ब्रेकिंग न्यूज़
भोजशाला परिसर विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली नई याचिका दाखिल

नयी दिल्ली: / सत्ता संदेश

Supreme Court of India में मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद में एक नई याचिका दायर की गई है। इस याचिका में Madhya Pradesh High Court के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर बताया गया था।

यह मामला लंबे समय से विवादित रहा है, जिसमें धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलू जुड़े हुए हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार तथा Archaeological Survey of India (एएसआई) ले सकते हैं।

नई याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष तथ्यात्मक और कानूनी दृष्टि से विवादास्पद है, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आग्रह किया है कि मामले की विस्तृत सुनवाई की जाए और सभी ऐतिहासिक साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

भोजशाला परिसर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से मतभेद चले आ रहे हैं। एक पक्ष इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे एक ऐतिहासिक मस्जिद स्थल के रूप में देखता है।

इस मामले में पहले भी कई बार अदालतों में सुनवाई हो चुकी है और विभिन्न आदेश दिए गए हैं। हाल के हाईकोर्ट आदेश के बाद यह विवाद फिर से कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक रिपोर्टों और कानूनी पहलुओं का संतुलित मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है। एएसआई की भूमिका भी इस प्रकार के विवादों में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह देश की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन से जुड़ी प्रमुख संस्था है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका पर अगली सुनवाई की तारीख तय होनी बाकी है, और सभी पक्षों की नजर अब शीर्ष अदालत के रुख पर टिकी है।

वीवीपैट पर्चियों पर समय दर्ज करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को सौंपा फैसला

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

चुनावी पारदर्शिता और मतदान प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में उच्चतम न्यायालय ने वीवीपैट पर्चियों पर वोट डालने का सटीक समय दर्ज करने की मांग संबंधी याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचन आयोग को सौंप दिया है। अदालत ने कहा कि यह एक तकनीकी विषय है, जिस पर फैसला लेने का अधिकार और विशेषज्ञता निर्वाचन आयोग के पास है।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को इस जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया मुद्दा चुनावी निष्पक्षता और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है, लेकिन वीवीपैट प्रणाली में तकनीकी बदलाव संभव हैं या नहीं, इसका आकलन निर्वाचन आयोग ही बेहतर तरीके से कर सकता है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि चुनावों में अधिक पारदर्शिता और सत्यापन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वीवीपैट पर्चियों पर मतदान का सटीक समय दर्ज करने की मांग एक तकनीकी प्रकृति का विषय है और यह निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय इस स्तर पर सीधे कोई तकनीकी निर्देश जारी करने के बजाय संबंधित संवैधानिक संस्था को इस विषय पर विचार करने का अवसर देना उचित समझता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित जनहित याचिका निर्वाचन आयोग को भेजी जाए, ताकि आयोग इस पर आवश्यक विचार कर सके और जरूरत पड़ने पर तकनीकी विशेषज्ञों की राय लेकर उचित निर्णय ले सके।

याचिका में दावा किया गया था कि यदि प्रत्येक वीवीपैट पर्ची पर मतदाता द्वारा वोट डालने का सटीक समय अंकित किया जाए, तो इससे चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही में और अधिक सुधार होगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि समय दर्ज होने से मतदान रिकॉर्ड का बेहतर सत्यापन संभव होगा और किसी भी विवाद या जांच की स्थिति में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता मजबूत होगी।

गौरतलब है कि वीवीपैट यानी ‘वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल’ प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से जुड़ी होती है, जिसके माध्यम से मतदाता यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसका वोट सही उम्मीदवार को दर्ज हुआ है। मतदान के बाद कुछ सेकंड के लिए मशीन में एक पर्ची दिखाई देती है, जिसमें उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिन्ह प्रदर्शित होता है। यही पर्ची बाद में सत्यापन प्रक्रिया में उपयोग की जाती है।

हाल के वर्षों में चुनावी पारदर्शिता को लेकर वीवीपैट प्रणाली को लेकर कई बहसें और याचिकाएं सामने आती रही हैं। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा समय-समय पर वीवीपैट के उपयोग और उसके सत्यापन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे निर्वाचन आयोग को भविष्य में तकनीकी सुधारों पर विचार करने का अवसर मिलेगा।