक्सिस पवन टर्बाइन, हाइब्रिड नवीकरणीय प्रणालियां, डेटा सेंटर, उन्नत रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली तथा छोटे हथियार प्रणालियों जैसे भविष्य उन्मुख क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है, जो भारत के बढ़ते तकनीकी आत्मविश्वास और रणनीतिक तैयारी को दर्शाता है।

रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार के नीतिगत सुधारों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत ने अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को अधिक निजी भागीदारी के लिए खोला है तथा उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों और स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों से जुड़ी महत्वाकांक्षी योजनाओं पर आगे बढ़ रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वचालित मौसम अवलोकन प्रणाली (एडब्ल्यूओएस) तथा नई पीढ़ी की दृष्टि ट्रांसमिसोमीटर प्रणाली के लिए सीएसआईआर-राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशालाओं और सीईएल के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पहलों का भी स्वागत किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में विकसित प्रौद्योगिकियों को उद्योग साझेदारी के माध्यम से व्यावसायीकरण और जन उपयोग की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

मंत्री ने संतोष व्यक्त किया कि नई पीढ़ी की दृष्टि ट्रांसमिसोमीटर प्रणाली अब पूर्ण रूप से स्वदेशी बन चुकी है और कहा कि स्वदेशी प्रौद्योगिकियां राष्ट्रीय आत्मविश्वास, विनिर्माण क्षमता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करती हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि 200 मेगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण लाइन का राष्ट्र को समर्पण विकसित भारत 2047 की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है तथा यह वैज्ञानिक उत्कृष्टता को राष्ट्रीय विकास में परिवर्तित करने की भारत की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।

हर काम देश के नाम’

सैनिकों के स्वास्थ्य और परिवार की भलाई को मजबूत करने के लिए  सप्त शक्ति कमान 11 एवं 12 मई 2026 को दो दिवसीय लैंडमार्क वेलनेस सेमिनार “ ऑगमेंटेड  वैलनेस : फिट  फॉर  ड्यूटी , फिट  फॉर  लाइफ   ” का आयोजन करने जा रही है।

चंडीगढ़: /सत्ता संदेश

भारतीय सेना गर्व के साथ संवर्धित वेलनेस नामक उच्च प्रभाव वाला दो दिवसीय वेलनेस सेमिनार आयोजित करने जा रही है। यह सेमिनार सैनिकों, अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसका शीर्षक “वेलनेस सेमिनार” है। यह सेमिनार आज के कठिन परिचालन वातावरण में सेवा कर रहे सैन्य कर्मियों द्वारा सामना की जाने वाली शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक चुनौतियों का समाधान करेगा।

वेलनेस सेमिनार बठिंडा मिलिट्री स्टेशन के सागत सिंह ऑडिटोरियम में 11 एवं 12 मई 2026 को आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम को तीन शक्तिशाली सत्रों के साथ तैयार किया गया है, जो अत्याधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान को युद्धकालीन सैन्य अनुभव के साथ जोड़कर व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य रणनीतियाँ प्रदान करता है, जिससे  सेना की परिचालन तैयारी और दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभों में सीधी वृद्धि होगी।

आधुनिक सैन्य जीवन, असाधारण शारीरिक फिटनेस, मानसिक दृढ़ता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, वित्तीय समझदारी और आध्यात्मिक शक्ति की मांग करता है। यह सेमिनार प्रतिभागियों को प्रमाण-आधारित उपकरण और सेवा/सेवानिवृत्त सैन्य नेताओं तथा क्षेत्र के विशेषज्ञों के समय-परीक्षित ज्ञान से सुसज्जित करेगा ताकि “संतुलित योद्धा” का निर्माण किया जा सके, जो मिशन के लिए सदैव तैयार रहे तथा व्यक्तिगत और पारिवारिक कल्याण भी बनाए रखे। यह सेमिनार जीवनशैली संबंधी रोगों में कमी, बेहतर तनाव प्रबंधन, मजबूत परिवार समर्थन प्रणालियों तथा संगठनात्मक लचक में सीधा योगदान देगा।

ऑपरेशन सिंदूर: वह अवधारणा जिसने भारत की रणनीतिक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया

— लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल याद रखने की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच में एक मजबूत और निर्णायक बदलाव पर विचार करने का अवसर है। 7 मई 2026 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं—इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को रेखांकित किया। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर को जटिल, बहु-क्षेत्रीय परिदृश्य में भारत के भविष्य के संघर्ष संचालन के रूप में याद किया जाएगा।

इस सफलता के केंद्र में अटूट राजनीतिक स्पष्टता थी। दशकों तक, सीमा पार उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम तक सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम को त्यागने के बजाय उसे परिष्कृत किया—इसने भारत की संवेदनशीलता के साथ शक्ति के प्रयोग की क्षमता को प्रदर्शित किया, सटीक रणनीतिक संदेश दिया और आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक रूप से स्थिति के विस्तार की क्षमता को बनाए रखा। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल निर्णायक कार्रवाई के इरादे का प्रदर्शन किया, बल्कि सैन्य कमांडरों को संचालन में लचीलापन देने का आत्मविश्वास भी दिखाया। उद्देश्य की यह स्पष्टता गति, सटीकता और समन्वय में परिवर्तित हुई—ये तीन विशेषताएं आधुनिक सफल सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं।

भारत की बहु-क्षेत्रीय क्षमताओं का निर्बाध एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण था। आधुनिक युद्ध अब केवल भूमि, समुद्र और वायु तक सीमित नहीं रहा; यह साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर ने इन क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करने की भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। सटीक हमलों में साइबर अभियानों ने पूरक भूमिका निभाई, जिससे विरोधी के संचार और लॉजिस्टिक तंत्र बाधित हुए। विशेष रूप से हमले के बाद नुकसान के आकलन में अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों ने वास्तविक समय की निगरानी और लक्ष्य निर्धारण सुनिश्चित किया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं ने दुश्मन की जवाबी कार्रवाई को कमजोर किया। यह अभियान संयुक्त संचालन क्षमता में परिपक्वता का प्रतीक था—सिर्फ तालमेल से आगे बढ़कर वास्तविक एकीकरण तक।

नागरिक-सैन्य एकीकरण की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; यह पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थानों और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ समन्वय में कार्य किया। स्वदेशी तकनीकों—निगरानी प्रणालियों से लेकर सटीक हथियारों तक—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भरता में निरंतर निवेश के लाभों को दर्शाती हैं। इस अभियान ने भारत की निर्णय-निर्माण संरचना की दक्षता को भी प्रदर्शित किया, जहां अंतर-एजेंसी समन्वय नौकरशाही बाधाओं से प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि साझा उद्देश्य की भावना से प्रेरित रहा।

अभियान से पहले और उसके दौरान भारत की पहलों में रणनीतिक दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई दी। कूटनीतिक संचार ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाइयों को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए—सटीक, आवश्यक और संतुलित।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया एक अनुमानित पैटर्न पर चली। सैन्य दृष्टि से, वह प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करता रहा, जो क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व दोनों से सीमित था। कूटनीतिक रूप से उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया, लेकिन सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था, जहां वास्तविक स्थिति को छिपाने के लिए गलत जानकारी का प्रसार किया गया। फिर भी, विश्वसनीयता और निरंतरता की कमी के कारण ऐसे प्रयास जल्द ही उजागर हो गए।

इस भ्रामक प्रचार का स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामना करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर आक्रामकता का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्पष्ट उकसावे के प्रति संतुलित प्रतिक्रिया थी। इसके उद्देश्य सटीक थे, लक्ष्य वैध थे और क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने अनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया—जो संयम के मूल तत्व हैं। पारदर्शिता और विश्वसनीय संचार के माध्यम से भारत ने गलत कथाओं को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया।

ऑपरेशन सिंदूर से कई महत्वपूर्ण सबक सामने आए हैं। पहला, राजनीतिक इच्छाशक्ति की केंद्रीय भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता—रणनीतिक अस्पष्टता विरोधियों को प्रोत्साहित करती है, जबकि स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास निरंतर जारी रहना चाहिए, विशेषकर साइबर, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश के माध्यम से। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय शक्ति का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।

सूचना युद्ध का क्षेत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। धारणा की लड़ाई निरंतर चलती रहती है। भारत को गलत सूचना की पहचान, उसका मुकाबला और पूर्व-नियोजन की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना होगा। त्वरित और विश्वसनीय संचार के लिए तकनीकी और संस्थागत दोनों प्रकार के साधनों की आवश्यकता है।

यह अभियान रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी रेखांकित करता है। स्वदेशी प्रणालियों ने अपनी प्रभावशीलता सिद्ध की, जिससे बाहरी निर्भरता कम हुई और संचालन की स्वतंत्रता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश आवश्यक है, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा।

साथ ही, यह अभियान अस्थिर सुरक्षा वातावरण में निरंतर तैयार रहने की आवश्यकता को भी उजागर करता है। निरोधक क्षमता स्थिर नहीं होती; इसे प्रदर्शित क्षमता और दृढ़ संकल्प से बनाए रखना पड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर ने एक मानक स्थापित किया है, जिसे बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और सिद्धांत विकास में निरंतर निवेश जरूरी है।

जब भारत इस अभियान की वर्षगांठ पर विचार करता है, तो संदेश स्पष्ट है—यह एक रणनीतिक प्रभाव वाला अभियान था। इसने दिखाया कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों हैं। इसने यह भी सिद्ध किया कि संयम एक विकल्प है—मजबूरी नहीं।

आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहु-क्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के एक उदाहरण के रूप में किया जाएगा, जिसमें मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता की भूमिका स्पष्ट है। इसने अपेक्षाओं को पुनर्परिभाषित किया है—देश के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत किया है: जब राष्ट्रीय संकल्प और क्षमता का संगम होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की विरासत इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास में निहित है जो इसने उत्पन्न किया, उन सबकों में है जो इससे सीखे गए हैं, और उस दिशा में है जो इसने भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए निर्धारित की है। आने वाले समय में विभिन्न रूपों में चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन जब तक देश की राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत शक्तियां एकजुट होकर स्पष्ट उद्देश्य के साथ कार्य करती रहेंगी, तब तक संतुलन भारत के पक्ष में रहेगा।

हमला, घेराबंदी, विजय: ऑपरेशन सिंदूर और वह सिद्धांत जिसे भारत ने 88 घंटों में गढ़ा

एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त)

6–7 मई 2025 की रात, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया—यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, के जवाब में चलाया गया एक योजनाबद्ध और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत के एक नए और पूरी तरह विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। यह सिद्धांत स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता से परिभाषित होता है।

ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से परिभाषित किया और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पहली बार भारत ने ऐसे दुश्मन का सामना किया—और उसे परास्त किया—जो वस्तुतः एक ही मोर्चे पर दो देशों की संयुक्त शक्ति के रूप में सामने आया। चीन ने औपचारिक रूप से दूरी बनाए रखी, लेकिन उसने पाकिस्तान को सैटेलाइट खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समर्थन, साइबर सहायता और PL-15 जैसी ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज’ (BVR) मिसाइलों सहित अग्रिम सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए। इसके बावजूद भारत ने इस संयुक्त चुनौती को हराया।

नियंत्रित युद्ध का सिद्धांत

आधुनिक संघर्षों की सबसे बड़ी विफलता—चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया के संघर्ष—यह रही है कि उनमें कोई स्पष्ट ‘एग्जिट स्ट्रेटेजी’ नहीं होती। लंबे खिंचने वाले युद्ध अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करते हैं, जन-मन को थका देते हैं और न तो स्पष्ट जीत दिलाते हैं और न ही स्थायी शांति। इसके विपरीत, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस जाल से खुद को बचाया और वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएं कर पाती हैं—पहली मिसाइल दागने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय करना।

भारत के उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट थे: आतंकी ढांचे और उन्हें संरक्षण देने वालों को नष्ट करना, दुश्मन को अधिकतम नुकसान पहुंचाना और अपनी शर्तों पर अभियान समाप्त करना—साथ ही नागरिकों को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाना। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने खुफिया जानकारी के आधार पर नौ लक्ष्यों की पहचान की, जो लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नेटवर्क से जुड़े थे। पहला हमला मात्र 23 मिनट में पूरा हुआ और पूरा अभियान 88 घंटों में समाप्त कर दिया गया। इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर किया।

यह सिद्धांत—स्पष्ट उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्रवाई करना और बिना अनावश्यक विस्तार के बाहर निकलना—नियंत्रित युद्ध की एक दुर्लभ शैली है, जिसका अध्ययन आने वाले वर्षों में सैन्य संस्थानों में किया जाएगा।

दुश्मन के गढ़ में गहरी चोट

ऑपरेशन सिंदूर का भौगोलिक दायरा अभूतपूर्व था। भारत ने अपने हमले केवल पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रखे, बल्कि पाकिस्तान के मुख्य भूभाग—विशेषकर पंजाब—के भीतर गहराई तक प्रहार किए। सियालकोट और बहावलपुर जैसे ठिकानों पर सटीक हमले किए गए, जो भारतीय सीमा से 140 किमी से भी अधिक दूर हैं।

बाद में रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और सरगोधा जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी भारत की मारक क्षमता के दायरे में लाया गया। संदेश स्पष्ट था: कोई भी ठिकाना पहुंच से बाहर नहीं है।

100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें IC-814 अपहरण से जुड़ा यूसुफ अजहर, अब्दुल मलिक रऊफ और पुलवामा हमले से जुड़ा मुदस्सिर अहमद शामिल थे। जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के परिवार के 10 सदस्य भी मारे गए। इन हमलों ने आतंकी संगठनों की कमांड संरचना को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।

सबसे अहम बात यह रही कि इस अभियान ने ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की अवधारणा को तोड़ दिया। दशकों से पाकिस्तान परमाणु छत्रछाया का उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करता रहा था, इस धारणा के साथ कि भारत प्रतिक्रिया नहीं देगा। भारत ने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

सीमापार अधिकतम क्षति, देश के भीतर न्यूनतम प्रभाव

जहां अधिकांश युद्धों का प्रभाव सीमाओं से बाहर फैलता है, वहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। भारत ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि अपने देश में इसका प्रभाव लगभग शून्य रहा।

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की चीनी मूल की वायु रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय कर दिया। राफेल जेट, स्कैल्प क्रूज मिसाइल और हैमर प्रिसिजन बमों का इस्तेमाल करते हुए शुरुआती हमले 23 मिनट में पूरे किए गए।

9–10 मई को पाकिस्तान द्वारा जवाबी हमले के बाद भारत ने एक ही समय में 11 एयरबेस पर हमला किया—यह इतिहास में पहली बार था। इसमें पाकिस्तान की वायुसेना की लगभग 20% क्षमता नष्ट हो गई।

भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली—जिसमें S-400, आकाश और MRSAM शामिल हैं—ने पाकिस्तान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को लगभग 100% सफलता के साथ नष्ट कर दिया। यहां तक कि 314 किमी दूर एक पाकिस्तानी AEW&C विमान को मार गिराया गया।

समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण

इस अभियान की सफलता ‘JAI’—संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण—पर आधारित थी। तीनों सेनाओं ने मिलकर बेहतरीन तालमेल के साथ काम किया। नौसेना ने अरब सागर में दबदबा बनाए रखा, वायुसेना ने सटीक हमले किए और थलसेना ने रक्षा को मजबूत किया।

भारत का रक्षा उत्पादन 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹1.54 लाख करोड़ हो गया, जिसमें 65% से अधिक उपकरण देश में ही बन रहे हैं। ब्रह्मोस, आकाश और अन्य स्वदेशी प्रणालियों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका

सैन्य शक्ति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी ली और सेना को स्पष्ट निर्देश दिए: आतंकियों को निशाना बनाओ, लेकिन नागरिकों को नुकसान नहीं होना चाहिए।

सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अन्य रणनीतिक फैसले इस व्यापक नीति का हिस्सा थे, जिससे पाकिस्तान पर दीर्घकालिक दबाव बना।

एकजुट राष्ट्र: ‘Whole-of-Nation’ दृष्टिकोण

यह अभियान केवल सैन्य नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र का संयुक्त प्रयास था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने उपग्रह निगरानी प्रदान की, जबकि अन्य एजेंसियों ने खुफिया समर्थन दिया।

नागरिक प्रशासन, उद्योग और स्टार्टअप्स ने भी योगदान दिया। सूचना युद्ध में भी भारत ने बढ़त बनाई और गलत सूचनाओं को तुरंत खारिज किया।

निष्कर्ष: एक नया मानक

‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक परिपक्व रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। इसने दिखाया कि आत्मनिर्भरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्णायक जीत हासिल कर सकता है।

हालांकि, आगे की चुनौतियां बनी हुई हैं—फाइटर स्क्वाड्रन बढ़ाना, ड्रोन क्षमता मजबूत करना और रक्षा बजट को बढ़ाना आवश्यक होगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने एक नया मानक स्थापित किया है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त बनी रहे—क्योंकि विरोधी भी सीख रहे हैं और स्थिर नहीं रहेंगे।

रक्षा मंत्रालय–भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड के बीच 1,476 करोड़ का रक्षा सौदा

दिल्ली/सत्ता संदेश

रक्षा मंत्रालय ने हैदराबाद स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ भारतीय सेना के लिए 1,476 करोड़ रुपये की लागत से पांच ग्राउंड-बेस्ड (ज़मीन पर स्थित) मोबाइल (एक से दूसरे स्थान तक ले जाये जाने में सक्षम) इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की खरीद के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं, जो न्यूनतम 72 प्रतिशत स्वदेशी उपकरणों से युक्‍त होंगे। स्वदेशी डिजाइन के आधार पर विकास और निर्माण श्रेणी (बाय इंडिया-इंडिजिनली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) के तहत इस अनुबंध पर आज नई दिल्ली के कर्तव्य भवन-दो में रक्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये गए।

इस प्रणाली से भारतीय सेना की इकाइयों का आधुनिकीकरण होगा और यह देश के स्वदेशी रक्षा विनिर्माण तंत्र को सुदृढ़ बनाएगा। यह अनुबंध रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत और प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की मेक-इन-इंडिया के प्रति प्रतिबद्धता और पुष्‍ट करता है।

खाद्य सुरक्षा से खाद्यान्नों के मामले में नेतृत्व की ओर: खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में पीएलआई योजना का परिवर्तनकारी प्रभाव
  • श्री अविनाश जोशी

खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की कहानी में एक निर्णायक मोड़

भारत आज अपने आर्थिक सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अब जबकि हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की दिशा में अग्रसर है, विकास को सिर्फ उत्पादन की मात्रा से ही नहीं, बल्कि हमारे द्वारा सृजित मूल्य के आधार पर भी मापना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की तुलना में बहुत कम क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां इस प्रकार का बदलाव बिल्कुल साफ नजर आता है।

भारत खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों, दूध और समुद्री उत्पादों के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। दशकों तक, हमारे कृषि संबंधी सामर्थ्य ने देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। फिर भी, इस उपज का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बेहद ही सीमित मूल्यवर्धन के साथ सीधे खेत से बाजार तक पहुंचता रहा।

आज भारत के कृषि उत्पादन का महज 12-13 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्करण से गुजरता है। उत्पादन और प्रसंस्करण के बीच का यही अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध सबसे बड़े अवसरों में से एक है।

इसलिए, खाद्यान्नों से जुड़ी भारत की यात्रा का अगला चरण बिल्कुल स्पष्ट है: कृषि की प्रचुर संपदा को उच्च मूल्य वाले एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खाद्य उत्पादों में परिवर्तित करना।

पीएलआई योजना के पीछे की परिकल्पना

इस अवसर को पहचानते हुए, भारत सरकार ने मार्च 2021 में कुल 10,900 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) की शुरुआत की।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) द्वारा इस योजना को 2021-22 से 2026-27 तक की छह साल की अवधि के लिए लागू किया जा रहा है।

इस योजना के पीछे का मूल विचार सरल लेकिन ठोस है: खाद्य प्रसंस्करण क्षमता, नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग के विस्तार में निवेश करने वाली कंपनियों को पुरस्कृत करना। कुल मिलाकर, यह योजना इन-स्टोर ब्रांडिंग, अंतरराष्ट्रीय खुदरा श्रृंखलाओं में शेल्फ स्पेस और वैश्विक विपणन अभियानों में निवेश करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करके भारत में खाद्य उत्पादन से जुड़ी वैश्विक स्तर की कई चैंपियन कंपनियां तैयार करती है।

रणनीतिक डिजाइन: एक आधुनिक खाद्य इकोसिस्टम का निर्माण

पीएलआईएसएफपीआई योजना की संरचना को सावधानीपूर्वक को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रखा गया है।

1. उच्च क्षमता वाले खाद्य क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना

पहला घटक पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) खाद्य पदार्थ, प्रसंस्कृत फल और सब्जियां, समुद्री उत्पाद जैसी प्रमुख खाद्य श्रेणियों में उत्पादन बढ़ाने पर केन्द्रित है।

ये श्रेणियां वैसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत घरेलू खपत और निर्यात क्षमता, दोनों में तेजी से विस्तार कर सकता है।

2. नवाचार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी को प्रोत्साहन देना

दूसरा घटक एमएसएमई द्वारा विकसित नवोन्मेषी और जैविक खाद्य उत्पादों को समर्थन प्रदान करता है। लघु एवं मध्यम उद्यम भारत के खाद्य क्षेत्र की रीढ़ हैं और समावेशी विकास हेतु  आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ उनका जुड़ाव बेहद जरूरी है।

पोषक अनाज (मिलेट) से संबंधित नवाचार: परंपरा को आधुनिक बाजारों से जोड़ना

वर्ष 2023 में, अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज (मिलेट्स) वर्ष के उपलक्ष्य में, मंत्रालय ने पीएलआई योजना के तहत एक विशेष पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) और खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पादों में मिलेट्स के उपयोग को प्रोत्साहित करना था।

मिलेट्स जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, अत्यधिक पौष्टिक और भारत की कृषि परंपराओं में गहराई से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलेट्स का समावेश करके, यह योजना पोषण संबंधी सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि को एक साथ बढ़ावा देती है।

बदलाव से जुड़े आंकड़े

पीएलआई योजना के तहत बहुत ही कम समय में हासिल की गई प्रगति उद्योग जगत की ओर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और इस नीति की प्रभावशीलता को दर्शाती है।

अब तक:

• इस योजना के तहत 165 कंपनियों को मंजूरी दी गई है।

• इनमें से 68 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) हैं, साथ ही बड़ी कंपनियों के 40 संविदा निर्माता भी शामिल हैं।

• कुल मिलाकर 9,207 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है।

• प्रति वर्ष लगभग 35 लाख मीट्रिक टन की नई प्रसंस्करण और संरक्षण संबंधी क्षमता सृजित की गई है।

• इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 3.29 लाख रोजगार सृजित हुए हैं।

ध्यान रखने लायक बात यह है कि इस योजना का मूल लक्ष्य 25 लाख रोजगार सृजित करना था। इस क्षेत्र ने पहले ही इस लक्ष्य का 131 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लिया है।

पीएलआई समर्थित कंपनियों द्वारा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों की बिक्री में भी 2019-20 से 13.23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।

(निर्यात में वृद्धि दर 2019-20 से 7.41 प्रतिशत की है)

विभिन्न पीएलआई योजनाओं के बीच एक चमकता सितारा

उत्पादन पर आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भारतीय अर्थव्यवस्था के 14 क्षेत्रों को कवर करती है। इनमें से, खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित पीएलआई सबसे प्रभावशाली योजनाओं में से एक बनकर उभरी है।

कुल पीएलआई सब्सिडी वितरण में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का हिस्सा मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही होने के बावजूद, इसने तमाम पीएलआई योजनाओं के तहत सृजित किए गए कुल रोजगारों में से लगभग 42 प्रतिशत रोजगार सृजित किए हैं।

अब तक, इस योजना के तहत कुल 2715 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी की जा चुकी है। यह कुल परिव्यय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है।

यह साबित करता है कि खाद्य प्रसंस्करण भारत के मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम में सबसे अधिक रोजगार सृजित करने वाले क्षेत्रों में से एक है।

उपभोक्ताओं की बदलती जीवनशैली के अनुरूप बदलाव

भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन का असर खाद्य उद्योग पर भी पड़ रहा है।

युवा और शहरीकरण की ओर अग्रसर आबादी की बढ़ती मांगें इस प्रकार हैं:

• खाद्य संबंधी सुविधाजनक उपाय

• स्वच्छ पैकेजिंग

• सुरक्षित और पौष्टिक खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) उत्पाद

बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर अक्सर पकाने के लिए तैयार (रेडी-टू-कुक) या खाने के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) वैसे गुणवत्तापूर्ण भोजन की तलाश में रहते हैं जो उनकी तेज रफ्तार जीवनशैली के अनुरूप हो।

खाद्य सुरक्षा से खाद्य नेतृत्व की ओर

भारत की प्रचुर कृषि संपदा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हमारे सामने इस प्रचुर संपदा को सतत आर्थिक मूल्य में बदलने की चुनौती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से संबंधित उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना इस बदलाव को गति देने में सहायक साबित हो रही है और खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर खाद्यानों के मामले में नेतृत्व का सपना शीघ्र ही साकार होने वाला है।

(लेखक आईएएस अधिकारी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के सचिव हैं)

स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट ‘महेंद्रगिरी’ की तेज डिलीवरी, 17 महीनों में प्रोजेक्ट 17ए का छठा युद्धपोत तैयार

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

नीलगिरी श्रेणी का छठा और इस श्रेणी का चौथा जहाजमहेंद्रगिरी (यार्ड 12654), जिसका निर्माण मजगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएसएल) में हुआ था, 30 अप्रैल 2026 को मुंबई स्थित एमडीएसएल में भारतीय नौसेना को सुपुर्द कर दिया गया। यह सुपुर्दगी युद्धपोत डिजाइन और निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट बहुमुखी बहु-मिशन प्लेटफॉर्म हैं जिन्हें समुद्री क्षेत्र में वर्तमान और उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह अत्याधुनिक फ्रिगेट नौसेना डिजाइन, स्टील्थ, मारक क्षमता, स्वचालन और उत्तरजीविता में एक अभूतपूर्व छलांग का प्रतीक है और युद्धपोत निर्माण में आत्मनिर्भरता का एक प्रशंसनीय प्रतीक है।

युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किए गए और युद्धपोत निरीक्षण दल द्वारा पर्यवेक्षित पी17ए फ्रिगेट स्वदेशी जहाज डिजाइन, स्टील्थ क्षमता, टिकाऊपन और युद्ध क्षमता में एक पीढ़ीगत छलांग का प्रतीक हैं। एकीकृत निर्माण के सिद्धांत से प्रेरित होकर, जहाज का निर्माण और वितरण निर्धारित समयसीमा के भीतर किया गया।

पी17ए जहाजों में पी17 (शिवालिक-श्रेणी) की तुलना में उन्नत हथियार और सेंसर प्रणाली लगी हुई है। इन जहाजों में संयुक्त डीजल या गैस (सीओडीओजी) प्रणोदन संयंत्र लगे हैं, जिनमें एक डीजल इंजन और एक गैस टरबाइन शामिल हैं जो प्रत्येक शाफ्ट पर एक नियंत्रणीय पिच प्रणोदक (सीपीपी) और एक अत्याधुनिक एकीकृत प्लेटफॉर्म प्रबंधन प्रणाली (आईपीएमएस) को संचालित करते है। शक्तिशाली हथियार और सेंसर प्रणाली में सतह-रोधी, वायु-रोधी और पनडुब्बी-रोधी युद्ध प्रणालियां शामिल हैं।

महेंद्रगिरी छठा पी17ए जहाज है जिसे भारतीय नौसेना को 20 दिसंबर 2024 को एमडीएसएल द्वारा पहले पी17ए (नीलगिरी) की डिलीवरी के बाद 17 महीने से भी कम समय में सौंपा गया है। महेंद्रगिरी की सुपुर्दगी देश की डिजाइन, जहाज निर्माण और इंजीनियरिंग क्षमता को प्रदर्शित करती है और जहाज डिजाइन और जहाज निर्माण दोनों में आत्मनिर्भरता पर नौसेना के अटूट फोकस को दर्शाती है। 75 प्रतिशत स्वदेशी भागीदारी वाली इस परियोजना में एमडीएसएल के 200 से अधिक लघु एवं मध्यम उद्यम शामिल हैं। इसने प्रत्यक्ष रूप से लगभग 4,000 और अप्रत्यक्ष रूप से 10,000 से अधिक कर्मियों के लिए रोजगार सृजन किया है।