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आकांक्षाओं का गणित: भारत में रोजगार का सवाल अब स्थिरता पर क्यों निर्भर है

जब 1954 में सर आर्थर लुईस ने गरीब अर्थव्यवस्थाओं के अमीर बनने की परिघटना को समझाने का काम शुरू किया, तो उन्होंने विकास की मुख्य प्रक्रिया को पूंजी के संचय के रूप में नहीं बल्कि कामगारों के जीवन-निर्वाह वाली खेती से हटकर अधिक कमाई वाले उद्योगों एवं
सेवा क्षेत्रों की ओर मुड़ने के तौर पर पहचाना। उनका यह अनुमान बिल्कुल ही सही था कि यही बदलाव देर से औद्योगीकरण करने वाले हर देश का भविष्य तय करेगा। आज भारत ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है और नीति-निर्माताओं के सामने सवाल पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध कराने भर का नहीं है। बल्कि, उनके सामने इससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियां पैदा करने की स्थिति में है या नहीं जो पर्याप्त तादाद में हों, औपचारिक हों और एक युवा कामगार को जीवन भर बढ़ती उत्पादकता एवं सुरक्षा दे सकने लायक टिकाऊ हों।

इस जिम्मेदारी के भार को काफी सटीकता से बताया जा सकता है। ‘आर्थिक समीक्षा 2023-24’ ने ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे)’ और आबादी से जुड़े अनुमानों के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि इस दशक की बाकी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को हर वर्ष लगभग 78.5 लाख गैर-कृषि नौकरियां सृजित करनी होंगी। यह आंकड़ा दो बढ़ते दबावों का नतीजा है: पहला, कामकाज के क्षेत्र में लोगों की भागीदारी बढ़ने के साथ श्रमशक्ति में हो रही लगातार बढ़ोतरी; और दूसरा, संरचनात्मक बदलाव के कारण खेती से बाहर आने वाले
कामगार। रोजगार में खेती की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 46 प्रतिशत है। वर्ष 2047 तक इस हिस्सेदारी के घटकर एक-चौथाई तक आ जाने की संभावना है।

जुलाई 2025 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई और उसके अगले महीने से शुरू हुई ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’ उस अंतर को पाटने की अब तक की सबसे सोची- समझी कोशिश है। इस योजना के तहत, जुलाई 2027 तक की दो वर्षों की अवधि में 3.5 करोड़ से अधिक औपचारिक नौकरियां सृजित करने हेतु ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ)’ के जरिए 99,446 करोड़ रुपये लगाए जा रहे हैं। ईपीएफओ में पंजीकृत किसी कंपनी में पहली बार शामिल होने वाला और महीने में एक लाख रुपये से कम कमाने वाला कामगार, दो किस्तों
में कुल 15,000 रुपये तक पाने का हकदार बन जाता है। दूसरी किस्त वित्तीय साक्षरता पाठ्यक्रम (फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स) करने पर और बचत (सेविंग्स) के तौर पर मिलती है। वहीं, निर्धारित आधार-रेखा (बेसलाइन) से अधिक लोगों को नौकरी पर रखने वाले नियोक्ताओं को हर नए कामगार के लिए महीने में 3,000 रुपये तक मिलते हैं। ये शर्तें कुछ इस तरह तय की गई हैं कि छोटी कंपनियां भी इसके दायरे से बाहर हो जाने के बजाय इसमें शामिल हो सकें।

यह योजना भर्ती संबंधी सब्सिडी वाले आम व निराशाजनक तरीकों से इसलिए अलग और बेहतर है क्योंकि इसमें पहला लाभ मिलने से पहले छह महीने तक लगातार नौकरी करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहली बार काम करने वाले को नौकरी पर रखने का लाभ तभी मिलता है जब वह कर्मचारी काम में कुशल बन जाए और टिका रहे। यह शर्त शुरुआती भर्ती को एक पक्की प्रतिबद्धता में बदल देती है, जिससे नियोक्ता को प्रशिक्षण की लागत वसूलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और कर्मचारी को भी उतने महीने मिल जाते हैं जिनमें वह असली हुनर सीख सके ​​और भरोसेमंद रिकॉर्ड बना सके। इस तरह, यह योजना केवल नौकरी देने के लिए नहीं बल्कि कर्मचारी को बनाए रखने की अपेक्षाकृत अधिक कठिन प्रक्रिया के लिए पुरस्कृत करती है और इसके बाद कर्मचारी के पास रोजगार क्षमता एक ऐसा ट्रैक रिकॉर्ड होता है जिसका वह कहीं भी सदुपयोग कर सकता है।

इस योजना का सबसे अधिक झुकाव मैन्यूफैक्चरिंग की ओर है, जहां नियोक्ता को मिलने वाला प्रोत्साहन दो वर्ष के बजाय चार वर्ष तक मिलता है। समय-सीमा को दोगुनी करने का यह निर्णय औद्योगिक क्षमता तैयार होने में लगने वाले अधिक समय को ध्यान में रखकर लिया गया है। साथ ही, इससे निर्माता (मैन्यूफैक्चरर) समय से पहले स्वचालित व्यवस्था (ऑटोमेशन) लाकर कामगारों को हटाने के बजाय श्रमशक्ति बढ़ाने की ओर प्रेरित होते हैं। अहम बात यह है कि सरकार ने इसे देश को वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग केन्द्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने की दृष्टि से जरूरी माना है। ईपीएफओ ​​के जरिए, हर नए कामगार को एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर मिलता है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा का पहली बार अहसास होता है। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले बहुत कम कामगारों को यह सुरक्षा मिल पाती है। इस योजना के शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं। इसके शुरू होने के बाद से लगभग 60 लाख नए कर्मचारी नामांकित हुए हैं। इनमें से अधिकतर 30 वर्ष से कम आयु के हैं और 18 लाख से अधिक महिलाएं हैं। वहीं, लगभग 1.77 लाख प्रतिष्ठानों ने 66 लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित किए हैं। इन प्रतिष्ठानों में कई ऐसी छोटी कंपनियां शामिल हैं, जहां लंबे समय से अनौपचारिक काम का बोलबाला रहा है।

हालांकि, एक अच्छी शुरुआत को पूरी तरह से सफल बदलाव मान लेना नासमझी होगी। इस योजना में धोखाधड़ी में शामिल कंपनियों को बाहर रखने, हर छह महीने में इलेक्ट्रॉनिक रिटर्न के जरिए यह सुनिश्चित करना कि नौकरी सिर्फ कागजों के बजाय असल में बनी हुई है और भुगतान की स्वचालित प्रणाली जैसी कई अच्छी बातें हैं। ये सभी खूबियां इस बात को दर्शाती हैं कि योजनाकारों को इस बात का अहसास है कि ऐसी योजना में उन भर्तियों को लाभ नहीं मिलना चाहिए जो अन्यथा भी हो जातीं। इसकी असली सफलता पहले वर्ष में नामांकित लोगों के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से पता चलेगी कि वे नौकरियां उस प्रोत्साहन के समाप्त होने के बाद भी बनी रहती हैं या नहीं और इससे पैदा होने वाली मांग को पूरा करने के लिए काम के लायक युवा मौजूद हैं या नहीं। इसीलिए, इस योजना की सफलता कौशल को सिखाने में किए जा रहे निवेश से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

यह याद रखना ज़रूरी है कि बेरोजगारी सिर्फ आमदनी से ही वंचित नहीं करती, बल्कि यह लोगों के हुनर, आत्म-सम्मान और समाज में उनकी हैसियत को भी कमजोर करती है। वोल्टेयर ने भी यही बात कही थी जब उन्होंने कैंडिड के जरिए यह निष्कर्ष दिया था कि काम करने से तीन बड़ी समस्याएं – बोरियत, बुराई और अभाव – दूर रहती हैं। इस तरह की योजना की अहमियत इसलिए है क्योंकि यह रोजगार के सही और संपूर्ण मतलब को समझती है। यह औपचारिक नौकरी को सिर्फ गिनती के आंकड़े के तौर पर नहीं, बल्कि कामकाजी जीवन की पहली सुरक्षित
सीढ़ी के तौर पर देखती है। अब जबकि भारत 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है, तो चुनौती इस बात की है कि इस योजना में दिखाई गई धैर्य की भावना को बनाए रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि युवाओं को सार्थक रोजगार, जिसे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय परियोजना के केन्द्र में रखा है, कुछ समय के प्रोत्साहन तक सीमित रहने के बजाय एक पूरी पीढ़ी के लिए टिकाऊ, उत्पादक और सम्मानजनक काम के रूप में मिले।

(लेखक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

दक्षिण एशिया में रोजगार और विकास की नई राह बनेगा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र: विश्व बैंक

कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रणालियों में निवेश से खुलेंगे आर्थिक विकास के नए अवसर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

विश्व बैंक समूह ने कहा है कि दक्षिण एशिया अपने विकास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां हर वर्ष लाखों युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में स्थायी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गया है। विश्व बैंक के अनुसार कृषि से आगे बढ़कर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और मूल्यवर्धन आधारित खाद्य प्रणालियों का विस्तार रोजगार, निवेश, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के व्यापक अवसर प्रदान कर सकता है।

विश्व बैंक समूह ने बताया कि दक्षिण एशिया का कृषि क्षेत्र सालाना 700 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का है और क्षेत्र के लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है। इसके बावजूद कृषि का क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 16 प्रतिशत है। चिंता की बात यह है कि क्षेत्र में उत्पादित कुल खाद्य पदार्थों का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हर वर्ष बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 30 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है।

विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि परिवर्तन का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, सप्लाई चेन, विपणन और मूल्यवर्धन गतिविधियों के विस्तार से लाखों नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। इससे खाद्य हानि कम होगी और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 1950-51 के 51 मिलियन टन से बढ़कर आज 330 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। वहीं पिछले दशक में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात लगभग 4.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 10 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के विनिर्माण मूल्यवर्धन में लगभग 9 प्रतिशत और कुल निर्यात में करीब 13 प्रतिशत योगदान दे रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि प्रभावी नीतियां और लक्षित निवेश कृषि मूल्य श्रृंखलाओं को बदल सकते हैं। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकरण योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना जैसी पहलों ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व बैंक समूह ने कहा कि तीव्र शहरीकरण, बढ़ता मध्यम वर्ग, समृद्ध कृषि जैव-विविधता और सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग दक्षिण एशिया को खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए विश्व बैंक समूह एग्रीकनेक्ट और सैपलिंग जैसी पहलों पर काम कर रहा है। एग्रीकनेक्ट का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 3 करोड़ किसानों को बाजारों से जोड़ना है, जबकि सैपलिंग सरकारों, निवेशकों, उद्योग जगत और विकास साझेदारों को एक मंच पर लाकर नीति सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

नीति संवाद में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स हब, प्रोसेसिंग क्लस्टर और कृषि-औद्योगिक पार्कों में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही डिजिटल तकनीकों के उपयोग, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने और कौशल विकास कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता भी बताई गई।

यह विचार दो दिवसीय क्षेत्रीय उच्च स्तरीय नीति संवाद मूल्य को उजागर करना: दक्षिण एशिया में रोजगार सृजन और सतत विकास के लिए खाद्य प्रसंस्करण को आगे बढ़ाना” के उद्घाटन अवसर पर सामने आए। इस कार्यक्रम का आयोजन 9 जून 2026 को अहमदाबाद, गुजरात में भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और विश्व बैंक समूह की सैपलिंग पहल के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स, निवेशकों और दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिनिधियों सहित लगभग 200 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं, जो क्षेत्र में मजबूत, समावेशी और दीर्घकालिक खाद्य प्रणालियों के निर्माण पर चर्चा कर रहे हैं।