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पंजाब में बुक कल्चर को बढ़ावा देने के लिए अपनाएं ‘बरगारी मॉडल’: प्रो. गुरभजन सिंह गिल

लुधियाना / सत्ता संदेश

पंजाब में पढ़ने की संस्कृति (बुक कल्चर) को मजबूत करने के लिए पीपुल्स फोरम बरगारी मॉडल को अपनाने की आवश्यकता है। यह बात पंजाबी लोक विरासत अकादमी, लुधियाना के चेयरमैन प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने कही।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 में फरीदकोट जिले के गांव बरगारी के 23 युवाओं ने साहित्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पीपुल्स फोरम की शुरुआत की थी। लगातार प्रयासों के चलते इस पहल ने पंजाब में बुक फेयर, पर्यावरण संरक्षण और हर घर लाइब्रेरी जैसे अभियानों के माध्यम से एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत किया है।

इस अवसर पर खुशवंत बरगारी ने प्रो. गुरभजन सिंह गिल को गुरबचन सिंह भुल्लर की नई पुस्तक “ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਖ ਕਾਂਜੀ- ਕਿਸ ਦੀ ਮਜਾਲ” भेंट की। उन्होंने बताया कि पीपुल्स फोरम हर दो महीने में चार पुस्तकों का एक सेट पाठकों तक पहुंचाता है। जुलाई-अगस्त 2026 के सेट में बलबीर परवाना का कहानी संग्रह “सब तो उदास इबारत”, हरमीत विद्यार्थी की रचनात्मक डायरी “धरती ने बोलना ही सी”, कुमार जगदेव की गद्य पुस्तक “मैले लट्ठे दी झालर” तथा पंजाबी साहित्य सभा, नई दिल्ली की त्रैमासिक पत्रिका “समकालीन साहित्य” शामिल हैं।

खुशवंत बरगारी ने बताया कि वर्ष 2013 से अब तक बिना किसी सरकारी या संस्थागत आर्थिक सहायता के 350 पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं। प्रकाशन के लिए किसी भी लेखक से कोई शुल्क नहीं लिया जाता, बल्कि उन्हें रॉयल्टी के रूप में पुस्तकें दी जाती हैं।

उन्होंने बताया कि मात्र 350 रुपये में चार पुस्तकों का सेट डाक के माध्यम से पंजाब सहित देशभर के 750 पंजाबी परिवारों तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए अलग से डाक शुल्क भी नहीं लिया जाता। विदेशों में रहने वाले 50 पंजाबी परिवार भी इस घरेलू पुस्तकालय अभियान से जुड़े हुए हैं।

पीपुल्स फोरम का संदेश है कि “हर दिन एक कप चाय की कीमत का आधा खर्च करके हर घर में शब्दों का प्रकाश फैलाया जा सकता है।”

प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने पंजाब के खेल क्लबों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से आह्वान किया कि वे मिलकर पंजाब को “शब्द भूमि” बनाने की दिशा में काम करें, ताकि ज्ञान और साहित्य के माध्यम से समाज को बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाया जा सके।

खुशवंत बरगारी के अनुसार, वर्ष 2013 से अब तक करीब ढाई लाख पुस्तकें घर-घर पहुंचाई जा चुकी हैं। पीपुल्स फोरम बरगारी द्वारा प्रकाशित पुस्तकें पंजाब के प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं के पास भी उपलब्ध हैं।

माझे की सुरीली बेटीमोहिनी रसीला

गुरभजन सिंह गिल
चेयरमैन
पंजाबी लोक विरासत अकादमी
लुधियाना

पिछले वर्ष मोहिनी रसीला हमें सदा के लिए छोड़कर चली गईं। उनकी स्मृति में आज उनके परिवार द्वारा कलानौर के निकट गांव खुशिपुर (गुरदासपुर) में पहला “मोहिनी रसीला स्मारक मेला” आयोजित किया गया। इसमें माझे के लगभग सभी प्रमुख गायक शामिल हुए। मोहिनी रसीला पर राजपाल सिंह बाठ द्वारा संपादित पुस्तक “सुरों की नज़्म” का इस अवसर पर गुरमीत सिंह बाजवा ने गणमान्य अतिथियों से लोकार्पण करवाया। यह एक शुभ कार्य है। स्मरण के लिए पुस्तक से बड़ा कोई साधन नहीं। रछपाल रसीला इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं।

अब मुझसे पूछो—मोहिनी रसीला कौन थीं?

रावी नदी के इस पार और उस पार शब्द, सुर, संगीत और प्रतिभा की भरपूर फसल उगती है। 1947 से पहले जब वतन एक था, तब नदी के दोनों ओर के गवैये अक्सर आते-जाते रहते थे। अधिकतर गायक पुरुष होते थे। महिलाएँ भी गाती थीं, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर ही—तिंझण में चरखा कातते समय या विवाह-शादियों में। लंबे हेक वाले गीतों का बोलबाला था। बचपन में मैंने अपनी तायाजी की बेटियों, बहन जीतो और बहन वीरो को साथ बैठकर गाते सुना था। बहन वीरो द्वारा बजाई पीतल की गागर आज भी कई बार सपनों में सुनाई देती है।

“घड़ा बजता, घड़ोली बजती
कहीं गागर बजती सुन मुंडिया…”

अब गागर कहीं सुनाई नहीं देती। यह घर के बर्तनों से भी गायब हो गई है और संगीत वाद्यों से भी। कितना सोना रेत में मिलकर मिट्टी हो गया—लोग-संस्कृति के अनेक वाद्य विलुप्त होते जा रहे हैं।

इसी तरह लोक रंग के गायक और लेखक भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं—सोने की डलियों जैसे गायक। ढाढी सोहन सिंह सीतल, जसवंत सिंह चाड़ भट्टी, गुरचरण सिंह गोहलवड़, मूला सिंह पाखरपुरी, कविशर जोगा सिंह जोगी, कुलवंत सिंह बीए, बलदेव सिंह बैंकां और कई अन्य। लोक गायक देविंदर सिंह नबीपुर, अमरजीत गुरदासपुरी, हमारे गांव बसंतकोट के हरदेव सिंह खुशदिल, जसबीर खुशदिल खेलेयां वाला, ज्ञान सिंह कमल, जागीर सिंह तालिब, अमरीक सिंह हरगोबिंदपुरी, लखबीर सिंह लखा भरथ—ये सब जैसे खोए हुए रत्न हैं।

माझे की सुरीली बेटियों में जोगिंदर अरोड़ा, गुरमीत बावा, प्रीति बाला और मोहिनी रसीला भी उस दुनिया में चली गईं, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।

अमरजीत गुरदासपुरी अक्सर कहते थे कि माझे की गायकी का रंग-ढंग और मधुरता रावी नदी का पानी पीने के कारण है।

रावी नदी धरती की सुरीली बेटी है। उसके किनारे चलने वाली हवा भी संगीत सा स्वर भरती है। इन्हीं में से रावी की बेटी, सोने की कण जैसी माझे की बेटी थी—मोहिनी रसीला।

किसी “है” को “था” कहना सबसे कठिन कार्य होता है।

गीतकार बाबू सिंह मान द्वारा लिखा और नरेंद्र बीबा द्वारा गाया एक गीत हमेशा यादों में बसता है—

“हाथों छोड़े सजनां नूं,
नाले याद करां नाले रोवां…”

…और इसी प्रकार आगे की पंक्तियाँ विरह, पीड़ा और स्मृतियों का गहरा भाव व्यक्त करती हैं।

उनके जीवनसाथी और मेरे छोटे भाई रछपाल रसीला की मनःस्थिति भी लगभग ऐसी ही है। उन्होंने बताया कि मोहिनी रसीला की याद में एक पुस्तक तैयार करवाई जा रही है। शब्दों का ताजमहल बनाना अच्छे लोगों की सोच का हिस्सा होता है।

रछपाल का गांव मेरे गांव बसंतकोट से मात्र दस किलोमीटर दूर है। पहले साइकिल से यात्रा करते समय ये रास्ते यादों में बसे रहते थे, अब नई सड़कों ने दूरी तो घटा दी है, लेकिन यादों के भीतर रास्ते और गहरे हो गए हैं।

लेखक मित्र राजपाल सिंह बाठ के अनुसार, मोहिनी रसीला का जन्म 28 मई 1961 को माता जसवंत कौर और पिता सरदार रजिंदर सिंह के घर गांव मियांकोट (कलानौर के निकट), जिला गुरदासपुर में हुआ था।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मियांकोट से, मैट्रिक सरकारी हाई स्कूल कलानौर से और बीए आरआर डीएवी कॉलेज बटाला से की। उनके प्रमाणपत्रों पर उनका नाम कमलजीत कौर दर्ज है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के इंटर-कॉलेज युवा महोत्सव में उन्होंने दो बार अपने कॉलेज की संगीत टीम का नेतृत्व किया—एक बार विजेता और एक बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया।

फरवरी 1980 में उनका विवाह लोक गायक रछपाल रसीला से हुआ। उनका एक पुत्र रूपिंदर सिंह ऑस्ट्रेलिया में परिवार सहित रहता है।

वे अपने गुरु लाल चंद यमला जट्ट को मानती थीं। उनकी आवाज़ में लोक गीत, दोहे, कथाएँ और धार्मिक गीत शामिल हैं।

मोहिनी रसीला और रछपाल रसीला की लोकप्रियता विदेशों तक पहुँची—इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर आदि देशों में उन्होंने अनेक कार्यक्रम किए।

उनकी रिकॉर्डिंग एचएसवी सोनोटोन, इनरिको, सीटीसी जैसी कंपनियों में हुई। वे आकाशवाणी जालंधर और दूरदर्शन जालंधर की मान्यता प्राप्त कलाकार थीं।

उन्हें कई पुरस्कार मिले—ढाढी अमर सिंह शौकी मेले का पुरस्कार, हाशिम शाह स्मृति पुरस्कार, और लाला चंद यमला जट्ट सम्मान आदि।

मोहिनी रसीला के लोकप्रिय गीतों में लोक गीत, लोक कथाएँ, दोहे और धार्मिक भजन शामिल हैं—जैसे “मैं माझे दी जट्टी”, “गुड्डी ले दे कागजां दी”, “शाहनी कौला”, “सोहनी”, “मिर्ज़ा साहिबां” आदि।

उनकी आवाज़ में “तेरा भाणा मीठा लागे”, “धन बाबा दीप सिंह जी” जैसे धार्मिक गीत भी प्रसिद्ध हैं।

कैंसर जैसी बीमारी ने इस सुरीली गायिका को घेर लिया और 29 मई 2025 को उन्होंने सदा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

माझे की यह बुलंद, सुरीली बेटी हमेशा के लिए चुप हो गई। अब केवल यादें शेष हैं—

“अहो गए सज्जण अहो गए,
लांघ गए दरिया…”

गीतकार राज काकड़ा के गीत संग्रह “पैंडा” का लोकार्पण प्रो. गुरभजन सिंह गिल और लोक गायक हरदीप मोहाली ने किया

लुधियाना / सत्ता संदेश

पंजाबी लोक विरासत अकादमी की ओर से प्रसिद्ध गीतकार राज काकड़ा के गीत संग्रह “पैंडा” का लोकार्पण प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने लुधियाना में किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि विरासत से लेकर वर्तमान तक फैले पंजाबी संस्कृति के विभिन्न रंगों से भरपूर यह विशाल गीत संग्रह साहित्यिक गीतों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाएगा।

उन्होंने कहा कि उनके पसंदीदा गीतकार और गायक राज काकड़ा के गीतों का सुंदर संग्रह “पैंडा” उन्हें घर बैठे प्राप्त हुआ, जिस पर उन्हें गर्व महसूस हो रहा है। उन्होंने बताया कि राज काकड़ा और देबी मखसूसपुरी उनके पसंदीदा शायर हैं। दोनों बेहद मधुर लिखते और गाते हैं तथा शब्दों की गरिमा को बनाए रखते हैं।

इस मौके पर मोहाली निवासी लोक गायक हरदीप मोहाली ने कहा कि अच्छे गीत लिखने के साथ-साथ राज काकड़ा निजी जीवन में भी अपने साहित्यिक गीतों की तरह सरल और संवेदनशील इंसान हैं।

जालंधर से आए संगीतकार कुलजीत ने कहा कि राज काकड़ा के गीतों में सहजता और सुंदरता दोनों हैं। वह अपने गीतों की धुन स्वयं तैयार करते हैं, जिसके कारण उनके गीत कई प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाए गए हैं।

पंजाब कल्चरल सोसायटी के अध्यक्ष रविंदर सिंह रंगूवाल ने कहा कि देश-विदेश में उनके प्रशंसक फैले हुए हैं, जिसके चलते उनकी यह पुस्तक जून महीने में अमेरिका और जर्मनी में भी लोकार्पित की जाएगी। उन्होंने कहा कि “पैंडा” का सुंदर प्रकाशन प्रिंट वेल अमृतसर ने बेहतरीन ढंग से किया है।

फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान रखने वाले अभिनेता याद धालीवाल भी इस अवसर पर उपस्थित थे। “पैंडा” को जर्मनी की संस्था पंज आब ने प्रकाशित किया है।