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Punjab Stubble Burning: पराली जलाने के मामलों में 2022 के मुकाबले करीब 90% गिरावट, मशीनों पर सब्सिडी से बढ़ा विकल्प

पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं 2022 के 49,922 से घटकर 2025 में 5,114 रह गईं। जानिए 2026 के आंकड़े, कृषि मशीनों पर सब्सिडी और पराली प्रबंधन की योजनाएं।

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

सर्दियों की शुरुआत के साथ दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण और पराली जलाने को लेकर चर्चा तेज हो जाती है। इस बहस में पंजाब का नाम प्रमुखता से आता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े राज्य में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी की ओर इशारा करते हैं। पंजाब सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में पराली जलाने की 49,922 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2025 में इनकी संख्या घटकर 5,114 रह गई। इस तरह 2022 के मुकाबले 2025 में घटनाओं में करीब 90 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।

हालांकि, चालू सीजन में पराली जलाने की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। 23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में 22 अक्टूबर तक 510 घटनाएं दर्ज की गई थीं। ऐसे में पराली प्रबंधन के लिए अपनाए जा रहे उपायों के साथ मौजूदा सीजन की स्थिति पर नजर रखना भी जरूरी है।

मध्य प्रदेश में पंजाब से ज्यादा घटनाएं

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के CREAMS कार्यक्रम के 6 अक्टूबर 2026 के बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में फसल अवशेष जलाने की कुल 287 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें मध्य प्रदेश में 118, पंजाब में 88 और उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं सामने आईं।

ये आंकड़े बताते हैं कि पराली जलाने की समस्या केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में धान की खेती का विस्तार, फसल कटाई का समय और अवशेषों के प्रबंधन की उपलब्ध सुविधाएं इस चुनौती को प्रभावित करती हैं। हालांकि, अलग-अलग तारीखों और निगरानी प्रणालियों के आंकड़ों की तुलना करते समय उनके स्रोत और गणना के तरीके को ध्यान में रखना आवश्यक है।

कृषि मशीनों पर सब्सिडी से किसानों को मदद

पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कृषि मशीनों पर सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। योजना के तहत व्यक्तिगत किसानों को मशीनों की खरीद पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटरों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों को पात्रता के अनुसार 80 प्रतिशत तक सहायता मिल सकती है।

कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, चालू खरीफ सीजन में किसानों ने 21 हजार से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें खरीदी हैं। इनमें सुपर सीडर की संख्या सबसे अधिक रही है। इसके अलावा मल्चर, हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एमबी प्लाऊ, जीरो टिल ड्रिल, बेलिंग मशीन और स्ट्रॉ रेक जैसी मशीनों का भी उपयोग किया जा रहा है।

इन मशीनों की मदद से किसान पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाने, उसके बीच अगली फसल की बुवाई करने या उसे इकट्ठा करके दूसरे उपयोगों के लिए भेजने जैसे विकल्प अपना सकते हैं।

पराली प्रबंधन के लिए 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना

पंजाब सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए फसल अवशेष प्रबंधन के मद में 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की है। इसके तहत मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, किसानों को तकनीकी सहायता देने और पराली के वैकल्पिक उपयोग को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है।

इससे पहले 2025 के सीजन में आधुनिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के लिए लगभग 395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। सरकारी प्रयासों का उद्देश्य किसानों को ऐसे व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना है, जिनसे धान की कटाई के बाद खेतों को समय पर गेहूं की बुवाई के लिए तैयार किया जा सके।

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच कम समय

किसानों के सामने पराली प्रबंधन की चुनौती केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिए समय कम मिलता है। ऐसे में खेत से पराली हटाने, मशीनों का इंतजाम करने और अवशेषों को दूसरी जगह पहुंचाने में अतिरिक्त खर्च आता है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह चुनौती अधिक हो सकती है।

इसलिए पराली जलाने की घटनाओं में कमी लाने के लिए निगरानी और कानूनी कार्रवाई के साथ सस्ती मशीनों की उपलब्धता, साझा मशीन केंद्रों और किसानों को समय पर तकनीकी सहायता देना भी महत्वपूर्ण है।

बायोगैस और बायो-CNG में भी संभावनाएं

धान की पराली का उपयोग बायोगैस, बायो-CNG, बिजली उत्पादन और अन्य औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जा सकता है। यदि किसानों को पराली के लिए नियमित खरीदार, उचित कीमत और किफायती परिवहन की सुविधा मिलती है, तो फसल अवशेष उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का स्रोत बन सकते हैं।

हालांकि, इससे होने वाली आय पराली की मात्रा, बाजार में मांग, परिवहन खर्च और संबंधित परियोजनाओं की उपलब्धता पर निर्भर करती है। इसलिए ऐसे विकल्पों को बड़े स्तर पर विकसित करना पराली प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

किसानों की भागीदारी के बिना संभव नहीं समाधान

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्षों के मुकाबले आई कमी के पीछे सरकारी योजनाओं, कृषि मशीनों की उपलब्धता, निगरानी और किसानों की भागीदारी जैसे कई कारक महत्वपूर्ण हैं। केवल किसी एक योजना को इसका पूरा श्रेय देना उचित नहीं होगा।

आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पराली प्रबंधन के विकल्प हर किसान तक समय पर पहुंचें और उनका उपयोग आर्थिक रूप से व्यावहारिक बना रहे। इसके साथ ही चालू सीजन के आंकड़ों की नियमित निगरानी भी जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि पिछले वर्षों में दर्ज सुधार को आगे भी बनाए रखा जा रहा है या नहीं।