ब्रेकिंग न्यूज़
भारत-साइप्रस रिश्तों को मिली नई मजबूती, रणनीतिक साझेदारी के साथ कई अहम समझौते

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने शुक्रवार को Nikos Christodoulides के साथ व्यापक द्विपक्षीय वार्ता की। इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान भारत और Cyprus ने अपने संबंधों को नई ऊंचाई देते हुए उन्हें औपचारिक रूप से “रणनीतिक साझेदारी” में बदलने का ऐलान किया।

दोनों देशों के नेताओं ने व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचे, नौवहन, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इसके साथ ही साझा परियोजनाओं और निवेश को गति देने के उद्देश्य से एक संयुक्त कार्यबल गठित करने का निर्णय भी लिया गया।

बैठक में क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और साइप्रस के बीच संबंध लोकतांत्रिक मूल्यों और आपसी विश्वास पर आधारित हैं तथा नई रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के आर्थिक और सामरिक सहयोग को और मजबूत करेगी।

साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स ने भारत को वैश्विक स्तर पर उभरती महत्वपूर्ण शक्ति बताते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने भविष्य में व्यापारिक और समुद्री संपर्क को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया।

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और वियतनाम के उप-प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग ने हनोई में द्विपक्षीय वार्ता की

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता, सुरक्षा, संरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने की प्रतिबद्धता की पुष्टि की

दोनों मंत्रियों ने वियतनाम के वायु सेना अधिकारी महाविद्यालय में भाषा प्रयोगशाला का आभासी रूप से उद्घाटन किया

भारत और वियतनाम ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

रक्षा मंत्री ने न्हा ट्रांग स्थित दूरसंचार विश्वविद्यालय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशाला स्थापित करने की घोषणा की

दिल्ली / सत्ता संदेश

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 19 मई, 2026 को हनोई में वियतनाम के उप- प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग के साथ द्विपक्षीय बैठक की। दोनों मंत्रियों ने दोनों देशों के बीच बढ़ती रक्षा साझेदारी की समीक्षा की और समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, प्रशिक्षण एवं क्षेत्रीय स्थिरता में सहयोग को और गहरा करने के तरीकों पर चर्चा की।

दोनों पक्षों ने पारस्परिक हित के क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा घटनाक्रमों पर विचारों का आदान-प्रदान किया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता, सुरक्षा, संरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा उद्योग सहयोग, समुद्री सुरक्षा, क्षमता निर्माण, संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा, साइबर सुरक्षा और उच्च स्तरीय आदान-प्रदान सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा की। उन्होंने नियमित संवाद, संयुक्त अभ्यास और आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों के रक्षा बलों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की।

रक्षा मंत्री ने वियतनाम के साथ भारत की उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के ढांचे के अंतर्गत वियतनाम के रक्षा आधुनिकीकरण और क्षमता संवर्धन पहलों का समर्थन करने के भारत के संकल्प को भी दोहराया।

जनरल फान वान जियांग ने भारत के निरंतर समर्थन की सराहना की और दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही मित्रता और बढ़ती रणनीतिक साझेदारी पर बल दिया।

दोनों रक्षा मंत्रियों ने वियतनाम के वायुसेना अधिकारी महाविद्यालय में भाषा प्रयोगशाला का वर्चुअल रूप से उद्घाटन किया। यह प्रयोगशाला भारतीय सहायता से स्थापित की गई है। रक्षा मंत्री ने न्हा ट्रांग स्थित दूरसंचार विश्वविद्यालय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशाला की स्थापना की भी घोषणा की।

भारत के मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग और वियतनाम की टेली कम्युनिकेशंस यूनिवर्सिटी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक समझौता ज्ञापन का आदान-प्रदान किया, जो दोनों देशों के बीच उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी में एक और महत्वपूर्ण अध्याय को चिह्नित करता है।

द्विपक्षीय बैठक के बाद, रक्षा मंत्री ने वियतनाम के महासचिव और राष्ट्रपति श्री तो लाम को फोन किया। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं दीं और रक्षा एवं सुरक्षा, व्यापार एवं निवेश, समुद्री सहयोग, संपर्क, डिजिटल परिवर्तन और जन-समुदायों के बीच आदान-प्रदान सहित विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को और गहरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया।

दोनों नेताओं ने साझा सभ्यतागत संबंधों, आपसी विश्वास और समान रणनीतिक हितों पर आधारित भारत और वियतनाम के बीच मजबूत और अटूट मित्रता की पुष्टि की। उन्होंने भारत-वियतनाम व्यापक रणनीतिक साझेदारी की निरंतर प्रगति पर संतोष व्यक्त किया।

अपनी भारत यात्रा को याद करते हुए वियतनाम के राष्ट्रपति ने बढ़ते द्विपक्षीय सहयोग की सराहना की और वियतनाम के विकास एवं रणनीतिक प्राथमिकताओं में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया। उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापक साझेदारी के प्रमुख स्तंभ के रूप में बढ़ते रक्षा सहयोग का स्वागत किया और विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे।

श्री राजनाथ सिंह ने वियतनाम के संस्थापक पिता, पूर्व राष्ट्रपति हो ची मिन्ह की 136वीं जयंती पर उनके मकबरे पर श्रद्धांजलि अर्पित कर दिन के कार्यक्रमों की शुरुआत की। उन्होंने एक्‍स पर एक पोस्ट में कहा, “उनकी दूरदृष्टि, नेतृत्व और राष्ट्रीय स्‍वतंत्रता एवं वैश्विक एकजुटता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने भारत-वियतनाम की मजबूत मित्रता की आधारशिला भी रखी, जो साझा मूल्यों और आपसी सम्मान पर आधारित है।”

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वीडन के प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय वार्ता की

दिल्ली /सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वीडन के गोथेनबर्ग में प्रधानमंत्री महामहिम श्री उल्फ क्रिस्टरसन के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। स्वीडन की क्राउन प्रिंसेस महारानी विक्टोरिया ने भी इस बैठक में भाग लिया और महामहिम राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ और रानी सिल्विया की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने महामहिम राजा के 80वें जन्मदिन पर अपनी हार्दिक शुभकामनाएं व्यक्त कीं।

दोनों नेताओं ने भारत-स्वीडन संबंधों के पूरे दायरे की समीक्षा की और व्यापार एवं निवेश, नवाचार, हरित परिवर्तन, उभरती प्रौद्योगिकियों, रक्षा और सुरक्षा, डिजिटलीकरण, एसएमई, अंतरिक्ष, अनुसंधान, शिक्षा, संस्कृति और लोगों के बीच आपसी मेलजोल जैसे विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों में बढ़ती गति को स्वीकार किया। उन्होंने इन संबंधों को मजबूत करने की अपनी साझा प्रतिबद्धता को दोहराया, जो साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हैं और नवाचार, स्थिरता तथा आर-एंड-डी संबंधों से प्रेरित हैं। उन्होंने इस बढ़ते सहयोग को दिशा देने के लिए नियमित रूप से उच्च-स्तरीय राजनीतिक संपर्क और संस्थागत संवाद बनाए रखने के महत्व पर ज़ोर दिया।

भारत-स्वीडन संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने पर, दोनों नेताओं ने सहमति व्यक्त की। यह रणनीतिक साझेदारी चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित होगी: स्थिरता और सुरक्षा के लिए रणनीतिक संवाद; अगली पीढ़ी की आर्थिक साझेदारी; उभरती प्रौद्योगिकियां और विश्वसनीय संपर्क; और साथ मिलकर भविष्य का निर्माण– लोग, ग्रह, स्वास्थ्य और लचीलापन। इस रणनीतिक साझेदारी को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए, दोनों नेताओं ने भारत-स्वीडन संयुक्त कार्य योजना 2026-2030 को अपनाया, जो राजनीतिक, आर्थिक, तकनीकी, सुरक्षा, जलवायु और लोगों के आपसी जुड़ाव के क्षेत्रों में सहयोग के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करती है।

दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि हाल ही में संपन्न हुए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते ने आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों में एक नया अध्याय शुरू किया है, और वे व्यापार, निवेश तथा तकनीकी संपर्कों को और मजबूत बनाने के लिए इसके शीघ्र कार्यान्वयन हेतु प्रयास जारी रखने पर सहमति व्यक्त की।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों, उन्नत विनिर्माण, सतत गतिशीलता और डिजिटल परिवर्तन सहित रणनीतिक क्षेत्रों में भारत के साथ स्वीडन के निरंतर सहभागिता की सराहना की। प्रधानमंत्री क्रिस्टरसन ने डिजिटल परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआई) के क्षेत्र में भारत द्वारा की जा रही प्रगति की सराहना की। उन्होंने स्वीडन की अर्थव्यवस्था और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में भारतीय समुदाय के सकारात्मक योगदान का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की विकास गाथा में स्वीडन की और अधिक भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

दोनों नेताओं ने आपसी हित के प्रमुख क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ(यूएनओ) और अन्य बहुपक्षीय संगठनों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में स्वीडन के मजबूत समर्थन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। दोनों नेताओं ने शांति, स्थिरता, सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया।

बहुपक्षवाद का संकट और डब्लूटीओ में सुधार की अनिवार्यता
  • श्री राजेश अग्रवाल

बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली औचित्य के गहरे संकट का सामना कर रही है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में, विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) वैश्विक व्यापार का केंद्रीय स्तंभ था, जो नियम-आधारित व्यवस्था की पेशकश करने के साथ तटस्थता, पूर्वानुमेयता और निष्पक्षता का वादा करता था। हालांकि आज, ये वादे काफी कमजोर प्रतीत होते हैं। डब्लूटीओ में विश्वास की कमी, किसी एक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक असंतुलन, असमान प्रवर्तन और वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते स्वरुप के संचयी प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है।

इस संकट के मूल में है – वैश्विक उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक व्यापार प्रथाओं की निरंतरता। समय के साथ, आपूर्ति श्रृंखलाएँ परस्पर अत्यधिक निर्भर हो गई हैं और उनका वितरण भी असमान है, जहाँ कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अनुपात से कई गुनी ज्यादा नियंत्रण रखती हैं। हालांकि, इस केंद्रीकरण ने कुछ मामलों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक कुशल बना दिया है, लेकिन इसने उन्हें काफी हद तक कमजोर भी बना दिया। व्यवधान—चाहे भू-राजनीतिक हो, आर्थिक हो, या पर्यावरण-संबंधी हों—अब प्रणालीगत नतीजे लेकर आते हैं। परिणामस्वरूप, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी अब केवल एक आर्थिक चिंता के रूप में नहीं देखी जाती; इसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के मामले के तौर पर देखा जाने लगा है।

धारणा में हुए बदलाव ने नीतिगत प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी लहर को जन्म दिया है, जो बहुपक्षवाद के मौलिक सिद्धांतों को चुनौती देती हैं। देश घरेलू हितों की रक्षा के लिए संरक्षण उपायों, आक्रामक औद्योगिक नीतियों और निर्यात नियंत्रण को अपना रहे हैं। हालांकि ऐसी रणनीतियाँ अल्पकालिक सहनशीलता ला सकती हैं, लेकिन वे डब्लूटीओ की सहयोग भावना और कानूनी रूपरेखा को अक्सर कमजोर कर देती हैं। तकनीकी अवरोध, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में बाज़ार पहुंच का बढ़ता उपयोग एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देता है: व्यापार अब केवल आर्थिक लेन-देन ही नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति के बारे में है।

डब्लूटीओ सदस्यों के बीच एक व्यापक रूप से मान्य दृष्टिकोण यह है कि संगठन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को उनके प्रतिबद्धताओं के प्रति जवाबदेह ठहराने में अक्षम रहा है और इसने वर्तमान स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जब नियम असमान रूप से लागू किए जाते हैं या प्रवर्तन तंत्र विफल हो जाते हैं, तो प्रणाली में विश्वास कमजोर हो जाता है। कई देशों में, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों में, यह धारणा मजबूत हुई है कि डब्लूटीओ अब एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य नहीं करता। इसके बजाय, इसे एक ऐसे संस्थान के रूप में देखा जाता है, जो तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के प्रति अनुकूल होने के लिए संघर्ष कर रहा है।

इस संदर्भ में, सुधार प्रयासों का केंद्रीय उद्देश्य डब्लूटीओ की विश्वसनीयता को बहाल करना हो गया है। यद्यपि डब्लूटीओ सुधार की आवश्यकता पर सदस्यों के बीच व्यापक सहमति है, फिर भी इसे हासिल करने के तरीके पर सहमति न के बराबर है। सुधार की संरचना और विषय वस्तु पर बहसें लगातार विवादास्पद होती जा रही हैं। याओंडे के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में, सदस्यों ने डब्लूटीओ के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुन: पुष्टि की, जिनमें निष्पक्षता, पारदर्शिता, समावेश और सहमति-आधारित निर्णय शामिल हैं। इन सिद्धांतों ने लंबे समय से डब्लूटीओ को अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग बनाये रखा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी सदस्य, चाहे उनका आकार या उनकी आर्थिक शक्ति कुछ भी हो, वैश्विक व्यापार नियमों को अंतिम रूप देने में अपनी बात रख सकें। हालांकि, इन सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को, विशेष रूप से बहुपक्षीय समझौतों से जुड़ी चर्चाओं में, समस्याओं का सामना करना पड़ा है। ये समझौते डब्लूटीओ सदस्यों के उपसमूहों के बीच बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं। इन्हें कई देश—विशेष रूप से वैश्विक उत्तर के देश —सहमति-आधारित नियम निर्माण की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान मानते हैं। ऐसी सदस्यता के लिए, जहां विकास स्तर और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में व्यापक असमानताएँ मौजूद हैं, जटिल मुद्दों पर सर्वसम्मति प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। बहुपक्षीय समझौते आगे बढ़ने का एक तरीका प्रदान करते हैं, जिससे इच्छुक प्रतिभागी नए नियम स्थापित कर सकते हैं, इसमें उन देशों को रुकावट नहीं माना जाता, जो प्रतिबद्ध होने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, ऐसी ही प्रणाली डब्लूटीओ से पहले गैट, 1947 (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) के तहत अस्तित्व में थी।

इस मुद्दे पर भारत का रुख एक सावधानीपूर्वक तैयार संतुलनकारी कार्य को दर्शाता है। नियम-निर्माण को आगे बढ़ाने में बहुपक्षीय समझौतों की क्षमता को स्वीकार करते हुए भारत ने लगातार मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की है, ताकि ऐसे समझौतों द्वारा बहुपक्षीय प्रणाली को कमजोर न होना सुनिश्चित हो सके। बहुपक्षीय समझौतों को प्रमुख डब्लूटीओ सिद्धांतों को दरकिनार नहीं करना चाहिए, मौजूदा कार्यादेश को कमजोर नहीं करना चाहिए या गैर-प्रतिभागी सदस्यों के लिए नुकसानदेह नहीं होना चाहिए। उन्हें बहुपक्षीय रूपरेखा की जगह लेने के बजाय एक पूरक भूमिका निभानी चाहिए। भारत एक तदर्थ, समझौता-दर-समझौता मॉडल के बजाय बहुपक्षीय समझौतों को डब्लूटीओ संरचना में समेकित करने के लिए एक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

सुधार बहस का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा, संगठन के पिछले कार्यादेशों को पूरा करने में विफलता से संबंधित है। यह कई विकासशील देशों के लिए असंतोष का एक प्रमुख कारण रहा है। ये अधूरी प्रतिबद्धताएं—जिनमें कृषि, विकास और विशेष व्यवहार प्रावधानों जैसे क्षेत्र शामिल हैं —केवल नियम बनाने की कमियों को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि वैश्विक व्यापार प्रणाली में लंबे समय से मौजूद असमानताओं को दूर करने के अवसरों की चूक को भी उजागर करती हैं।

विशेष रूप से कृषि, इन असंतुलनों की गंभीरता को दर्शाती है। विकसित देशों ने अपने कृषि क्षेत्रों को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण लचीलापन बनाए रखा है, जिससे उनके किसान वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। वहीं, विकासशील देशों को अपने किसानों को दिए जाने वाले समर्थन के प्रकारों और स्तरों में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। यह विषमता संरचनात्मक असुविधाओं को बनाए रखती है, वैश्विक दक्षिण में लाखों लोगों की आजीविका को कमजोर करती है और वैश्विक व्यापार प्रवाह को विकृत करती है।

कृषि से परे, ऐसी न्यायसंगत रूपरेखाओं की मांग बढ़ रही है, जो प्रौद्योगिकी स्थानांतरण और क्षमता निर्माण को नियंत्रित करती हैं। तेज़ तकनीकी प्रगति के युग में ज्ञान, नवाचार और ज्ञान-कौशल तक पहुँच आर्थिक विकास का एक प्रमुख निर्धारक बन गया है। फिर भी, मौजूदा नियम अक्सर मौजूदा पदानुक्रम को मजबूत करते हैं, जिससे विकासशील देशों की मूल्य श्रृंखला में ऊपरी पायदान पर चढ़ने की क्षमता सीमित हो जाती है। अधिक समावेशी और संतुलित व्यापार प्रणाली बनाने के लिए इन असमताओं को दूर करना आवश्यक है।

विशेष और विभेदपूर्ण व्यवहार (एस एंड डीटी) पर बहस डब्लूटीओ सुधार की जटिलताओं को और अधिक उजागर करती है। एस एंड डीटी मूल रूप से सबसे कम विकसित और विकासशील देशों को गैर-पारस्परिक बाजार पहुँच और व्यापार प्रतिबद्धताओं को लागू करने में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो अब एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। कुछ विकसित देशों का तर्क है कि स्व-निर्धारण की मौजूदा प्रणाली अपेक्षाकृत उन्नत अर्थव्यवस्थाओं को उन प्रावधानों से लगातार लाभ उठाने की अनुमति देती है, जो कम विकसित राष्ट्रों के लिए बनाए गए थे। भारत इन चिंताओं को स्वीकार करता है, लेकिन सकल आर्थिक आकार जैसे मनमाने पैमानों पर आधारित सरल समाधानों के प्रति आगाह भी करता है।

इसके बजाय, ध्यान यह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए कि एस एंड डीटी वास्तविक विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक प्रभावी उपकरण बना रहे। इसके लिए एक अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है—ऐसा दृष्टिकोण, जो विकासशील दुनिया में मौजूद आर्थिक स्थितियों की विविधता को मान्यता देता हो और उसी के अनुसार लचीलापन तैयार करता हो। यह मुद्दा और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि कई विकसित देशों ने कृषि सब्सिडी अधिकारों के संदर्भ में, जिसे कभी-कभी विपरीत एस एंड डीटी कहा जाता है, का फायदा उठाना जारी रखा है।

अंततः, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का भविष्य इसके सदस्यों की प्रतिस्पर्धी हितों को सुलझाने और साझा संस्थानों में विश्वास पुनः स्थापित करने की क्षमता पर निर्भर करता है। चुनौतियाँ कठिन हैं, लेकिन हित इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक कमजोर डब्लूटीओ से एक विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म देने का खतरा है, जो एकपक्षीय और शक्ति-आधारित सौदेबाज़ी पर आधारित हो सकती है। इसके विपरीत, सुधार किये गये और फिर से सशक्त बनाये गये डब्लूटीओ में एक अधिक सुदृढ़, समावेशी और सहयोगात्मक वैश्विक व्यवस्था को आधार प्रदान करने की क्षमता है।         

भारत की व्यापक व्यापार रणनीति, बहुपक्षीय मंचों में भागीदारी को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों के  साथ जोड़ती है। जैसे-जैसे व्यापार नीति जटिल होती जा रही है—जिसमें नियामक मानक, डिजिटल शासन और आपूर्ति श्रृंखला का एकीकरण शामिल है—समान विचारधारा वाले भागीदारों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) मजबूत आर्थिक एकीकरण के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरे हैं। हालांकि, वर्तमान  में जारी चर्चाओं में भारत की रचनात्मक भागीदारी इस कार्य की तात्कालिकता और जटिलता, दोनों को प्रतिबिंबित करती है। संतुलित, समावेशी और भविष्य-केंद्रित सुधारों को समर्थन देकर, भारत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि डब्लूटीओ तेजी से बदलती दुनिया में प्रासंगिक बना रहे—एक ऐसा संस्थान, जो न केवल व्यापार को प्रबंधित करने में सक्षम हो, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक भविष्य को आकार देने की भी क्षमता रखता हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डब्लूटीओ व्यवसायों को निश्चितता, पूर्वानुमेयता, समावेशिता, समानता और सरलता प्रदान करता है, यानि नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था।

…………………..

व्यक्त किए गए विचार निजी हैं        

(लेखक वाणिज्य विभाग के सचिव हैं )            

वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने गांधीनगर में ब्रिक्स बैठक में व्यापार और आर्थिक सहयोग पर चर्चा की


गांधीनगर / सत्ता संदेश

ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार 1.17 ट्रिलियन अमरिकी डॉलर तक पहुंचा, इस क्षेत्र में अपार संभावना है: वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल

वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने गुजरात के गांधीनगर में व्यापार और आर्थिक मुद्दों पर ब्रिक्स संपर्क समूह (सीजीईटीआई) की दूसरी बैठक में मुख्य भाषण दिया। यह बैठक मार्च 2026 में वर्चुअल रूप से आयोजित सीजीईटीआई की पहली बैठक के बाद हुई।

श्री अग्रवाल ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स लगातार मजबूत होता जा रहा है तथा यह उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रभावी आवाज के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि बढ़ते संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, मुद्रास्फीति के दबाव और बढ़ती अनिश्चितता के बावजूद ऐसा हुआ है। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स देशों के बीच माल व्यापार तेरह गुना बढ़ गया है, जो 2003 के  84 बिलियन अमरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 1.17 ट्रिलियन अमरिकी डॉलर हो गया है। यह  वृद्धि वैश्विक व्यापार की गति से अधिक रही है और इससे सदस्य देशों के लिए अधिक लचीलापन तथा विविधीकरण में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच होने वाला व्यापार अभी भी वैश्विक व्यापार का लगभग 5 प्रतिशत है, जो अधिक व्यापार एकीकरण, मजबूत मूल्य-श्रृंखला संबंधों और बेहतर आर्थिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण अप्रयुक्त संभावनाओं को दर्शाता है।

“लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता लाना”  विषय पर आयोजित इस बैठक में पिछली अध्यक्षता के दौरान किए गए कार्यों को आगे बढ़ाया गया। भारत 2012, 2016 और 2021 के बाद चौथी बार ब्रिक्स का अध्यक्ष बना है। इस दौरान हुए विचार-विमर्श में समकालीन व्यापार मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को सुदृढ़ करना, रोजगार सृजन के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के अंतर्राष्ट्रीयकरण में सहायता करना, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को अधिक लचीला और विविध बनाना तथा सेवाओं से संबंधित व्यापार को बढ़ाना शामिल है। बैठक में अधिक संतुलित व्यापार को बढ़ावा देने, सेवा क्षेत्र में नए अवसर उपलब्‍ध कराने और ब्रिक्स देशों के बीच अधिक व्यापार के माध्यम से किसानों, महिलाओं, उद्यमियों और व्यवसायों सहित प्रमुख हितधारकों को अधिक समृद्ध बनाने के तरीकों पर भी चर्चा की गई।

15 मई 2026 को, प्रतिनिधिमंडल ने गिफ्ट सिटी-गांधीनगर का दौरा किया और वे वहां कमांड एंड कंट्रोल सेंटर सहित विभिन्‍न सुविधा केंद्र भी गए। गिफ्ट सिटी को विश्व स्तरीय वित्तीय केंद्र के रूप में विकसित करने की पहलों पर एक प्रस्तुति भी दी गई। इस यात्रा से प्रतिनिधिमंडल को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में सहायता करने के लिए बैंकिंग, पूंजी बाजार, फंड प्रबंधन, लीजिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाने के भारत के प्रयासों को देखने का अवसर मिला।

सीजीईटीआई में हुई चर्चाओं में ब्रिक्स के साथ भारत की सहभागिता को व्यापक व्यापार परिप्रेक्ष्य में भी रखा गया। नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स के सदस्य देशों को भारत का माल निर्यात अनुमानित 82.0 बिलियन अमरिकी डॉलर और कैलेंडर वर्ष 2024 में सेवाओं के क्षेत्र में निर्यात 31.3 बिलियन अमरिकी डॉलर था। ये आंकड़े ब्रिक्‍स देशों के बीच व्यापार और बढ़ाने की गुंजाइश को दर्शाते हैं, जिसमें सेवाएं और कनेक्टिविटी भविष्य की वृद्धि के महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं।

***

चार देशों के दूतों ने राष्ट्रपति को अपने परिचय पत्र प्रस्तुत किए

दिल्ली /सत्ता संदेश

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (23 अप्रैल, 2026) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में लाओ पीडीआर, कांगो, नामीबिया और गिनी बिसाऊ के राजदूतों द्वारा प्रस्तुत उनके परिचय पत्र स्वीकार किए।

जिन लोगों ने अपने प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए, वे थे:

1. लाओ पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक की राजदूत श्रीमती विथया ज़ायावोंग,

2. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की राजदूत श्रीमती एमिली अयाजा मुशोबेकवा,

3. नामीबिया गणराज्य के उच्चायुक्त विंग कमांडर एलेक्स लुन्याज़ो टुकुहुपवेले (सेवानिवृत्त),

4. गिनी-बिसाऊ गणराज्य के राजदूत श्री एंटोनियो सेरिफो एम्बालो।

काहिरा में भारत और मिस्र के बीच 11वीं संयुक्त रक्षा समिति की बैठक आयोजित हुई

दिल्ली /सत्ता संदेश

भारत-मिस्र संयुक्त रक्षा समिति (जेडीसी) ने 20 से 22 अप्रैल, 2026 तक काहिरा में आयोजित अपनी 11 वीं बैठक में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में सार्थक चर्चा की। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संयुक्त सचिव (अंतर्राष्ट्रीय सहयोग) श्री अमिताभ प्रसाद ने किया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल में  रक्षा मंत्रालय और रक्षा बलों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल थे। मिस्र के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व रक्षा बलों और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने किया।

दोनों पक्षों ने पिछली संयुक्त रक्षा सम्मेलन बैठक के बाद से हुई प्रगति की व्यापक समीक्षा की। रक्षा सहयोग के लिए दोनों पक्षो ने एक दूरदर्शी रूपरेखा तैयार की। उन्होंने वर्ष 2026-27 के लिए एक द्विपक्षीय रक्षा सहयोग योजना पर सहमति व्यक्त की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य संरचित सैन्य अंतःक्रिया तंत्रों का विस्तार करना, संयुक्त प्रशिक्षण आदान-प्रदान को मजबूत करना, समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना, सैन्य अभ्यासों के दायरे और जटिलता को बढ़ाना और रक्षा उत्पादन एवं प्रौद्योगिकी में सहयोग को बढ़ावा देना है।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय रक्षा उद्योग की तेजी से बढ़ती विनिर्माण क्षमताओं पर एक प्रस्तुति दी। प्रस्तुति में यह दर्शाया गया कि इसका उत्पादन 20 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है। भारत 100 से अधिक देशों को लगभग 4 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के उत्पाद निर्यात कर रहा है। दोनों पक्षों ने रक्षा उद्योग सहयोग योजना विकसित करने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति व्यक्त की। रक्षा उद्योग सहयोग भारत-मिस्र रक्षा संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभर रहा है। दोनों पक्ष रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में सह-विकास और सह-उत्पादन के अवसरों की खोज कर रहे हैं।

इस बैठक के दौरान नौसेना-से-नौसेना स्टाफ वार्ता का उद्घाटन किया गया। हिंद महासागर क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने में भारतीय नौसेना द्वारा निभाई गई उत्कृष्ट भूमिका को प्रस्तुत किया गया। समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने में भारत के सूचना संलयन केंद्र द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने मिस्र की वायु सेना (ईएएफ) के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अमर अब्देल रहमान साकर से भी मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने दोनों देशों की वायु सेनाओं के बीच घनिष्ठ सहयोग के लिए मिस्र की वायु सेना कमांडर को धन्यवाद दिया।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने हेलीपोलिस युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सर्वोच्च बलिदान देने वाले भारतीय वीरों को श्रद्धांजलि दी।

भारत-मिस्र रक्षा साझेदारी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सितंबर 2022 में रक्षा मंत्री की मिस्र यात्रा के दौरान रक्षा क्षेत्र में सहयोग पर हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) थी। द्विपक्षीय संबंधों को वर्ष 2023 में रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया। 11 वीं बैठक ने दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंधों की पुष्टि की। दोनों देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा एवं स्थिरता के प्रति उनकी पारस्परिक प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया।

भारतीय नौसेना का जहाज त्रिकंद केन्या के मोम्बासा पहुंचा

भारतीय नौसेना का अग्रणी निर्देशित मिसाइल युद्धपोत आईएनएस त्रिकंद दक्षिण पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी जारी तैनाती के तहत अप्रैल 2026 को केन्या के मोम्बासा पहुंचा। केन्‍या में इस तैनाती का उद्देश्य समुद्री सहयोग को मजबूत करना और भारत तथा केन्या के बीच द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देना है।

इस बंदरगाह पर आईएनएस त्रिकंद युद्धपोत के आगमन के साथ ही पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन भी केन्या यात्रा पर पहुंचे।

इस यात्रा के दौरान व्यावसायिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाएगा और आवश्यक सामग्री केन्या रक्षा बलों को सौंप दी जाएगी। इसके अलावा युद्धपोत के कमांडिंग ऑफिसर केन्‍या के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।

मोम्बासा से प्रस्थान करने से पहले आईएनएस त्रिकंद केन्या नौसेना की इकाइयों के साथ एक पैसेज एक्सरसाइज (पासेक्स) में भाग लेगा। इस अभ्यास में सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों के आदान-प्रदान को सुगम बनाया जाएगा और द्विपक्षीय समुद्री अंतर संचालनीयता को बढ़ावा मिलेगा।

आईएनएस त्रिकंद का मोम्‍बासा बंदरगाह पर आना भारत के महासागर (हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) विजन के अनुरूप है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सूरीनाम के राष्ट्रपति के निधन पर शोक व्यक्त किया

नयी दिल्ली, 31 मार्च (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूरीनाम के पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिकाप्रसाद संतोखी के निधन पर मंगलवार को शोक व्यक्त किया और कहा कि उनका निधन न केवल उनके अपने देश के लिए बल्कि वैश्विक भारतीय प्रवासी समुदाय के लिए भी अपूरणीय क्षति है।

मोदी ने कहा कि संतोखी को भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव था और उन्होंने संस्कृत में शपथ लेकर अनेक लोगों के दिल जीते थे।

उन्होंने संदेश में कहा, “मेरे मित्र और सूरीनाम के पूर्व राष्ट्रपति श्री चंद्रिकाप्रसाद संतोखी जी के अचानक निधन से मैं गहरे सदमे और दुःख में हूं। यह केवल सूरीनाम के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक प्रवासी भारतीय समुदाय के लिए भी अपूरणीय क्षति है।”

प्रधानमंत्री ने संतोखी के साथ अपनी कई मुलाकातों को भी याद किया और कहा कि सूरीनाम के नेता की देश के लिए निष्ठावान सेवा और भारत-सूरीनाम संबंधों को मजबूत करने के प्रयास उनके साथ हुई बातचीत में स्पष्ट रूप से झलकते थे।

उन्होंने कहा, “इस दुःख की घड़ी में मैं उनके परिवार और सूरीनाम के लोगों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। ओम शांति।”

संतोखी (67) 2020 से 2025 तक सूरीनाम के राष्ट्रपति रहे। वह सूरीनाम की प्रोग्रेसिव रिफॉर्म पार्टी के अध्यक्ष भी थे और 2005 से 2010 तक देश के न्याय मंत्री भी रहे।

पाकिस्तान ने काबुल और नंगरहार में तालिबान के ठिकानों को निशाना बनाया

इस्लामाबाद, 17 मार्च (भाषा) पाकिस्तान ने रात भर हवाई हमले कर काबुल और नंगरहार में अफगान तालिबान के ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में उनके सैन्य अड्डों तथा आतंकी ढांचे को नष्ट कर दिया गया। मंगलवार को यह जानकारी प्राप्त हुई।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, ये नवीनतम हमले 26 फरवरी से शुरू किए गए ऑपरेशन ‘गजब-लिल-हक’ (इंसाफ के लिए गुस्सा) के तहत किए गए हैं।

पाकिस्तान ने 16 मार्च की रात काबुल और नंगरहार में अफगान तालिबान तथा फ़ितना अल-ख्वारिज के अड्डों और आतंकवदियों के ठिकानों को सटीक रूप से निशाना बनाया। इन ठिकानों में तकनीकी उपकरण भंडारण और गोला-बारूद भंडारण शामिल थे, जिनका उपयोग पाकिस्तान के निर्दोष नागरिकों के खिलाफ किया जा रहा था।

मंत्रालय ने तालिबान के इस बयान को खारिज कर दिया कि पाकिस्तान ने नागरिक स्थानों को निशाना बनाया और कहा कि पाकिस्तान का लक्ष्य सटीक था और सावधानीपूर्वक किया गया था ताकि कोई भी अप्रत्यक्ष नुकसान न हो।

इसके अलावा सुरक्षा सूत्रों ने बताया कि अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में पाकिस्तानी सेना ने अफगान तालिबान के चार सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।

सूत्रों ने यह भी बताया कि इन ठिकानों के आसपास मौजूद रसद सामग्री, गोला-बारूद और तकनीकी बुनियादी ढांचे को भी नष्ट कर दिया गया।

उन्होंने कहा कि नंगरहार और काबुल में ड्रोन वर्कशॉप (वह मुख्यालय जहां से ड्रोन भेजे जाते थे) और हथियारों के भंडार भी नष्ट कर दिए गए।

सूत्रों ने बताया कि काबुल और नंगरहार में छह ठिकानों को निशाना बनाया गया है, साथ ही कई आतंकवादियों के मारे जाने की भी खबरें हैं।