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स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन: विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति का व्यावहारिक रास्ता

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

ब्रिक्स की भारत की अध्यक्षता दृढ़ता, नवाचार, सहयोग और स्थायित्व पर आधारित व्यावहारिक रास्तों को आगे बढ़ाने का अवसर देती है

वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, ऊर्जा की बढ़ती मांग और जलवायु से जुड़ी गंभीर चुनौतियों के इस दौर में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसी ऊर्जा प्रणालियों का निर्माण करने की जरूरत है जो स्वच्छ व अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित, सस्ती एवं भरोसेमंद होने के साथ-साथ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विकास संबंधी जरूरतों तथा आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप भी हों।

स्वच्छ ऊर्जा दरअसल ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और दीर्घकालिक विकास की दृष्टि से तेजी  से अहम होती जा रही है। यह ईंधन बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव से पैदा होने वाले जोखिमों  को कम कर सकती है, ऊर्जा को अपेक्षाकृत अधिक सुलभ बना सकती है, रोजगार सृजित कर सकती है, घरेलू उद्योगों को मजबूत कर सकती है और देश को अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ बना सकती है। फिर भी, स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने के रास्ते एक जैसे नहीं हो सकते। इन रास्तों को राष्ट्रीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और विकास की प्राथमिकताओं के हिसाब से निर्धारित किया जाना चाहिए।

इसी बिंदु पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच बेहतर सहयोग से स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता और समावेशी विकास के साझा लक्ष्यों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।

भारत का अपना अनुभव यह बताता है कि स्वच्छ ऊर्जा की शुरुआत लोगों से ही होनी चाहिए।

पिछले दशक में, प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) के तहत लगभग 28.6 मिलियन घरों को बिजली के कनेक्शन दिए गए। इससे सभी तक बिजली पहुंचाने का काम आगे बढ़ा और ग्रामीण व कम सुविधा वाले इलाकों में लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) के तहत महिलाओं को 105 मिलियन से अधिक एलपीजी कनेक्शन दिए गए। इससे खाना पकाने के साफ-सुथरे तरीकों को बढ़ावा मिला, घर में सेहत बेहतर हुई और कठिन श्रम का बोझ कम हुआ।

ये पहल एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करती हैं: स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने को केवल स्थापित मेगावाट या जोड़ी गई क्षमता के आधार पर नहीं मापा जा सकता, बल्कि इससे पैदा हुए अवसरों, सुदृढ़ हुई आजीविका और बेहतर हुए जीवन स्तर के आधार पर भी मापा जाना चाहिए।

लोगों को प्राथमिकता देने वाले इस दृष्टिकोण के साथ-साथ बड़े पैमाने पर काम और सहयोगी  बुनियादी ढांचे की भी जरूरत है। भारत की स्वच्छ ऊर्जा की कहानी में नवीकरणीय ऊर्जा अहम हो गई है। लेकिन इसकी सफलता इसे समर्थन प्रदान करने वाली प्रणालियों पर निर्भर करती है। सौर  और पवन ऊर्जा को तेजी से अपनाया जा सकता है, लेकिन इनकी पूरी क्षमता का लाभ तभी मिल पाएगा जब पारेषण (ट्रांसमिशन), वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन), भंडारण (स्टोरेज) और ग्रिड प्रबंधन एकसाथ मिलकर काम करें।

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में सहायता प्रदान करने वाली प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। पारेषण संबंधी बुनियादी ढांचे (ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर) का निरंतर विस्तार हुआ है। इसके साथ-साथ ऊर्जा के भंडारण (एनर्जी स्टोरेज) और ग्रिड की सुदृढ़ता (ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी) के क्षेत्र में भी निवेश बढ़ा है। वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) संबंधी सुधारों और उन्नत ग्रिड तकनीक को अपनाने से एक ऐसी बेहतर एवं भरोसेमंद ऊर्जा प्रणाली बनाने में मदद मिली है, जो नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी को समन्वित करने में सक्षम है।

भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित क्षमता अब 288 गीगावॉट से अधिक हो गई है। बड़े पैमाने की परियोजनाओं के अलावा, वितरित नवीकरणीय ऊर्जा (डीआरई) प्रणालियां – जैसे कि रूफटॉप सोलर, सोलर पंप, मिनी-ग्रिड और माइक्रो-ग्रिड – ग्रामीण और कम सुविधा वाले इलाकों में स्वच्छ ऊर्जा को और अधिक सुलभ बना रही हैं। ये प्रणालियां सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज, स्कूलों, हेल्थकेयर सेंटरों तथा स्थानीय व्यवसायों को मदद पहुंचाने के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका और स्थानीय आर्थिक सुदृढ़ता को भी बढ़ावा दे रही हैं।

भारत की ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ बड़े पैमाने पर इस दृष्टिकोण को दर्शाती है। इस योजना से अब तक लगभग 4 मिलियन परिवारों को लाभ हुआ है, जिससे उपभोक्ता अपेक्षाकृत अधिक विकेन्द्रीकृत एवं भागीदारी वाली ऊर्जा प्रणाली में योगदान देने वाले बन पाए हैं।

हालांकि, स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में वित्त पोषण सबसे अहम तत्वों में से एक बना रहेगा। कई विकासशील देशों में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इन संभावनाओं को बड़े पैमाने पर लागू करने तथा बैंक से ऋण पाने योग्य परियोजनाओं में बदलने हेतु सस्ती और दीर्घकालिक पूंजी की जरूरत होती है।

आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा, वितरण संबंधी बुनियादी ढांचा, ग्रिड के आधुनिकीकरण, भंडारण प्रणाली और कम ऊर्जा खर्च करने वाली तकनीकों में निवेश बेहद जरूरी होगा। न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे संस्थान वित्त पोषण, तकनीक संबंधी साझेदारी और क्षमता विकास के जरिए विकासशील देशों की मदद करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों के लिए सुदृढ़ एवं विविधतापूर्ण आपूर्ति श्रृंखला बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुरक्षित, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा प्रणालियां  सुनिश्चित करने हेतु मैन्यूफैक्चरिंग, तकनीक, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना जरूरी होगा।

अब जबकि ब्रिक्स की भारत की अध्यक्षता आगे बढ़ रही है, सहयोग की एक ऐसी भविष्योन्मुखी रूपरेखा को मजबूत करने का अवसर है जो सामर्थ्य, बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता, विश्वसनीयता, तकनीक की सुलभता, सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला और सतत विकास का समर्थन करे।

चुनौती सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाने की ही नहीं, बल्कि ऐसे ऊर्जा प्रणाली के निर्माण की भी है जो सबके लिए सुलभ, किफायती एवं भरोसेमंद होने के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक विकास और मानव विकास को कायम रखने में सक्षम हों।

 (लेखक विद्युत राज्यमंत्री हैं)

Goa: पर्यावरण संरक्षण की बड़ी पहल, दक्षिण गोवा की 1.03 करोड़ वर्ग मीटर जमीन नो डेवलपमेंट जोन घोषित

गोवा / सत्ता संदेश

गोवा सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए दक्षिण गोवा के सालसेत तालुका में 1.03 करोड़ वर्ग मीटर भूमि को ‘नो डेवलपमेंट जोन’ (एनडीजेड) घोषित कर दिया है। इस फैसले के बाद इन इलाकों में निर्माण और विकास से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लग जाएगी। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों, कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना है।

गोवा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग मंत्री विश्वजीत राणे ने शुक्रवार को बताया कि अधिसूचित क्षेत्र में नमक के खेत, धान के खेत और अन्य पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील जमीन शामिल हैं। ये जमीनें सालसेत तालुका के सात गांवों में फैली हुई हैं। राज्य सरकार ने इसे क्षेत्रीय योजना के तहत ‘नो डेवलपमेंट जोन’ घोषित किया है, ताकि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाया जा सके।

किन इलाकों को नो डेवलपमेंट जोन में शामिल किया गया है?

सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, सबसे अधिक 29.13 लाख वर्ग मीटर भूमि तालाउलिम गांव में अधिसूचित की गई है। इसके बाद माजोर्डा में 17.64 लाख वर्ग मीटर, सेराउलिम में 16.81 लाख वर्ग मीटर, लौटोलिम में 16.71 लाख वर्ग मीटर, उटोरडा में 9.92 लाख वर्ग मीटर, ओरलिम में 9.49 लाख वर्ग मीटर और कालाटा में 4.08 लाख वर्ग मीटर भूमि को एनडीजेड में शामिल किया गया है।विज्ञापन

सरकार ने यह फैसला क्यों लिया है?

गोवा सरकार का कहना है कि यह निर्णय राज्य के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए लिया गया है। समुद्र तटों और हरित क्षेत्रों के लिए प्रसिद्ध गोवा में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। ऐसे में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों को संरक्षण देना जरूरी हो गया था। सरकार का मानना है कि इससे प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ कृषि विरासत भी सुरक्षित रहेगी।

क्या इन इलाकों में विकास कार्य पूरी तरह रुक जाएंगे?

‘नो डेवलपमेंट जोन’ घोषित होने के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण और व्यावसायिक विकास गतिविधियों पर रोक रहेगी। हालांकि, सरकार ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि स्थानीय लोगों की पारंपरिक कृषि गतिविधियों और अन्य सीमित उपयोगों को लेकर क्या दिशा-निर्देश होंगे। क्षेत्रीय योजना के तहत इन इलाकों की निगरानी की जाएगी, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को रोका जा सके

गोवा में पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे क्या योजना है?

इस महीने की शुरुआत में ही टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील भूमि की पहचान शुरू की थी। सरकार का उद्देश्य ऐसे इलाकों को विकास के दबाव से बचाना और प्राकृतिक परिदृश्य को संरक्षित रखना है। ताजा अधिसूचना को इसी व्यापक अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले समय में राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं।

दक्षिण एशिया में रोजगार और विकास की नई राह बनेगा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: विश्व बैंक

कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रणालियों में निवेश से खुलेंगे आर्थिक विकास के नए अवसर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व बैंक समूह ने कहा है कि दक्षिण एशिया अपने विकास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां हर वर्ष लाखों युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में स्थायी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गया है। विश्व बैंक के अनुसार कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और मूल्यवर्धन आधारित खाद्य प्रणालियों का विस्तार रोजगार, निवेश, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के व्यापक अवसर प्रदान कर सकता है।

विश्व बैंक समूह ने बताया कि दक्षिण एशिया का कृषि क्षेत्र सालाना 700 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का है और क्षेत्र के लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। इसके बावजूद कृषि का क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 16 प्रतिशत है। चिंता की बात यह है कि क्षेत्र में उत्पादित कुल खाद्य पदार्थों का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हर वर्ष बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 30 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है।

विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि परिवर्तन का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, सप्लाई चेन, विपणन और मूल्यवर्धन गतिविधियों के विस्तार से लाखों नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। इससे खाद्य हानि कम होगी और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 के 51 मिलियन टन से बढ़कर आज 330 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। वहीं पिछले दशक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात लगभग 4.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 10 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के विनिर्माण मूल्यवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और कुल निर्यात में करीब 13 प्रतिशत योगदान दे रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि प्रभावी नीतियां और लक्षित निवेश कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को बदल सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकरण योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना जैसी पहलों ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व बैंक समूह ने कहा कि तीव्र शहरीकरण, बढ़ता मध्यम वर्ग, समृद्ध कृषि जैव-विविधता और सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग दक्षिण एशिया को खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए विश्व बैंक समूह एग्रीकनेक्ट और सैपलिंग जैसी पहलों पर काम कर रहा है। एग्रीकनेक्ट का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 3 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ना है, जबकि सैपलिंग सरकारों, निवेशकों, उद्योग जगत और विकास साझेदारों को एक मंच पर लाकर नीति सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

नीति संवाद में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, प्रोसेसिंग क्लस्टर और कृषि-औद्योगिक पार्कों में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही डिजिटल तकनीकों के उपयोग, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने और कौशल विकास कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता भी बताई गई।

यह विचार दो दिवसीय क्षेत्रीय उच्च स्तरीय नीति संवाद मूल्य को उजागर करना: दक्षिण एशिया में रोजगार सृजन और सतत विकास के लिए खाद्य प्रसंस्करण को आगे बढ़ाना” के उद्घाटन अवसर पर सामने आए। इस कार्यक्रम का आयोजन 9 जून 2026 को अहमदाबाद, गुजरात में भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और विश्व बैंक समूह की सैपलिंग पहल के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स, निवेशकों और दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिनिधियों सहित लगभग 200 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं, जो क्षेत्र में मजबूत, समावेशी और दीर्घकालिक खाद्य प्रणालियों के निर्माण पर चर्चा कर रहे हैं।

यूपी के सीतापुर में रक्षा मंत्री ने रक्षा भूमि पर सौर उर्जा परियोजना को मिली मंजूरी

ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और रक्षा मंत्रालय की खाली पड़ी जमीनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर में लगभग 850 एकड़ रक्षा मंत्रालय की खाली पड़ी जमीन पर बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली सहित 250 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजना की स्थापना को मंजूरी दी है। इसमें रक्षा भूमि पर एकीकृत बीईएसएस सहायता के साथ बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा उत्पादन सुविधा का विकास भी शामिल है।

यह पहल स्वच्छ ऊर्जा, सतत विकास और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। रक्षा बलों के लिए दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के अलावा, इस परियोजना से रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए पारंपरिक ग्रिड बिजली की खरीद पर होने वाले खर्च में काफी कमी आने की उम्मीद है। इससे परियोजना की अवधि के दौरान सरकारी खजाने में बचत होगी।


एनटीपीसी लिमिटेड रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए सबसे अनुकूल ऊर्जा मूल्य निर्धारण और बचत सुनिश्चित करने हेतु प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से इस परियोजना को कार्यान्वित कर रही है। यह परियोजना रक्षा मंत्रालय के एकीकृत मुख्यालय और रक्षा संपदा महानिदेशालय के साथ बेहतर समन्वय में कार्यान्वित की जाएगी। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार और पर्यावरणीय स्थिरता का संगम है, जो रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के समर्थन में अपनी संपत्तियों का लाभ उठाने के लिए रक्षा मंत्रालय की प्रतिबद्धता को उजागर करती है।


रक्षा मंत्रालय, एनटीपीसी, सेना का मुख्यालय और डीजीडीई परियोजना के समय पर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए बेहतर समन्वय में कार्य करेंगे। परियोजना पूरी होने पर सीतापुर सौर ऊर्जा परियोजना रक्षा भूमि पर स्थापित देश की सबसे महत्वपूर्ण नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से एक के रूप में उभरेगी और परियोजना के रक्षा क्षेत्र में भविष्य की सौर-सह-भंडारण परियोजनाओं के लिए एक मानदंड स्थापित करने की उम्मीद है।

ग्रेट निकोबार: भारत की समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र : एडमिरल डी. के. जोशी

“जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।”

– कौटिल्य

कौटिल्य की यह सीख सदियों पहले ही शासन और रणनीति की मूल सोच का हिस्सा बन चुकी थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर सामने आई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इस बात से हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है।

यह भारतीय मानचित्र के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित एक दूरस्थ द्वीप जैसा प्रतीत होता है। ऐसी जगह जिसे दशकों से लगभग अछूता छोड़ दिया गया है और जिसे वैसे ही रहने देना चाहिए। परंतु ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के समीप स्थित यह द्वीप दुनिया की ओर भारत की सबसे अहम सामरिक अवसर में से एक है। 

अत: ग्रेट निकोबार के प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह केवल एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्‍न नहीं है। यह वास्तव में इस बात की सामरिक परीक्षा है कि क्या भारत अपनी इस दुर्लभ भौगोलिक बढ़त को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने के लिए तैयार है।

सदियों से हिंद महासागर ने भारत की नियति को आकार दिया है। इसी समुद्री क्षेत्र ने हमारे व्यापार, हमारे विचारों और हमारे  सभ्यतागत प्रभाव को विश्‍व भर में पहुंचाया, परन्‍तु कई बार यही हमारी कमजोरियों का कारण भी बना। तथापि, स्वतंत्रता के पश्‍चात् लंबे समय तक भारत की सामरिक सोच मुख्य रूप से स्‍थल-आधारित रही।

यह निर्विवाद है कि ग्रेट निकोबार अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। यह अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जो सम्‍पूर्ण द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 2 प्रतिशत है। इसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है।

यह दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्‍ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्‍ट्रेट और लोम्बोक स्‍ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। वास्तविक सामरिक दृष्टि से देखें तो यह भारत की पूर्वी समुद्री चौकी है।

इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। कल्पना कीजिए उन जहाजों की, जो अदन की खाड़ी से मलक्का स्‍ट्रेट की ओर बढ़ रहे हैं, ऊर्जा से भरे मालवाहक जहाज, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जा रहे हैं, एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला कंटेनर यातायात तथा नौसैनिक संसाधन, निगरानी मंच और लॉजिस्टिक श्रृंखलाएँ, जो इन जलमार्गों से होकर गुजर रही हैं।

हिंद महासागर अब शांत समुद्र नहीं रहा। यह तेजी से एक भीड़भाड़ वाले सामरिक क्षेत्र में बदल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, कंटेनर यातायात, नौसैनिक तैनाती, द्वीपीय सुविधाएं, समुद्र के नीचे बिछी केबलें और समुद्री निगरानी अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं। यह शायद मुख्य भूमि पर बैठे कई लोगों को दिखाई न दे, परन्‍तु देशों के भविष्य के लिए यह बेहद निर्णायक है।

हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो नव-डिज़ाइन किए गए गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी — एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुम्फोन में। इसके साथ दोहरी ट्रैक्‍स वाली उच्च गति रेल, बहु-लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक मिलकर इंडो-पैसिफिक व्यापार मार्गों को पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

मलक्का स्‍ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोकपॉइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों (तेल और एलएनजी) तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है, जो मलक्का स्‍ट्रेट को अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्‍ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स के निकट स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। 

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अनेक शक्तिशाली देश बंदरगाहों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं, समुद्री पहुँच सुविधाओं, नौसैनिक संसाधनों, निगरानी प्रणालियों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से निरंतर अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं।

भारत का उत्तर संकोचपूर्ण नहीं हो सकता। उसका उत्तर सामरिक सुदृढ़ीकरण होना चाहिए। संप्रभुता केवल मानचित्र पर सीमाएँ खींच देने से सुदृढ़ नहीं होती। वह तब सशक्त होती है जब कोई भूभाग जुड़ा हुआ, आबाद, सुविधायुक्त, उत्पादक और सामरिक रूप से उपयोगी बनता है। अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और विद्युत संयंत्र अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं हैं। ये सभी मिलकर उस पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का निर्माण करते हैं, जिसकी सहायता से भारत एक निर्णायक सामुद्रिक स्थान पर विश्वसनीय, सतत और बहुआयामी उपस्थिति बनाए रख सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सिंगापुर केवल इसलिए एक महान सामुद्रिक केंद्र नहीं बना क्योंकि उसका भौगोलिक स्थान अनुकूल था। उसने उस स्थान के आस-पास आवश्यक क्षमताओं का निर्माण किया। भौगोलिक स्थिति ने उसे अवसर दिया, और उसके अवसंरचनात्मक विकास ने उस अवसर को प्रभाव में परिवर्तित किया। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कोई दूरस्थ द्वीप भी, यदि उसे लॉजिस्टिक और परिचालन अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, तो असाधारण सामरिक महत्व प्राप्त कर सकता है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती; वह भूगोल का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है।

ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित और विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है, साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुँच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इससे सप्लाई चेन सुदृढ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और भारत को अपने सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण और निश्चितता प्राप्त होगी।

निस्संदेह, ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिक सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और वास्तविक शमन उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता। लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। वास्तविक चुनौती पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चयन करने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाया जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सामरिक द्वीप का उत्तरदायित्‍व पूर्वक विकास करना चाहता है, अथवा फिर ऐसे समय में जब पूरा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पुनर्गठित हो रहा है, वह इस द्वीप को अविकसित और अपर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ छोड़ देगा।

भारत एक कॉन्टिनेंटल और सामुद्रिक — दोनों प्रकार की शक्ति है। लंबे समय तक स्थलीय सोच ने सामुद्रिक दृष्टिकोण पर हावी रहा है। अत: ग्रेट निकोबार परियोजना कोई विलासिता नहीं, बल्कि सामरिक दूरदृष्टि का प्रतीक है। किसी राष्ट्र की नियति केवल उन खतरों से निर्धारित नहीं होती जिनका वह सामना करता है, बल्कि उन अवसरों से भी तय होती है जिन्हें वह समय रहते पहचान लेता है। ग्रेट निकोबार ऐसा ही एक अवसर है। इसकी उपेक्षा करना भूगोल की उस सामरिक शक्ति को अनुपयोगी छोड़ देना होगा, जिसे बाद में अन्य शक्तियाँ अपने अनुसार आकार दे सकती हैं। वहीं, इसका विवेकपूर्ण विकास भूगोल को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

भारत को सामरिक दृष्टि से सोचने के लिए किसी से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल  उत्तरदायित्‍व पूर्वक, निर्णायक रूप से और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। इंडो-पैसिफिक की इस शताब्दी में, ग्रेट निकोबार भारत का अंतिम छोर नहीं है, यह भविष्य के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत का वॉचटावर है।

(लेखक वर्तमान में अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल तथा द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष हैं। वे भारतीय नौसेना के पूर्व नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) रह चुके हैं और वर्ष 2009-10 के दौरान अंडमान तथा निकोबार कमान (A&N Command) के कमांडर-इन-चीफ भी रहे हैं।)

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को 2025-26 में लाभ साझाकरण व्यवस्था से ₹21.26 करोड़ प्राप्त हुए

दिल्ली / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान पहुंच और लाभ साझाकरण व्यवस्था के अंर्तगत 21.26 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यह राशि अनुसंधान, वाणिज्यिक उपयोग, बौद्धिक संपदा अधिकार, जैव सर्वेक्षण और जैविक संसाधनों के जैव उपयोग के लिए दी गई स्वीकृतियों से प्राप्त हुई है। यह भारत के जैव विविधता शासन ढांचे में उद्योग की बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है।

इस अवधि के दौरान, बीज क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक रहा, जो 11.75 करोड़ रुपये था। इसके बाद आयुष क्षेत्र का योगदान 5.56 करोड़ रुपये रहा। अन्य योगदानकर्ताओं में न्यूट्रास्यूटिकल्स क्षेत्र के 1.40 करोड़ रुपये और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र के 1.18 करोड़ रुपये शामिल थे। जैव प्रौद्योगिकी, सौंदर्य प्रसाधन, रसायन, जैव ईंधन और खाद्य एवं पेय पदार्थों से भी योगदान प्राप्त हुआ।

बीज क्षेत्र में प्रमुख योगदानकर्ताओं में नुनहेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ईस्ट वेस्ट सीड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन, नोंगवू सीड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और बीएएसएफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल थे। आयुष क्षेत्र में प्रमुख योगदानकर्ताओं में हिमालय वेलनेस कंपनी, ऑर्गेनिक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और नेचुरल रेमेडीज शामिल थे।

इन क्षेत्रों में मक्का, चावल, हल्दी, आंवला, सरसों, करेला, कलमेघ, इलायची, तुलसी, गुग्गल गोंद, नीम के पत्ते, गार्सिनिया, अश्वगंधा, काली मिर्च और लौंग सहित लगभग 300 जैविक संसाधनों का उपयोग किया गया।

आज तक, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने जैविक संसाधनों और संबंधित ज्ञान के उपयोगकर्ताओं से एबीएस निधि के रूप में 266 करोड़ रुपये प्राप्त किए हैं। इसमें से 145 करोड़ रुपये पहले ही देश भर के लाभार्थियों को वितरित किए जा चुके हैं।

जैविक विविधता अधिनियम के तहत स्थापित एबीएस व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि जैविक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभ स्थानीय समुदायों, जैव विविधता प्रबंधन समितियों, किसानों और पारंपरिक ज्ञान धारकों के साथ निष्पक्ष और समान रूप से साझा किए जाएं। इससे प्राप्त धनराशि जैव विविधता संरक्षण, जैविक संसाधनों के सतत उपयोग और जमीनी स्तर पर आजीविका संवर्धन में प्रत्यक्ष रूप से योगदान देती है।

यह उपलब्धि जैव विविधता पर सम्मेलन, पहुंच और लाभ साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य योजना 2024-2030 के लक्ष्य 13 के उद्देश्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है। उद्योग जगत का बढ़ता योगदान यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास और जैव विविधता संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं, जिससे देश के लिए अधिक टिकाऊ और समावेशी भविष्य का निर्माण होगा।

ट्रैक से संसद तक:

क्यों भारत के भविष्य का नेतृत्व महिलाओं को करना चाहिए

डॉ. पी टी ऊषा

मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है, पहले केरल की कच्ची सड़कों पर, फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में। हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है, कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी, जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है। मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है। अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है।

यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक, 2023—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है। यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा। यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है।

खेलों ने हमें क्या सिखाया है

जब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई, तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं, जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं। लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है। प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ, भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है।

पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू, विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं। वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने धीरे-धीरे ही सही, पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया। प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा, जब समर्थित होती है, तो उपलब्धि दिलाती है।

सबक साफ है। जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है, तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं, वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं।

हर भारतीय के लिए बेहतर शासन

भारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है। 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से, विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है।

ये महज़ “महिलाओं के मुद्दे” नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।

इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है। यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।

प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्व

भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है, जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है। यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है।

विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है, जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं, जैसे किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित कार्यस्थल, ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।

अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है।

सुरक्षा, गरिमा और भागीदारी

भारत भर में लाखों महिलाओं के लिए, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा, भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है। चाहे खेल हो, शिक्षा हो या कार्यस्थल, ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।

संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं। इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा, जो उत्तरदायी और सुलभ हो।

शासन तभी अधिक प्रभावी होता है, जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है, जिनकी वह सेवा करता है।

प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्ति

भारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है। उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है।

जब मणिपुर, झारखंड, राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है, तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है।

आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है।

भारत की महिलाओं ने खेल जगत, सशस्त्र बलों, विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है। विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है।

अब है कार्यवाही का वक्त

राज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद, मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। फिर भी, आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है। अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है।

भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए, विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता। आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता, न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है।

आगे का रास्ता साफ है। सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।

(लेखक राज्यसभा सांसद, भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ, भारत की अध्यक्ष हैं।)