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लोकसभा में 543 से 850 तक हो सकती हैं सीटें? परिसीमन पर फिर चर्चा, यूपी-बिहार से दक्षिण भारत तक बदलेगा प्रतिनिधित्व

लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव, 50% बढ़ोतरी फॉर्मूले और परिसीमन की बहस को समझें। जानें यूपी, बिहार, तमिलनाडु और अन्य राज्यों पर संभावित असर।

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन की प्रक्रिया में बदलाव को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इस दौरान संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक को दोबारा आगे बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, 22 अक्टूबर तक विशेष सत्र की तारीख और विधायी एजेंडे की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 करने का प्रस्ताव और सीटों में संभावित 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का फॉर्मूला है। मौजूदा लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें हैं। यदि 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का मॉडल लागू होता है, तो सदस्यों की संख्या करीब 815 से 816 तक पहुंच सकती है। वहीं, प्रस्तावित संवैधानिक बदलाव के तहत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 करने की बात कही गई थी।

लेकिन सवाल सिर्फ सीटें बढ़ने का नहीं है। असली बहस इस बात पर है कि नए परिसीमन में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व किस अनुपात में बदलेगा और क्या सभी राज्यों में प्रति सांसद आबादी का अंतर कम हो पाएगा।

अप्रैल में क्यों अटक गया था परिसीमन का प्रस्ताव?

केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने, परिसीमन की व्यवस्था बदलने और महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया से जुड़े तीन विधेयक पेश किए थे। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक शामिल थे।

17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मतदान हुआ। इसे 298 सदस्यों का समर्थन मिला, जबकि 230 सदस्यों ने विरोध में मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद संबंधित दो विधेयकों पर भी आगे की कार्यवाही नहीं हुई।

अब दोबारा विधायी पहल की चर्चाओं के बीच यह देखना अहम होगा कि सरकार नए प्रस्ताव में राज्यों के प्रतिनिधित्व और सीटों की बढ़ोतरी को लेकर क्या व्यवस्था रखती है। फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार ने जरूरी बहुमत जुटा लिया है या विधेयक निश्चित रूप से पारित हो जाएगा।

50% फॉर्मूला लागू हुआ तो कितनी बढ़ सकती हैं सीटें?

50 प्रतिशत बढ़ोतरी के मॉडल के तहत राज्यों की मौजूदा लोकसभा सीटों में संभावित बदलाव का अनुमान इस प्रकार है। ये आंकड़े केवल गणना पर आधारित हैं, अंतिम प्रस्तावित या स्वीकृत सीटों की सूची नहीं हैं।

राज्यमौजूदा सीटें50% बढ़ोतरी के हिसाब से संभावित सीटें
उत्तर प्रदेश80120
बिहार4060
महाराष्ट्र4872
पश्चिम बंगाल4263
मध्य प्रदेश29लगभग 44
राजस्थान25लगभग 38
तमिलनाडु39लगभग 59
कर्नाटक2842

इन अनुमानों में अलग-अलग राज्यों की सीटों को 1.5 से गुणा किया गया है और जहां जरूरी है, वहां संख्या को निकटतम पूर्णांक में दर्शाया गया है। अंतिम वितरण परिसीमन की स्वीकृत व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

गृह मंत्री अमित शाह ने अप्रैल में बहस के दौरान कहा था कि सभी राज्यों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी के मॉडल से दक्षिण भारत के पांच राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल सीटों में उनका हिस्सा लगभग 24 प्रतिशत बना रह सकता है। हालांकि, यह उस समय सरकार की ओर से रखा गया राजनीतिक आश्वासन था, लागू हो चुका कानूनी प्रावधान नहीं। <Cite refs={[“turn265468search0”]}/>

बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रति सांसद आबादी ज्यादा क्यों?

लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने का एक बड़ा तर्क यह है कि मौजूदा व्यवस्था में एक सांसद को बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है। लेकिन सभी राज्यों की जनसंख्या एक जैसी गति से नहीं बढ़ी है। इसी कारण समान प्रतिशत से सीटें बढ़ाने के बाद भी प्रति सांसद आबादी का अंतर बना रह सकता है।

दिए गए 2026 के जनसंख्या अनुमानों और 50 प्रतिशत बढ़ोतरी के मॉडल के आधार पर:

  • बिहार: करीब 13.23 करोड़ की अनुमानित आबादी और 60 सीटों के हिसाब से प्रति सांसद लगभग 22 लाख लोग होंगे।
  • उत्तर प्रदेश: करीब 24.29 करोड़ की अनुमानित आबादी और 120 सीटों के हिसाब से प्रति सांसद लगभग 20.2 लाख लोग होंगे।
  • महाराष्ट्र: लगभग 72 सीटों के मॉडल में प्रति सांसद आबादी करीब 18 लाख के आसपास हो सकती है।
  • पश्चिम बंगाल: 63 सीटों के मॉडल में प्रति सांसद लगभग 16 लाख से कुछ अधिक लोग हो सकते हैं।
  • तमिलनाडु: 59 सीटों के मॉडल में प्रति सांसद आबादी लगभग 13 लाख के आसपास रह सकती है।
  • कर्नाटक: 42 सीटों के मॉडल में प्रति सांसद आबादी करीब 16 लाख के आसपास हो सकती है।

ये आंकड़े जनसंख्या अनुमानों पर आधारित हैं, जनगणना के अंतिम आंकड़े नहीं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि सीटों में एक समान प्रतिशत की बढ़ोतरी अपने आप सभी राज्यों में प्रति सांसद आबादी को बराबर नहीं करेगी।

परिसीमन पर उत्तर-दक्षिण बहस क्यों तेज है?

परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व से जुड़ी सीटों के पुनर्निर्धारण से है। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे पर 1971 की जनगणना के आधार पर रोक लागू रही है, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का अंतिम व्यापक पुनर्निर्धारण 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ था। सीटों के अंतरराज्यीय बंटवारे पर लगी रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना से जुड़ी व्यवस्था तक रखा गया था।

इस व्यवस्था के पीछे जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण रहा है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के प्रयास किए। दूसरी ओर, उत्तर भारत के कुछ राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही।

ऐसे में यदि सीटों का बंटवारा केवल नई जनसंख्या के अनुपात पर किया जाता है, तो अधिक आबादी वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को आशंका है कि कुल सीटों में उनका हिस्सा घट सकता है, भले ही उनकी अपनी सीटों की संख्या बढ़ जाए।

इसी वजह से परिसीमन की बहस में यह सवाल अहम है कि प्रतिनिधित्व का आधार केवल जनसंख्या हो या राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अन्य संवैधानिक व्यवस्थाओं पर भी विचार किया जाए।

2011 की जनगणना से सीटें बांटी गईं तो क्या होगा?

परिसीमन से जुड़े अप्रैल 2026 के विधेयकों में प्रकाशित जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण की व्यवस्था प्रस्तावित थी। PRS Legislative Research के विश्लेषण के अनुसार, यदि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या मौजूदा स्तर पर रखी जाए और 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों का प्रतिनिधित्व दोबारा तय हो, तो उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 89 और बिहार की 40 से बढ़कर 46 हो सकती हैं। इसके विपरीत, तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर 32 और केरल की 20 से घटकर 15 हो सकती हैं।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि कुल सीटों की संख्या स्थिर रखने और सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी करने वाले मॉडल के परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी राज्य को होने वाले वास्तविक लाभ या नुकसान का आकलन प्रस्तावित नियमों, जनगणना के आधार और अंतिम सीट वितरण को देखे बिना नहीं किया जा सकता।

850 सीटें होने पर एक सांसद पर कितनी आबादी होगी?

भारत की आबादी करीब 140 करोड़ मानकर एक सामान्य गणना करें, तो 850 सांसदों के हिसाब से प्रति सांसद लगभग 16.47 लाख लोग आते हैं। मौजूदा 543 सीटों के हिसाब से यह संख्या लगभग 25.78 लाख होगी।

यह केवल राष्ट्रीय औसत है। वास्तविकता में किसी निर्वाचन क्षेत्र की आबादी, राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे और परिसीमन की प्रक्रिया के कारण प्रति सांसद आबादी अलग-अलग हो सकती है।

अंतरराष्ट्रीय तुलना करते समय भी संबंधित देशों की संसद की संरचना, निर्वाचन क्षेत्रों और जनसंख्या के नवीनतम आंकड़ों को एक ही आधार पर देखना जरूरी है। केवल सांसदों की संख्या से अलग-अलग देशों में प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

आगे क्या होगा?

लोकसभा की सीटें बढ़ाने और परिसीमन के प्रस्ताव पर अगला कदम सरकार की आधिकारिक घोषणा और विधेयकों के वास्तविक मसौदे पर निर्भर करेगा। अप्रैल में पेश विधेयक आवश्यक विशेष बहुमत नहीं जुटा पाए थे। अब यदि सरकार इन्हें दोबारा पेश करती है, तो राज्यों के प्रतिनिधित्व, जनसंख्या के आधार और दक्षिण भारत की आशंकाओं पर फिर बहस होने की संभावना है।

फिलहाल 850 सीटों की सीमा और 50 प्रतिशत बढ़ोतरी को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। वास्तविक सीटों की संख्या और राज्यों के हिस्से का निर्धारण तभी स्पष्ट होगा, जब संबंधित कानून पारित हों और परिसीमन की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो।