ब्रेकिंग न्यूज़
Ludhiana : वरुण रूजम ने जांचे 270 वोटर फॉर्म, फील्ड विजिट में 50 आवेदन सही मिले

लुधियाना में इलेक्टोरल रोल ऑब्जर्वर वरुण रूजम ने 270 वोटर फॉर्म की भौतिक जांच की। फील्ड विजिट के दौरान नए वोट और वोटर कार्ड सुधार के 50 आवेदन सही पाए गए।

लुधियाना / सत्ता संदेश

दिनांक : 8 अक्टूबर 2026

वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सुचारू बनाने के लिए इलेक्टोरल रोल ऑब्जर्वर वरुण रूजम, IAS, ने लुधियाना जिले के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से संबंधित मतदाता फॉर्म की जांच की। इस दौरान उन्होंने कुल 270 फॉर्म की भौतिक जांच की, जबकि फील्ड विजिट के दौरान नए वोट बनवाने और वोटर कार्ड में सुधार से संबंधित 50 अन्य फॉर्म भी चेक किए। ये सभी 50 फॉर्म सही पाए गए।

लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में संबंधित इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों के साथ आयोजित बैठक में वरुण रूजम ने विधानसभा क्षेत्र 57-खन्ना, 58-समराला, 59-साहनेवाल, 60-लुधियाना ईस्ट, 61-लुधियाना साउथ, 62-आतम नगर और 67-पायल से संबंधित फॉर्म नंबर 6, 6A, 7 और 8 की विस्तृत जांच की। कुल 270 आवेदनों की जांच के साथ उन्होंने मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया की भी समीक्षा की।

इसके अतिरिक्त, फील्ड विजिट के दौरान नए मतदाता पंजीकरण और वोटर कार्ड में सुधार के लिए भरे गए फॉर्म नंबर 6 और 8 के 50 आवेदनों की जांच की गई। जांच में सभी फॉर्म सही पाए गए।

इस दौरान विभिन्न पोलिंग क्षेत्रों में बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) की ओर से किए जा रहे कार्यों की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों का काम संतोषजनक पाया गया।

इलेक्टोरल रोल ऑब्जर्वर वरुण रूजम ने संबंधित अधिकारियों और BLOs को निर्देश दिया कि मतदाता सूची से जुड़े सभी कार्य निर्धारित नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार पारदर्शी ढंग से पूरे किए जाएं, ताकि मतदाता पंजीकरण और वोटर कार्ड में सुधार की प्रक्रिया में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

SIR कराना चुनाव आयोग का अधिकार…मतदाता सूची पुनरीक्षण की वैधता पर SC की मुहर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

बिहार में चुनाव आयोग के एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ दाखिल याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग के पास एसआईआर करने का अधिकार है। उसने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है। कोर्ट का कहना है कि आयोग ने बिहार की वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन का आदेश देकर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन नहीं किया। इस तरह के अभ्यास से वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित हुई और निष्पक्ष चुनाव में मदद भी मिली।

NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स समेत कई संगठनों और लोगों की ओर से दायर याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाओं के इस समूह में SIR से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। खासतौर से बिहार में आयोग द्वारा निर्देशित गहन पुनरीक्षण से यह चुनौती मूल रूप से संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21(3) के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए चुनाव आयोग के उस फैसले से पैदा हुई है, जिसमें बिहार के सभी विधानसभा क्षेत्रों में एसआईआर का निर्देश दिया गया था।

 अहम मुद्दों पर विश्लेषण जरूरी

“बिहार में जनसांख्यिकीय भिन्नताओं, शहरीकरण और बड़े पैमाने पर लोगों के इधर-उधर जाने के कारण वोटर लिस्ट में पर्याप्त परिवर्तन होने की वजह से यह प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया गया था. इसलिए, चुनावी प्रक्रिया की अखंडता की रक्षा करने, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने बिहार से इसे शुरू किया और फिर राष्ट्रव्यापी विशेष पुनरीक्षण करने का संकल्प लिया”

CJI सूर्यकांत ने फैसला सुनाते हुए आगे कहा कि दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार करने और घटनाक्रमों का अवलोकन करने के बाद पक्षों की ओर से पेश दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इन 3 अहम मसलों का विश्लेषण आवश्यक है।

SIR से निष्पक्ष चुनाव में मदद मिलीः SC

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि आयोग ने बिहार में एसआईआर का आदेश देकर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि इस तरह के अभ्यास से वोटर लिस्ट की शुद्धता हुई, साथ ही स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव में मदद भी मिली। कोर्ट ने आगे कहा कि हम इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट हैं कि एसआईआर द्वारा प्राप्त किया जाने वाला मकसद स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य से सीधा जुड़ा हुआ है।

कोर्ट ने आगे कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव महज मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते. वे असल में की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं।

“आयोग द्वारा दर्ज किए गए कारण, यानी अंतिम गहन संशोधन के बाद से चार 4 से अधिक का समय बीत जाना, कई सालों से बड़े पैमाने पर नामों का जुड़ना और हटना, तीव्र शहरीकरण, प्रवासन और इसके परिणामस्वरूप मतदाता सूचियों में पुनरावृत्ति और अशुद्धियों की संभावना, स्पष्ट रूप से उस मूलभूत सत्यनिष्ठा को बनाए रखने की दिशा में निर्देशित हैं।

आयोग के SIR कराने का अधिकारः SC

देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सुनाया है कि आयोग को एसआईआर अभ्यास आयोजित करने का अधिकार था और उसने किसी भी वैधानिक या संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया। इस सबके पीछे का मकसद स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से है।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस प्रक्रिया से पहले से रजिस्टर्ड लोगों की नागरिकता की अनुमानित मान्यता समाप्त हो जाती है। कोर्ट ने राजनीतिक दलों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा एसआईआर को चुनौती देने वाले इस आम तर्क को भी खारिज कर दिया कि यह एक बहिष्करणकारी प्रक्रिया है।

4 हफ्ते में काटे गए लोगों के नाम भेजेंः SC

कोर्ट ने आगे कहा कि वोटर स्थिति को साबित करने के लिए निर्धारित दस्तावेज आम तौर पर हर वोटर्स के पास उपलब्ध होते हैं और वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करने के काम से इनका सीधा संबंध है। साथ ही कोर्ट ने आयोग से संदिग्ध नागरिकता के कारण वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों के नाम 4 हफ्ते के अंदर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने को कहा है, जो उनकी नागरिकता निर्धारित करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया अपनाएगा।

नागरिकता से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग वोटर लिस्ट में शामिल करने या बाहर करने के उद्देश्य से नागरिकता पर सीमित जांच कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग किसी मतदाता की नागरिकता का निर्धारण नहीं कर सकता। वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए आयोग द्वारा नागरिकता का निर्धारण फाइनल नहीं है , क्योंकि संदिग्ध वोटर को लिस्ट से हटाए जाने के बाद पर्याप्त अवसर देने के बाद केंद्र सरकार द्वारा इसकी पूरी तरह से जांच की जानी आवश्यक है।