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गरुड़ रेजिमेंटल ट्रेनिंग सेंटर, वायुसेना स्टेशन, चांदीनगर में मैरून बेरेट की औपचारिक परेड

दिल्ली / सत्ता संदेश

वायु सेना के ‘गरुड़’ बल के विशेष बलों के जवानों के प्रशिक्षण के सफल समापन के उपलक्ष्य में, 23 मई 2026 को गरुड़ रेजिमेंटल ट्रेनिंग सेंटर (जीआरटीसी), वायु सेना स्टेशन चांदीनगर में मैरून बेरेट औपचारिक परेड का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में एवीएम राहुल गुप्ता, एसीएएस ऑपरेशन (अंतरिक्ष) ने परेड का निरीक्षण किया।

गरुड़ रेजिमेंटल ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया और उन्हें प्रशिक्षण के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। मुख्य अतिथि ने गरुड़ कमांडो को उनकी सफल पासिंग आउट पर बधाई दी। उन्होंने युवा कमांडो को संबोधित करते हुए तेजी से बदलते सुरक्षा परिदृश्य के अनुरूप कठोर प्रशिक्षण और विशेष बलों के कौशल को निखारने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सफल गरुड़ प्रशिक्षुओं को मैरून बेरेट, गरुड़ प्रवीणता बैज और विशेष बल टैब प्रदान किए और पुरस्कार विजेताओं को ट्राफियां वितरित की।

पासिंग आउट समारोह के दौरान, ‘गरुड़ों’ ने युद्धक फायरिंग, बंधक बचाव, फायरिंग ड्रिल, विस्फोटक सामग्री का उपयोग, बाधा पार करना, दीवार पर चढ़ना, रेंगना, रस्सियों से उतरना और सैन्य मार्शल आर्ट जैसे विभिन्न कौशल का प्रदर्शन किया।

मैरून बेरेट सेरेमोनियल परेड ‘गरुड़ों’ के लिए गौरव और उपलब्धि का क्षण होता है। यह एक अत्यंत कठिन प्रशिक्षण कार्यक्रम की उपयुक्त परिणति और विशिष्ट ‘गरुड़’ बल में शामिल ‘युवा विशेष बल संचालकों’ के रूप में उनके परिवर्तन का प्रतीक है।

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायु सेना के विशेष बलों की भूमिका को देखते हुए, हाल ही में पास आउट विशेष बल संचालक नए विशेष अभियानों को अंजाम देने के लिए भारतीय वायु सेना की क्षमता को और मजबूत करेंगे।

बहुपक्षीय अभ्यास प्रगति-2026 का उमरोई, मेघालय में शुभारंभ हुआ

मेघालय / सत्ता संदेश

मेघालय के उमरोई सैन्य स्टेशन में आज बहुपक्षीय सैन्य अभ्यास प्रगति-2026 का शुभारंभ हुआ। इस सैन्य अभ्यास में भूटानकंबोडियाइंडोनेशियालाओसमलेशियामालदीवम्यांमारनेपालफिलीपींससेशेल्सश्रीलंका और वियतनाम सहित 12 मित्र देशों ने भागीदारी कर रहे हैं। भारतीय सेना ने इन सैन्य टुकड़ियों के आगमन पर उनका गर्मजोशी और पारंपरिक रूप से स्वागत किया और यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आतिथ्य सत्कार को दर्शाता है।

प्रगति (पीआरएजीएटीआई) , जिसका अर्थ हिंद महासागर क्षेत्र में विकास और परिवर्तन के लिए क्षेत्रीय सेनाओं की साझेदारी है, समानता, मित्रता और आपसी सम्मान की भावना से आयोजित की जा रही है। यह अभ्यास भाग लेने वाली सेनाओं को पेशेवर आदान-प्रदान करने, एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और घनिष्ठ सैन्य संबंध बनाने के लिए एक साझा मंच प्रदान करता है।

उद्घाटन समारोह में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। अपने संबोधन में भारतीय सेना के अपर महानिदेशक (इन्फैंट्री) मेजर जनरल सुनील शेओरान ने सभी टुकड़ियों का स्वागत किया और समकालीन सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सामूहिक भागीदारी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को खुलेपन, आपसी सम्मान और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने की तत्परता के साथ भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही इस बात पर भी बल दिया कि प्रत्येक राष्ट्र की क्षमता और दृष्टिकोण अभ्यास के सामूहिक उद्देश्यों को हासिल करने में सार्थक योगदान देंगे।

इस अभ्यास के उद्देश्यों में संयुक्त अभियानों में भाग लेने वाले देशों के बीच निर्बाध समन्वय स्थापित करना और सहयोग के सामान्य क्षेत्रों की पहचान करना; विशेषज्ञता साझा करना एवं व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से विकसित सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों के आदान-प्रदान के लिए एक संस्थागत तंत्र स्थापित करना; संयुक्त प्रशिक्षण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से रक्षा संबंधों और सौहार्द को मजबूत करने के साथ-साथ बहुराष्ट्रीय परिवेश में खुफिया जानकारी के प्रबंधन और साझाकरण के लिए सामान्य अवधारणाओं को विकसित करना शामिल है।

दो सप्ताह तक संचालित होने वाले इस अभ्यास में अर्ध-पहाड़ी और जंगली इलाकों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम में संयुक्त योजना अभ्यास, सामरिक स्तर के अभ्यास और समन्वित अभियान शामिल होंगे, जिनका उद्देश्य भाग लेने वाले सैनिकों की अनुकूलन क्षमता, सहनशक्ति और सामरिक दक्षता में सुधार करना है। चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में संचालन के दौरान शारीरिक फिटनेस, अनुशासन और समन्वय पर विशेष बल दिया जाएगा।

इस अभ्यास के अंतर्गत, भारतीय प्रौद्योगिकी और रक्षा कंपनियां आत्मनिर्भर भारत पहल के अंतर्गत स्वदेशी उपकरणों और नवाचारों का प्रदर्शन करेंगी, जो ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान करेगा और रक्षा उत्पादन, नवाचार और आत्मनिर्भरता में भारत की बढ़ती क्षमताओं को उजागर करेगा।

अभ्यास प्रगति-2026 से सैन्य सहयोग को और मजबूत करने, पेशेवर संबंधों को परिपुष्ट करने और क्षेत्रीय भागीदारों के बीच सामान्य सुरक्षा चुनौतियों के लिए एक साझा दृष्टिकोण में योगदान देने की उम्मीद है।

भारत ने एमआईआरवी सिस्टम से उन्नत अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत ने 8 मई को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेड री-एंट्री व्हीकल (एमआईआरवी) सिस्टम से उन्नत अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इस मिसाइल का परीक्षण कई विस्फोटकों के साथ किया गया, जिनका लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र में एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैले विभिन्न लक्ष्य थे।

कई जमीनी और जहाज-आधारित स्टेशनों ने टेलीमेट्री और ट्रैकिंग का कार्य किया। इन प्रणालियों ने मिसाइल के प्रक्षेपण से लेकर सभी विस्फोटकों के प्रभाव तक की पूरी यात्रा का पता लगाया। उड़ान डेटा से पता चला कि परीक्षण के दौरान मिशन के सभी उद्देश्य पूरे हुए।  

भारत ने इस सफल परीक्षण से एक बार फिर एक ही मिसाइल प्रणाली का उपयोग करके कई महत्वपूर्ण लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता का प्रदर्शन किया। इस मिसाइल को डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं ने देश भर के उद्योगों के सहयोग से विकसित किया है। इस परीक्षण के दौरान डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक और भारतीय सेना के जवान उपस्थित थे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सफल उड़ान परीक्षण के लिए डीआरडीओ, भारतीय सेना और उद्योग जगत की सराहना की। उन्होंने कहा कि इससे बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूती मिलेगी।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया

दिल्ली /सत्ता संदेश

‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक ऑपरेशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक मारक क्षमता की याद दिलाता रहेगा

सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, एजेंसियों की खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति सीमा पार मौजूद आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के लिए एकसाथ उठ खड़े हुए

यह दिन हमारे दुश्मनों को यह याद दिलाता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, बच नहीं सकते

वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष पूरे होने पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने सशस्त्र बलों के अद्वितीय शौर्य को नमन किया और कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का एक ऐतिहासिक मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमेशा हमारे सशस्त्र बलों की अचूक प्रहार क्षमता की याद दिलाता रहेगा।

ऑपरेशन सिंदूर भारत का एक युगांतरकारी मिशन है, जो हमारे दुश्मनों को हमारी सशस्त्र सेनाओं की अचूक प्रहार क्षमता की याद हमेशा दिलाता रहेगा। इतिहास इसे एक ऐसे दिन के तौर पर याद रखेगा जब हमारे सशस्त्र बलों की सटीक मारक क्षमता, हमारी एजेंसियों की पैनी खुफिया जानकारी और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति—ये तीनों एक होकर सीमा पार मौजूद आतंकवाद के हर उस ठिकाने को नेस्तनाबूद करने के लिए उठ खड़े हुए, जिसने पहलगाम में हमारे नागरिकों पर अपना बुरा साया डालने की हिमाकत की थी। यह दिन हमारे दुश्मनों के लिए यह खौफनाक संदेश लेकर आता रहेगा कि वे कहीं भी छिप जाएं, वे बच नहीं सकते। वे हर पल हमारी नज़रों में और हमारी मारक क्षमता के प्रचंड कोप की जद में हैं। इस अवसर पर, मैं हमारी सेनाओं के अद्वितीय शौर्य को नमन करता हूँ।”

ऑपरेशन सिंदूर: वह अवधारणा जिसने भारत की रणनीतिक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया

— लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल याद रखने की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच में एक मजबूत और निर्णायक बदलाव पर विचार करने का अवसर है। 7 मई 2026 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं—इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को रेखांकित किया। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर को जटिल, बहु-क्षेत्रीय परिदृश्य में भारत के भविष्य के संघर्ष संचालन के रूप में याद किया जाएगा।

इस सफलता के केंद्र में अटूट राजनीतिक स्पष्टता थी। दशकों तक, सीमा पार उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम तक सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम को त्यागने के बजाय उसे परिष्कृत किया—इसने भारत की संवेदनशीलता के साथ शक्ति के प्रयोग की क्षमता को प्रदर्शित किया, सटीक रणनीतिक संदेश दिया और आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक रूप से स्थिति के विस्तार की क्षमता को बनाए रखा। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल निर्णायक कार्रवाई के इरादे का प्रदर्शन किया, बल्कि सैन्य कमांडरों को संचालन में लचीलापन देने का आत्मविश्वास भी दिखाया। उद्देश्य की यह स्पष्टता गति, सटीकता और समन्वय में परिवर्तित हुई—ये तीन विशेषताएं आधुनिक सफल सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं।

भारत की बहु-क्षेत्रीय क्षमताओं का निर्बाध एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण था। आधुनिक युद्ध अब केवल भूमि, समुद्र और वायु तक सीमित नहीं रहा; यह साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर ने इन क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करने की भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। सटीक हमलों में साइबर अभियानों ने पूरक भूमिका निभाई, जिससे विरोधी के संचार और लॉजिस्टिक तंत्र बाधित हुए। विशेष रूप से हमले के बाद नुकसान के आकलन में अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों ने वास्तविक समय की निगरानी और लक्ष्य निर्धारण सुनिश्चित किया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं ने दुश्मन की जवाबी कार्रवाई को कमजोर किया। यह अभियान संयुक्त संचालन क्षमता में परिपक्वता का प्रतीक था—सिर्फ तालमेल से आगे बढ़कर वास्तविक एकीकरण तक।

नागरिक-सैन्य एकीकरण की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; यह पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थानों और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ समन्वय में कार्य किया। स्वदेशी तकनीकों—निगरानी प्रणालियों से लेकर सटीक हथियारों तक—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भरता में निरंतर निवेश के लाभों को दर्शाती हैं। इस अभियान ने भारत की निर्णय-निर्माण संरचना की दक्षता को भी प्रदर्शित किया, जहां अंतर-एजेंसी समन्वय नौकरशाही बाधाओं से प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि साझा उद्देश्य की भावना से प्रेरित रहा।

अभियान से पहले और उसके दौरान भारत की पहलों में रणनीतिक दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई दी। कूटनीतिक संचार ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाइयों को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए—सटीक, आवश्यक और संतुलित।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया एक अनुमानित पैटर्न पर चली। सैन्य दृष्टि से, वह प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करता रहा, जो क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व दोनों से सीमित था। कूटनीतिक रूप से उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया, लेकिन सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था, जहां वास्तविक स्थिति को छिपाने के लिए गलत जानकारी का प्रसार किया गया। फिर भी, विश्वसनीयता और निरंतरता की कमी के कारण ऐसे प्रयास जल्द ही उजागर हो गए।

इस भ्रामक प्रचार का स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामना करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर आक्रामकता का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्पष्ट उकसावे के प्रति संतुलित प्रतिक्रिया थी। इसके उद्देश्य सटीक थे, लक्ष्य वैध थे और क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने अनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया—जो संयम के मूल तत्व हैं। पारदर्शिता और विश्वसनीय संचार के माध्यम से भारत ने गलत कथाओं को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया।

ऑपरेशन सिंदूर से कई महत्वपूर्ण सबक सामने आए हैं। पहला, राजनीतिक इच्छाशक्ति की केंद्रीय भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता—रणनीतिक अस्पष्टता विरोधियों को प्रोत्साहित करती है, जबकि स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास निरंतर जारी रहना चाहिए, विशेषकर साइबर, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश के माध्यम से। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय शक्ति का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।

सूचना युद्ध का क्षेत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। धारणा की लड़ाई निरंतर चलती रहती है। भारत को गलत सूचना की पहचान, उसका मुकाबला और पूर्व-नियोजन की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना होगा। त्वरित और विश्वसनीय संचार के लिए तकनीकी और संस्थागत दोनों प्रकार के साधनों की आवश्यकता है।

यह अभियान रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी रेखांकित करता है। स्वदेशी प्रणालियों ने अपनी प्रभावशीलता सिद्ध की, जिससे बाहरी निर्भरता कम हुई और संचालन की स्वतंत्रता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश आवश्यक है, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा।

साथ ही, यह अभियान अस्थिर सुरक्षा वातावरण में निरंतर तैयार रहने की आवश्यकता को भी उजागर करता है। निरोधक क्षमता स्थिर नहीं होती; इसे प्रदर्शित क्षमता और दृढ़ संकल्प से बनाए रखना पड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर ने एक मानक स्थापित किया है, जिसे बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और सिद्धांत विकास में निरंतर निवेश जरूरी है।

जब भारत इस अभियान की वर्षगांठ पर विचार करता है, तो संदेश स्पष्ट है—यह एक रणनीतिक प्रभाव वाला अभियान था। इसने दिखाया कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों हैं। इसने यह भी सिद्ध किया कि संयम एक विकल्प है—मजबूरी नहीं।

आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहु-क्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के एक उदाहरण के रूप में किया जाएगा, जिसमें मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता की भूमिका स्पष्ट है। इसने अपेक्षाओं को पुनर्परिभाषित किया है—देश के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत किया है: जब राष्ट्रीय संकल्प और क्षमता का संगम होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की विरासत इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास में निहित है जो इसने उत्पन्न किया, उन सबकों में है जो इससे सीखे गए हैं, और उस दिशा में है जो इसने भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए निर्धारित की है। आने वाले समय में विभिन्न रूपों में चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन जब तक देश की राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत शक्तियां एकजुट होकर स्पष्ट उद्देश्य के साथ कार्य करती रहेंगी, तब तक संतुलन भारत के पक्ष में रहेगा।

हमला, घेराबंदी, विजय: ऑपरेशन सिंदूर और वह सिद्धांत जिसे भारत ने 88 घंटों में गढ़ा

एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त)

6–7 मई 2025 की रात, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया—यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, के जवाब में चलाया गया एक योजनाबद्ध और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत के एक नए और पूरी तरह विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। यह सिद्धांत स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता से परिभाषित होता है।

ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से परिभाषित किया और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पहली बार भारत ने ऐसे दुश्मन का सामना किया—और उसे परास्त किया—जो वस्तुतः एक ही मोर्चे पर दो देशों की संयुक्त शक्ति के रूप में सामने आया। चीन ने औपचारिक रूप से दूरी बनाए रखी, लेकिन उसने पाकिस्तान को सैटेलाइट खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समर्थन, साइबर सहायता और PL-15 जैसी ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज’ (BVR) मिसाइलों सहित अग्रिम सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए। इसके बावजूद भारत ने इस संयुक्त चुनौती को हराया।

नियंत्रित युद्ध का सिद्धांत

आधुनिक संघर्षों की सबसे बड़ी विफलता—चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया के संघर्ष—यह रही है कि उनमें कोई स्पष्ट ‘एग्जिट स्ट्रेटेजी’ नहीं होती। लंबे खिंचने वाले युद्ध अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करते हैं, जन-मन को थका देते हैं और न तो स्पष्ट जीत दिलाते हैं और न ही स्थायी शांति। इसके विपरीत, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस जाल से खुद को बचाया और वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएं कर पाती हैं—पहली मिसाइल दागने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय करना।

भारत के उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट थे: आतंकी ढांचे और उन्हें संरक्षण देने वालों को नष्ट करना, दुश्मन को अधिकतम नुकसान पहुंचाना और अपनी शर्तों पर अभियान समाप्त करना—साथ ही नागरिकों को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाना। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने खुफिया जानकारी के आधार पर नौ लक्ष्यों की पहचान की, जो लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नेटवर्क से जुड़े थे। पहला हमला मात्र 23 मिनट में पूरा हुआ और पूरा अभियान 88 घंटों में समाप्त कर दिया गया। इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर किया।

यह सिद्धांत—स्पष्ट उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्रवाई करना और बिना अनावश्यक विस्तार के बाहर निकलना—नियंत्रित युद्ध की एक दुर्लभ शैली है, जिसका अध्ययन आने वाले वर्षों में सैन्य संस्थानों में किया जाएगा।

दुश्मन के गढ़ में गहरी चोट

ऑपरेशन सिंदूर का भौगोलिक दायरा अभूतपूर्व था। भारत ने अपने हमले केवल पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रखे, बल्कि पाकिस्तान के मुख्य भूभाग—विशेषकर पंजाब—के भीतर गहराई तक प्रहार किए। सियालकोट और बहावलपुर जैसे ठिकानों पर सटीक हमले किए गए, जो भारतीय सीमा से 140 किमी से भी अधिक दूर हैं।

बाद में रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और सरगोधा जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी भारत की मारक क्षमता के दायरे में लाया गया। संदेश स्पष्ट था: कोई भी ठिकाना पहुंच से बाहर नहीं है।

100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें IC-814 अपहरण से जुड़ा यूसुफ अजहर, अब्दुल मलिक रऊफ और पुलवामा हमले से जुड़ा मुदस्सिर अहमद शामिल थे। जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के परिवार के 10 सदस्य भी मारे गए। इन हमलों ने आतंकी संगठनों की कमांड संरचना को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।

सबसे अहम बात यह रही कि इस अभियान ने ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की अवधारणा को तोड़ दिया। दशकों से पाकिस्तान परमाणु छत्रछाया का उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करता रहा था, इस धारणा के साथ कि भारत प्रतिक्रिया नहीं देगा। भारत ने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

सीमापार अधिकतम क्षति, देश के भीतर न्यूनतम प्रभाव

जहां अधिकांश युद्धों का प्रभाव सीमाओं से बाहर फैलता है, वहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। भारत ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि अपने देश में इसका प्रभाव लगभग शून्य रहा।

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की चीनी मूल की वायु रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय कर दिया। राफेल जेट, स्कैल्प क्रूज मिसाइल और हैमर प्रिसिजन बमों का इस्तेमाल करते हुए शुरुआती हमले 23 मिनट में पूरे किए गए।

9–10 मई को पाकिस्तान द्वारा जवाबी हमले के बाद भारत ने एक ही समय में 11 एयरबेस पर हमला किया—यह इतिहास में पहली बार था। इसमें पाकिस्तान की वायुसेना की लगभग 20% क्षमता नष्ट हो गई।

भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली—जिसमें S-400, आकाश और MRSAM शामिल हैं—ने पाकिस्तान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को लगभग 100% सफलता के साथ नष्ट कर दिया। यहां तक कि 314 किमी दूर एक पाकिस्तानी AEW&C विमान को मार गिराया गया।

समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण

इस अभियान की सफलता ‘JAI’—संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण—पर आधारित थी। तीनों सेनाओं ने मिलकर बेहतरीन तालमेल के साथ काम किया। नौसेना ने अरब सागर में दबदबा बनाए रखा, वायुसेना ने सटीक हमले किए और थलसेना ने रक्षा को मजबूत किया।

भारत का रक्षा उत्पादन 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹1.54 लाख करोड़ हो गया, जिसमें 65% से अधिक उपकरण देश में ही बन रहे हैं। ब्रह्मोस, आकाश और अन्य स्वदेशी प्रणालियों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका

सैन्य शक्ति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी ली और सेना को स्पष्ट निर्देश दिए: आतंकियों को निशाना बनाओ, लेकिन नागरिकों को नुकसान नहीं होना चाहिए।

सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अन्य रणनीतिक फैसले इस व्यापक नीति का हिस्सा थे, जिससे पाकिस्तान पर दीर्घकालिक दबाव बना।

एकजुट राष्ट्र: ‘Whole-of-Nation’ दृष्टिकोण

यह अभियान केवल सैन्य नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र का संयुक्त प्रयास था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने उपग्रह निगरानी प्रदान की, जबकि अन्य एजेंसियों ने खुफिया समर्थन दिया।

नागरिक प्रशासन, उद्योग और स्टार्टअप्स ने भी योगदान दिया। सूचना युद्ध में भी भारत ने बढ़त बनाई और गलत सूचनाओं को तुरंत खारिज किया।

निष्कर्ष: एक नया मानक

‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक परिपक्व रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। इसने दिखाया कि आत्मनिर्भरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्णायक जीत हासिल कर सकता है।

हालांकि, आगे की चुनौतियां बनी हुई हैं—फाइटर स्क्वाड्रन बढ़ाना, ड्रोन क्षमता मजबूत करना और रक्षा बजट को बढ़ाना आवश्यक होगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने एक नया मानक स्थापित किया है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त बनी रहे—क्योंकि विरोधी भी सीख रहे हैं और स्थिर नहीं रहेंगे।

रक्षा मंत्रालय–भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड के बीच 1,476 करोड़ का रक्षा सौदा

दिल्ली/सत्ता संदेश

रक्षा मंत्रालय ने हैदराबाद स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ भारतीय सेना के लिए 1,476 करोड़ रुपये की लागत से पांच ग्राउंड-बेस्ड (ज़मीन पर स्थित) मोबाइल (एक से दूसरे स्थान तक ले जाये जाने में सक्षम) इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की खरीद के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं, जो न्यूनतम 72 प्रतिशत स्वदेशी उपकरणों से युक्‍त होंगे। स्वदेशी डिजाइन के आधार पर विकास और निर्माण श्रेणी (बाय इंडिया-इंडिजिनली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) के तहत इस अनुबंध पर आज नई दिल्ली के कर्तव्य भवन-दो में रक्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये गए।

इस प्रणाली से भारतीय सेना की इकाइयों का आधुनिकीकरण होगा और यह देश के स्वदेशी रक्षा विनिर्माण तंत्र को सुदृढ़ बनाएगा। यह अनुबंध रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत और प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की मेक-इन-इंडिया के प्रति प्रतिबद्धता और पुष्‍ट करता है।

भारत का ऑपरेशन सिंदूर: रणनीतिक जीत का एक वर्ष
  • मेजर जनरल रवि मुरुगन (सेवानिवृत्त)

आज से एक साल पहले, 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसने केवल नीति की घोषणा से आगे बढ़कर उसे निर्णायक कार्रवाई में बदल दिया। यह भारत की धरती पर दशकों से जारी पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ जवाब देने के तरीके में एक बड़ा बदलाव था। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर भारत के उस लंबे संघर्ष में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया, जिसमें पाकिस्तान द्वारा गैर-राज्य तत्वों को प्रॉक्सी हिंसा के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का जवाब दिया गया।

इस अभियान के पीछे भारत का राजनीतिक इरादा पूरी तरह स्पष्ट और दृढ़ था। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पाकिस्तान-प्रशिक्षित आतंकवादियों के बर्बर हमले में 26 निर्दोष लोगों की मौत के बाद भारत की प्रतिक्रिया केवल प्रतीकात्मक या सीमित नहीं थी। यह पूरी तरह योजनाबद्ध, समयबद्ध और स्पष्ट उद्देश्य वाली कार्रवाई थी। 88 घंटे तक चले इस अभियान ने साफ दिखाया कि भारत ने तय लक्ष्यों के साथ संगठित जवाबी रणनीति अपनाई और अपने उद्देश्यों को पूरा करने के बाद अपनी शर्तों पर इसे समाप्त किया।

राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से इस अभियान की दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहली, हमलों का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक था। लक्ष्य केवल नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब के अंदरूनी क्षेत्रों तक भी पहुंचे। यह एक सोची-समझी रणनीतिक पहल थी, जिसने पाकिस्तान की कथित परमाणु सीमाओं और उसकी प्रतिरोधक नीति को सीधे चुनौती दी।

दूसरा, इस अभियान ने दिखाया कि आज के सूचना युग के युद्धों में तकनीक कितनी केंद्रीय भूमिका निभाती है। क्रूज़ मिसाइलों, लोइटरिंग हथियारों, नेटवर्क-आधारित प्रणालियों और बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा प्रणाली के उपयोग ने स्पष्ट किया कि अब युद्ध सटीकता, गति और बेहतर समन्वय तथा युद्धक्षेत्र की समझ पर आधारित हैं। ऑपरेशन सिंदूर केवल जवाबी कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह भारत की उस नई युद्ध रणनीति का प्रदर्शन भी था, जिसमें दूर से मार करने की क्षमता, तेज निर्णय प्रक्रिया और कई मोर्चों पर एकीकृत कार्रवाई प्रमुख है।

7 मई 2025 को शुरू हुआ यह अभियान पाकिस्तान के भीतर मौजूद आतंकी ढांचे पर तेज, सटीक और योजनाबद्ध कार्रवाई था। यह भारत की समन्वित सैन्य क्षमता का नियंत्रित लेकिन अत्यंत प्रभावशाली प्रदर्शन था, जिसका उद्देश्य दुश्मन पर कीमत थोपना था, बिना संघर्ष को अनावश्यक रूप से बढ़ाए। एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर भारत की बढ़ती रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण माना जाता है—अर्थात, परमाणु शक्ति से लैस दुश्मन को जवाबदेह बनाने की क्षमता, वह भी स्पष्ट उद्देश्य, दृढ़ संकल्प और संतुलित रणनीति के साथ।

आज के कई युद्ध जहां लंबे और अनिर्णायक बन जाते हैं, वहीं ऑपरेशन सिंदूर स्पष्ट लक्ष्यों और ठोस कार्रवाई के कारण अलग दिखाई देता है। इसका राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट था—आतंकवाद के ढांचे और उसे समर्थन देने वालों पर सीधा और प्रभावी प्रहार करना। लक्ष्य प्राप्त होते ही अभियान को सीमित रखा गया। टारगेट चयन में भी संयम और दृढ़ता दोनों दिखाई दिए। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों से जुड़े महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया, ताकि उनकी क्षमता कमजोर हो, लेकिन आम नागरिकों को नुकसान और सहायक क्षति न्यूनतम रहे।

सैन्य संचालन के स्तर पर यह अभियान भारत की दूर से सटीक प्रहार करने की युद्ध क्षमता के परिपक्व होने का संकेत था। लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों और प्रिसीजन हथियारों से लैस राफेल, साथ ही ब्रह्मोस प्रणाली से जुड़े सुखोई SU-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म ने व्यापक दायरे में गहराई तक समन्वित हमले संभव बनाए। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से आगे बढ़कर पाकिस्तान के पंजाब के भीतर तक कार्रवाई का विस्तार इस बात का संकेत था कि भारत ने अपनी पुरानी स्व-निर्धारित सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए कथित सुरक्षित ठिकानों को भी चुनौती दी।

इस अभियान की रक्षा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। एकीकृत वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियों ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए किसी भी जवाबी हमले को प्रभावी ढंग से विफल कर दिया। आक्रामक क्षमता और मजबूत रक्षात्मक सुरक्षा के इस संयोजन ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि आधुनिक युद्ध में नेटवर्क-आधारित समन्वय और बहु-स्तरीय सुरक्षा कितनी आवश्यक हो चुकी है।

रणनीतिक सिद्धांत के स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर ने एक साथ तीन महत्वपूर्ण सीमाएं पार कीं—जिम्मेदार लक्ष्य चयन, संतुलित सैन्य शक्ति का उपयोग और स्पष्ट दबावकारी संदेश। इसने दिखाया कि जब कार्रवाई स्पष्ट राजनीतिक इरादे, सटीक सैन्य लक्ष्यों और मजबूत प्रतिरोधक क्षमताओं के साथ की जाए, तो दुश्मन को दंडित किया जा सकता है बिना स्थिति को अनियंत्रित युद्ध में बदले। भारत ने युद्ध के दायरे को पूरी तरह बढ़ाने के बजाय उसे सीमित लेकिन प्रभावशाली ढंग से बढ़ाया, जिससे पूर्ण युद्ध से बचते हुए भी दुश्मन पर ठोस कीमत थोपी गई।

इस अभियान की एक और बड़ी विशेषता थी—तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और पूरे रक्षा तंत्र का एकीकृत संचालन। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की स्थापना के बाद विकसित नए रक्षा ढांचे का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। समुद्री मोर्चा, हवाई शक्ति और जमीनी लक्ष्य—ये अलग-अलग अभियान नहीं थे, बल्कि एक ही संयुक्त रणनीति के हिस्से थे।

इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बढ़ती ताकत ने और मजबूत बनाया। स्वदेशी प्लेटफॉर्म, प्रिसीजन हथियार प्रणालियां, काउंटर-ड्रोन तकनीक और ISR (इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस) जैसी घरेलू क्षमताओं की बढ़ती भूमिका ने दिखाया कि भारत धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से रक्षा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। इस तरह, ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारत की औद्योगिक और तकनीकी गहराई का भी प्रमाण था। अब मजबूत रक्षा तैयारी सीधे तौर पर देश की औद्योगिक क्षमता से जुड़ चुकी है।

कूटनीतिक स्तर पर भी यह अभियान बेहद सोच-समझकर चलाया गया। भारत ने अपनी कार्रवाइयों को आतंकवाद के खिलाफ जवाब और आत्मरक्षा के दायरे में प्रस्तुत किया, जिससे ऑपरेशन सिंदूर के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नैतिक और रणनीतिक आधार तैयार हुआ। सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक संदेशों के बीच यह तालमेल भारत के लिए रणनीतिक स्पेस बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

अंततः, ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी विशेषता उसका सही समय पर और स्पष्ट तरीके से समापन था। अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद भारत ने तय समय-सीमा के भीतर अभियान रोक दिया, जिससे वह उन लंबे और दिशाहीन संघर्षों से बचा रहा जो आज कई आधुनिक युद्धों की पहचान बन चुके हैं। इसकी शुरुआत, संचालन और समाप्ति—तीनों में दिखाई गई स्पष्टता और सटीकता ही इस अभियान की सबसे बड़ी पहचान रही।

एक साल बाद, ऑपरेशन सिंदूर की वास्तविक विरासत केवल दुश्मन को हुए नुकसान में नहीं, बल्कि उस नई मिसाल में है जो इसने स्थापित की। इसने दिखाया कि संतुलित, तकनीक-सक्षम और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा निर्देशित सैन्य कार्रवाई दुश्मन पर भारी कीमत थोप सकती है, उसकी रणनीति बदल सकती है और फिर भी नियंत्रण के दायरे में रह सकती है। यह परमाणु जोखिम के बीच सीमित युद्ध के लिए भारत के उभरते मॉडल को दर्शाता है—इरादों में मजबूत, कार्रवाई में सटीक और संयम में अनुशासित।

तकनीक आधारित युग में भविष्य के लिए अनुसंधान और नवाचार जरुरी : राजनाथ सिंह

दिल्ली/सत्ता संदेश

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने तीव्र तकनीकी क्रांति के वर्तमान युग में भविष्य के लिए तैयार रहने हेतु अनुसंधान पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने और अप्रत्याशित नवाचार की रणनीति अपनाने के महत्व पर बल दिया। रक्षामंत्री ने 4 मई को प्रयागराज में भारतीय सेना की उत्तरी एवं मध्य कमान तथा भारतीय रक्षा निर्माता सोसायटी द्वारा आयोजित तीन दिवसीय नॉर्थ टेक संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में रक्षा कर्मियों, उद्योगपतियों, नवप्रवर्तकों, स्टार्टअप्स और शिक्षा जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए यह विचार व्‍यक्‍त किए।

उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष में, युद्ध का स्वरूप महज तीन-चार सालों में टैंकों और मिसाइलों से बदलकर ड्रोन और सेंसर जैसे क्रांतिकारी उपकरणों में परिवर्तित हो गया। इसके अलावा, दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी वस्‍तुएं भी घातक हथियार बनती जा रही हैं।

रक्षामंत्री ने बताया कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योग, शिक्षा जगत और स्टार्टअप्स को आवंटित किया गया है और अब तक इन संस्थाओं ने बजट का 4,500 करोड़ रुपये से अधिक का उपयोग कर लिया है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की एक नई नीति लागू की गई है, जिसके अंतर्गत विकास-सह-उत्पादन साझेदारों, विकास साझेदारों और उत्पादन एजेंसियों के लिए पहले लगने वाला 20 प्रतिशत शुल्क पूरी तरह से माफ कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, डीआरडीओ ने अब तक विभिन्न उद्योगों को 2,200 से अधिक प्रौद्योगिकियां हस्तांतरित की हैं।

रक्षा मंत्री ने रक्षा त्रिवेणी संगम- जहां प्रौद्योगिकीउद्योग और सैन्य शक्ति का संगम होता है विषय पर आधारित नॉर्थ टेक संगोष्ठी को नवाचार को बढ़ावा देने और भारत की तकनीकी एवं रक्षा तैयारियों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने सभी हितधारकों को अपने प्रदर्शन को और बेहतर बनाने में सक्षम बनाने के लिए ठोस सुझावों की आशा व्‍यक्‍त की। उन्होंने हितधारकों को विशेषज्ञता साझा करने और उभरते एवं अनछुए क्षेत्रों में सामूहिक रूप से क्षमताओं को बढ़ाने में सक्षम बनाने के लिए एक ज्ञान गलियारे के निर्माण का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यह हमारा सामूहिक प्रयास है कि हम आने वाले समय में विश्व की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति के रूप में खुद को स्थापित करें।

संगोष्ठी के भाग के रूप में, एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसमें लघु एवं मध्यम उद्यमों, निजी रक्षा प्रौद्योगिकी फर्मों, स्टार्टअप्स और वर्दीधारी नवोन्मेषकों सहित विभिन्न प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत स्वदेशी समाधानों को प्रदर्शित किया गया। 284 कंपनियों ने अपने नवीनतम नवाचारों और प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शित करने के लिए स्टॉल लगाए।