ब्रेकिंग न्यूज़
Chabahar port strike : अमेरिका ने चाबहार को बनाया निशाना, तनाव का माहौल

इंटरनेशनल डेस्क / सत्ता संदेश

अमेरिका और ईरान के बीच हो रही जंग की आंच चाबहार बंदरगाह तक पहुंच चुकी है। होर्मुज और आसपास के इलाकों में 90 से अधिक ठिकानों पर हवाई हमलों के बाद अमेरिकी सेना ने चाबहार को भी निशाना बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान में अमेरिकी सेना की एयर स्ट्राइक के बाद चाबहार और आसपास के क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। हमलों में बंदरगाह, एक समुद्री यातायात नियंत्रण टावर और पास की सैन्य संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा है।

पश्चिम एशिया में संकट कितना गहरा?

गुरूवार को ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर खामेनेई को मशहद शहर में सुपुर्द-ए-खाक भी किया जाना है, ऐसे में अमेरिकी हमलों के बाद पश्चिम एशिया में संकट गहराने लगा है। दोनों पक्षों की तरफ से आक्रामक बयानबाजी का सिलसिला भी जारी है।

अमेरिका ने ईरान के चाबहार पर हमला किया, संघर्ष पर ट्रंप क्या बोले?

दरअसल, अमेरिका ने बुधवार-गुरुवार की दरम्यानी रात ईरान के दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह शहर चाबहार पर नए हमले किए। रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देश दूसरे दिन भी एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं। ईरान की सरकारी मीडिया में आई खबरों के मुताबिक चाबहार में विस्फोटों की आवाज सुनी गई। शहर के कुछ हिस्सों में बिजली भी गुल हो गई। स्थानीय लोगों ने कई धमाके सुने। आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी जगहों पर भी नुकसान की खबर है। यह हमले चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि अप्रैल में अमेरिका-ईरान युद्धविराम की घोषणा के बाद से भारत की मदद के विकसित इस रणनीतिक बंदरगाह पर पहली बार हमले हुए हैं। 

90 ईरानी ठिकानों पर हमले, अमेरिकी सेना क्या बोली?

अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, समुद्र में बने बुनियादी ढांचे और सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया गया। वाशिंगटन की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि इन जगहों की मदद से ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाता है। खतरों को भांपते हुए अमेरिकी सेना की मध्य पूर्व कमान- सेंटकॉम (CENTCOM) ने लगभग 90 ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया। एक्स पर जारी बयान में सेंटकॉम ने लिखा, अमेरिकी सेंट्रल कमांड बलों ने ईरान के खिलाफ अतिरिक्त हमले शुरू किए हैं। इसका मकसद होर्मुज में खतरों को कम करना और जहाजों को नुकसान पहुंचाने की ईरान की ताकत पर नकेल कसना है।

इन हमलों के बाद अमेरिका ने कहा कि वाणिज्यिक जहाजों और नागरिक दल के खिलाफ हालिया आक्रामकता अनुचित हैं। इसके लिए ईरान जवाबदेह है। अमेरिकी हमलों से पहले मंगलवार को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे तीन मालवाहक जहाजों पर कथित तौर पर ईरान की सेना ने हमले किए। ट्रंप ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि अगर तेहरान महत्वपूर्ण शिपिंग लेन में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना जारी रखेगा, तो इसके अंजाम ‘बहुत खराब’ होंगे।

ईरान ने अमेरिका पर पलटवार करने के लिए कुवैत और बहरीन में उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। ट्रंप के आक्रामक बयान के बीच ईरान की संसद के अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार गालिबाफ ने कहा, अमेरिका ने अभी तक यह नहीं सीखा है कि धमकाना और वादे तोड़ना बीते दिनों की बात हो चुकी है।

ट्रंप ने क्यों कहा- ईरान के साथ वार्ता समय की बर्बादी?

यह भी महत्वपूर्ण है कि ईरान में अमेरिकी सेना के ताजा हमलों से पहले नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा था कि ईरान के साथ मौजूदा हालात में बातचीत करना उन्हें समय की बर्बादी लगता है। तल्ख अंदाज में ट्रंप ने तेहरान के नेताओं को बेवकूफ भी बताया था। उन्होंने शांति समझौते को लेकर भी कहा कि ईरान की तरफ से सीजफायर का उल्लंघन किया गया, ऐसे में उन्हें लगता है कि समझौता टूट चुका है। तेहरान की तरफ से भी अमेरिका को दो-टूक जवाब दिया गया है।

भारत ने कैसे किया होर्मुज संकट का मुकाबला : हरदीप सिंह पुरी  

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब फरवरी के अंत में होर्मुज की खाड़ी बंद हुई, तो भारत सरकार ने एक प्राथमिकता का चयन किया – हमारे देश के नागरिकों, विशेष रूप से सबसे कमजोर समुदायों, को अभूतपूर्व आपूर्ति और मूल्य व्यवधानों से सुरक्षित रखना। इस प्राथमिकता के आस-पास ही अन्य प्रयास किये जाने थे। यह भावना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थी और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा व्यवधान के लगभग चार महीनों तक बनी रही। 

तथ्यों के पता चलने से पहले ही भारत को लेकर निर्णय किये जा रहे थे: तर्क यह था कि एक ऐसा देश, जो अपने  कच्चे तेल का 85% से अधिक आयात करता है, होर्मुज के बंद होने से संभल नहीं पायेगा, जिससे होकर दुनिया का 20-30% से अधिक हाइड्रोकार्बन गुजरता है। पेट्रोल पंप में कुछ ही दिनों में तेल ख़त्म हो जाएगा, कीमतें आसमान छुएंगी (जैसे कि कई अन्य देशों में हुआ) और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आज स्टॉक भरे हुए हैं, पंप खुले हैं, और भारतीय उपभोक्ता ने इस संकट के दौरान ऊर्जा के लिए दुनिया के किसी भी अन्य उपभोक्ता की तुलना में कम भुगतान किया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे कैसे किया गया और इससे गलत आख्यानों को जवाब भी मिल जाएगा।

28 फरवरी को ईरान पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर सबसे महत्वपूर्ण मार्ग-खंड बंद हो गया और एलपीजी आपूर्ति ने भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश की, क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका और मध्य पूर्व ही प्रमुख एलपीजी निर्यातक हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी पहले मध्य पूर्व से आती थी और यह आपूर्ति तुरंत लगभग शून्य हो गई। फिर आपूर्ति और मांग, दोनों को लेकर एक युद्धकक्ष ऑपरेशन शुरू हुआ, हर कार्गो, हर रिफाइनरी, हर बॉटलिंग प्लांट की निगरानी की गयी, ताकि पूरे देश के सभी रसोईघरों में खाना पकाने के लिए आग जलती रहे।

आपूर्ति के संबंध में, 8 मार्च को एलपीजी नियंत्रण आदेश पारित किया गया, जिसके तहत सभी रिफाइनरियों को अपना एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए सभी सी3-सी4 कार्बन स्ट्रीम को बदलने का निर्देश दिया गया। जो रिफाइनरी कभी कुकिंग गैस नहीं बनाती थीं, बदलाव किया गया और उत्पादन 35  टीएमटी प्रति दिन से बढ़कर 54 टीएमटी प्रति दिन हो गया। युद्ध की सर्वाधिक विभीषिका के दौरान, जब होर्मुज से कोई भी जहाज बाहर नहीं निकल रहा था, तब 12 से अधिक भारतीय एलपीजी जहाजें चुपचाप होर्मुज से बिना कोई टोल दिए निकाल दी गईं – किसी भी देश के लिए यह सबसे बड़ी संख्या थी। कार्गो सुरक्षित किए गए तथा यानबू और फुजैरा बंदरगाहों से लाल सागर रास्ते के जरिए कार्गो जहाज-से-जहाज स्थानांतरित किये गये। अमेरिका से कार्गो को सुरक्षित करने की स्थिति में भी खाली जहाज भेजे गए, नए माल लेने के लिए जहाज हॉर्मुज के अंदर भेजे गए तथा अल्जीरिया, जापान और कनाडा जैसे कई देशों के साथ नई आपूर्ति व्यवस्था शुरू की गयी। मैंने हर उस देश के ऊर्जा मंत्री से कई बार बात की, जो एलपीजी निर्यात कर सकता था। मैं यह बात कहना चाहता हूँ कि खाड़ी क्षेत्र के अंदर या बाहर का हर उत्पादक, जिसके साथ हमने व्यापार किया, हमारे साथ खड़ा रहा। 

हालांकि, आपूर्ति प्रयास का केवल आधा हिस्सा था, क्योंकि मांग को भी प्राथमिकता देना जरूरी था। घरों में जाने वाला रसोई गैस पूरा सुरक्षित रखा गया और इस कीमती आपूर्ति को काले बाज़ारियों से बचाने के लिए डिजिटल सत्यापन कोड अनिवार्य किया गया। हर नागरिक को उनके ज़रूरत के समय सिलेंडर मिलें, लेकिन कोई भी सिलेंडर जमा न कर सके, इसके लिए 25 दिन और 45 दिन की सीमा लगाई गई। चूँकि, वाणिज्यिक सिलेंडरों को नियंत्रित नहीं किया जाता और कोई भी खरीदार उपलब्ध पूरी आपूर्ति एक साथ खरीद सकता था, इसलिए इन्हें उद्योग संघों और राज्य नागरिक आपूर्ति विभागों के माध्यम से भेजा गया, ताकि हर किसी को पर्याप्त मिले और कोई भी जमा न कर सके। उद्योग को पाइप प्राकृतिक गैस अपनाने के लिए कहा गया, बड़े रसोईघरों और प्रतिष्ठानों को अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जहाँ संभव था और घरेलू पाइप गैस और सीएनजी को बिना कटौती वाले वर्ग में रखा गया। सरकार के सभी विभागों ने मिलकर नगर निगम की शीघ्र मंज़ूरी के ज़रिए पाइप गैस कनेक्शनों की ओर बदलाव को संभव बनाया। कई उपभोक्ता, जिनमें प्रवासी भी शामिल थे, एजेंट से सिलेंडर खरीदते थे, जो अब डीएसी की शर्तों के कारण सिलेंडर नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पूरे देश में 5 किलो का मुफ्त व्यापार सिलेंडर उपलब्ध कराया गया, जब तक इसका इस्तेमाल लगभग दोगुना नहीं हो गया। लोगों में भय पैदा करने वाले और खराब स्थिति बताने वाले झूठी अफवाहें फैलाने लगे और झूठे वीडियो शेयर करने लगे ताकि कमी, घबराहट और अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके, जबकि सरकार हर दिन युद्धकक्ष मोड में कई क्रांतिकारी कदम उठा रही थी, ताकि देश में किसी भी जगह आपूर्ति में बाधा न आये।

इस सब के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का दृढ़ संकल्प था – भारतीय नागरिक को सुरक्षा दी जायेगी चाहे खजाने पर कितना भी बोझ क्यों न पड़े —रूस-यूक्रेन संघर्ष और जीवन को संकट में डालने वाली कोविड चुनौती से पैदा हुए ऊर्जा संकट के दौरान यही ‘भारत की राह’ रही है। फरवरी और जून के बीच, रसोई गैस के अंतरराष्ट्रीय मानक, सऊदी सी पी, में लगभग 50% की वृद्धि हुई, और फिर भी, उस आयात दर पर ₹1,600 से अधिक की कीमत वाला सिलेन्डर उज्ज्वला घर तक ₹642 में पहुँचा। मोदी सरकार हर उज्ज्वला सिलेंडर पर लगभग ₹900 का और हर अन्य घर के लिए जाने वाले सिलेंडर पर करीब ₹600 का नुकसान उठाती है, आज सभी भारतीय परिवार अपने रसोई गैस के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्पेन या फ्रांस के घरों की तुलना में बहुत कम भुगतान कर रहे हैं।

मार्च में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती का साहसिक निर्णय लिया गया, जिससे कीमत-वृद्धि में कमी आयी, जबकि कच्चे तेल की कीमत लगभग दोगुनी हो गयी थी और सरकारी तेल कंपनियों ने इस तिमाही में हर दिन 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाया। इसी अवधि में, अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 40% से अधिक और ब्रिटेन में करीब 20% बढ़ी, जबकि यूरोप के बड़े हिस्से में भी दहाई अंक की वृद्धि हुई, लेकिन भारत में कीमत में लगभग 7% की ही वृद्धि हुई।

एक और कहानी यह थी कि पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, विदेशी भंडार ख़त्म हो जाएंगे और हमारी आर्थिक संभावनाएँ धुंधली हो जाएंगी। भंडार खुद जवाब देते हैं, जो लगभग 690 बिलियन डॉलर के करीब है। यह संघर्ष शुरू होने के सप्ताह में रिकॉर्ड किये गये उच्चतम दर से केवल थोडा कम है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है।

यह कहा गया कि भारत के पास केवल 8 या 9 दिन का भंडार है और उसके पास ज्यादा भंडार रखने की वास्तविक क्षमता नहीं है, यह दावा 1.5 बिलियन लोगों वाली बड़ी ऊर्जा अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को गलत रूप में समझता है। आप किसी देश को कुछ गुफाओं से नहीं चला सकते, क्योंकि जमीन के भीतर रखी गई ऊर्जा से कुछ भी कमाई नहीं होती और उसे रखने में बहुत ज़्यादा खर्च भी आता है। इसके बजाय आप इसे इम्पोर्ट टर्मिनल, डिपो, पाइपलाइन, रिफाइनरी और पूरे देश में फैले स्टोरेज के सिस्टम के जरिए चलाते हैं, और आज भारत के पास 24 रिफाइनरी हैं, 47,000 किलोमीटर से ज्यादा तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, और 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं जो प्रतिदिन करीब 8 करोड़ लोगों की सेवा करते हैं।

उस प्रणाली की वास्तविकता की जांच, महाप्रलय का भय दिखाने वाले किसी भविष्यवक्ता की स्लाइड पर दिखाए गए आंकड़े से नहीं होती। असली जांच है – आधुनिक समय के सबसे बड़े ऊर्जा संकट के लगभग चार महीने गुजर जाने के बाद, क्या देश को अपने लोगों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी, क्या ईंधन सिर्फ सम-विषम नंबर प्लेट्स के हिसाब से देना पड़ा, क्या घर में ऑफिस बनाना पड़ा या क्या हर दिन 5 बजे अपने पंप बंद करने पड़े। भारत को इनमें से कोई काम नहीं करना पड़ा। यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पिछले कई सालों में इसकी तैयारी की गई थी। हमारे कच्चे तेल के बास्केट को 27 देशों से बढ़ाकर 41 करना, हमारे आयात टर्मिनल को दुगना करना, और प्रधानमंत्री मोदी के तहत एक दशक में बनाए गए पाइपलाइन और भंडार, होर्मुज के बंद होने पर ये सभी चीजें उपयोगी साबित हुईं; यही वजह थी कि रोशनी जलती रही।

इस स्तर का संकट एक देश को उसकी असली क्षमता दिखाता है। भारत ने होर्मुज के बंद होने की बाधा पार की और देश में कहीं भी बिना किसी कमी के आपूर्ति जारी रही। इस अनुभव से सीख लेकर, हम अपनी ऊर्जा सुदृढ़ता को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त क्षमताओं का निर्माण करेंगे, लेकिन जब इस संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक पंक्ति मौजूद रहनी चाहिए: मानव स्मृति का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट हमारे तटों तक पहुंचा, लेकिन 150 करोड़ भारतीय नागरिक सुरक्षित रहे।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)  

………………….        

ईरान पर अमेरिका का फिर बड़ा प्रहार: 4 ड्रोन मार गिराए, 5वें के ठिकाने को किया तबाह; ट्रंप बोले- “ईरान अब कमजोर”

इंटरनेशनल डेस्क : मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने बुधवार को ईरान पर एक बार फिर जोरदार हमला किया है, जिसे अमेरिकी सेना ने “रक्षात्मक कार्रवाई” करार दिया है। इस हफ्ते में यह दूसरी बार है जब अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ ऐसी सैन्य कार्रवाई की है।

ड्रोन हमलों को किया नाकाम: अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, यह कदम तब उठाया गया जब ईरानी सेना की ओर से आक्रामक गतिविधियां देखी गईं। अमेरिकी सेना ने ईरान के 4 ड्रोन मार गिराए और एक ऐसे सैन्य ठिकाने पर हमला किया, जहां से पांचवां ड्रोन लॉन्च करने की तैयारी हो रही थी। अधिकारियों का दावा है कि इन ड्रोनों से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को गंभीर खतरा था।

डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान: “ईरान कमजोर स्थिति में” इस सैन्य कार्रवाई के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कैबिनेट बैठक में कहा कि ईरान अब “कमजोर स्थिति में बातचीत” कर रहा है। ट्रंप ने भरोसा जताया कि दोनों देशों के बीच जल्द ही समझौता हो सकता है। उन्होंने बताया कि पिछले हफ्ते के अंत में उनकी सरकार और तेहरान के बीच समझौते को लेकर काफी प्रगति हुई थी, हालांकि अभी बातचीत को अंतिम रूप देना बाकी है।

रणनीतिक उद्देश्य और चुनौतियां : राष्ट्रपति ट्रंप का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा समझौता करना है जिससे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ फिर से सामान्य रूप से खुल सके और ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर किया जा सके। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वे ईरान के यूरेनियम को चीन या रूस ले जाने की अनुमति नहीं देंगे। हालांकि, अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों को लेकर रिपब्लिकन नेताओं में चिंता बनी हुई है।

होर्मुज में अमेरिकी युद्धपोत पर मिसाइल हमला: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, शेयर बाजार में गिरावट के आसार

बिजनेस डेस्क : खाड़ी देशों में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने दावा किया है कि जास्क द्वीप के करीब एक अमेरिकी युद्धपोत पर दो मिसाइलें दागी गई हैं। बताया जा रहा है कि ईरानी चेतावनियों को नजरअंदाज करने के कारण हुए इस हमले के बाद अमेरिकी जहाज को अपनी सुरक्षा के लिए वापस लौटना पड़ा।

कच्चे तेल में लगी आग: इस हमले की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में हड़कंप मच गया है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 5% की भारी तेजी के साथ 113.35 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं,। जानकारों का मानना है कि यदि कीमतें इसी स्तर पर रहीं, तो भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का भारी दबाव बनेगा, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है।

शेयर बाजार पर संकट के बादल: वैश्विक बाजारों में इस तनाव का असर साफ़ दिख रहा है। अमेरिकी बाजार (नैस्डैक, डाउ जोंस) और यूरोपीय सूचकांक लाल निशान में आ गए हैं। भारतीय निवेशकों के लिए भी मंगलवार की सुबह चिंताजनक हो सकती है। गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) में गिरावट को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मंगलवार (5 मई) को सेंसेक्स और निफ्टी की शुरुआत ‘गैप-डाउन’ (बड़ी गिरावट) के साथ हो सकती है।

ट्रंप का ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम‘: यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ नामक नौसैनिक मिशन की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करना है।

भारत के लिए बड़ी राहत: होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर एलएनजी टैंकर ‘मुबाराज’ पहुंचा भारतीय जलक्षेत्र के करीब

नेशनल डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच भारत के लिए एक बेहद सकारात्मक खबर आई है। एलएनजी (LNG) से लदा एक विशाल टैंकर जहाज, जिसने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को सफलतापूर्वक पार कर लिया है, अब कुछ ही दिनों में भारत पहुंचने वाला है।

युद्ध के बीच फंसा था जहाज : जहाज ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, इस जहाज का नाम ‘मुबाराज’ है। यह जहाज मार्च 2026 में संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के दास द्वीप संयंत्र से एलएनजी भरकर निकला था। मार्च में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने के बाद से यह जहाज खाड़ी क्षेत्र में फंसा हुआ था और 31 मार्च के आसपास इसने सिग्नल भेजना भी बंद कर दिया था।

तनाव कम होने का संकेत: युद्ध की शुरुआत के बाद यह पहली बार है जब किसी एलएनजी टैंकर ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को पार किया है। सोमवार को यह जहाज भारतीय जलक्षेत्र के पास फिर से दिखाई दिया, जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में से एक में तनाव कम होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, मुबाराज मई के पहले सप्ताह में भारत पहुंच सकता है।

एलएनजी का महत्व: एलएनजी (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) को -162 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा करके तरल रूप में बदला जाता है ताकि इसे लंबी दूरी तक आसानी से ले जाया जा सके। भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम (Ceasefire) को लेकर बातचीत चल रही है, जिससे ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है।

अमेरिका ने ईरान की समुद्री नाकेबंदी की कड़ी: 31 जहाजों को रोका, हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा

इंटरनेशनल डेस्क: U.S. सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी समुद्री नाकेबंदी को और सख्त कर दिया है, जिसके तहत अब तक 31 जहाजों को वापस लौटने या बंदरगाह पर जाने के लिए मजबूर किया गया है। यह नाकेबंदी 13 अप्रैल, 2026 से शुरू हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ईरान से जुड़े समुद्री व्यापार को पूरी तरह से रोकना है। CENTCOM ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में किसी भी जहाज को ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने या वहां से निकलने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

भारी सैन्य तैनाती : इस व्यापक ऑपरेशन को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी बड़ी सैन्य ताकत झोंक दी है। रिपोर्ट के अनुसार, इस नाकेबंदी के लिए 10,000 से अधिक सैनिक, 100 से ज्यादा फाइटर और निगरानी विमान, और 17 से अधिक युद्धपोत तैनात किए गए हैं। इन सैन्य संसाधनों में एयरक्राफ्ट कैरियर, गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर, ड्रोन और रिफ्यूलिंग विमान शामिल हैं, जो निरंतर निगरानी कर रहे हैं। जिन जहाजों को रोका गया है, उनमें से अधिकतर तेल टैंकर हैं और अधिकांश ने अमेरिकी आदेशों का पालन किया है।

वैश्विक तेल मार्ग पर प्रभाव: इस नाकेबंदी का सबसे बड़ा प्रभाव स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर पड़ा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक माना जाता है। यहाँ जहाजों की आवाजाही अत्यंत धीमी हो गई है और विशेषज्ञों का मानना है कि 30 जून तक स्थिति सामान्य होने की संभावना लगभग शून्य है। बाजार के आंकड़ों और निवेशक की धारणा के अनुसार, आने वाले समय में भी इस क्षेत्र में तनाव बना रह सकता है।

आर्थिक और रणनीतिक दबाव : विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक सैन्य कदम नहीं है, बल्कि ईरान पर भारी आर्थिक दबाव बनाने की अमेरिका की एक रणनीति है। हालांकि सीजफायर की अवधि बढ़ाई गई थी, लेकिन बातचीत में कोई ठोस परिणाम न निकलने के कारण अमेरिका ने अपनी सख्ती जारी रखी है। अमेरिकी प्रशासन ने यह भी संकेत दिया है कि जब तक कोई समझौता नहीं होता, ईरानी बंदरगाहों पर यह नौसैनिक नाकेबंदी जारी रह सकती है।

24 घंटे के भीतर पलटा फैसला: ईरान ने फिर बंद किया होर्मुज स्ट्रेट, अमेरिकी नाकेबंदी के जवाब में गनबोट्स ने की जहाजों पर फायरिंग

इंटरनेशनल डेस्क : खाड़ी क्षेत्र में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुँच गया है। शुक्रवार को ईरान ने जिस होर्मुज स्ट्रेट को खोलने का ऐलान किया था, उसे 24 घंटे के भीतर ही दोबारा बंद कर दिया गया है। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई अमेरिका द्वारा उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखने के जवाब में की गई है।

बाजार में उथल-पुथल और अमेरिकी रुख : शुक्रवार को जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर रास्ता खोलने की पुष्टि की थी, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 10% की गिरावट दर्ज की गई थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस कदम का स्वागत किया था। लेकिन, जब ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अंतिम समझौते तक अमेरिका की नाकेबंदी जारी रहेगी, तो ईरान ने अपना फैसला बदल दिया। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने शनिवार को ऐलान किया कि होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद कर दिया गया है।

युद्ध जैसी स्थिति: गनबोट्स से हमला हालात तब और बिगड़ गए जब शनिवार को ओमान के तट से 20 मील दूर दो व्यापारिक जहाजों पर फायरिंग की गई। जहाज के कप्तानों के अनुसार, यह हमला ईरानी गनबोट्स द्वारा किया गया था। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने सख्त लहजे में कहा है कि उनकी नेवी दुश्मनों को करारी हार देने के लिए तैयार है।

22 अप्रैल की समयसीमा और संभावित खतरा: क्षेत्र में लागू युद्धविराम अब केवल तीन दिन में, यानी 22 अप्रैल को खत्म होने वाला है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि इस तारीख तक कोई ठोस समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका फिर से बमबारी शुरू कर सकता है। दूसरी ओर, ईरान ने भी मई 2026 में विकसित अपनी नई मिसाइलों के इस्तेमाल की धमकी दी है।

सोने-चांदी की कीमतों में आया ‘भूचाल’: एक ही दिन में ₹11,000 महंगी हुई चांदी, सोना भी ₹1.56 लाख के पार; जानें आज का नया रेट

बिजनेस डेस्क: सर्राफा बाजार में बुधवार, 8 अप्रैल 2026 को कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया है, जिसने खरीदारों और निवेशकों को हैरान कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदले हालातों के कारण घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों ने नए रिकॉर्ड बना दिए हैं।

चांदी की तूफानी तेजी: दिल्ली बुलियन मार्केट में चांदी की कीमत में एक ही दिन में 11,000 रुपये (करीब 5%) का भारी उछाल आया है। अब एक किलो चांदी का भाव 2,51,000 रुपये पर पहुँच गया है, जबकि मंगलवार को यह 2,40,000 रुपये पर थी।

सोना भी हुआ बेकाबू: 99.9% शुद्धता वाले सोने की कीमत में भी 3,200 रुपये की बढ़त दर्ज की गई है। सोना अब 1,56,400 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुँच गया है।

तेजी की असल वजह: इस उछाल के पीछे सबसे बड़ा कारण सात समंदर पार अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 2 हफ्ते का सीजफायर (संघर्ष विराम) है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य कार्रवाई की डेडलाइन से ठीक पहले दोनों देशों के बीच सहमति बनी कि ईरान ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को सुरक्षित व्यापारिक आवाजाही के लिए खोल देगा।

मार्केट एक्सपर्ट्स की राय: एचडीएफसी सिक्योरिटीज के मुताबिक, वैश्विक तनाव कम होने से डॉलर और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई है। इस राहत भरी खबर के बाद निवेशकों ने एक बार फिर सुरक्षित निवेश के रूप में सोने और चांदी की ओर रुख किया है, जिससे मांग और कीमतें दोनों बढ़ गई हैं।

ग्लोबल मार्केट का हाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने का भाव 2.07% बढ़कर 4,803.33 डॉलर प्रति औंस और चांदी 6% की छलांग लगाकर 77.33 डॉलर प्रति औंस पर ट्रेड कर रही है।यदि आप इस सीजन में गहने बनवाने या निवेश करने की योजना बना रहे थे, तो आपको अपना बजट दोबारा चेक करने की जरूरत पड़ सकती है।

ईरान-अमेरिका युद्ध : ट्रंप ने किया 2 हफ्ते के सीजफायर का ऐलान; ‘विनाशकारी’ डेडलाइन से ठीक पहले रुकी जंग

इंटरनेशनल डेस्क: ईरान और अमेरिका के बीच मंडरा रहे महायुद्ध के बादलों के बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘पूरी सभ्यता’ को तबाह करने की अपनी रात 8 बजे की डेडलाइन खत्म होने से मात्र दो घंटे पहले ईरान के साथ दो हफ्ते के सीजफायर (युद्धविराम) का ऐलान किया है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता: ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर जानकारी दी कि यह सीजफायर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के विशेष अनुरोध के बाद हुआ है।

सबसे बड़ी शर्त: यह युद्धविराम इस शर्त पर आधारित है कि ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़’ (Strait of Hormuz) को तुरंत, पूरी तरह और सुरक्षित रूप से फिर से खोल देगा।

इजराइल भी शामिल: व्हाइट हाउस के अनुसार, इजराइल भी इस दो हफ्ते के सीजफायर का हिस्सा है और वह भी बातचीत जारी रहने तक अपनी बमबारी रोकने पर सहमत हो गया है।

ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव: ट्रंप ने बताया कि उन्हें ईरान की ओर से एक 10-पॉइंट का प्रस्ताव मिला है, जिसे वे बातचीत के लिए एक व्यावहारिक आधार मानते हैं। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है और वे एक स्थायी शांति समझौते के काफी करीब हैं।

ईरान का दावा: दूसरी ओर, ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने इसे अपनी जीत बताते हुए कहा है कि अमेरिका को उनका प्रस्ताव मानने के लिए विवश होना पड़ा है।

इस प्रस्ताव में प्रतिबंधों को हटाने, यूरेनियम संवर्धन की स्वीकृति और क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी जैसी शर्तें शामिल हैं।अगले दो हफ्तों का समय इस समझौते को अंतिम रूप देने और लंबे समय तक चलने वाली शांति स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

‘होर्मुज में सिर्फ हमारे नाविक मारे गए’: 60 देशों की बैठक में भारत ने दुनिया को चेताया

इंटरनेशनल डेस्क: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन की पहल पर होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए आयोजित 60 से अधिक देशों की एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन बैठक में भारत ने अपना पक्ष मजबूती से रखा है।

इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने जानकारी दी कि होर्मुज संकट में अब तक 3 भारतीय नाविक अपनी जान गंवा चुके हैं, जो विभिन्न विदेशी जहाजों पर कार्यरत थे। भारत ने जोर देकर कहा कि वह एकमात्र ऐसा देश है जिसने खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हमलों के दौरान अपने नागरिकों की जान गंवाई है।

ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: विदेश सचिव ने चेतावनी दी कि होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन गई है। इस रास्ते से दुनिया का लगभग 20% तेल और एलएनजी (LNG) गुजरता है, और इसके बंद होने से वैश्विक कीमतों में भारी उछाल आया है।

कूटनीति की अपील: भारत ने सभी संबंधित पक्षों से तनाव कम करने और संवाद के जरिए रास्ता निकालने की अपील की है। भारत का मानना है कि इस पूरे संकट का समाधान केवल बातचीत और शांतिपूर्ण कूटनीति से ही संभव है।

सप्लाई पर असर: ईरान की सेना (IRGC) द्वारा स्ट्रेट को अवरुद्ध किए जाने से भारत के साथ-साथ चीन, जापान, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों की पेट्रोल-डीजल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।यह बैठक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टॉर्मर की सरकार द्वारा वैश्विक व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए बुलाई गई थी।