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‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया

दिल्ली /सत्ता संदेश

‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक ऑपरेशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक मारक क्षमता की याद दिलाता रहेगा

सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, एजेंसियों की खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति सीमा पार मौजूद आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिए एकसाथ उठ खड़े हुए

यह दिन हमारे दुश्मनों को यह याद दिलाता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, बच नहीं सकते

वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष पूरे होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया और कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक प्रहार क्षमता की याद दिलाता रहेगा।

ऑपरेशन सिंदूर भारत का एक युगांतरकारी मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमारी सशस्त्र सेनाओं की अचूक प्रहार क्षमता की याद हमेशा दिलाता रहेगा। इतिहास इसे एक ऐसे दिन के तौर पर याद रखेगा जब हमारे सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, हमारी एजेंसियों की पैनी खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति—ये तीनों एक होकर सीमा पार मौजूद आतंकवाद के हर उस ठिकाने को नेस्तनाबूद करने के लिए उठ खड़े हुए, जिसने पहलगाम में हमारे नागरिकों पर अपना बुरा साया डालने की हिमाकत की थी। यह दिन हमारे दुश्मनों के लिए यह खौफनाक संदेश लेकर आता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, वे बच नहीं सकते। वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं। इस अवसर पर, मैं हमारी सेनाओं के अद्वितीय शौर्य को नमन करता हूँ।”

स्पष्ट राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नियंत्रित शक्ति का प्रयोग: ऑपरेशन सिंदूर दुनिया के लिए एक मिसाल

— लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप पांडे (सेवानिवृत्त)

संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और रूस के बदलते राजनीतिक-सैन्य उद्देश्यों के बीच युद्ध छेड़ने के प्रयोगों ने दिखाया है कि 21वीं सदी के युद्ध और संघर्ष अक्सर लंबे और अस्पष्ट अभियानों में बदल गए हैं। इनके परिणाम संबंधित क्षेत्रों के लिए विनाशकारी रहे हैं और अंततः आरंभ करने वाले को कोई ठोस लाभ नहीं मिला। तालिबान, इराक, यूक्रेन, गाज़ा और अब ईरान से जुड़े संघर्ष यह दर्शाते हैं कि सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य अनिश्चितकाल तक दबाव बनाए रखना नहीं होना चाहिए, बल्कि निर्णायक रणनीतिक परिणाम हासिल कर उपयुक्त शर्तों पर पीछे हटना होना चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से भारत की प्रतिक्रिया ने विश्व की सैन्य शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, के सामने एक ठोस विकल्प प्रस्तुत किया। अमेरिका के राष्ट्रपति ने बार-बार युद्धविराम का श्रेय लिया है, लेकिन ईरान को सैन्य और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बावजूद वे अपने घोषित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं रहे। इसके विपरीत, ऑपरेशन सिंदूर एक योजनाबद्ध और नियंत्रित शक्ति के उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें स्पष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के बाद अनुशासित संयम दिखाया गया।

पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था द्वारा की गई एक क्रूर उकसावे वाली कार्रवाई के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया गया। आतंकियों ने धर्म के आधार पर पुरुषों की उनके परिवारों के सामने हत्या कर दी। इसके बावजूद भारत ने न तो जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दी और न ही अंधाधुंध बदला लिया। बल्कि एक सुविचारित, चरणबद्ध और तेज़ कार्रवाई की गई। हर कदम सटीक, दंडात्मक और लक्ष्य-केंद्रित था। साथ ही तनाव कम करने की गुंजाइश भी बनाए रखी गई—यह कमजोरी नहीं बल्कि नियंत्रण का संकेत था।

भारत की रणनीति की सबसे बड़ी विशेषता उसके राजनीतिक-सैन्य उद्देश्यों की स्पष्टता थी। लक्ष्य था—सीमा पार आतंकवाद के ढांचे को निर्णायक झटका देना और प्रतिरोधक क्षमता को पुनः स्थापित करना। यह सब अंतरराष्ट्रीय कानून और परमाणु संतुलन को ध्यान में रखते हुए किया गया। प्रमुख ठिकानों को नष्ट करने और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करने के बाद भारत ने संघर्ष को यहीं रोक दिया।

केवल 88 घंटों के भीतर भारतीय सशस्त्र बलों ने अपने लक्ष्य पूरे कर लिए और नियंत्रण राजनीतिक नेतृत्व को सौंप दिया। पाकिस्तान, जो पहले बिना परिणाम भुगते उकसावे की कार्रवाई करता रहा, इस बार युद्धविराम की मांग करने को मजबूर हुआ। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने यह स्पष्ट किया कि उसकी रणनीति तेज़ और सटीक हमलों का सामना करने में सक्षम नहीं है।

भारत का रणनीतिक समुदाय यह समझता है कि पाकिस्तान की मूल सोच को बदलना संभव नहीं है, क्योंकि उसकी नीति विचारधारा और संस्थागत संरचना पर आधारित है। इसलिए भारत का उद्देश्य समस्या का स्थायी समाधान नहीं, बल्कि नियंत्रित और दोहराने योग्य कार्रवाई के माध्यम से उसके व्यवहार को प्रभावित करना था।

अमेरिकी सैन्य अभियानों के विपरीत, भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट और सीमित था। अमेरिका ने कई बार अपनी सैन्य श्रेष्ठता दिखाई, लेकिन रणनीतिक परिणाम हासिल करने में कठिनाई झेली है। लंबे अभियानों से संसाधनों की बर्बादी, थकान और विश्वसनीयता में कमी आती है—जैसा कि इराक, अफगानिस्तान और ईरान के मामलों में देखा गया।

यदि ऑपरेशन सिंदूर के मॉडल को ईरान के संदर्भ में लागू किया जाता, तो सीमित और सटीक हमलों के बाद मिशन को सफल घोषित कर कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ा जा सकता था। इसके बजाय लंबे अभियानों ने जटिल परिणाम पैदा किए और अमेरिका की स्थिति को कमजोर किया।

भारत का दृष्टिकोण यह भी दिखाता है कि आधुनिक युद्ध केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि धारणा प्रबंधन का भी खेल है। संतुलित प्रतिक्रिया देकर भारत ने दृढ़ता और संयम दोनों का परिचय दिया।

हालांकि कई विश्लेषकों ने संघर्ष बढ़ाने की वकालत की, भारत ने अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों—आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक भूमिका—पर ध्यान बनाए रखा। 2047 के लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत ने यह सुनिश्चित किया कि वह लंबे युद्ध में उलझकर अपनी प्रगति को बाधित न करे।

ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि कूटनीतिक सीख भी है। यह दिखाता है कि शक्ति का उपयोग एक सटीक नीति उपकरण के रूप में किया जा सकता है। यह सिद्ध करता है कि संयम कमजोरी नहीं, बल्कि विश्वसनीयता को बढ़ाता है। और यह भी कि सही समय पर सैन्य कार्रवाई को समाप्त करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसे शुरू करना।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए संदेश स्पष्ट है—सफलता संघर्ष की अवधि से नहीं, बल्कि उद्देश्यों और परिणामों के सामंजस्य से तय होती है। भारत ने दिखाया कि निर्णायक प्रहार, विरोधी को बाध्य करना और अपनी शर्तों पर पीछे हटना संभव है।

ऑपरेशन सिंदूर का पूरा ढांचा केवल एक प्रभावी रणनीति नहीं, बल्कि अनुशासित “स्मार्ट पावर” का उत्कृष्ट उदाहरण है।